रविवार, 11 नवंबर 2012

रिच इकोनोमिक पॉलिसी के खिलाफ हैं अमरीकी


टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम
  • टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम
(लेखक भारत के पूर्व कैबिनेट सचिव हैं।)

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा की लगातार दूसरी बार जीत से दो-तीन महत्वपूर्ण बातें उभरकर सामने आई हैं। सबसे पहली बात यह कि अमेरिका एक ह्वाईट कंट्री है। अमेरिका की कुल आबादी में गोरों की तादाद लगभग चौंसठ प्रतिशत है। जबकि अश्वेत महज बारह फीसद हैं। 
 
लेकिन कास्ट और रेस से ऊपर उठकर इस बार वहां राष्ट्रपति का चुनाव मूलतः आर्थिक नीति के मुद्दे पर लड़ा गया। दूसरी बात, बराक ओबामा के खिलाफ चुनाव लड़नेवाले रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार मिट रोमनी बहुत अमीर आदमी हैं। 
 
अमेरिका एक अमीर देश है। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक ओबामा को लगातार दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव जिताकर वहां के नागरिकों ने यह साबित कर दिया कि अमेरिकी नहीं चाहते कि वहां बहुत रिच इकोनोमिक  पॉलिसी लागू हो।

रिपब्लिकन पार्टी और मिट रोमनी ने चुनाव प्रचार के दौरान बराक ओबामा की आर्थिक नीतियों की लगातार आलोचना की। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान ओबामा और रोमनी दोनों ने पूरे अमेरिका में घूम-घूमकर लोगों को हरेक क्षेत्र में अपनी अपनी पार्टी की नीतियों के बारे में बताया। हमारे यहाँ यह नहीं होता है। 
 
हमारे यहाँ की राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान जनता को लुभाने के लिए तरह-तरह की घोषणाएं करती हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन घोषणाओं पर अमल कम ही होता है। को लेकिन आखिरकार  बराक ओबामा  की आर्थिक नीतियों को ही अमरीकियों ने पसंद किया।

एक बात और गौर करने की है! दोबारा चुनाव जीतने के बाद बराक ओबामा ने कहा कि ओबामा ने नहीं अमेरिका ने चुनाव जीता है। अपने प्रतिद्वंद्वी मिट रोमनी की प्रशंसा करते हुए ओबामा ने कहा है कि मैं रोमनी परिवार को समाज में योगदान देने के लिए धन्यवाद देता हूँ. मैं रोमनी के साथ बैठकर चर्चा करना चाहता हूँ कि हम देश (अमेरिका) को आगे कैसे ले जा सकते हैं. 
 
उन्होंने कहा कि सभी मतभेदों के बावजूद हम अमेरिका के लोगों को एक बेहतर भविष्य देना चाहते हैं। राष्ट्र हित में राजनीतिक मतभेद भुलाकर राजनीतक विरोधी के साथ देश को आगे ले जाने की बराक ओबामा की इस पहल पर गौर फरमाने की जरूरत है। हमारे यहाँ चुनाव परिणाम आने के बाद नेतागण एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगते हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि मुख्यतः आर्थिक मुद्दों पर लड़े गए इस बार के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला कांटे का था। चुनावी आंकड़े बताते हैं की ओबामा को पचाश फीसद वोट मिले जबकि रोमनी को उनसे सिर्फ दो प्रतिशत कम यानी अड़तालीस फीसद। 
 
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव काफी खर्चीला है। दोनों उम्मीदवारों ने चुनाव के दौरान कई मिलियन डालर खर्च किये। भारत के सन्दर्भ में देखें तो फर्क केवल इतना है कि यहाँ चुनावों में काले धन का इस्तेमाल किया जाता है जबकि अमेरिका में चुनावों में काले धन का इस्तेमाल बिलकुल नहीं होता।

अब सवाल उठता है की अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव परिणाम का भारत-अमेरिकी संबंधों पर क्या असर पडनेवाला है। मैं मानता हूँ कि बराक ओबामा के दूसरी बार चुनाव जीतने के बाद दोनों देशों के संबंधों में फिलहाल कोई ख़ास तब्दीली नहीं आनेवाली है। 
 
दरअसल भारत सहित दुनिया भर के देशों के साथ अमेरिका के सम्बन्ध हैं। भारत के साथ अमेरिकी विदेश नीति का एक लॉंग टर्म इंटरेस्ट है। अमेरिकी हित को देखते हुए अमेरिका अपनी विदेश नीति बनाता है। समय-समय पर वह उसमें थोडा-बहुत बदलाव करता है। लेकिन फिलहाल उसके सामने आर्थिक नीति महत्वापूर्ण हैं। (शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)