मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

कोई बारह बरस पहले 28 सितम्बर 2003 को मुंबई में निदा फाजली साहब के साथ उनके घर पर एक मुलाक़ात हुई थी (उसके बाद फोन पर अखबारों के लिए 3-4 बार और बातचीत हुई). उस मुलाक़ात में निदा साहब ने कई अहम् बातें कही थीं जो 12 अक्टूबर 2003 को 'राष्ट्रीय सहारा' में प्रकाशित हुई थी.आज जब निदा साहब हमारे बीच नहीं हैं तो उनको याद करते हुए श्रद्धांजलिस्वरूप वो मुलाक़ात-कथा अपने फेसबुकिया दोस्तों के हवाले कर रहा हूँ. - शशिकांत


 धर्म आज बहुतों की दुकान बन गई है : निदा फाज़ली

                                      ‘‘हर आदमी में होते हैं, दस–बीस आदमी
                           जिसको भी देखना हो कई बार देखना’’


निदा फाज़ली की मशहूर नज़्म है। इसमें वे इंसान को उसके व्यक्तित्व और व्यवहार के अलग–अलग शेड्स को मिलाकर देखने की प्रस्तावना करते हैं । पहली बार महानगर मुंबई जाना मेरे लिए जितना रोमांचक था, वहाँ पहुँचकर निदा फाज़ली, मकबूल फिदा हुसैन और तैय्यब मेहता से मिलने–बतियाने का उतना ही उतावलापन । ‘सहारा समय’ हिंदी साप्ताहिक के मुंबई ब्यूरो प्रमुख धीरेंद्र अस्थाना से जब मैंने यह इच्छा जाहिर की तो निदा फाज़ली साहब के घर का पता बतलाते हुए उन्होंने मुझे अचंभित कर डाला कि अँधेरी (वेस्ट) के सात बंगला गार्डन स्थित केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान के जिस गेस्ट हाउस में पिछले तीन दिनों से मैं ठहरा हुआ हूँ उसी लेन के आखिर में चंद कदमों की दूरी पर है सनराइज अपार्टमेंट, जिसके फ्लैट नंबर 201–बी में रहते हैं उर्दू के मशहूर शायर, कवि–लेखक निदा फाज़ली साहब ।

28 सितंबर की सुबह निदा साहब को जब मैंने फोन किया तो उनके लिए मैं अजनबी नहीं था । दरअसल अपने आत्मकथात्मक उपन्यास ‘‘दीवारों के बीच’ और ‘दीवारों के बाहर’ (दो खंडों में) पर राजेंद्र यादव के ‘हंस’ में प्रकाशित मेरी लंबी समीक्षा से वे वाकिफ’ थे । बैंक ऑफ बड़ौदा, मुंबई में कार्यरत अपने पत्रकार मित्र संजय सिंह बघेल के साथ जब मैं सनराइज अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 201–बी में पहुँचा तो न वह निदा फाज़ली थे और न वैसी उनकी घरेलू दुनिया जैसी ‘दीवारों के बीच’ और ‘दीवारों के बाहर’ में मैंने उनके बारे में मैंने पढ़ी थी ।
अपने घर में परिवार के साथ थे निदा फाज़ली जिसमें थीं उनकी धर्मपत्नी मालती जोशी और उनकी पाँच साल की बेटी तहरीर ।

किताबों के रैक से भरे अंदर के कमरे में सफेद कुर्त्ता–पायजामा पहने उर्दू के इस कवि–लेखक की सहजता, सादगी और मिलनसारिता तेज रफ़्तार से भागते मुंबई महानगर में शुकून देने वाली तो थी ही देशकाल, समाज, राजनीति, साहित्य, सांप्रदायिकता, भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद से लेकर देश के गाँव–देहात और मंुबई, दिल्ली की दुनिया की अपनी समझ भी बढ़ाने वाली थी ।

बातचीत के बीच नन्हीं, प्यारी तहरीर जब खेलती हुई निदा फाज़ली साहब के पास पहुँची तो उनहोंने हमारा उससे परिचय यूँ कराया, ‘‘नमस्ते करो अंकल को । यह पचास प्रतिशत मुसलमान है, चालीस प्रतिशत हिंदू और दस प्रतिशत गुजराती । ''–––और शरमाती–सकुचाती हुई बेटी पर पिता का लाड़–प्यार उमड़ पड़ा यानी दोनों बाप–बेटी खेलने लगे । दरअसल मालती जोशी गुजरात के एक हिंदू परिवार से ताल्लुक’ रखती हैं जो दसेक साल से निदा साहब की ज़िंदगी की हमसफ’र बनी हुई हैं । आज के भारत की सांप्रदायिकता के गढ़ गुजरात की एक ब्राह्मण हिंदू स्त्री का सांप्रदायिक सौहार्द भरा कदम देख–सुनकर मैं दंग रह गया ।

एक संजीदा शायर, कवि–लेखक पत्रकारिता की दुनिया को किस निगाह से देखता है ? ‘‘पत्रकारिता से आपकी भाषा इकहरी हो जाती है, समरसेट मॉम ने ‘मेमॉयस’ में लिखा है’’, निदा की टिप्पणी थी, एक पत्रकार के सामने ।

औपचारिक–अनौपचारिक बातचीत आगे बढ़ती हुई सांप्रदायिकता और विभाजन के इतिहास के बहाने कुर्रतुल ऐन हैदर के कालजयी उपन्यास ‘आग का दरिया’ और कमलेश्वर के ‘कितने पाकिस्तान’ पर आ जाती है । निदा कहते हैं, ‘‘इस देश के इतिहास का जो विभाजन किया गया उसे कुर्रतुल ऐन हैदर ने बुद्धिज़्म से जोड़ा । पाकिस्तान में उसने ‘आग का दरिया’ लिखा और इसके जरिए इतिहास को फिर से जोड़ने की कोशिश की । –––हालाँकि ‘आग का दरिया’ से पहले राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा तक’ आ चुकी थी––– ।’’

निदा साहब को रोककर मैंने पूछा कि इसका मतलब क्या यह है कि ‘आग का दरिया’ में जिस वैश्विक संस्कृति
की बात कुर्रतुल ऐन हैदर करती है वह राहुल सांकृत्यायन से प्रभावित है ?

‘‘दखिए कोई चीज वैक्यूम से तो आती नहीं है । जो ग्लोबल चिंतन था, उसे हम बहुत पहले से सोच–समझ रहे थे । डॉ– इकबाल के यहाँ एक ग्लोबल आदमी का कांसेप्ट आने लगा था और फिर मर्क्सिज्म का, हिस्ट्री का जो इंटरप्रटेशन था वह इतिहास की अखंडता पर विश्वास करता था । प्रगतिशील आंदोलन में मुल्कराज आनंद, सज्जाद जहीर आदि का महत्त्वपूर्ण योगदान था । इस मूवमेंट में प्रेमचंद और टैगोर की शुभकामनाएँ थीं । मतलब प्रगतिशील मूवमेंट ने आदमी को उसके क्षेत्र, धर्म, जाति आदि से पहचानने के बजाय उसको इतिहास के एक लंबे प्ररिपे्रक्ष्य में पहचानने पर जोर दिया था । यही काम अपनी तरह से संत और सूफी कर चुके थे’’, निदा फाज़ली का जवाब था ।

मेरे इस सवाल पर कि प्रगतिशील आंदोलन की इस मजबूत बुनियाद के बावजूद क्या वजह रही कि सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातिवाद और शोषण, दमन, अत्याचार आदि से हमारा आज का हिंदुस्तानी समाज आक्रांत है, निदा फाज़ली ने संजीदगी से कहा, ‘‘–––जैसे कहा जाता है कि सोवियत रूस का पतन मार्क्सवाद का पतन था । प्रगतिशीलों में जो चिंतन था, जो सोच थी, वह अब भी है लेकिन वह साहित्य आज कितने लोगों तक पहुँचता है ? आज हिंदी साहित्य का यह हाल है कि एक लिखने वाला ही दूसरे लिखने वाले को पढ़ता है । दरअसल अज्ञेय जी के बाद पाठक का अनादर किया गया हिंदी और उर्दू में और ड्रांइग रूम पोएट्री थमा दी गई पाठकों को प्रयोगवाद के नाम पर । और इस तरह आपने लेखक बिरादरी को सीमित कर दिया । . . .

