सोमवार, 30 अगस्त 2010

A GREAT MOTHER OF INDIA!!!

By Nirmal Kumar, Mumbai, India

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

"ओछी प्रीत छिनाल की....."



साथियो,
आजकल हमारी हिंदी में छिनाल प्रसंग का टीआरपी टॉप पर है!

एस डब्ल्यू फालोन की
"अ न्यू हिन्दुस्तानी इंग्लिश डिक्शनरी विद इलस्ट्रेशंस फ्रॉम हिन्दुस्तानी लिटरेचर एंड फोक लोर" 
को पलटते हुए
मेरी जिज्ञासा 'छिनाल' शब्द पर जा अटकी.

सन 1889 में यह डिक्शनरी लन्दन से छपी थी
जिसे बाद में भारती भण्डार, इलाहाबाद ने भी मुद्रित किया.
आप सब जानते हैं
फालोन साहब कई साल तक हिन्दुस्तान
ख़ासकर बिहार में रहे थे
और यहाँ के फोक लोर का अध्ययन किया था.

बहरहाल, उन्होंने 'छिनाल' शब्द का विश्लेषण करते हुए
एक कविता की ये दो पंक्तियाँ उद्धृत की है.
गौर फरमाइए : 

"ओछी पीत (प्रीत) छिनाल की निभे न काहू साथ, 
नाउ   की   सी  आरसी   हर   काहू   के   हाथ." 

हिन्दी की एक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित एक साक्षात्कार के बाद
छिनाल प्रसंग पर हुए विवाद के सन्दर्भ में
आप इन पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कर सकते हैं!

शुक्रिया.
शशिकांत

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

साहित्य से खत्म होते गाँव और किसान

मित्रो,

लेखक अपने समय और समाज का अगुआ होता है!

जब ग्लोबलाइजेशनी विकास से लबरेज राजधानी  बारिश से पानी-पानी हो रही हो
और मुल्क़ के सबसे पिछड़े राज्य (बिहार)
की करोड़ों जनता पर
अकाल का पहाड़ टूट पड़ा हो ,

जब हिन्दुस्तान के सिरमौर कश्मीर का एक हिस्सा लेह
और पड़ोसी मुल्क़ में आई प्राकृतिक आपदा से
जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो,

जब डेढ़ सौ करोड़ से शुरू हुआ कॉमनवेल्थ गेम्स का बजट
1 लाख करोड़ पहुँच गया हो
और उसमें भ्रष्टाचार के मामले-दर-मामले सामने आ रहे हों,

जब 1 सौ करोड़ से ज्यादा मुल्क़वासियों का पेट भरनेवाला किसान
खेती छोड़ने को बाध्य हो रहा हो,
फटेहाल हो
और आत्महत्या कर रहा हो
और उस मसले पर बनी 1 फिल्म (पीपली लाइव) पर बहस हो रही हो.

वैसे दौर में एम्पावर्ड लेखकों की दो जमातें
अपने अपने वर्चस्व जमाने की ख़ातिर
पावर डिस्कोर्स कर रही हों- 
इस पर हमें शर्मिंदा होना चाहिए.
इतिहास यह सवाल हम सबसे पूछेगा बेशक!

खैर,
'पीपली लाइव' फिल्म से मुल्क के किसानों
और गाँवों की बदहाली की शुरू हुई बहस को
साहित्य और पत्रकारिता (प्रिंट मीडिया) की बहस
बनाने का आगाज़ करते हुए मैंने
अपने बड़े भाई और मित्र विमल झा से
'दैनिक भास्कर' में यह लेख प्रकाशित करने का अनुरोध किया.
21 अगस्त के 'दैनिक भास्कर' के ऑप-एड पेज पर छपे इस लेख को आप भी पढ़ सकते हैं.
शुक्रिया. 
शशिकांत
साहित्य से खत्म होते गाँव और किसान 

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ग्रामीण जन-जीवन और किसानों की समस्या पर आजकल हमारे साहित्यकारों और पत्रकारों का कम ही ध्यान जाता है. बड़ी तेजी से हो रहे शहरीकरण के बावजूद भारत की  अधिकाँश जनता अभी भी गाँवों में रह रही है और खेती-बाड़ी एवं पशुपालन ही उनकी रोज़ी-रोटी का मुख्य जरिया है.

हमारे देश में वातावरण, मौसम, जमीन, अनाज, खेती-बाड़ी के तौर-तरीके आदि में इतनी विविधता (जो हमारी कृषि संस्कृति का निर्माण करते हैं) है कि यदि हम यहाँ कृषि को उद्योग बनाना चाहें तो हमारा देश संसार के सर्वोत्तम देशों में एक होगा. बहुत प्रयासों के बाद और तमाम गुण-दोषों के बावजूद हमने खाद्यान्न के मामले में स्वावलंबन पा लिया था लेकिन गलत सरकारी नीतियों के कारण देश में फिर से खाद्यान्न संकट और महंगाई पैदा हो रही है.

इसका मूल कारण यह है कि हमारे देश में विकास और बढ़ोतरी के अंतर को ठीक से समझा नहीं जा रहा है. बढ़ोतरी को विकास नहीं कहा जा सकता. देश में जीडीपी के ग्रोथ और अरबपतियों के बढ़ने का मतलब यह नहीं कि यहाँ विकास हो रहा है बल्कि इन सब के कारण गरीब और अमीर के बीच खाई बढ़ रह रही है. बढ़ोतरी का जब जनता के बीच ठीक से वितरण होता है तब वह विकास कहलाता है.

पी. वी. नरसिंह राव के समय से जब से मनमोहन सिंह ने इस देश का वित्त संभाला है तब से समाजवादी सपनों को सरकारी नीतियों के माध्यम से एक-एक कर तोड़ा जा रहा है. हमारे यहाँ आजादी के बाद से देखे जा रहे इस समाजवादी सपने को गढ़ने में गाँधी, नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश, मौलाना आजाद, आम्बेडकर, डांगे, नम्बूदरीपाद जैसे नेताओं ने गढ़ा था, और तमाम तरह के आपसे मतभेदों के बावजूद ये सभी समाजवादी थे.

