"छिनाल" प्रसंग के पीछे की राजनीति!

हममें से कुछ लोग इनफॉर्मल रूप में रोज़मर्रा तौर पर अपने घर और बाहर गाली-गलौच करते हैं- यह सच है, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक के तौर पर और एक सभ्य नागरिक के रूप में हम गाली-गलौच को फॉर्मल तौर पर कतई नही स्वीकार करते.


मैने मर्दों से ज़्यादा भद्दी गालियाँ औरतों को देते हुए देखा-सुना है, अपने बिहार के गाँव की तथाकथित 'अनपढ़', 'गँवार' औरतों से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के मानसरोवर हास्टल के प्रो. वॉर्डन और उनकी प्रो. बीवी को ("वॉर्डन की बीवी: "तुम कुत्ता हो", वॉर्डन : "तुम कुत्ती हो"...)ठिठुरती सर्दी की रात में दरवाज़े के बाहर खड़े-खड़े. औरतों के सभ्य समाज में  मर्द  लोग तो गाली देने के लिए ही पैदा होते हैं.


विनारा एक वीसी हैं, कि एक लेखक हैं या क़ि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं-उन्हें सार्वजनिक तौर पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कतई नहीं करना चाहिए था, और यदि उन्होने किया तो "एनजी" के संपादक रवीन्द्र कालिया को उसे एडिट कर देना चाहिए था. इसके लिए दोनो ज़िम्मेदार हैं बराबर. 

दोनो हमारे दौर के महान नहीं लेकिन ठीक-ठाक लेखक हैं. इन दोनो से मैं आजतक न मुखामुखम हुआ हूँ और न कभी दूरभाष पर बात की है (और किसी तरह का लाभ लेने का तो दूर-दूर तक कोई सवाल ही नहीं उठता. दिल्ली और दिल्ली यूनिवर्सिटी में रहते हुए १८ साल में नामवर सिंह, निर्मला जैन, नित्यानंद तिवारी, सुधीश पचौरी जैसों से कोई लाभ नहीं ले पाया तो इनसे क्या लूँगा).


खैर, गैर हिन्दी के मेरे कई मित्रों ने मेरे सामने विनारा के "शहर में कर्फ़्यू" और रवीन्द्र कालिया के "ग़ालिब छूटी शराब" की तारीफ़ की है. 

हिन्दी के एक मामूली पाठक और स्वतंत्र साहित्यिक पत्रकार के तौर पर मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर शुरू से अब तक राजनीति हो रही है. आज के  दौर में 'राजनीति' का मतलब गाली यानी वस्तुस्थिति से ऊपर उठकर अपने हित के लिए स्टैंड लेना है. देश के विश्वविद्यालयों, संस्थाओं, अकादमियों आदि में तीन-तिकड़म करके ही तो लोग घुसते हैं. जो घुसे ऐसे ही घुसे और छाली कट रहे हैं. अपने रिश्तेदारों, चापलूसों को घुसा रहे हैं. जो नहीं घुस पाए वे उन्हें निकलवा कर ख़ुद घुसने की फिराक में हैं. आज हमारी हिंदी में कितने महात्मा गाँधी हैं जिन्हें कालिया की जगह ज्ञानपीठ में और  विनारा की जगह म.गाँ.हिं.विवि. में बिठाएंगे? 


प्रो निर्मला जैन ने दैनिक भास्कर में कहा है कि मैंने पूरा इंटरव्यू पढ़ा है और गालियों को निकाल दें तो विनारा का इंटरव्यू स्त्रियों के पक्ष में है. उन्होंने उन लेखिकाओं जिन्होंने राजेंद्र यादव की अगुआई में देह विमर्श की कहानियाँ और उपन्यास लिख कर स्त्री विमर्शकार के रूप में सामने आयी हैं उनका विरोध किया है, और पुरुष सत्ता का विरोध किया है.


