शनिवार, 30 अप्रैल 2011

अन्ना ने भ्रष्टाचार को नैतिक मुद्दे की तरह पेश किया : अरुंधति

अरुंधति रॉय
मित्रो,  
फेहरिस्त लम्बी होती जा रही है, अन्ना हजारे के आन्दोलन को किन्तु-परन्तु के साथ देखनेवालों की. शुद्धाव्रत सेन गुप्ता, शिव विश्वनाथन, बद्री रैना, हर्षमंदर, योगेन्द्र यादव, के एन पणिक्कर, महेश भट्ट, मृणाल पांडे, मस्तराम कपूर....और अब अरुंधति रॉय.  जनतांत्रिक आंदोलनों के गठबंधन की ओर से बीते 29 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित एक सेमीनार में अरुंधति रॉय के भाषण के संपादित अंश को बीबीसीहिंदीडॉटकॉम ने प्रस्तुत किया है. अरुंधति रॉय का मानना है, "अन्ना हज़ारे और उनकी टीम के समर्थन में जंतर मंतर पहुँचे हज़ारों हज़ार लोगों के सामने भ्रष्टाचार को एक नैतिक मुद्दे की तरह पेश किया गया, एक राजनैतिक या व्यवस्था की कमज़ोरी की तरह नहीं. वहाँ भ्रष्टाचार पैदा करने वाली व्यवस्था को बदलने या उसे तोड़ने का कोई आह्वान नहीं किया गया." पेश है - शशिकांत  


बीस साल पहले जब उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का दौर हम पर थोपा गया तब हमें बताया गया था कि सार्वजनिक उद्योग और सार्वजनिक संपत्ति में इतना भ्रष्टाचार और इतनी अकर्मण्यता फैल गई है कि अब उनका निजीकरण ज़रूरी है. हमें बताया गया था कि मूल समस्या इस प्रणाली में ही है.
अब लगभग हर चीज़ का निजीकरण हो चुका है. हमारी नदियाँ, पहाड़, जंगल, खनिज, पानी सप्लाई, बिजली और संचार प्रणाली प्राइवेट कंपनियों को बेच दिए गए हैं. तब भी भ्रष्टाचार सुरसा के मुँह की तरह फैलता जा रहा है.
भ्रष्टाचार की विकास दर कल्पना से परे है. घोटाला दर घोटाला जितनी बड़ी रक़में निगली जा रही हैं उसका कोई हिसाब नहीं. इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस देश के लोग बुरी तरह नाराज़ हैं. लेकिन ग़ुस्से में होने का मतलब ये नहीं है कि आप साफ़ साफ़ सोच भी पा रहे हों.
अन्ना हज़ारे और उनकी टीम के समर्थन में जंतर मंतर पहुँचे हज़ारों हज़ार लोगों के सामने भ्रष्टाचार को एक नैतिक मुद्दे की तरह पेश किया गया, एक राजनैतिक या व्यवस्था की कमज़ोरी की तरह नहीं. वहाँ भ्रष्टाचार पैदा करने वाली व्यवस्था को बदलने या उसे तोड़ने का कोई आह्वान नहीं किया गया.

इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि जंतर मंतर पर मौजूद मध्यम वर्ग के ज़्यादातर लोगों और कॉरपोरेट-समर्थित मीडिया को भ्रष्टाचार के जनक इन आर्थिक सुधारों का बहुत फ़ायदा हुआ.
अन्ना हज़ारे
मीडिया ने इस आंदोलन को “क्रांति” और भारत का तहरीर चौक बताया. इसी मीडिया ने पहले दिल्ली में हज़ारों हज़ार ग़रीब लोगों की रैलियों को नज़रअंदाज़ किया क्योंकि उनकी माँगें कॉरपोरेट एजेंडा के माफ़िक़ नहीं थीं.
जब भ्रष्टाचार को धुँधले तरीक़े से, सिर्फ़ एक ‘नैतिक’ समस्या के तौर पर देखा जाता है तो हर कोई इससे जुड़ने को तैयार हो जाता है – फ़ासीवादी, जनतांत्रिक, अराजकतावादी, ईश्वर-उपासक, दिवस-सैलानी, दक्षिणपंथी, वामपंथी और यहाँ तक कि घनघोर भ्रष्ट लोग जो आम तौर पर प्रदर्शन करने को हमेशा उत्सुक रहते हैं.
ये एक ऐसा घड़ा है जिसे बनाना बहुत आसान है और उससे आसान उसे तोड़ना है. अन्ना हज़ारे ने अपने बनाए इस बर्तन पर सबसे पहले पत्थर मारा और वामपंथी समर्थकों को हैरान कर दिया जब वो नरेंद्र मोदी को विकास-प्रतिबद्ध मुख्यमंत्री का जामा पहना कर अपने मंच के केंद्र में ले आए.
उन्होंने विकास के नाम पर मोदी की उपलब्धियों की झूठी प्रकृति पर बहस में पड़ना ठीक नहीं समझा. हम में से कई लोग ये सोचते रह गए कि क्या हमें भ्रष्ट मगर कथित जनतांत्रिक लोगों की जगह एक ईमानदार फ़ासीवादी नेता का विकल्प दिया जा रहा है.