इस लिहाज से देखें तो आज हमारे देश में देश की जमीन और देश की जनता से सरोकार रखने वाला नेता नाम का कोई व्यक्ति नहीं है. बड़े ही सुनियोजित षड़यंत्र  रच कर और चालाकी से समाजवादी नीतियों के तहत दिए गए अधिकार और सुविधाएं देश की जनता से एक-एक कर चीने जा रहे हैं. गाँव और खेती की जमीन का जबरन अधिग्रहण कर शहर और राजमार्ग बनाए जा रहे हैं और कारपोरेट घरानों को दिया जा रहा है. सबको गाँव और खेती छोड़कर शहर आने के लिए बाध्य किया जा रहा है.

आज कोई आदर्श, बलिदान, त्याग जैसे मानवीय मूल्यों की बात ही नहीं करता. ख़ूब पैसे कमाओ और ऐश-मौज करो - यही हमारा आख़िरी उद्देश्य रह गया है. इसने हमारी चेतना और हमारी राजनीति को बिगाड़ कर रख दिया है. धूमिल ने कहा था कि ये लोग हमारी भाषा बिगाड़ रहे हैं. और जब कोई हमारी भाषा बिगाड़ता है तो वह हमारा मन भी बिगाड़ देता है.

गाँव की तरफ  बिल्कुल ध्यान न देने का मतलब है किसानों पर ध्यान न देना. नंदीग्राम, सिंगूर से लेकर मथुरा-अलीगढ, हर जगह किसानों से खेती कि जमीन छीनी जा रही है. देश के हर जगह पर छोटा-छोटा कस्बा भी शहर बनने का स्वप्न देख रहा है. महानगरों के आसपास के किसानों की जमीनें ली जा रही हैं. फिर जमीन जाने के बाद वे आत्महत्या कर रहे हैं.

 इतना ही नहीं बीज और नई-नई कृषि टेक्नोलॉजी भी आयात किए जा रहे हैं. सरकार को न किसान से मतलब है, न पर्याप्त अनाज उत्पादन की, न गोदामों में अनाज सड़ने की, और न महंगाई बढ़ने की चिंता है. शहरो में फलों और सब्जियों कि इतना प्रदूषित कर दिया गया है कि वे खाने लायक नहीं रह गई हैं.

सरकार में विषमता बढाने का उन्माद है. जनता के खाने-पीने कि उसे कोई चिंता नहीं है. इस देश के नेताओं की नैतिकता का हाल यह है कि संसद में कहा जाता है कि विकास होगा तो थोड़ा-बहुत भ्रष्टाचार तो होगा ही.

अब गाँव और खेती-बाड़ी जब सुनियोजित ढंग से ख़त्म किये जा रहे हैं तो लोग रोज़ी-रोटी की खोज में शहर और महानगर आ रहे हैं. अन्य पढ़े-लिखे लोगों की तरह हिन्दी के साहित्यकारों का एक तबका भी दिल्ली की ओर देख रहा है. दिल्ली के अलावा भोपाल, मुंबई आदि महानगर आजकल साहित्य के केंद्र हैं. 

इस समय हिंदी साहित्य नया ट्रेंड यह आया है कि ऐसा साहित्य लिखा जाए  जो ग्लोबल हो यानी जो अंग्रेजी में अनूदित हो, जो अमेरिका और यूरोप में रहनेवाले लोगों को पसंद आए. इस समय अचानक विदेश में हिंदी के पुरस्कारों कि बाढ़ आ गई है.

हमारे गाँव, हमारी जड़, हमारी बोलियाँ-भाषाएँ, हमारे आदिवासी, खानाबदोस जनजातियों के विविधतापूर्ण जनजीवन और उनकी जीवन स्थितियों को लेकर कितना नया और उत्कृष्ट साहित्य लिखा जा सकता है. लेकिन उनकी उपेक्षा की जा रही है. दरअसल पूंजीवादी गिरफ़्त में आ गए हैं हमारे लेखक. सबकुछ चाहिए उन्हें. यश भी. सिर्फ पैसा और पोलिटिकल पोस्ट ही पावर नहीं होता, यश भी पावर होता है.

स्वाधीनता आन्दोलन के समय गांधी कहते थे कि हमारा भगवान गाँवों में रहता है. प्रेमचंद का लगभग पूरा साहित्य गाँव और किसानी जन-जीवन को आधार बनाकर लिखा गया है. आजादी के बाद फनीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों और कहानियों में किसानी और ग्रामीण संस्कृति को व्यापक अभिव्यक्ति मिली. ग्राम-कथाओं और ग्राम-कविताओं का भी दौर आया. 

हिंदी की उन रचनाओं में गाँव और किसानी जन-जीवन के साथ-साथ ऋतुओं, फसलों, नदियों, इनसे जुड़े गीतों, पर्व-त्योहारों आदि का भी वर्णन मिलता था लेकिन हमारे हिंदी साहित्य से ये सब धीरे-धीरे ग़ायब हो रहे हैं. चूंकि हमारे लेखक जमीन से कटते जा रहे हैं इसलिए किसानों और गानों के समस्या अब उनके लिए ख़ास मायने नहीं रखतीं.

दलित और स्त्री लेखन को मैं आजादी के बाद हिंदी साहित्य की दो बड़ी उपलब्धि मानता हूँ लेकिन ताज्जुब है कि उनके लेखन में भी गाँव, ग्रामीण और किसानी संस्कृति आदि नहीं के बराबर आ रहे हैं. दलित साहित्य में स्त्री विचित्र रूप में आ रही है. असल में दलित और गरीब स्त्रियाँ अभी लिख नहीं रही हैं. आलो आंधारि अपवाद हैं, आज जो लिख रही हैं वे अच्छी-अच्छे साड़ियाँ पहनने वाली औरतें हैं. जब दलित और गरीब औरतें लिखने लगेगी तब वे ये सब भी दर्ज करेंगी, ऐसी मुझे उम्मीद है.