. . . ‘‘लेकिन प्रगतिशील आंदोलन देश की आम जनता में सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने और उसमें धर्मनिरपेक्षता की भावना विकसित करने में क्यों विफल रहा कि आज चैतरफा सांप्रदायिकता का बोलबाला हो गया ?’’ मेरे इस कठोर सवाल पर निदा साहब का जवाब भी काफी कठोर और सीधा था ।

उन्होंने कहा, ‘‘भारत में जो प्रगतिशील मूवमेंट आया उसमे पूरा का पूरा दोगलापन रहा । एलीट भाषा में आप हल चलाने वाले, सब्जी बेचने वाले, इमारत बनाने वाले, झुग्गी–झोपड़ियों में रहने वाले तक अपनी बात नहीं पहुँचा सकते । उर्दू में भी फै’ज़ और (अली सरदार) जाफरी की भाषा कौन सी थी ? ये वो भाषा नहीं है जो ‘जनता की भाषा’ है, बल्कि दलितों का जो आरोप है उसमें थोड़ी बहुत सत्यता भी है । जब वे कहते हैं कि प्रेमचंद की ‘कफन’ कहानी के नायक घीसू और माधव दारू और आलू क्यों पीते हैं । वे सामंतवाद पूँजीवाद से टकराते क्यों नहीं ? अमिताव घोष का का आरोप है कि ये जो परिवर्तन आया है इसमें विद्रोह कहाँ है ? इसलिए नहीं है कि वे (प्रेमचंद) जिस वर्ग से ताल्लुक’ रखते थे उसके दायरे में ही उन्होंने दूसरे वर्ग के बारे में सोचा । ''

(थोड़ा सँभलकर आगे  वे कहते हैं), ‘‘प्रगतिशीलता को मैं इग्नोर नहीं कर रहा । (मैक्सिम) गोर्की साहब जिस वर्ग से थे वे उस वर्ग के उतार–चढ़ाव से वाकिफ’ थे । कृश्नचंदर ने भी उसी तरह से लिखा । देखिये, ड्राइंग रूप में टेबुल–कुर्सी पर बैठकर आम आदमी के लिए लिखी गई भाषा ‘सिंपैथेटिक (सहानुभूतिपरक) ही हो सकती है । ‘अनुभव गाबे सो रागी है’ कहने वाले कबीर वे नहीं बन सकते । –––और सबसे बड़ी बात यह कि केवल विचार से श्रेष्ठ साहित्य नहीं लिखा जा सकता । विचार के अलावा भी बहुत सी चीज़ है जो उसे श्रेष्ठ साहित्य बनाती है ।''

आगे वे कहते हैं, ‘‘मुंबई में हर हफ्ते प्रगतिशीलों की मीटिंग होती थी पहले । वे नए मांइड को कन्विंस करते थे । लेकिन अब वो नहीं है । बीजेपी का फील्ड वर्क क्लास वर्क है । बीजेपी के लीडर दुकानदार हैं । आज जो लोग बीजेपी के साथ हैं, उनमें एक तबका अपने फायदे के लिए है और दूसरा अज्ञानतावश । लेकिन लेफ्ट मूवमेंट जो था उसका अपना विचार था और उसके प्रचार का माध्यम उसने साहित्य को बनाया था । वह इतना बड़ा मूवमेंट था कि पूरा रशियन लिटरेचर कम से कम मूल्य पर हिंदी के पाठकों को मिल जाता था । इतना ही नहीं, उसका विश्व की हर भाषा में अनुवाद होता था । लेकिन आज ज़माना ये आ गया है कि ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ फूटपाथ पर न्यूज पेपर की तरह बिकता है और ‘आग का दरिया’, ‘शेखर एक जीवनी’ के बारे में आम हिंदी पाठकों को कुछ पता ही नहीं । अरुंधति राय, सलमान रूश्दी, विक्रम सेठ आदि जो लिख रहे हैं, भारत में लिखे अच्छे उपन्यासों के सामने वे कहीं नहीं ठहरते । इसके बावजूद उनके पाठक हैं । इसकी वजह यह है कि हिंदी इज राजभाषा बट इंग्लिस इज ए लैंग्वेज ऑफ रूलिंग क्लास । फिर हमारा आम लेखक अमरीकन, फ्रेंच, अफ्रीकी आदि साहित्य के बारे में ज़्यादा जानता है लेकिन दूसरी भारतीय भाषाओं के बारे में उसका ज्ञान बिल्कुल शून्य है ।’’

हिंदुस्तान की शीर्ष साहित्यिक संस्थाओं, अकादमियों की कार्य प्रणाली को लेकर उर्दू के इस कवि, लेखक को बहुत शिकायतें हैं, ‘‘हमारे यहाँ साहित्य अकादेमी, भारतीय ज्ञानपीठ है । दिलीप (कुमार) साहब पूछते हैं कि ये क्या हो रहा है कि जो जितना जितना बड़ा भोंपू है उसको उतना ज़्यादा मिल रहा है ? हमारा पत्रकार तबका दिग्भ्रमित है । वह तोगड़िया, सिंघल को हाइलाइट करता है । उसकी तुलना में हमारा जो वर्तमान साहित्य है और उसके जो कवि लेखक हैं वे कितने हाइलाइट होते हैं ? साहित्य में जो मानवीय मूल्य हैं, संस्कारों की जो पहचान है उसे आज का मीडिया हाशिए पर छोड़ देता है और तोगड़िया, सिंघल, जोशी को––– । इसकी वजह यह है कि हिंदुस्तान की जनता को जान–बूझकर अनएजुकेट रखा गया है । अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए उसका शोषण भी किया जाता है । उससे कभी मस्जिद तुड़वाया जाता है तो कभी मंदिर को अपमानित करवाया जाता है । यह एक पूरा षडंयत्र है’’, निदा फाज़ली का कहना था ।

दरअसल, सांप्रदायिकता, बाज़ारवाद, भूमंडलीकरण और देशीय–अंतर्देशीय सत्ता विमर्श के झूठ–सच के घालमेल को निदा फाज़ली भलीभाँति पहचानते हैं । वे कहते हैं, ‘‘आज जो कुछ घटित होते हुए हम देख रहे हैं, वर्षाें तक यह मालूम नहीं पड़ता कि जो हम देख रहे हैं वह हमारे देखे हुए से बिल्कुल अलग है । यह उस अमरीका की तरह है जिसने जिसे चाहा सद्दाम बना दिया जाता है । अभी एडवर्ड सईद का देहांत हुआ । उसे अमरीकी टीवी चैनल पर बोलने की इजाजत नहीं थी । भई, जब हम बीजेपी को टारगेट करते हैं तो सबकांटिनेट (उप महाद्वीप) के बड़े मुद्दे को छोड़ देते हैं । पूरे उप महाद्वीप में आम आदमी की एक जैसी समस्याएँ हैं । लेकिन इतना बड़ा मार्केट है कि इस पर अरब की तरह बाज़ारवादियों की आँख गड़ी हुई है । कश्मीर का मसला हो या फिलिस्तीन का, वे इन्हें नासूर की तरह जिं़दा रखना चाहते हैं । और जो गवर्नमेंट्स हैं वे डमीज हैं । उनकी डोरियाँ दूसरे के हाथ में हैं । नाच उनका अपना है और मंच हमारा ।’’
 

उत्तर आधुनिकतावादी के ‘फ्रॉड’ को निदा फाज़ली साहब बड़ी बेबाकी से रहस्योद्घाटित करते हैं, ‘‘आज उनकी तरफ से नई–नई थ्योरी आ रही है जैसे उत्तर आधुनिकता । उसमें वे कह रहे हैं कि आपकी आइडियोलॉजी, हिस्ट्री आदि खत्म हो गई है । हमें टुकड़ों में बाँटकर आँचलिक बनाया जा रहा है । आज से पचास साल पहले जींस का कपड़ा हमारी मॉडर्निटी का हिस्सा था लेकिन आज उसने गंदगी और सफाई के अंतर को मिटा दिया है । वर्ल्ड के तीन चैथाई हथियारों का निर्माता अमरीका है । उसके विरोध में कोई कुछ कर नहीं सकता ।’’