मैं एक मज़बूत भ्रष्टाचार-विरोधी संस्था के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, पर मैं ये भरोसा पाना चाहूँगी कि ऐसी संस्था बहुत सारे अधिकार पाने के बाद ग़ैरज़िम्मेदार और ग़ैरजनतांत्रिक न हो जाए. हालाँकि मैं ये नहीं मानती कि सिर्फ़ क़ानूनी तरीक़ों से ही सांप्रदायिक फ़ासीवाद और उस आर्थिक निरंकुशता के ख़िलाफ़ लड़ा जा सकता है जिसके कारण 80 करोड़ से ज़्यादा लोग क़ानूनी तरीक़े से 20 रुपए प्रतिदिन पर गुज़र करते हैं.
जब तक मौजूदा आर्थिक नीतियाँ जारी हैं तब तक राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना से भूख और कुपोषण ख़त्म नहीं किया जा सकता. भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून से अन्याय नहीं ख़त्म हो सकता और अपराध विरोधी क़ानूनों से सांप्रदायिक फ़ासीवाद को ख़त्म नहीं किया जा सकता.
क्या सूचना के अधिकार या जन लोकपाल बिल के ज़रिए उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में किए गए उन गुप्त सहमति पत्रों को सामने लाया जा सकता है जिन पर सरकार ने व्यापार घरानों के साथ दस्तख़त किए हैं और जिनके लिए वो अपने सबसे ग़रीब नागरिकों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने को तैयार है? अगर ऐसा हो सकता है तो इन सहमति पत्रों से ये स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार देश की खनिज संपदा को निजी कॉरपोरेशनों के हाथों कौड़ियों के मोल बेच रही है.
लेकिन ये भ्रष्टाचार नहीं है. ये पूरी तरह क़ानूनी लूट है और 2-जी घोटाले से कई गुना बड़ा घोटाला है. अगर हमें सूचना के अधिकार के तहत ये सूचना मिल भी जाती है तो हम उस सूचना का क्या कर पाएँगे?
मैं मानती हूँ कि जंतर मंतर की क्रांति में अगर किसी ने इन समझौता पत्रों का सवाल उठाया होता तो टीवी कवरेज और वहाँ मौजूद भीड़ का एक बड़ा हिस्सा तुरंत ग़ायब हो गया होता.

रविवार, 17 अप्रैल 2011

चाहे दक्षिण, चाहे वाम, जनता को रोटी से काम: नागार्जुन



बाबा नागार्जुन का यह जन्म शताब्दी वर्ष है. आज (17 अप्रैल 2011) राष्ट्रीय सहारा ने रविवारीय उमंग का एक पूरा पन्ना बाबा नागार्जुन की स्मृति को समर्पित किया है. 