अभी हाल में मैंने पंजाबी के लेखक रामस्वरूप अणखी का उपन्यास 'सल्फास' पढ़ा है. पिछले दिनों उनकी मौत हो गई. 'समकालीन भारतीय साहित्य' में अरुण प्रकाश ने तेलगु के वरिष्ट लेखक केशव रेड्डी का 'भू देवता' उपन्यास भी छापा था. उसे भी मैंने पढ़ा है. हिन्दी में प्रेमचंद किसानों की जमीन चले जाने की वेदना को गहराई से समझते थे. प्रेमचंद का होरी जमीन बेच कर जब बेटी की शादी करता है है तो बेटी और जमीन दोनों एक हो जाता है.

उन्हीं के 'रंगभूमि' उपन्यास का सूरदास जमीन के लिए काफ़ी संघर्ष करता है. सूरदास दलित है, किसान है और विकलांग है. इस लिहाज से देखें तो आज के दलित चित्रण और प्रेमचंद के दलित चित्रण में कितना फर्क है. 'रंगभूमि' के सूरदास का संघर्ष बहुत बड़ा सांस्कृतिक सन्देश है.

यह बहुत चिंता की बात है कि आज हमारे कथा साहित्य, कविता और ख़ास तौर पर नाटकों से किसानी जन-जीवन पूरी तरह से ख़त्म होता जा रहा है हमारे नाटककारों ने लोरिकायन, चनैनी, नाचा,-ये सब छोड़ दिया है. गाँव की कहानी जब जाएगी तो गाँव भी चला जाएगा. जो जमीनी समस्या है यदि हमारे लेखक उस पर ध्यान देंगे तो किसानों की समस्या, उसका हर्ष-विषाद, वहां के चरित्र सबकुछ आ जाएंगे.

इस देश का विकास सिर्फ आर्थिक विकास नहीं बल्कि सांस्कृतिक विकास भी होना चाहिए, वह तभी संभव है जब यहाँ की किसानी संस्कृति का विकास होगा. यह समझ हमारे वर्तमान और भविष्य के भारत के लिए जितना पथ निर्देशक बना रहे उतना अच्छा है.

(विश्वनाथ त्रिपाठी से शशिकांत की बातचीत पर आधारित, 21 अगस्त, 2010 के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित )

शनिवार, 21 अगस्त 2010

पीपली लाइव इसलिए अच्छी नहीं लगी.....

  • आत्महत्या करने वाले बिना किसी को बताए चुपके से आत्महत्या कर लेते हैं, किसी को बताते नहीं, जो बताते हैं वे शोले के वीरू की तरह तमाशा करते हैं. नत्था और उसका भाई ऐसे शातिर और चालाक किसान हैं जो आत्महत्या का नाटक रच कर सबको पगला दिए हैं.
  • हिन्दुस्तान ही नहीं, पाकिस्तान की या किसी अन्य मुल्क़ की शायद (अपवाद में गिनी-चुनी) ही कोई पत्नी मुआवजे कि ख़ातिर अपने पति के मरने के फ़ैसले को आसानी से स्वीकार कर लेगी- मरना चाह रहे हो, पता नहीं, उसे बाद भी मुआवज़ा मिलेगा कि नहीं.
  • जो साथी इसे व्यंग्य कि उत्कृष्ट फिल्म बता रहे हैं वे पता नहीं भीष्म साहनी का बहुचर्चित नाटक 'मुआवज़े' (एन.एस.डी. के कई शो देखे हैं मैंने, गज़ब का नाटक है) देखे हैं या नहीं, मैंने परसाई का व्यंग्य 'भोलाराम का जीव' पढ़ा है, शरद जोशी को भी थोड़ा-बहुत, और चार्ली चैप्लिन इज माय फेवरेट.  हाँ ये संभव है कि मुझे व्यंग्य की समझ नहीं.
  • मीडिया के इतिहास में कोई घटना तब तक खबर नहीं बनती जब तक वो घट नहीं जाती, ख़ासकर इलक्ट्रोनिक मीडिया के लिए. अव्वल ये कि हिन्दुस्तान में रोज़ हज़ारों घटनाएं मीडिया रिपोर्टिंग से महरूम रह जाती हैं, बिना घटी घटनाओं कि रिपोर्टिंग का तो सवाल ही नहीं उठता.
  •  हमारे मुल्क़ की मीडिया महानगर और शहर केन्द्रित है, गाँव और क़स्बे से उसका नहीं के बराबर सरोकार है. पीपली लाइव में मीडिया के इस बुनियादी सच को उलट दिखाया गया है.
  • चुनावी संहिता के रहते किसी एक व्यक्ति ही नहीं सामूहिक हित का भी कोई सरकारी डिसीजन नहीं लिया जा सकता, रूटीन कामकाज को छोड़कर.
  • आफ्टर पार्टीशन हिन्दुस्तान के ६२ साल के इतिहास में कोई भी कस्बाई स्तर पर बिना घटे कोई घटना तो दूर घटने के बाद भी चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दा नहीं नहीं बना, पीपली लाइव फिल्म को छोड़ कर.
  • टीवी रिपोर्टर कामचोर होते हैं, ख़ासकर महिला टीवी रिपोर्टर. वे घटना कि जगह पर आईने लेकर सजती-संवारती हैं, फीड में दीन-रात भूखे-प्यासे ख़ाक छानने वाले दीपक चौरसिया जैसे सीनियर रिपोर्टर को ख़बर के इम्पोर्टेंस की समझ नहीं, ज़मीनी सच से दूर दफ्तर में बैठा बॉस उसे हड़काता है कि उसेप्राइम टाइम में ये ख़बर चाहिए, चुनाव का नेशनल इश्यू नहीं, बकवास दि ग्रेट. काश, ऐसा होता!                                                                          
     ( शेष अगली डाक में)

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

'पीपली लाइव' देखने के बाद ....