हिंदुस्तान में राष्ट्रवाद के उभार और उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर आज जो धार्मिक संकीर्णता, सांप्रदायिक नग्नता और अमानवीय कुकृत्य हो रहे हैं, उसका निदा फाज़ली ग्लोबल मैन की अपनी अवधारणा के तर्इं जवाब देते हैं, ‘‘अलग–अलग नशों में जो सबसे बड़ा एक नशा है उनमें नेशनलिज्म भी है । देखिए, जब कोई बच्चा पैदा होता है तो पूरी धरती और पूरा आकाश उसका होता है लेकिन जैसे–जैसे वह बड़ा होता है उसकी धरती और उसका आकाश छोटा होता जाता है । इसी तरह धर्म आज बहुतों की दुकान बन गई है । गंगा का जल जब कोई भरता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह इससे ‘वजू’ करेगा या शिवालय में चढ़ाएगा । किसान जब खेत में गेहूँ उपजाता है तो यह नहीं सोचता कि यह मंदिर जाएगा या मस्जिद––– ।’’

डेढ़–दो घंटे की गंभीर बातचीत के बाद मैं जब मुंबई की मायानगरी के गीतकार–पटकथाकार निदा फाज़ली के हालिया लेखन के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बतलाया कि अश्विनी चैधरी के निर्देशन में सत्यकथा पर आधारित ‘धूप’ फिल्म रीलिज होने वाली है जिसके गीत उन्होंने लिखे हैं । दूसरी रीलीज होने वाली फिल्म गोंविद निहलानी की ‘देव’ है जिसमें अमिताभ बच्चन, फरदीन खान, करीना कपूर, ओमपुरी आदि ने भूमिका निभाई है । इसके गीत और संवाद भी निदा फाज़ली साहब ने ही लिखे हैं, और विशेष गुजारिश पर ‘देव’ फिल्म का अपना गीत वे गुनगुनाते हैं :
                      ‘‘हरेक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
                        यहाँ न कोई ऐसा हो एहतिजाज (क्रांति) भी हो
                        हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं
                        हुकूमतें जो बदलती हैं वो समाज भी हो
                        न करते शोर–शराबा तो और क्या करते
                        तुम्हारे शहर में कुछ और कामकाज भी हो
                        रहेगी कब तलक वादों में कैद खुशहाली
                        हरेक बार कल क्यूँ हो, कभी आज भी हो ।’’

                                                    
                                           (समाप्त)

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो नित्यानंद तिवारी ने अरविन्द केजरीवाल की तुलना महात्मा गांधी से की.

महात्मा गांधी
हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय के हज़ारों विद्यार्थियों (जिनमें सैकड़ों अब अध्यापक हो गए हैं) के प्रिय अध्यापक प्रो नित्यानंद तिवारी ने सार्वजनिक मंच पर आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल की तुलना महात्मा गांधी से की.

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैम्पस स्थित मोतीलाल नेहरू कॉलेज में पिछले 25-26 मार्च को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के आख़िरी सत्र में खचाखच भरे सेमीनार हॉल में तिवारी जी ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में अरविन्द केजरीवाल एकमात्र ऐसे नेता हैं जो राजनीति में 'सादगी', 'ईमानदारी' तथा 'कथनी और करनी में भेद न करने' जैसी बातें कर रहे हैं.
 

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में हिंदुस्तान के पूरे राजनीतिक परिदृश्य से इस तरह के 'वेल्यूज'
अरविन्द केजरीवाल
अप्रासंगिक हो गए थे लेकिन अरविन्द केजरीवाल ने इतिहास के भीतर से इन 'वेल्यूज' को 'रिकवर' किया। हमारे सार्वजनिक जीवन से जो मूल्य खत्म कर दिए गए थे उन्हें अरविन्द केजरीवाल ने फिर से मूल्य बनाया।

 

प्रो तिवारी ने कहा कि अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि वे देश की हरेक जनता को स्वाधीन करना चाहते हैं. उन्होंने अरविन्द केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी' का उल्लेख करते हुए कहा कि लोग अरविन्द केजरीवाल से जब पूछते हैं कि 'आम आदमी' से उनका क्या तात्पर्य है तो वे कहते हैं हिंदुस्तान का वह नागरिक चाहे वह धनी है या गरीब, यदि वह वर्त्तमान 'राजनीतिक ढाँचे' को तोड़ने में यकीन रखता है तो वह 'आम आदमी' है. यानि अरविन्द केजरीवाल के हिसाब से हम एक जिम्मेदार मनुष्य बन सकते हैं.'

 

आखिर में प्रो तिवारी ने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन के समय गांधीजी ने जो राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि हमें दी थी अरविंद केजरीवाल आज कुछ वैसी ही दृष्टि हमें देने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन कॉंग्रेस और भाजपा बड़ी मुश्तैदी से अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को दबाने की कोशिश कर रही है. कभी उनके चरे पर स्याही फेंकी जाती है तो कभी उनकी कार का शीशा तोड़ा जाता है. (नोट : तबतक थप्पड़ काण्ड नहीं हुआ था.) यह दुर्भागयपूर्ण है. 

प्रो नित्यानंद तिवारी

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

ये इश्क नहीं आसां ...!

                                                                                     
लैला-मजनूं
 मित्रो, आज प्रेम दिवस है- वेलेंटाइन्स डे. 'दुनिया में इतनी हैं नफ़रतें..' के बीच कुछ मासूम  दिलोंमें में पनप रही चाहतों का हम सबको ख़ैर मख्दम करना चाहिए, पश्चिम-पूरब की बहस को छोड़कर. प्रेम प्रेम होता है देसी-बिदेसी नहीं...ख़ैर, पिछली साल वेलेंटाइन्स डे पर राजस्थान पत्रिका के लिए लिखा गया यह लेख आपके हवाले कर रहा हूँ. शुक्रिया.
 - शशिकांत. 
 



‘ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजै
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’’
मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ां ‘ग़ालिब’ ने यह नज़्म यूं तो उन्नीसवीं सदी में लिखी थी। आज भी मुहब्बत के पहरेदारों से जूझ रहे प्रमियों पर उनकी यह नज़्म उतनी ही सटीक बैठती है और सैकड़ों सालों से मिथ बने उन आशिकों पर भी, जिनका प्यार परवान नहीं चढ़ा और अपने प्यार की खातिर उन्होंने जान तक कुर्बान कर दी। 

हिदुस्तान से लेकर अरब और यूरोप की ज़मीं पर उगीं ऐसी अनंत प्रेम कथाएं हैं, जो हर जुबां पर आज भी जिं़दा हैं। राधा-कृष्ण, शकुंतला-दुष्यंत, सावित्री-सत्यवान जैसी पौराणिक प्रेम कथाएं और रानी रूपमती-बाज बहादुर, सलीम-अनारकली, लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, ढोला-मारू, शीरीं-फरहाद, रोमियो-जूलियट जैसे प्रेम चरित्रों की गाथाएं इसकी मिसाल हैं।

विडंबना यह है कि मुहब्बत की राह पर शहीद हुए इन आशिकों का प्रेम-प्रसंग आज भी जिं़दा है। बस उसके रूप और शरीर बदल जाते हैं। अक्सर हर गांव और कसबे में हर वक्त ऐसा जोड़ा पैदा होता हे लेकिन जाति-बिरादरी, संप्रदायवाद, अमीरी-गऱीबी और अन्य वजहों से तंगनजऱ लोगों के हाथों मौत के घाट उतार दिया जाता है या खुदकुशी करने को बाध्य हो जाता है। 

दरअसल लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलियट हर ज़माने में पैदा होते हैं और हो रहे हैं लेकिन हमारे समाज में प्रेम के मामले में पाल्थी मारकर बैठी वर्जनाएं हज़ारों लैला-मजनूओं की कुर्बानी के बाद भी नहीं टूट रही हैं। वेलेंटाइन डे के अवसर पर पेश है कुछ ऐसी ही जगत प्रसिद्ध प्रेम चरित्रों की संघर्ष गाथाओं का संक्षिप्त सार -

लैला-मजनूं: अरब के प्रेमी युगल लैला-मजनूं सदियों से प्रेमियों के आदर्श रहे हैं। कैस-लुबना, मारवा-अल मजनूं अल फ रांसी, अंतरा-अबला, कुथैर-अजा, लैला-मजनूं सरीखी प्रेम कहानियां इसकी मिसाल हैं। और रहें भी क्यों नहीं, इन्होंने अपने अमर प्रेम से दुनिया को दिखा दिया है कि मोहब्बत इस जमीन पर तो क्या जन्नत में भी जिंदा रहती है। इनमें लैला-मजनूं की प्रेम कहानी जगजाहिर है। 