बाबा नागार्जुन
जीवन के आखिरी दिनों में जब भी नागार्जुन  दिल्ली आते तो सादतपुर में ठहरते थे। यहीं लोगों से मिलते थे, मुलाकात करते थे। अब तो बाबा रहे नहीं लेकिन मुलाकातों की यादें लोगों के मन-मस्तिष्क पर गहरे तौर पर अंकित है। किसी सुबह की मुलाकात को याद कर रहे हैं शशिकांत - 

उत्तर-पूर्व दिल्ली में एक बस्ती है- सादतपुर।  सादतपुर में रहते हैं हिन्दी के कई लेखक और पत्रकार। लेकिन सादतपुर को 'बाबा नागार्जुन नगर' कहा जाता है, क्योंकि यहीं के गली नंबर-2 में रहते थे- मैथिली और हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार बाबा नागार्जुन उर्फ वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री'। बाबा ने अपने नवनिर्मित घर का नाम रखा था - 'यात्री निवास'। यात्री निवास यानी पक्की ईटों का बिना पलस्तर का तीन कमरों का एक मंजिला मकान। उसके आगे एक-डेढ़ कट्ठे में बॉडीनुमा आंगन और मरद भर ऊंची-ऊंची चारदीवारी। बिल्कुल गांव के किसी मकान की तरह। 

सुबह दस-ग्यारह बजे के आसपास दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खुलते ही श्रीकांत सामने दिखे। बाबा के बेटे हैं श्रीकांत जी। दो-तीन कमरों के सामने से गुजरते हुए हम बैठकनुमा कमरे में पहुंचे। ओ, तो यही था बाबा का कमरा, और उनका रीडिंग रूम और उनकी बैठकी। तख्त पर बैठे बाबा के सामने रखी कुर्सी पर जाकर चुपचाप बैठ गया। बाबा के आधे टकलू सिर के किनारे-किनारे थे, उलझे हुए सफेद बाल और बड़ी-बड़ी सफेद दाढ़ी। धोती को लुंगी की तरह कमर में लपेटे और खादी का कुर्ता पहने बाबा तख्त पर बैठकर ग्लास से एक किताब पढ़ रहे थे। बगल में रखा था, उनके चलने-फिरने का सहारा यानी उनकी लाठी। 

सामने आंगन में खेल रहे थे श्रीकांत जी के बच्चे। संडे जो था लेकिन बाबा थे पढ़ने में मगन। बच्चों के शोरगुल और मेरे आने से बेखबर। इस बैठकनुमा कमरे की दो तरफ की दीवारों में बने थे लकड़ी के ऊंचे-ऊंचे रैक। उनमें भरी थी दुनियाभर की किताबें। इन्हीं किताबों के बीच था उनका अपना रचनात्मक संसार-'नयी पौध', 'बलचनमा', 'रतिनाथ की चाची'..। सामने टेबल पर रखा था हिन्दी का एक अखबार और कई साहित्यिक पत्रिकाएं। 

इस बीच, स्टील के एक गिलास में पानी और एक कप चाय मेरे सामने आ गई। हिन्दी का शोधार्थी अपने समय के महान रचनाकार से रू-ब-रू था और उन्हें ग्लास से पढ़ते हुए देख रहा था। तभी अचानक ग्लास को पन्नों के बीच रखकर बाबा ने किताब बंद किया और दाढ़ियों से भरे, झुर्रियों से सजे, मुस्कान भरी, बेहद आत्मीय और निश्छल निगाहों से, मेरी तरफ ऐसे देखा, मानो उनका मुझसे पूर्व-परिचय हो और मैं कोई उनका बेहद करीबी था। 

बाबा थे, तो उनके हर अंदाज और उनकी हर बातें निराली थी। घर आए एक अपरिचित शख्स को इतना स्नेह। महानगरीय औपचारिकताओं से बिल्कुल परे। 'क्या नाम है तुम्हारा?' उन्हों ने पूछा। मैंने बताया। थोड़ी देर तक सोचते रहे, शायद मेरे नाम का मतलब निकाल रहे थे। फिर पूछा, 'कहां रहते हो?', 'यहां आने में दिक्कत तो नहीं हुई?' मैंने कहा, 'नहीं।'

लेकिन बातचीत के दौरान जब मैंने कहा, 'रेणु के मैला आंचल में सबॉल्टर्न चेतना' विषय पर एम.फिल किया है, दिल्ली विश्वविद्यालय से...', तो उनके चेहरे पर ताजगी छा गई, मानो रेणु जी की छवि उनकी आंखों में आ बसी हो। फिर तो बहुत देर तक रेणु जी के व्यक्तित्व और उनके लेखन के बारे में ही बताते रहे। 