आज की तारीख में दोनों ने सार्वजनिक तौर पर माफी भी माँग ली है. हम हिन्दी वाले रहीम  की उस परंपरा के पोषक हैं जिन्होने लिखा है- "वे रहीम नर मर चुके जे कछू माँगन जात उनसे पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहीं." फिर भी उनका विरोध जारी है, और कई लोग उनके माफी माँगने के पहले प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर उनके समर्थन में खड़े थे और हैं.


मुझे लगता है कि इन दोनों के समर्थकों का अपना हित है या हो सकता है लेकिन विरोधी खेमे के कुछ लेखकों को विनारा से व्यक्तिगत खुंदक है और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जैसे कई लोगों को रवीन्द्र कालिया से. हिन्दी में क्रांतिकारी लेखक के तौर पर उभरे विष्णु खरे खरी-खोटी लिखने की लाख कोशिश करें दिल्ली में हिन्दी की गिरोहबंदी की खबर रखने वाले लोग जानते हैं कि उनकी आईआईसी में ओम थानवी से हमप्याला दोस्ती है (और १० और ११ अगस्त को जनसत्ता में इस मसले पर प्रकाशित लेख इसी के परिणाम हैं).


रही बात देह विमर्श से जुड़ी लेखिकाओं की, तो इंटरव्यू में इस्तेमाल आपत्तिजनक शब्दों को वे बहाना बना कर विरोध कर रही हैं, जबकि उनका दिल जानता है कि विनारा ने देह विमर्शपरक उनकी लेखनी पर जिस तरह से सवाल उठाए हैं उसके तईं देहवादियों का लेखन कठघरे में खड़ा हो जाता है. इसका उन्हें ज़्यादा दुःख है, और इसीलिए स्वस्थ बहस करके नहीं, उनके द्वारा प्रयुक्त गालियों के बहाने मामले को सर पर उठा लिया है.


विनारा के आपतिजनक शब्दों की निंदा करते हुए और उन्हें प्रकाशित करने वाले रवीन्द्र कालिया की भर्त्सना करते हुए, और इसके लिए दोनों के सार्वजनिक तौर पर माफी माँगने के बाद माफ़ करते हुए बहस इस बात पर होनी चाहिए जिस मुद्दे को विनारा और रवींद्र कालिया संपादित पत्रिका ने उठाया है--बहस देह विमर्श, स्त्री विमर्श, अस्मितामूलक विमर्श/विमर्शों और साहित्य के साथ इनके रिश्ते पर होनी चाहिए.


आख़िर क्यों हमारे दौड़ के बड़े लेखक और आलोचक (नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, असग़र वजाहत, उदय प्रकाश, निर्मला जैन आदि) स्त्रियों के पक्ष में क्लैसिक रचनाएँ/आलोचनाएँ लिखते हुए भी अस्मितामूलक विमर्शों को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते, इसे साहित्यिक कम राजनीतिक मसले ज़्यादा मानते हैं, क्योंकि साहित्य अलग मंच है, और यहाँ राजनीतिक मसले राजनीतिक रूप में नहीं, साहित्यिक रूप में उठाए जाने चाहिए. 

माफ़ कीजियेगा, हम इसे कुछ एम्पावर्ड स्त्रियों की निगाह से नहीं, गाँव-देहात में पुरुष सत्ता की शिकार ५० करोड़ महिलाओं की निगाह से देख रहे हैं जो रोज़-ब-रोज़ भ्रूण हत्या, बेटे-बेटियों में भेदभाव, बाल विवाह, दहेज़, सती और मार-कुटाई आदि से पीड़ित होती हैं. (मैंने अखबारों में सैकड़ों लेख इन मसलों पर लिखे हैं,और घर-परिवार का विरोध कर के २० लाख रुपये दहेज़ लेकर शादी करने से इनकार किया है,  मेरे घरवाले और दिल्ली के कई मित्र मुझे पागल समझते हैं. आज ४० साल की उम्र में कुंवारा हूँ और दिल्ली में ख़ाक छान रहा हूँ.)

आइये, हम इस मसले के बुनियादी पक्ष पर वाद, विवाद और संवाद करें. हाँ, ख़याल रहे हिंदीतर लोग भी इस मसले पर हो रही बहस पर निगाह रखे हुए हैं!!!

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