अरबपति शाह अमारी के बेटे कैस की किस्मत में यह प्रेमरोग हाथ की लकीरों में ही लिखा था। उसे देखते ही भविष्य वक्ताओं ने कहा कि कैस प्रेम दीवाना होकर दर-दर भटकता फिरेगा। उनकी भविष्यवाणी को झुठलाने के लिए शाह अमारी ने खूब मन्नतें कीं कि उनका बेटा इस प्रेमरोग से महरूम रहे, लेकिन कुदरत अपना खेल दिखाती ही है।

दमिश्क के मदरसे में जब उसने नाज्द के शाह की बेटी लैला को देखा तो पहली नजऱ में उसका आशिक हो गया। मौलवी ने उसे समझाया कि वह प्रेम की बातें भूल जाए और पढ़ाई में अपना ध्यान लगाए, लेकिन प्रेम दीवाने ऐसी बातें कहां सुनते हैं। कैस की मोहब्बत का असर लैला पर भी हुआ। 

नतीजा यह हुआ कि लैला को घर में कैद कर दिया गया और लैला की जुदाई में कैस दीवानों की तरह मारा-मारा फि रने लगा। कुछ कथाओं में यह कहा गया है कि मजनूं को जब यह पता चला तो वह पागल हो गया और इसी पागलपन में उन्होंने कई कविताएं रचीं। उसकी दीवानगी देखकर लोगों ने उसे ‘मजनूं’ का नाम दिया। आज भी लोग उसे ‘मजनूं के नाम से जानते हैं और मजनू मोहब्बत का पर्याय बन गया है।

लैला-मजनूं को अलग करने की लाख कोशिशें की गईं लेकिन सब बेकार साबित हुईं। लैला की तो बख्त नामक व्यक्ति से शादी भी कर दी गई। लेकिन उसने अपने शौहर को बता दिया कि वह सिर्फ मजनूं की है। मजनूं के अलावा उसे और कोई नहीं छू सकता। बख्त ने उसे तलाक दे दिया और मजनूं के प्यार में पागल लैला जंगलों में ‘मजनूं-मजनूं’ पुकारने लगी। जब मजनूं उसे मिला तो दोनों प्रेमपाश में बंध गए। लैला की मां ने उसे अलग किया और घर ले गई। मजनूं के गम में लैला ने दम तोड़ दिया। लैला की मौत की खबर सुनकर मजनूं भी चल बसा।

उनकी मौत के बाद दुनिया ने जाना कि दोनों की मोहब्बत कितनी अजीज थी। दोनों को साथ-साथ दफ नाया गया ताकि इस दुनिया में न मिलने वाले लैला-मजनूं जन्नत में जाकर मिल जाएं। लैला-मजनूं की कब्र आज भी दुनियाभर के प्रेमियों की इबादतगाह है। समय की गति ने उनकी कब्र को नष्ट कर दिया है, लेकिन लैला-मजनूँ की मोहब्बत जिंदा है और जब तक दुनिया है जिंदा रहेगी। मजनूँ के काल्पनिक होने के संबंध में कई कथन वर्णित हैं। लेकिन सदियों से लैला-मजनूँ की प्रेम कहानी दुनिया भर के प्रेमियों के लिए मिसाल बना हुआ है।

प्रेमी युगल आज भी लैला मजनूं की मजार पर सजदा करते हें। भारत-पाकिस्तान की सीमा के साथ लगते गांव बिंजौर (अनूपगढ़) में लैला-मजनूं की मजार पर देशभर से आए प्रेमी- प्रेमिकाओं का हजूम एकत्र होकर उनकी मजार पर माथा टेकते हैं। प्रेमी जोड़ों को विश्वास है कि सैंकड़ों वर्ष पुरानी इस मजार पर मत्था टेकने से उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होंगी। 

ऐसा माना जाता है कि लैला व मजनूं ने इसी गांव में अपनी जान दी थी। इस मजार पर पूजा करने के लिए दूर- दूर से नव विवाहित जोड़े आते हैं और साथ में प्रेमी-प्रेमिकाओं का हुजूम भी उमड़ता है।

लैला मजनूं की प्रेम कहानी पर हिंदी में पहली फि ल्म इसी नाम से 1953 में ऑल इंडिया पिक्चर्स के बैनर तले बनी थी जिसके निर्देशक थे - अमरनाथ। उस फि ल्म में बेगम पारा, नूतन, रतन कुमार, शम्मी कपूर आदि कलाकारों ने काम किया था। 

उसके बाद हरनाम सिंह रवैल ने रिशी कपूर और रंजीता को लेकर ‘‘लैला मजनूं’ फि ल्म बनाई थी जो 1976 में रिलीज हुई। उसमें गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे और संगीत मदन मोहन का था। फि ल्म बनाने के दौरान ही 1975 में मदन मोहन की मौत हो गई और फिर संगीत पूरा करने की जिम्मेदारी जयदेव को सौंपी गई थी।

हीर-रांझा: पंजाब की धरती प्रेमियों की धरती रही है। वहां कई प्रेम कथाओं का जन्म हुआ है। इनमें वारिस शाह रचित हीर-रांझा के किस्से को पूरी दुनिया जानती है। इस प्रेम कथा की नायिका हीर एक दौलतमंद खनदान से ताल्लुक रखती थी। वह बहुत खूबसूरत थी और हीर से बेहद प्रेम करती थी।

रांझा अपने चार भाइयों में सबसे छोटा था। भाइयों से विवाद के बाद वह घर छोडकर हीर के गांव पहुंच गया और उसके घर में वह पशुओं की रखवाली करने लगा। दोनों के बीच प्रेम पनपा और दोनों मिलने लगे। लेकिन हीर के ईष्र्यालु चाचा कैदो और माता-पिता को इन दोनों की दिल्लगी मंजूर नहीं थी। उन्होंने हीर का विवाह अन्यत्र कर दिया गया।

उसके बाद रांझा जोगी हो गया और अलख निरंजन कहकर गांव-गांव फिरने लगा। जोगी के वेश में वह एक बार हीर से मिला और दोनों भाग गए लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड लिया। लेकिन उसी रात पूरे शहर में आग लग गई। घबराए हुए महाराजा ने प्रेमियों को आजाद कर दिया और उन्हें विवाह की इजाजत दे दी। दोनों हीर के गांव वापस आ गए।

इस बार हीर के माता-पिता दानों के विवाह के लिए राजी हो गए। लेकिन हीर के ईष्र्यालु चाचा कैदो ने विवाह के दिन हीर को जहर खिला दिया। रांझा ने उसे बचाने का बहुत प्रयास किया लेकिन हीर नहीं बच सकी। हीर के मौत से आहत रांझा ने भी कुछ दिन बाद जान दे दी। इस तरह एक दारुण प्रेम कहानी खत्म हो गई।

सोहनी-महिवाल: पंजाब की ही धरती पर उपजी एक और प्रेम कथा है- सोहनी-महिवाल की। इस प्रेम कथा की प्रेयसी सोहनी सिंधु नदी के तट पर रहने वाले एक कुम्हार तुला की बेटी थी। वह अपने पिता द्वारा बनाए गए बर्तनों पर सुंदर चित्रकारी करती थी। 

एक दिन उजबेकिस्तान के बुखारा शहर से इज्जत बेग नाम का एक धनी व्यापारी व्यापार के सिलसिले में भारत आया और सोहनी से मिलने पर वह उसके सौंदर्य पर आसक्त हो उठा। सोहनी को देखने के लिए वह रोज सोने की मुहरें जेब में भरकर कुम्हार तुला के पास आता और उसके सारे बर्तन खरीद लेता। सोहनी भी उसकी तरफ आकर्षित हो गई। वह सोहनी के पिता के घर में नौकर बनकर भैंसें चराने लगा। इस तरह उसका नाम महिवाल पड गया।

तुला को जब उनके प्रेम का पता चला तो उसने सोहनी को बिना बताए किसी कुम्हार से उसकी शादी कर दी। उसके बाद महिवाल अपना घर, देश भूलकर फकीर हो गया। मगर दोनों प्रेमियों ने मिलना न छोडा। रोज जब रात में सारी दुनिया सोती, सोहनी नदी के उस पार महिवाल का इंतजार करती, और वह नदी तैरकर उससे मिलने चला जाता। 

एक बार महिवाल बीमार हो गया तो सोहनी एक पक्के घड़े की मदद से तैरकर उससे रोज मिलने आने लगी। एक दिन उसकी ननद ने सोहनी को देख लिया तो उसने पक्के घड़े की जगह कच्चा घड़ा रख दिया। सोहनी घड़े द्वारा नदी पार करने लगी और डूबकर उसकी मौत हो गई। महिवाल उसे बचाने के लिए नदी में कूदा, वह भी डूब गया। इस तरह यह दुख भरी प्रेम कहानी ख़त्म हो गई।