वीरू : “कूद जाऊँगा...फाँद जाऊँगा... मर जाऊँगा…हट जाओ...”
गाँव वाला -१ : “अरे-अरे ये क्या कर रहे हो?”
वीरू : “वही कर रहा हूँ जो मजनूं ने लैला के लिए किया था, रांझा ने हीर के लिए किया था, रोमियो ने जूलियट के लिया था, सुसाइड, सुसाइड…
गाँव वाला-२ : “अरे भाई ये 'सुसाइड' क्या होता है?”
गाँव वाला-३ :"अँग्रेज़ लोग जब मरते हैं तो उसे 'सुसाइड' कहते हैं.”
 
गाँव वाला-२ : “लेकिन ये अँग्रेज़ लोग मरते क्यों हैं?”
गाँव वाला-३ : “वो….” 
गाँव वाला -१ : “अरे भाई बात क्या है? तुम सुसाइड क्यों करना चाहते हो?”
वीरू : “ये मत पू्छो चाचा, तुम्हारे आँसू निकल आएँगे. ये बड़ी दुख भरी कहानी है. इस स्टोरी में इमोशन है, ड्रामा है, ट्रेजडी है!!!"

#शोले

“हम किसानों पर फिल्म बनाने चले थे लेकिन बन गई मीडिया पर…!”

# महमूद फारूकी (सह-निर्देशक, ‘पीपली लाइव’)

मित्रो,
आमिर ख़ान प्रोडक्शन के बैनर तले अनूषा रिज़वी और महमूद फारूकी के निर्देशन में अभी हाल में रीलीज़ हुई फिल्म ‘पीपली लाइव’ की कहानी किसानों की आत्महत्या के इर्द-गिर्द घूमती है.

मैने जो पढ़ा है, पिछले सालों में किसानों की 'सुसाइड' करने की जो भी घटनाएँ घटी हैं और घट रही हैं वे महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में ज़्यादातर.

मेरा मानना है कि ये सुसाइड उन किसानों ने की है और कर रहे हैं जो व्यावसायिक खेती कर रहे थे/हैं, और जो बॅंक लोन के जाल में फँस गये थे/हैं.

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे ग़रीब राज्यों के किसान चाहे जितने भी बदहाल, फटेहाल और लाचार हों और भारी से भारी तकलीफ़ में जी रहे हों लेकिन वे आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाते.

आख़िर क्यों?

मुझे खेद है कि ’पीपली लाइव’ फिल्म में किसानों की आत्महत्या की समस्या को ग़लत पृष्ठभूमि में पेश किया गया है, 'शोले' के वीरू (धर्मेंद्र) की तरह सुसाइड का ख़ूब ड्रामा करते हैं दोनों भाई, और भी बहुत से झोल हैं फिल्म में...वो सब अगली डाक में...!

बुधवार, 18 अगस्त 2010

आज 2 अक्टूबर है, बापू का जन्मदिन...!

आज 2 अक्टूबर है, बापू का जन्मदिन...!

30 जनवरी सन 1948
नव-स्वाधीन भारत का काला दिन
दक्षिणपंथी विचारधारा से
ताल्लुक रखने वाले
एक दिग्भ्रमित युवक  ने
(मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता)
हमारे बापू को
हमसे छीन लिया था.

आज तक बापू को,
बापू के बारे में
(खिलाफ़ और पक्ष में)
बहुत कुछ पढ़ा, सुना
और कुछ फ़िल्में भी देखी

अभी-अभी
फेसबुक पर विचरते हुए मुझे
बापू के आख़िरी क्षण का
फोटो मिला है-

(उसके दाएं हाथ में है पिस्तौल
उंगली घोड़े पर
बहस कर रहा है बापू से
फिर गोलियां चलाएगा!
......................
हे राम!)

आप सब भी देख सकते हैं!


शुक्रिया.
- शशिकांत 

सोमवार, 16 अगस्त 2010

किसान विरोधी है फिल्म पीपली लाइव


"फिल्म में दिखाया गया है कि पैसे की खातिर किसान आत्महत्या करते हैं. यह सरासर ग़लत है. लगातार फसल खराब होने और बैंक के क़र्ज़ न चुका पाने की वजह से मज़बूर होकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं..." आत्महत्या करनेवाले एक किसान की बेवा ने कैमरे के सामने कहा. 

विदर्भ में पंद्रह अगस्त, रविवार को आमिर ख़ान के विरोध में हज़ारों किसानों ने प्रदर्शन किया. 

आत्महत्या करनेवाले किसानों की विधवाओं, उनके अनाथ बच्चों और उनके परिवार के सदस्यों ने आज आमिर ख़ान का पुतला फूँका. 

ये क्या कर दिया आपने आमिर भाई, अनूषा जी और महमूद भाई? 

एक लाख रुपये की खातिर किसान आत्महत्या करते हैं? 

एक ग़रीब किसान का भाई ही पैसे के लोभ में अपने भाई को आत्महत्या करने के लिए बाध्य करता है? 

भाई-बहन, वाकई आपने ये सब यदि फिल्म में दिखाया है तो भयानक है. 

आपकी यह फिल्म पूरी तरह किसान विरोधी है. 

अरे, आप दिल्ली, बम्बई वाले  क्या जानें किसानों को? 

नहीं कुछ तो यह फिल्म बनाने से पहले प्रेमचंद की "पूस की रात" कहानी ही पढ़ लेते. 

आपलोगों ने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया.


हिन्दुस्तान के किसान ईश्वर, खुदा, जीसस या कहें वाहे गुरु होते हैं. किसानों को अमूमन मुनाफ़ा नहीं होता. वे नो प्रॉफिट नो लौस पर खेती करते हैं. 

जो फसल उपजाते हैं, उसे खुद नही खाते, गाय-भैंस पोसते हैं लेकिन सारा दूध बेच देते हैं,ना खुद खाते ना अपने मासूम बच्चों को खिलाते हैं, मज़बूरन.