बातचीत में पता चला कि बाबा को किसी संकीर्ण विचार में बांधना आसान नहीं। मैंने पूछा, "बाबा ! आप वामपंथी हैं। भारत में वामपंथी और समाजवादी- दोनों एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। फिर भी आप शरीक हुए जेपी के आंदोलन में?" बाबा ने झट से कहा, "चाहे दक्षिण- चाहे वाम, जनता को रोटी से काम।" बाबा  की बातों से ऐसा लगा कि जेपी आंदोलन में जोड़ने में फणीश्वरनाथ रेणु की अहम भूमिका थी। 

1974 जेपी आंदोलन में बाबा ने फणीश्वरनाथ रेणु के साथ बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था, इतना कि उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। दरअसल, स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनीतिक उतार-चढ़ाव, उठा-पटक, जोड़-तोड़ और जनचेतना का जीवंत दस्तावेज है- नागार्जुन का पूरा साहित्य। नागार्जुन के काव्य को आधार बनाकर आजाद भारत में राजनीतिक चेतना का इतिहास लिखा जा सकता है। 

तभी तो उदय प्रकाश प्रख्यात इतिहासकार डी. डी. कोसांबी की इस प्रस्थापना के हवाले से बाबा नागार्जुन की कविताओं का मूल्यांकन करते हुए कहते हैं, 'इतिहास लेखन के लिए काव्यात्मक प्रमाणों को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।.. हम उनकी रचनाओं के प्रमाणों से अपने देश और समाज के पिछले कई दशकों के इतिहास का पुनर्लेखन कर सकते हैं।'

बाबा में प्रतिरोध की शायद जन्मजात क्षमता थी। तभी तो अपने छह भाई-बहनों में अकेले जीवित बच पाए बाबा। शुरुआती पढ़ाई दरभंगा जिले में अपने तरौनी गांव में ही हुई, वह भी संस्कृत परंपरा में। लेकिन मैथिली, हिन्दी, बांग्ला और संस्कृत भाषा पर एक समान अधिकार। 1925 में गोनौली संस्कृत पाठशाला से प्रथमा और मध्यमा की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद बनारस विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा। यहीं से साहित्याचार्य की डिग्री। 

फिर एक साल कलकत्ता में रहकर काव्यतीर्थ की उपाधि हासिल की। यहीं बाबा वामपंथी विचारधारा के संपर्क में आए। 1936 में सिंहलद्वीप (श्रीलंका) गए। वहां बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन करने के दौरान विद्यालंकार परिवेश में बौद्ध शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। यहीं आपको बौद्ध नाम 'नागाजरुन' मिला। बाबा के व्यक्तित्व का एक बड़ा पक्ष था- घुमक्कड़पना। यायावरी जीवन-शैली का एक हिस्सा रहा था। इस 'यात्रीपन' के पीछे बाबा का उद्देश्य वास्तव में आम भारतीय जनजीवन को समग्र और सच्चे रूप में समझना भी रहा था। 

अपनी कविताओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए बाबा ने रेलगाड़ी में घूम-घूम कर चार-चार आने में अपनी कविता की किताबें बेचीं। 'रतिनाथ की चाची', 'बलचनमा', 'बाबा बटेसरनाथ', 'नयी पौध', 'वरुण के बेटे', 'दुखमोचन', 'उग्रतारा', 'कुंभीपाक', 'पारो', 'आसमान में चांद तारे' जैसे उपन्यास, दर्जनभर से ज्यादा कविता संग्रह सहित व्यंग्य, निबंध और बाल साहित्य लिखनेवाले बाबा नागाजरुन को उनकी ऐतिहासिक मैथिली रचना 'पत्रहीन नग गाछ' के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया। 

कुल मिलाकर कहा जाए तो छोटी-सी इस पहली मुलाकात में ही लगा था कि बाबा बतक्कड़ हैं। खूब बातें करते हैं। दिल खोलकर दुनिया जहान की बातें। गंभीर नहीं- सहज, सीधी और सपाट बातें। मसलन महंगाई है तो क्यों है? उसके कई कारण गिनाते हैं। खादी के धोती-कुत्रे की क्या खासियत है और रेशमी की क्या तासीर, बाबा सबका बारीक विश्लेषण करते हैं। इसी तरह सन पचास-साठ-सत्तर के भारत और आज के भारत, गांव के भारत और शहर के भारत के अंतर को भी समझाते हैं। तभी तो अब ये न तो वैद्यनाथ मिश्र थे, न यात्री और न नागार्जुन बल्कि थे, बाबा नागार्जुन।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