शीरीं-फरहाद: फारस की पृष्ठभूमि में जन्मी इस कहानी का पात्र फरहाद एक शिल्पकार था, जो राजकुमारी शीरीं से बेइंतहा मुहब्बत करता था। लेकिन राजकुमारी शीरीं इस एकतरफा प्रेम से अनभिज्ञ थी। निराश फरहाद पहाड़ों में जाकर रहने लगा और बांसुरी पर राजकुमारी की तारीफ में धुनें बजाने लगा। जब यह बात शीरीं को मालूम हुई तो वह फरहाद से मिली और उसके प्रेम पर वारी न्यारी हो गई। 

उनकी बेटी एक आम युवक से शादी करे, शीरीं के पिता और राजा को यह कतई मंजूर नहीं था। आखिर उन्होंने अपनी बेटी के सामने शर्त रखी कि यदि फरहाद पहाडों के बीच चट्टानों में नहर खोद दे तो वह शीरीं का विवाह उससे कर देंगे। यह बेहद मुश्किल कार्य था, लेकिन फरहाद ने नहर खोदनी शुरू की। उसकी अथक मेहनत देखकर राजा को लगा कि कहीं फरहाद अपना लक्ष्य प्राप्त न कर ले।

जब नहर पूरी होने को थी तो राजा घबरा गए। वे अपने दरबारियों के साथ अपनी बेटी शीरीं के विवाह की खातिर मशविरा करने लगे। उनके वजीर ने उन्हें सलाह दी कि किसी बूढ़ी स्त्री को फरहाद के पास भेजा जाए और उसे यह झूठी ख़बर दी जाए कि जिस राजकुमारी को पाने के लिए वह पहाड़ों के बीच चट्टानों में नहर खोद रहा है उसकी मौत हो चुकी है। 

वजीर का आइडिया राजा को भ गया। उसने एक बूढ़ी स्त्री को फरहाद के पास भेजा। वह बूढ़ी फरहाद के पास गई और जोर-जोर से रोने लगी। फ रहाद ने उससे रोने का कारण पूछा तो बुढिय़ा ने कहा, तुम जिसके लिए अपने शरीर को खटा रहे हो-वह तो मर चुकी है। 

यह सुनकर फरहाद को इतना सदमा पहुंचा कि उसने अपने औजारों से खुद को मार लिया, नहर बन चुकी थी, मगर पानी की जगह उसमें फरहाद का लहू बह रहा था। फ रहाद की मौत की खबर सुनकर शीरीं ने भी खुद को खत्म कर लिया। इस तरह एक और प्रेम कहानी असमय मौत की गोद में सो गई।

सलीम-अनारकली: मुगल सम्राट अकबर के चहेते और बाबा फरीद के आशीर्वाद से जन्मे बेटे सलीम ने अनारकली से प्रेम किया। अनारकली एक मूर्तिकार की बेटी थी और बेहद खूबसूरत थी। अकबर इस प्रेम के खिलाफ थे। अनारकली के प्रेम में पागल शाहजादा सलीम ने अपने पिता के खिलाफ़ बग़ावत तक कर दी। कहा जाता है कि दरियादिल माने जाने वाले मुगल सम्राट ने अनारकली को जिं़दा दीवार में चिनवा दिया गया। मुगले-आजम जैसी फिल्म ने इस प्रेम कथा को अमर कर दिया।

रोमियो -जूलियट: ‘‘प्रिय जूलियट... तुम ही मेरी आखिरी आशा हो। वो लडक़ी जिसे मैं विश्व में सबसे ज्यादा प्यार करता था, मुझे छोडक़र चली गई है...।’’ यह उन तमाम पत्रों में से एक है, जो इटली के वेरोना स्थित पोस्ट ऑफि स में जूलियट के नाम आते हैं और जिन पर पते के स्थान पर केवल इतना लिखा होता है... ‘टू जूलियट वेरोना।’ 

इतने संक्षिप्त पते के बावजूद चिठ्ठियाँ  वहां पहुंच ही जाती हैं, जहां उन्हें पहुंचना चाहिए, यानी जूलियट के पास। ठीक पहचाना आपने, यह वही जूलियट है... विश्व विख्यात रचनाकार शेक्सपियर की अमर कृति रोमियो-जूलियट की नायिका। मगर, वह तो एक काल्पनिक पात्र है। 

शेक्सपियर की अनुपम कृति रोमियो-जूलियट की प्रेम दास्तान पर भरोसे के बूते ही दुनिया भर के प्रेम पीडि़त जूलियट के बुत के नाम आज भी पत्र लिखते हैं और उनके जवाब भी पाते हैं। यही तो है हम इन्सानों के धडक़ते नन्हे दिल के जिंदा होने का सबूत।

अचंभित होने की जरूरत नहीं है। प्रेम में जब इन्सान को खोने का अहसास होता है, तो वह उसे हासिल करने के लिए कोई कसर नहीं रहने देना चाहता। 

जूलियट तो फिर भी एक अमर हस्ती है, भले ही काल्पनिक ही क्यों न हो। दरअसल वेरोना दुनिया की शायद एकमात्र जगह है, जिसे प्रेम नगरी कहा जाता है। यह वही वेरोना नगर है, जिसे शेक्सपियर ने अपनी रचना रोमियो-जूलियट की पृष्ठभूमि बनाया था। यहां की हरेक चीज रोमियो-जूलिएट को समर्पित है। इस खूबसूरत नगरी को देखने दुनिया भर से हर साल कोई पांच लाख पर्यटक यहां आते हैं।

यहां पर एक दरगाह है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह जूलियट का मकबरा है एवं यहां पर लगी जूलियट की कांस्य प्रतिमा को छूकर लोग अपने प्रेम हेतु मन्नतें मांगते हैं। यह एक मिथ है, फिर भी लोगों को इस पर अटूट भरोसा है। इस भरोसे को बनाए रखने का श्रेय जाता है, वेरोना स्थित जूलियट क्लब को, जिन्होंने जूलियट को मिलने वाले इन बेशुमार पत्रों को आदर देने का संकल्प लिया हुआ है।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग तरह की परेशानियों से भरे पत्र इनके पास आते हैं, जिनका जवाब देने हेतु एक ऐसी टीम मौजूद है, जिसमें अनेक अनुवादक, मनोविज्ञानी आदि शामिल हैं। वे जानते हैं कि उनके पत्र लिखने से उन प्रेमियों की समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला, पर डूबते को तिनके का सहारा ही काफी होता है। 

इस लिहाज से जूलियट का पत्र पाकर प्रेम में निराश शख्स को कुछ तो सहारा मिलेगा ही। जूलियट क्लब के अध्यक्ष ग्यूलियो कहते हैं, ‘‘जूलियट क्लब को मिलने वाले ज्यादातर पत्र प्रेम का इजहार न कर पाने, दिल टूटने, साथी की तलाश जैसी कठिनाइयों के बारे में बताते हैं और इस ट्रेंड की ओर इशारा करते हैं कि अब लोग पहले से ज्यादा एकाकी और असुरक्षित महसूस करते हैं।’’
कहते हैं कि वेरोना को अपनी कथा की पृष्ठभूमि बनाने वाले शेक्सपियर कभी इटली गए ही नहीं थे। रोमियो-जुलियट लिखते समय उन्होंने आर्थर ब्रुक की एक कविता को अपनी कहानी का आधार बनाया था, जो तीस साल पहले प्रकाशित हुई थी।

दरअसल आस्था और तर्क में छत्तीस का आंकड़ा हमेशा से रहता आया है। आस्थावान प्रेमियों को वैज्ञानिक तर्कों से कोई लेना-देना नहीं। उनके लिए वेरोना एक तीर्थ है एवं जूलियट प्रेम की एक देवी है, जो उनकी मनोकामना पूर्ण कर सकने में सक्षम है। यह भरोसा आज भी बना हुआ है, क्योंकि प्रेम पर से भरोसा खत्म नहीं हुआ है।

वक्त बीत रहा है। ज़माना बदल रहा है। नई-नई पीढिय़ां आ रही हैं और पुरानी हो जा रही हैं लेकिन लैला-मजनूं,, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, शीरीं-फ रहाद, सलीम-अनारकली की कहानी हो या फिर रोमियो-जूलियट की दास्तान, इन कहानियों का जादू कभी कम नहीं हो सका है। हर जमाने, हर समाज और वक्त के बदलाव के हर पहिये के साथ-साथ घूम रही हैं ये प्रेम कहानियां।