(मैं बिहार के एक किसान परिवार से हूँ और मेरे तीनों बड़े भाई खेती करते है. उन तीनों की सालाना आमदनी से ज़्यादा अकेली मेरीसालाना आमदनी है. जबकि मेरे पास दिल्ली में  कोई नौकरी नहीं है, फ्रीलांसिंग करता हूँ.)


..और ऐसे किसानों का आपने अपनी "पीपली लाइव" फिल्म में मज़ाक उड़ाया है? 

आपलोगों ने ठीक से  होमवर्क नहीं किया.यह अच्छी बात नहीं है आमिर भाई, अनूषा रिज़वी और महमूद फारूकी जी. 

माफ़ कीजिएगा.
-शशिकांत

रविवार, 15 अगस्त 2010

टोटली पावर डिस्कोर्स है 'छिनाल' प्रसंग

साथियो,

हिन्दी समाज में छिनाल प्रसंग पर छिड़े गृह-युद्ध में आख़िरकार अभय तिवारी, रविकान्त और अविनाश दास
(बरास्ते दीवान) भी शामिल हो ही गये, लेकिन एक अलग दृष्टिकोण के साथ.

इस मसले पर इसी दृष्टिकोण से बहस की दरकार थी और है.


आप तीनों की राय जान कर तो ऐसा लग रहा है कि 'छिनाल' शब्द पर बवाल मचा रही देहवादी लेखिकाएँ अपने पैरों पर ही टांगी चला रही हैं.

'छिनाल' शब्द को स्त्री के लिए अपमान मानना स्त्री को पवित्र, पतिव्रता, देवी आदि बनाए रखना ही है, इंसान के तौर पर स्वीकार करना नहीं. यह पुरुषवादी मानसिकता है.

इस लिहाज से दोनों पक्ष एक ही रास्ते के मुसाफिर हैं, इस बहस में.

फिर क्या हस्र होगा हिंदी में स्त्री लेखन का? कैसे मिलेगी हिन्दुस्तान की  50 करोड़ स्त्रियों को पुरुष सत्ता से मुक्ति?

मेरा मानना है कि हमारे समाज के हाशिए के जो भी वर्ग, समूह या तबके पिछले सालों में एम्पावर्ड हुए हैं वे  कुछ ज़्यादा ही ख़ुदग़र्ज़ और गैर ज़िम्मेदार हैं, और धन व ताक़त का भौंडा प्रदर्शन व दुरुपयोग कर रहे हैं. 


जिस सामाजिक-आर्थिक ढाँचे की जलालत को झेल कर ये यहाँ पहुँचे हैं, खुद भी वैसा ही सलूक कर रहे हैं, 'दूसरों' ही नहीं 'अपनों' के साथ भी. (मध्य  वर्ग, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श में ख़ासतौर पर यह देखा जा रहा है.) 



कम से कम अब इन्हें उछल-कूद मचाना छोड़ कर गंभीर हो जाना चाहिए.  बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है इनके कंधे पर.


वैसे, 'छिनाल' प्रसंग में दोनों पक्षों को स्त्री के अपमान या सम्मान से कोई लेना-देना नहीं, यह टोटली पावर डिस्कोर्स है.

हिन्दी के ताकतवर लेखकों, प्रोफेसरों, लेखक संगठनों, प्रकाशनों वग़ैरह की सत्ता की लड़ाई है यह, जो तय करते हैं कि कौन-कौन लोग किस-किस वि.वि., साहित्यिक संस्था, आकदेमी में कैसे घुसाए जाएँगे या निकाले जाएँगे और कौन-कौन से पुरूस्कार किसे-किसे दिलवाए जाएँगे.

शायद फिराक़ साहब ने इन्हीं के लिए लिखा था :

"जो कामयाब हैं दुनिया में उनकी क्या कहिये 
है इससे बढ़ कर भले आदमी कि क्या तौहीन" 

माफ़ कीजिएगा मुल्क की मुख्यधारा की राजनीति से भी भयानक हो गई है हिन्दी की राजनीति!

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स में मेहमाननवाजी के टिप्स

मित्रो,
कॉमनवेल्थ गेम्स में अब सिर्फ पचास दिन बाकी रह गए हैं. तैयारियों में देरी, घोटाले आदि पर हो रही राजनीति से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम इस खेल को सुचारू ढंग से संपन्न कराने में योगदान करें, खास कर हम दिल्लीवासियों के कंधे पर बड़ी ज़िम्मेदारी है.

इस तैयारी के दौरान जो भी त्रुटियाँ हुईं हम उन पर गेम के बाद वाद, विवाद, संवाद, जांच और सजा आदि तय करेंगे. आख़िर हम एक लोकतांत्रिक मुल्क़ के नागरिक हैं. 
बहरहाल, खिलाड़ियों क साथ-साथ दुनिया भर के लाखों लोग हमारे  दिल्ली शहर में तशरीफ़ ला रहे हैं. हम हिन्दुस्तानियों को मेहमाननवाजी  की  महान परम्परा विरासत में मिली है. 

आज ही बीबीसी हिंदी.कॉम पर दो साल बाद लंदन में होनेवाले ओलंपिक खेल के दौरान दुनिया भर से ब्रिटेन आने वाले मेहमानों का स्वागत ठीक से हो इसके लिए वहां कि पर्यटन एजेंसी के अधिकारियों ने एक गाइड जारी की है.

इस गाइड के जारी करने का उद्देश्य यह है कि ओलम्पिक के दौरान दुनिया भर से ब्रिटेन आने वाले मेहमानों का स्वागत ठीक से हो. वहां के पर्यटन विभाग का मानना है कि यदि पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोग, जैसे- होटल वाले, टैक्सी वाले, दुकानदार आदि, विदेशी मेहमानों की सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ख़ास ध्यान रखें तो ओलम्पिक के दौरान ब्रिटेन को पर्यटकों से होने वाली आमदनी 60 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.