रविवार, 11 नवंबर 2012

रिच इकोनोमिक पॉलिसी के खिलाफ हैं अमरीकी


टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम
  • टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम
(लेखक भारत के पूर्व कैबिनेट सचिव हैं।)

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा की लगातार दूसरी बार जीत से दो-तीन महत्वपूर्ण बातें उभरकर सामने आई हैं। सबसे पहली बात यह कि अमेरिका एक ह्वाईट कंट्री है। अमेरिका की कुल आबादी में गोरों की तादाद लगभग चौंसठ प्रतिशत है। जबकि अश्वेत महज बारह फीसद हैं। 
 
लेकिन कास्ट और रेस से ऊपर उठकर इस बार वहां राष्ट्रपति का चुनाव मूलतः आर्थिक नीति के मुद्दे पर लड़ा गया। दूसरी बात, बराक ओबामा के खिलाफ चुनाव लड़नेवाले रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार मिट रोमनी बहुत अमीर आदमी हैं। 
 
अमेरिका एक अमीर देश है। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक ओबामा को लगातार दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव जिताकर वहां के नागरिकों ने यह साबित कर दिया कि अमेरिकी नहीं चाहते कि वहां बहुत रिच इकोनोमिक  पॉलिसी लागू हो।

रिपब्लिकन पार्टी और मिट रोमनी ने चुनाव प्रचार के दौरान बराक ओबामा की आर्थिक नीतियों की लगातार आलोचना की। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान ओबामा और रोमनी दोनों ने पूरे अमेरिका में घूम-घूमकर लोगों को हरेक क्षेत्र में अपनी अपनी पार्टी की नीतियों के बारे में बताया। हमारे यहाँ यह नहीं होता है। 
 
हमारे यहाँ की राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान जनता को लुभाने के लिए तरह-तरह की घोषणाएं करती हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन घोषणाओं पर अमल कम ही होता है। को लेकिन आखिरकार  बराक ओबामा  की आर्थिक नीतियों को ही अमरीकियों ने पसंद किया।

एक बात और गौर करने की है! दोबारा चुनाव जीतने के बाद बराक ओबामा ने कहा कि ओबामा ने नहीं अमेरिका ने चुनाव जीता है। अपने प्रतिद्वंद्वी मिट रोमनी की प्रशंसा करते हुए ओबामा ने कहा है कि मैं रोमनी परिवार को समाज में योगदान देने के लिए धन्यवाद देता हूँ. मैं रोमनी के साथ बैठकर चर्चा करना चाहता हूँ कि हम देश (अमेरिका) को आगे कैसे ले जा सकते हैं. 
 
उन्होंने कहा कि सभी मतभेदों के बावजूद हम अमेरिका के लोगों को एक बेहतर भविष्य देना चाहते हैं। राष्ट्र हित में राजनीतिक मतभेद भुलाकर राजनीतक विरोधी के साथ देश को आगे ले जाने की बराक ओबामा की इस पहल पर गौर फरमाने की जरूरत है। हमारे यहाँ चुनाव परिणाम आने के बाद नेतागण एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगते हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि मुख्यतः आर्थिक मुद्दों पर लड़े गए इस बार के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला कांटे का था। चुनावी आंकड़े बताते हैं की ओबामा को पचाश फीसद वोट मिले जबकि रोमनी को उनसे सिर्फ दो प्रतिशत कम यानी अड़तालीस फीसद। 
 
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव काफी खर्चीला है। दोनों उम्मीदवारों ने चुनाव के दौरान कई मिलियन डालर खर्च किये। भारत के सन्दर्भ में देखें तो फर्क केवल इतना है कि यहाँ चुनावों में काले धन का इस्तेमाल किया जाता है जबकि अमेरिका में चुनावों में काले धन का इस्तेमाल बिलकुल नहीं होता।

अब सवाल उठता है की अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव परिणाम का भारत-अमेरिकी संबंधों पर क्या असर पडनेवाला है। मैं मानता हूँ कि बराक ओबामा के दूसरी बार चुनाव जीतने के बाद दोनों देशों के संबंधों में फिलहाल कोई ख़ास तब्दीली नहीं आनेवाली है। 
 
दरअसल भारत सहित दुनिया भर के देशों के साथ अमेरिका के सम्बन्ध हैं। भारत के साथ अमेरिकी विदेश नीति का एक लॉंग टर्म इंटरेस्ट है। अमेरिकी हित को देखते हुए अमेरिका अपनी विदेश नीति बनाता है। समय-समय पर वह उसमें थोडा-बहुत बदलाव करता है। लेकिन फिलहाल उसके सामने आर्थिक नीति महत्वापूर्ण हैं। (शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल थीं ऐनी आपा : शशिकांत

'मोहम्मद अली जिन्ना ने हिन्दुस्तान के साढ़े चार हज़ार सालों की तारीख़ (इतिहास) में से मुसलमानों के १२०० सालों की तारीख़ को अलग करके पाकिस्तान बनाया था। क़ुर्रतुल ऎन हैदर ने नॉवल 'आग़ का दरिया' लिख कर उन अलग किए गए १२०० सालों को हिन्दुस्तान में जोड़ कर हिन्दुस्तान को फिर से एक कर दिया।'' : निदा फ़ाज़ली. आज ऐनी आपा उर्फ़ कुर्रतुल ऐन हैदर की पुण्यतिथि है. प्रभात ख़बर के पटना संस्करण में प्रकाशित यह संस्मरणात्मक लेख अब ऑनलाइन मीडिया के मित्रों के हवाले है. शुक्रिया. शशिकांत

गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल थीं ऐनी आपा

''आज देखिए कंज्यूमरिज्म कितना बढ़ गया है. मार्केट में इतने तरह के प्रोडक्ट्स आ गए हैं कि मत पूछिए. मैं आपको बताऊँ, जिस तरह का दिखावा आजकल है, यह पहले नहीं था. यह सब देखादेखी, कम्पीटीशन से बढ़ा है. पता नहीं आजकल के लोगों को क्या हो गया है. आज हर कोई पैसे और दिखावे के पीछे भाग रहा है. करप्शन की वजह है पैसा. आज के पॉलिटिशियन और ब्यूरोक्रेट्स के नाम जिस तरह करप्शन के मामले में सामने आ रहे हैं, इसे देख-सुनकर बड़ी कोफ़्त होती है. पहले के ज़माने में ऐसा नहीं था'',

यह बात उर्दू की बहुचर्चित लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर ने आज से दस साल पहले कही थी. नोएडा के जलवायु विहार स्थित अपने फ़्लैट में ऐनी आपा ने इंडियन पॉलिटिक्स में करप्शन से लेकर कम्युनलिज्म, लिटरेचर, सोशल और कल्चरल - तमाम मसलों पर बेझिझक अपनी राय बयाँ किया था. लेकिन गुजरात दंगे पर बोलने से वह कतरा रही थीं.

उन दिनों गुजरात दंगे को लेकर लेखकों-कलाकारों की पूरी ज़मात काफ़ी परेशान थी. गुजरात दंगे के दस साल बाद ऐनी आपा के वे दहशतज़दा लफ्ज़ सचमुच रोंगटे ख़ड़े कर देनेवाले थे. उन्होंने झल्लाकर कहा था, ''क्या करेंगे जानकर? अखब़ार में छापेंगे? मैं गुजरात दंगे के बारे में उन लोगों के खिलाफ़ कुछ नहीं बोलूंगी. वे लोग मुझे जान से मार देंगे. मैं यहाँ अकेली रहती हूँ.'' 

कुर्तुल ऐन हैदर ने महज़ तीस साल की उम्र में हिंद-पाक विभाजन और हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर 'आग का दरिया' नोवेल लिखकर कर उर्दू अदब कि दुनिया में धमाकेदार तरीक़े से दस्तक दी थी. गुजरात दंगे पर उन्होंने तो सीधे-सीधे कोई बात नहीं की लेकिन कम्युनलिज्म को उन्होंने इंडियन डेमोक्रेसी के लिए बड़ा ख़तरा बताया.

सुनिए उन्हीं की जुबानी, ''देखिए, बाबरी मस्जिद की घटना के बाद हमारे हिंदुस्तान में कम्युनलिज्म का एक नया दौर आया है. किसने शुरू किया यह सब? मेरा ख़याल है कि हिंदुस्तान जैसे सेकुलर स्टेट में बीजेपी के बढ़ने की कई वजहें हैं. (कुछ तो अमेरिका का भी हाथ है. भाई अगर इंडिया में प्रोग्रेस होगा, यहाँ डेमोक्रेसी रहेगी, सेकुलरिज्म रहेगा तो साउथ एशिया का यह मुल्क़ मज़बूत होगा. यहाँ तरक्की होगी. लेकिन अमेरिका यह क्यों चाहेगा? ते वांट बैड इंडिया. दे नोट  वांट मॉडर्न एंड प्रोग्रेसिव इंडिया.)

''असल में कम्युनलिज्म जो है, और इसका जो प्वायजन है- आईटी इज अ बिग डिज़ीज़. हिंदुस्तान में जब तक ओवर ऑल एक इन्कलाब नहीं आएगा, जबतक आपका पूरा पौलिटिकल सिस्टम नहीं बदलेगा, जिसमें पब्लिक को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा 
तबतक कम्युनलिज्म का यह खेल चलता रहेगा. और वो अभी होनेवाला नहीं है. 
''आज हमारा पूरा का पूरा पॉलिटिकल सिस्टम बिगड़ा हुआ है. देखते है यह फेज़ कबतक चलता है. यह सब पॉलिटिक्स का मामला है. आगे यहाँ अगर अच्छे लीडर आएँगे तो यह डार्क फेज़ बदल जाएगा और बुरे आएँगे तो हालात और भी बुरे होंगे. दिक्कत यह है कि आज हमलोग चंद ऐसे लीडरों के कब्ज़े में हैं जिनको हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब से कोई लेना-देना नहीं है. उन्हें जैसे-तैसे, फ़साद करके कुर्सी हासिल करना है.''

कुर्रतुल ऐन हैदर को अदब की दुनिया में लोग इज्ज़त से ऐनी आपा कहते थे. वह बेहद ख़ूबसूरत थीं. रईस थीं. उन्होंने विवाह नहीं किया. 20 जनवरी सन 1928 को  पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेह्टौर क़स्बे में एक जमींदार ख़ानदान में उनकी पैदाइश हुई थी. लेखन उन्हें विरासत में मिली थी. उनकी माँ नज़र सज्जाद हैदर और पिता सज्जाद हैदर यलदरम- दोनों लेखक थे.

ऐनी आपा ने बताया, ''मेरे फादर पीसीएस से थे, कलेक्टर ग्रेड में. वे अंडमान में रेवेन्यू कमिश्नर थे बाद में लखनऊ आ गए. उस ज़माने में हमारे फादर के पास अमेरिका की 'ऑकलैंड' कार होती थी. लेकिन वो ज़माना दूसरा था. उस ज़माने के अमीर लोग अपनी अमीरी की नुमाइश नहीं करते थे. उस वक्त कहा जाता था कि आप अमीर हैं तो अपनी अमीरी की अकड़ मत दिखाइए. इस तरह की हरकत को
उस समय के लोग छिछोरापन समझते थे.'' 

आज़ादी की लड़ाई जब अपने आख़िरी दौर में चल रही थी तब ऐनी आपा ने होश सम्भाला. एक छोटे से क़स्बे से निकलकर उन्होंने लखनऊ, अलीगढ़ और दिल्ली में तालीम हासिल कीं. सन 1945 ई. में दिल्ली यूनिवर्सिटी के आईपी कॉलेज में पढ़ाई करते हुए वह बैडमिन्टन खेलती थी. फिर कुछ दिन देहरादून में रहीं. वहां डालनवाला में उनका एक प्यारा-सा बँगला था.

उसके बाद उन्होंने कराची, लाहौर, लन्दन और मुंबई का रुख किया और वहां पत्रकारिता और लेखन को अंजाम दिया. लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिस 'आग का दरिया' उपन्यास ने अदब की दुनिया में उन्हें शोहरत दिलाई उम्र के आख़िरी दौर में अपने उस उपन्यास पर बात करने से वो बचती थीं जबकि पार्टीशन की त्रासदी को उन्होंने ख़ुद झेला था. उस त्रासदी के वक्त  उनकी उम्र महज़ उन्नीस साल थी. भाई के साथ उनको पाकिस्तान जाना पड़ा.

लेकिन 'आग का दरिया' जब छाप कर आया तो पाकिस्तान के कट्टरपंथियों को गंगा-जमुनी तहजीब पर लिखा उनका यह उपन्यास पसंद नहीं  आया. और वे इनके पीछे पड़ गए. उस मुश्किल वक्त में ख्वाजा अहमद अब्बास ने ऐनी आपा की मदद की और  उन्हें बीबीसी में नौकरी मिल गई.

बाद में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पंडित जवाहरलाल नेहरू की मदद से हिंदुस्तान में उनकी वापसी हुई और मुंबई में उन्होंने अंग्रेज़ी की 'इम्प्रिंट' पत्रिका का छः साल तक और 'इलस्ट्रेटेड वीकली' का पाँच साल तक सम्पादन किया. बहुत कम लोग जानते हैं कि मुंबई में पत्रकारिता करते हुए ऐनी आपा ने हृषिकेश मुखर्जी की 'एक मुस्सफिर एक हसीना'
फ़िल्म की पटकथा और संवाद भी लिखा था.

ऐनी आपा ने ताउम्र शादी तो नहीं की लेकिन अदब की दुनिया में ख्वाजा अहमद अब्बास और खुशवंत सिंह के साथ उनका नाम दबी ज़ुबान चलता रहा. पद्मा सचदेव ने ऐनी आपा पर लिखे अपने एक संस्मरण में इसका ज़िक्र करते हुए लिखा है कि ख्वाजा अहमद आब्बास उनसे शादी करना चाहते थे लेकिन उन्हीं दिनों एक इंटरव्यू में ऐनी आपा ने अब्बास साहब को 'एक बेहूदा क़िस्म का रायटर' कह दिया इसलिए बात वहीं ख़त्म हो गई.

बातचीत में इस घटना का ज़िक्र चलने पर ऐनी आपा ने अफ़सोस जाहिर करते हुए कहा कि मैंने कभी उनके बारे में ऐसा कोई बयान नहीं दिया. फिर उन्होंने नाराज़गी के साथ कहा, ''लॉट्स ऑफ पीपुल आर नॉट मैरेड. उनके पीछे कोई नहीं पड़ता. औरत के पीछे क्यों पड़ते हैं?''     

उम्र के आख़िरी साल ऐनी आपा ने दिल्ली से सटे नोएडा में बिताया. उनकी भांजी हुमा हसन यहाँ उनकी पड़ोस में रहती थीं और उनका हालचाल लेती रहती थीं. वैसे रेहाना नाम की एक लड़की चौबीसों घंटे उनकी देखभाल करती थी. उसे सपरिवार ऐनी आपा ने अपने फ़्लैट में ही पनाह दे दिया था.

ऐनी आपा के साथ बातचीत का सिलसिला दस-ग्यारह बजे सुबह से शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला लंच तक चलता रहा. ख़ाने की मेज़ पर तमाम तरह के मुगलई व्यंजनों के बीच पंडित नेहरू के ज़माने को याद करना भला वह कैसे भूलतीं, ''वो पंडित नेहरू का ज़माना था. नेहरू जी से मेरे पेरेंट्स के बहुत अच्छे रिलेशन थे. ही वाज अ वेरी स्वीट पर्सन. वेरी कल्चर्ड. वे पॉलीटिक्स के आदमी ही नहीं थे. यदि वे पॉलिटिशियन नहीं होते तो बड़े रायटर, बड़े हिस्टोरियन या बड़े इंटेलेक्चुअल (इंटेलेक्चुअल तो वे थे) होते.

''उनकी वजह से हम इंडियन उन दिनों बड़े फ़ख्र से कहते थे- 'नेहरू इज इंडिया'. वो दौर अब ख़त्म हो गया. देखिये, हर मुल्क़ में एक लीडर होता है जिससे सारा मुल्क़ अपने को आईडेंटिफाई करता है. तुर्की में कमाल अतातुर्क थे. उन्होंने मॉडर्न तुर्की बनाया. ईरान में राज़ाशाह पहलवी थे. ही इज अ क्रिएटर ऑफ मॉडर्न ईरान. इजिप्ट (मिस्र) को जानते हैं जमाल अब्दुल नासिर के नाम से. और इंडिया को जानते हैं नेहरू और गांधी के नाम से.''