मुझे लगता है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के सन्दर्भ में ब्रिटिश पर्यटन अधिकारियों द्वारा जारी की गई यह सूची आगामी कॉमनवेल्थ गेम्स  के मद्देनज़र हमारे लिए भी अहम् मायने रखती है.
- बीबीसी हिंदी.कॉम से साभार - शशिकांत 

ब्रिटेन की राष्ट्रीय पर्यटन एजेंसी विजिटब्रिटेन की गाइड में विस्तार से बताया गया है कि किस देश के पर्यटकों से किस तरह पेश आना चाहिए. भारतीयों के बारे में भी विजिटब्रिटेन की गाइड में कई बातें कही गई हैं. जैसे-

किसी भारतीय से पहली बार मिल रहे हों तो उन्हें छूने या उनके ज़्यादा निकट जाने से बचें. यदि कोई भारतीय ज़ोरज़ोर से बोलते हुए नज़र आए या विनम्र नहीं दिखे रहा हो, तो घबराएँ नहीं...धैर्य रखें क्योंकि भारतीय आमतौर पर भीड़ और शोरगुल वाली पृष्ठभूमि से आते हैं. 

वैसे भारतीयों के बारे में गाइड में एक अच्छी बात का भी उल्लेख है कि यदि चीज़ें व्यवस्थित दिख रही हों तो भारतीय इस बात की खुल कर तारीफ़ करने से पीछे नहीं हटते.

कोई जापानी मुस्कुरा रहा हो तो कोई ज़रूरी नहीं कि वो ख़ुश ही हो क्योंकि जापानी आम तौर पर क्रोधित, उदासी या निराशा की स्थिति में मुस्कुराते हैं. किसी जापानी को घूर कर देखना या उससे आँखें मिलाना भी ठीक नहीं है. एक जापानी के सामने बैठे हों तो प्रयास इस बात का करें कि आपके जूते के सोल उन्हें नहीं दिखे.

हांगकांग के किसी व्यक्ति से बातचीत में अंगुली नहीं दिखाएँ. ज़रूरी ही पड़ जाए तो पूरे हाथ से इशारा करें. बातचीत में नाकामी, ग़रीबी या मौत के ज़िक्र से हांगकांग से आया पर्यटक आहत महसूस कर सकता है.

संयुक्त अरब अमीरात के किसी पर्यटक से ये नहीं कहें कि उसे क्या करना है...वो बुरा मान जाएगा.

दक्षिण अफ़्रीका के किसी व्यक्ति से मुलाक़ात हो तो उसके सामने भूल कर भी अपने अंगूठे को दो अंगुलियों के बीच नहीं दबाएँ क्योंकि इसे वो अश्लील इशारे के रूप में लेगा.

किसी ब्राज़ीलियन से उम्र, वेतन या शादी जैसी व्यक्तिगत बातें कभी नहीं पूछें. किसी ब्राज़ीलिन को अर्जेंटीनीयिन नहीं कहें. दोनों देशों के बीच बहुत प्रतिद्वंद्विता है.

इसी तरह कनाडा का कोई व्यक्ति ख़ुद को अमरीकी कहे जाने पर अपमानित महसूस कर सकता है.

मेक्सिको के किसी पर्यटक के साथ बातचीत में ग़रीबी, दूसरे ग्रह के जीव, भूकंप या मेक्सिको और अमरीका के बीच 1845 में हुई लड़ाई का ज़िक्र नहीं करें.
यदि 'थैंक्यू' कहने पर कोरियाई पर्यटक 'नो-नो' कहे तो घबराएं नहीं क्योंकि इस स्थिति में नहीं-नहीं का मतलब हुआ- यू आर वेलकम!

"छिनाल" प्रसंग के पीछे की राजनीति!

हममें से कुछ लोग इनफॉर्मल रूप में रोज़मर्रा तौर पर अपने घर और बाहर गाली-गलौच करते हैं- यह सच है, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक के तौर पर और एक सभ्य नागरिक के रूप में हम गाली-गलौच को फॉर्मल तौर पर कतई नही स्वीकार करते.


मैने मर्दों से ज़्यादा भद्दी गालियाँ औरतों को देते हुए देखा-सुना है, अपने बिहार के गाँव की तथाकथित 'अनपढ़', 'गँवार' औरतों से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के मानसरोवर हास्टल के प्रो. वॉर्डन और उनकी प्रो. बीवी को ("वॉर्डन की बीवी: "तुम कुत्ता हो", वॉर्डन : "तुम कुत्ती हो"...)ठिठुरती सर्दी की रात में दरवाज़े के बाहर खड़े-खड़े. औरतों के सभ्य समाज में  मर्द  लोग तो गाली देने के लिए ही पैदा होते हैं.


विनारा एक वीसी हैं, कि एक लेखक हैं या क़ि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं-उन्हें सार्वजनिक तौर पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कतई नहीं करना चाहिए था, और यदि उन्होने किया तो "एनजी" के संपादक रवीन्द्र कालिया को उसे एडिट कर देना चाहिए था. इसके लिए दोनो ज़िम्मेदार हैं बराबर. 

दोनो हमारे दौर के महान नहीं लेकिन ठीक-ठाक लेखक हैं. इन दोनो से मैं आजतक न मुखामुखम हुआ हूँ और न कभी दूरभाष पर बात की है (और किसी तरह का लाभ लेने का तो दूर-दूर तक कोई सवाल ही नहीं उठता. दिल्ली और दिल्ली यूनिवर्सिटी में रहते हुए १८ साल में नामवर सिंह, निर्मला जैन, नित्यानंद तिवारी, सुधीश पचौरी जैसों से कोई लाभ नहीं ले पाया तो इनसे क्या लूँगा).


खैर, गैर हिन्दी के मेरे कई मित्रों ने मेरे सामने विनारा के "शहर में कर्फ़्यू" और रवीन्द्र कालिया के "ग़ालिब छूटी शराब" की तारीफ़ की है. 

हिन्दी के एक मामूली पाठक और स्वतंत्र साहित्यिक पत्रकार के तौर पर मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर शुरू से अब तक राजनीति हो रही है. आज के  दौर में 'राजनीति' का मतलब गाली यानी वस्तुस्थिति से ऊपर उठकर अपने हित के लिए स्टैंड लेना है. देश के विश्वविद्यालयों, संस्थाओं, अकादमियों आदि में तीन-तिकड़म करके ही तो लोग घुसते हैं. जो घुसे ऐसे ही घुसे और छाली कट रहे हैं. अपने रिश्तेदारों, चापलूसों को घुसा रहे हैं. जो नहीं घुस पाए वे उन्हें निकलवा कर ख़ुद घुसने की फिराक में हैं. आज हमारी हिंदी में कितने महात्मा गाँधी हैं जिन्हें कालिया की जगह ज्ञानपीठ में और  विनारा की जगह म.गाँ.हिं.विवि. में बिठाएंगे? 


प्रो निर्मला जैन ने दैनिक भास्कर में कहा है कि मैंने पूरा इंटरव्यू पढ़ा है और गालियों को निकाल दें तो विनारा का इंटरव्यू स्त्रियों के पक्ष में है. उन्होंने उन लेखिकाओं जिन्होंने राजेंद्र यादव की अगुआई में देह विमर्श की कहानियाँ और उपन्यास लिख कर स्त्री विमर्शकार के रूप में सामने आयी हैं उनका विरोध किया है, और पुरुष सत्ता का विरोध किया है.


आज की तारीख में दोनों ने सार्वजनिक तौर पर माफी भी माँग ली है. हम हिन्दी वाले रहीम  की उस परंपरा के पोषक हैं जिन्होने लिखा है- "वे रहीम नर मर चुके जे कछू माँगन जात उनसे पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहीं." फिर भी उनका विरोध जारी है, और कई लोग उनके माफी माँगने के पहले प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर उनके समर्थन में खड़े थे और हैं.


मुझे लगता है कि इन दोनों के समर्थकों का अपना हित है या हो सकता है लेकिन विरोधी खेमे के कुछ लेखकों को विनारा से व्यक्तिगत खुंदक है और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जैसे कई लोगों को रवीन्द्र कालिया से. हिन्दी में क्रांतिकारी लेखक के तौर पर उभरे विष्णु खरे खरी-खोटी लिखने की लाख कोशिश करें दिल्ली में हिन्दी की गिरोहबंदी की खबर रखने वाले लोग जानते हैं कि उनकी आईआईसी में ओम थानवी से हमप्याला दोस्ती है (और १० और ११ अगस्त को जनसत्ता में इस मसले पर प्रकाशित लेख इसी के परिणाम हैं).


रही बात देह विमर्श से जुड़ी लेखिकाओं की, तो इंटरव्यू में इस्तेमाल आपत्तिजनक शब्दों को वे बहाना बना कर विरोध कर रही हैं, जबकि उनका दिल जानता है कि विनारा ने देह विमर्शपरक उनकी लेखनी पर जिस तरह से सवाल उठाए हैं उसके तईं देहवादियों का लेखन कठघरे में खड़ा हो जाता है. इसका उन्हें ज़्यादा दुःख है, और इसीलिए स्वस्थ बहस करके नहीं, उनके द्वारा प्रयुक्त गालियों के बहाने मामले को सर पर उठा लिया है.


विनारा के आपतिजनक शब्दों की निंदा करते हुए और उन्हें प्रकाशित करने वाले रवीन्द्र कालिया की भर्त्सना करते हुए, और इसके लिए दोनों के सार्वजनिक तौर पर माफी माँगने के बाद माफ़ करते हुए बहस इस बात पर होनी चाहिए जिस मुद्दे को विनारा और रवींद्र कालिया संपादित पत्रिका ने उठाया है--बहस देह विमर्श, स्त्री विमर्श, अस्मितामूलक विमर्श/विमर्शों और साहित्य के साथ इनके रिश्ते पर होनी चाहिए.


आख़िर क्यों हमारे दौड़ के बड़े लेखक और आलोचक (नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, असग़र वजाहत, उदय प्रकाश, निर्मला जैन आदि) स्त्रियों के पक्ष में क्लैसिक रचनाएँ/आलोचनाएँ लिखते हुए भी अस्मितामूलक विमर्शों को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते, इसे साहित्यिक कम राजनीतिक मसले ज़्यादा मानते हैं, क्योंकि साहित्य अलग मंच है, और यहाँ राजनीतिक मसले राजनीतिक रूप में नहीं, साहित्यिक रूप में उठाए जाने चाहिए. 

माफ़ कीजियेगा, हम इसे कुछ एम्पावर्ड स्त्रियों की निगाह से नहीं, गाँव-देहात में पुरुष सत्ता की शिकार ५० करोड़ महिलाओं की निगाह से देख रहे हैं जो रोज़-ब-रोज़ भ्रूण हत्या, बेटे-बेटियों में भेदभाव, बाल विवाह, दहेज़, सती और मार-कुटाई आदि से पीड़ित होती हैं. (मैंने अखबारों में सैकड़ों लेख इन मसलों पर लिखे हैं,और घर-परिवार का विरोध कर के २० लाख रुपये दहेज़ लेकर शादी करने से इनकार किया है,  मेरे घरवाले और दिल्ली के कई मित्र मुझे पागल समझते हैं. आज ४० साल की उम्र में कुंवारा हूँ और दिल्ली में ख़ाक छान रहा हूँ.)

आइये, हम इस मसले के बुनियादी पक्ष पर वाद, विवाद और संवाद करें. हाँ, ख़याल रहे हिंदीतर लोग भी इस मसले पर हो रही बहस पर निगाह रखे हुए हैं!!!

बुधवार, 11 अगस्त 2010

पाकिस्तान में बाढ़, सहायता के लिए यूएन की गुहार

पाकिस्तान में बाढ़
पाकिस्तान में मौजूद राहत एजेंसियों का कहना है कि अगर देश में बाढ़ से पनपे हालात से निबटने के लिए तुरंत अंतरराष्ट्रीय सहायता में बढ़ोतरी नहीं की गई तो और कई लोगों की जान ख़तरे में पड़ जाएगी.
पाकिस्तान में बाढ़ अब देश की दक्षिणी हिस्सों की ओर बढ़ रही है और हर वक़्त नए इलाक़े इसके प्रभाव में आ रहे हैं. बुधवार को सयुंक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय के लिए ताज़ा अपील जारी करेगा.