खाना ख़ाने के बाद उन्होंने जल्दी-जल्दी मौसंमी के दो-तीन टुकड़े खाए और रेहाना को 'काफ-ए-गुल्फरोश' लेकर आने का हुक्म दिया. डायनिंग टेबल पर ही आठ सौ पन्नों के
अपने तस्वीरों के उस मोटे से अल्बम को उलट-पलट कर दिखाते हुए उन्होंने बताया कि उर्दू अकादेमी, दिल्ली से यह प्रकाशित इस अल्बम में उनकी, उनके मित्र लेखकों और फिल्मकारों की हज़ार से ज़्यादा तस्वीरें हैं.    

(19 अगस्त 2012, प्रभात ख़बर रविवारीय अंक में प्रकाशित)       

गुरुवार, 10 मई 2012

सआदत हसन मंटो
मित्रो, आज से कोई सौ साल पहले 12 मई सन 1912 ई. को भारतीय उपमहाद्वीप के नामचीन अफसानानिगारों में से एक सआदत हसन मंटो साहब पैदा हुए थे. विभाजन की त्रासदी को बेहद संजीदगी के साथ बयाँ करनेवाले मंटो साहब को याद करते हुए यह टिप्पणी  पेश है. इसके कुछ अंश 15 जनवरी 2011 को दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित हो चुके हैं. - शशिकांत

सौ साल के मंटो को याद करते हुए

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि कुछ महान शख्सियतें काग़ज़ के पन्नों पर इन्सानी ज़िन्दगी, समाज और इतिहास की विडंबनाओं की परतों को उघाड़ने में जितनी माहिर होती हैं उनकी ख़ुद की ज़िन्दगी उन्हें इतना मौक़ा  नहीं देती कि वे बहुत ज़्यादा वक्त तक लिखते रहें। शख्सियतों की इसी फेहरिस्त में एक नाम है- सआदत हसन मंटो।

हिंद-पाक विभाजन की त्रासदी और मनवीय संबंधों की बारीक़ी को उकेरने वाली ‘कितने टोबाटेक सिंह’, ‘काली सलवार’, ‘खोल दो’, ‘टेटवाल का कुत्ता’, ‘बू’ सरीखी कहानियां लिखनेवाले भारतीय उपमहाद्वीप के इस लेखक और उसके सृजन पर आज पूरी अदबी दुनिया को फख्र है। 

लेकिन मंटो की शख्सियत की ख़ुद की ज़िन्दगी के दीगर पहलुओं, उनकी ज़द्दोज़हद, उनकी तकलीफ़ों और बेसमय हुई उनकी मौत से जब वाकिफ़ होते हैं तो मन अचानक मायूस हो जाता है।

हालांकि ताउम्र बदनामी और विवादों से घिरे रहनेवाली इस लेखक शख्सियत के कुछ दिलचस्प पहलू भी रहे हैं। बेशक इनमें से कुछ मंटो की शख्सियत को जानने-समझने में हमारी मदद करते हैं लेकिन कुछ को पढ़ते हुए कभी-कभी अचंभा भी होता है।

दरअसल मंटो बड़े ही मनमौजी क़िस्म के इन्सान थे। उनके मन में जो आता था वे वही करते थे, भले उसका अंज़ाम कुछ भी हो। अपने मन की बात कहने या लिखने में उन्हें कभी किसी तरह की कोई झिझक नहीं होती थी। 

अपनी इस फ़ितरत का उन्हें बेशक खामियाजा भी भुगतना पड़ा था। और तो और लिखते हुए वे उस दौर की महान शख्सियतों को भी नहीं बख्शते थे। उनकी ये हरकतें या हिमाकत कभी-कभार तो उस दौर की महान शख्सियतों को इतनी नागवार लगती थी कि वे मंटो साहब के लिए आपत्तिजनक लफ़्ज़ों का भी इस्तेमाल करते थे।

मसलन, सन् 18 जनवरी सन 1955 में मंटो का इंतकाल हुआ। उनकी मौत पाकिस्तान ही नहीं पूरे भारतीय उप-महाद्वीप की अदबी बिरादरी के लिए एक बड़ा सदमा था। इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी बेबाक लेखनी तो थी ही, कम उम्र में इस जहां से उनका रुखसत हो जाना भी था। 

उनके इंतकाल के बाद बहुचर्चित नृत्यांगना सितारा देवी को किसी ने मंटो साहब के इंतकाल की ख़बर दी। ख़बर सुनते ही सितारा देवी ने अपना मुंह बिगाड़कर कहा, ‘‘बड़ा ही बदतमीज और बेवकूफ आदमी था। मेरा चैन हराम कर दिया था उसने।’’ सआदत हसन मंटो से आखिर क्यों इतनी नाराज थीं सितारा कि उनकी मौत की खबर सुनकर भी उनका गुस्सा ठंडा नहीं पड़ा।

दरअसल, सितारा देवी के बारे में मंटो साहब को जब भी लिखने का मौका मिलता तो वे चटखारे लेकर लिखते थे। उनकी लेखनी के मुरीद पाठक जानते हैं कि उन्होंने सितारा देवी पर कई शब्द-चित्र लिखे हैं। 

ऐसे ही एक शब्द-चित्र में उन्होंने लिखा है, ‘‘सितारा देवी की जब मैं कल्पना करता हूं तो वह मुझे बंबई की एक ऐसी पांच मंज़िला  इमारत लगती हैं जिसमें कई फ़्लोर और कमरे हैं। और यह एक हकीक़त है कि वह एक वक्त में कई-कई मर्द अपने दिल में बसाए रखती हैं।’’ 

कभी-कभी तो वे सितारा देवी के बारे में इतनी आपत्तिजनक टिप्पणियां कर जाते थे कि यदि वो चाहतीं तो उन पर मानहानि का मुक़दमा कर सकती थीं।

उस दौर की दो महान लेखक शख्सियतों अली सरदार जाफ़री, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अहमद नसीम क़ासमी, कृश्नचंदर, ख्वाज़ा  अहमद अब्बास, मजाज़, शाहिद लतीफ़, राजेंदर सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, अशोक कुमार सरीखी शख्सियतें उन्हें अपना दोस्त कहते हुए फ़ख्र करती थीं। इन सबका साथ-साथ उठना-बैठना होता था। 

कहते हैं कि वे सब मंटो साहब का बड़ा ख़याल रखते थे। लेकिन तब सवाल उठता है कि फिर ऐसा क्यों हुआ कि उनके ये सारे दोस्त बंबई में मौज़ करते रहे लेकिन उनमें से किसी ने भी मंटो साहब की वापस हिंदुस्तान बुला लेने की दिली आरज़ू पर कभी गौर नहीं फ़रमाया।

दरअसल सआदत हसन मंटो ने हिंद-पाक विभाजन के वक्त पाकिस्तान जाने का फ़ैसला तो कर लिया था लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान से उनका मोह भी भंग हो गया था, कुछ-कुछ कुर्रतुल ऐन हैदर की तरह। कुर्रतुल ऐन हैदर ने तो ख्वाज़ा अहमद अब्बास की मदद से पहले बीबीसी ज्वाइन किया और फिर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पंडित नेहरू से गुज़ारिश करके वापस हिंदुस्तान आने में क़ामयाब रहीं।

लेकिन मंटो के हाथ तो इतने लंबे थे नहीं। हां, मुबई के कई दोस्तों को उन्होंने ज़रूर लिखा, ‘‘यार, मुझे वापस हिंदुस्तान बुला लो। पाकिस्तान में मेरी कोई जगह नहीं है।’’ पर पर उनकी ‘बदतमीज़ी’, ‘बदमिज़ाजी’, ‘बदकलमी' बर्दास्त करने की  कूव्वत यहीं बंबई के उनके किसी दोस्त में नहीं थी।

ऐसी हालत में फटेहाली के साथ पाकिस्तान में ही रहना उनकी मज़बूरी बन गई थी। फिर तो हताशा और निराशा के साथ रहना और खुद को अकेला महसूस करने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था। 

उसी अकेलेपन में उन्होंने शराब को अपना खास दोस्त बना लिया, इतना खास कि दिन-रात उसी के साथ रहने लगे। 

इसका अंज़ाम तो बुरा ही होना था, सो हुआ। देखते ही देखते टीबी की लाइलाज बीमारी ने उन्हें अपने आग़ोश में ले लिया, और सन 1955 में महज़ 42-43 साल की उम्र में वे इस ज़हाँ को अलविदा कह गए। 
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