सयुंक्त राष्ट्र के आपातकालीन राहत कॉ-ऑर्डिनेटर जॉन होल्म्स ने बीबीसी को बताया, “हम फ़िलहाल 40 से 50 करोड़ अमरीकी डॉलर तक की सहायता की अपील करने वाले हैं. और ये सिर्फ़ पहले तीन महीनों के लिए एक प्रारंभिक आंकड़ा है जो मौजूदा हालात में संभव आकलन पर आधारित है.”

बड़ी त्रासदी

"हमारे लिए समस्या ये नहीं है कि कितने लोग मारे गए हैं बल्कि ये है कि कितने लोगों को सहायता चाहिए. हम कह रहे हैं कि पाकिस्तान में बाढ़ से प्रभावित लोगों की तादाद बहुत बड़ी है और ये लगातार बढ़ रही है."
- जॉन होल्म्स, सयुंक्त राष्ट्र के आपातकालीन राहत कॉ-ऑर्डिनेटर
सयुंक्त राष्ट्र का कहना है कि पाकिस्तान में आई मौजूदा बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या अब एशिया में सुनामी, दक्षिण एशिया में वर्ष 2005 में आए भूकंप और हैटी में आए भूंकप से प्रभावित लोगों से अधिक हो गई है.
जॉन होल्म्स के बीबीसी को बताया कि पाकिस्तान में मरने वालों की संख्या भले ही इन त्रासदियों से कम हो लेकिन वहां भारी संख्या में लोगों की पीड़ा कहीं ज़्यादा है.

जॉन होल्म्स ने कहा, “हमारे लिए समस्या ये नहीं है कि कितने लोग मारे गए हैं बल्कि ये है कि कितने लोगों को सहायता चाहिए. हम कह रहे हैं कि पाकिस्तान में बाढ़ से प्रभावित लोगों की तादाद बहुत बड़ी है और ये लगातार बढ़ रही है.”

पाकिस्तान में बाढ़

पाकिस्तान में बाढ़

पाकिस्तान में बाढ़

शनिवार, 7 अगस्त 2010

50 करोड़ स्त्रियों की मुक्ति बरास्ते देह विमर्श?

मित्रो,
पिछले दिनों 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित विभूति नारायण राय के विवादास्पद इंटरव्यू के मसले पर आज के 'दैनिक भास्कर' ने पूरा ऑप-एड पेज़ दिया है. प्रो निर्मला जैन ने इंटरव्यू में प्रकाशित आपत्तिजनक शब्दों पर जांच की मांग की है, लेकिन कुल मिलाकर उनके इंटरव्यू को स्त्रियों के पक्ष में बताया है.

दरअसल यह मामला अब देह विमर्श के समर्थन और विरोध - दो खेमों में बंटता दिख रहा है.

हिंदी के सीनियर लेखकों का एक तबका इस तरह के आस्मितामूलक विमर्शों का लगातार विरोध या कहें अनदेखी करता रहा है. अख़बारों के लिए बातचीत करते हुए मैने पाया है कि नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, निर्मला जैन, असग़र वजाहत, उदय प्रकाश सरीखे लेखकों ने हिन्दी साहित्य के अस्मितामूलक विमर्शों के साथ-साथ स्त्री विमर्श के राजेंद्र यादव माडल (देह विमर्श) को कभी भी ज़्यादा तवज्जो नहीं दिया.

इनमें से कई आज चुप हैं तो इसकी एक वजह यह भी है, और जो विरोध कर रहे हैं उन्हें इंटरव्यू में कहे गये आपत्तिजनक शब्द या शब्दों से है. (कृष्णा सोबती और निर्मला जैन से मैंने इस मसले पर बात की. मन्नू जी ने बिना पढ़े इस मसले पर कुछ भी बोलने से साफ़  इनकार कर दिया.) बाकी लोगों की अपनी-अपनी समझदारी और राजनीति हो सकती है.

इधर, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका, रमणिका गुप्ता सरीखी लेखिकाओं का मानना है कि देह विमर्श से ही स्त्री विमर्श शुरू होता है या कि देह विमर्श ही स्त्री विमर्श है या कि देह विमर्श स्त्री विमर्श का एक अहम हिस्सा है. मैंने इन्हें पढ़ते हुए अबतक यही समझा है.

अब जबकि विनारा ने माफ़ी मांग ली है तो मेरी रुचि विवि या संस्थान या शख्स/शख्सों के खिलाफ या पक्ष में चलाई जा रही राजनीतिक मुहिम से ज़्यादा इसमें है कि क्या देह विमर्श ही स्त्री विमर्श है? क्या हिन्दुस्तान की 50 करोड़ स्त्रियों को पुरुष सत्ता से मुक्ति दिलाने का यह सबसे बड़ा ज़रिया है? अस्मितामूलक विमर्श और साहित्य का आख़िर क्या रिश्ता है? हमारे दौर के वरिष्ठ लेखक और आलोचक (स्त्री और पुरुष दोनों) इसे तवज्जो नहीं देते हैं तो उसकी क्या वजह है? वगैरह-वगैरह.

खैर, इस मसले पर आज के 'दैनिक भास्कर' में  कृष्णा सोबती, मैनेजर पांडे, पंकज बिष्ट, विमल थोरात की प्रतिक्रिया और खुद विभूति नारायण राय की सफाई  पढ़ सकते हैं.

उम्मीद करता हूँ कि हिंदी के विश्वविद्यालयों, संस्थानों, पुरुस्कारों आदि से परहेज़ करने वाले साथी इस मसले को गाली-गलौच से बाहर निकालकर स्वस्थ बहस का रूप देंगे. ...आख़िर यह हिन्दुस्तान की 50 करोड़ स्त्रियों से जुड़ा एक गंभीर मसला है.

--  शशिकांत