लैंगिक विकलांगता और भारतीय समाज

एक किन्नर के साथ सलमान खान
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में समाज के हाशिए पर जी रहे लैंगिक विकलांगों की यौन अस्मिता और उनकी समाजार्थिक स्थितियों का मुद्दा अक्सर उठता रहा है। ‘हिजड़ा’ शब्द जेहन में आते ही हमारी आंखों के सामने एक खास तरह की भाव-भंगिमा, आचार-व्यवहार, रहन-सहन, चाल-ढाल वाले इन्सानों की छवि आ जाती है।

मुख्यधारा के समाज में बहिष्कृत, व्यंग्य, घृणा, तिरस्कार आदि सहने को अभिशप्त इस श्रेणी के इंसानों की यौन स्थिति के आधार पर कई और नामों से पुकारा जाता है जैसे ‘किन्नर’, ‘उभयलिंगी’, ‘शिखंडी’ वगैरह। हिजड़ा स्त्री या पुरुष जननांगों के स्पष्ट अभाव वाला वह शख्स है जो न तो स्त्री है और न पुरुष। इनमें सेक्स हारमोन के रिसाव की संभावना नहीं होती है।

किन्नरों को लेकर भारतीय समाज में भिन्न-भिन्न तरह की भ्रांतियां हैं। मिथक और इतिहास में भी इनकी खास तरह की उपस्थिति है। महाभारत का शिखंडी योद्धा था। जिसकी मदद से अर्जुन ने भीष्म पितामह का वध किया था। वह आधा औरत और आधा मर्द यानि किन्नर था। अर्जुन ने अपने अज्ञातवास का एक साल का समय भी किन्नर का रूप धारण कर वृहन्नला के नाम से बिताया था। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में किन्नरों का उल्लेख किया है। उस समय राजाओं ने किन्नरों का अपने निजी सुरक्षाकर्मी के तौर पर तैनात किया हुआ था तथा उनका इस्तेमाल जासूसी के लिए किया जाता था।

किन्नर विधायक शबनम मौसी
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, हिंदू और मुसलिम शासकों द्वारा किन्नरों का इस्तेमाल खासतौर पर अंत:पुर ओर हरम में रानियों की पहरेदारी के लिए किया जाता था। इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि रानियां पहरेदारों से अवैध संबंध स्थापित नहीं कर पाएं। उस दौर में राजाओं द्वारा काफी नौजवानों के यौनांग काटकर उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था।

दिल्ली की सल्तनत के दौरान किन्नर महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में किन्नर वरिष्ठ सैनिक अधिकारी रहे हैं। खिलजी का एक प्रमुख पदाधिकारी मलिक गफूर था, जो किन्नर था। वह खिलजी का दायां हाथ माना जाता था। उसी के प्रयासों से खिलजी ने दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

गुजरात में सुलतान मुजफ्फर के शासनकाल में एक किन्नर मुमित-उल-मुल्क कोतवाल था। जहांगीर के शासनकाल में कई किन्नर महत्वपूर्ण पदों पर थे। एक किन्नर ख्वाजा सराय हिलाल प्रमुख प्रशासनिक पद पर था। उन्हीं के शासन में इफ्तिखार खान नामक एक किन्नर भी था। बाद में जहांगीर ने उसे एक जागीर का फौजदार बना दिया। जहांगीर की अदालत में भी खान नामक एक किन्नर था।

भोपाल के सडक पर किन्नरों की कलश यात्रा
इतिहास में दर्ज किन्नरों की समाजार्थिक, राजनीतिक स्थिति का मूल्यांकन करें तो हम पाते हैं कि इनकी सामाजिक उपयागिता अय्याश राजा-महाराजाओं व नवाबों के हरमों तक में थी। मुगलकाल से पहले इनका अलग सामाजिक अस्तित्व दिखाई नहीं देता। मुख्यधारा के लोगों में व्यापत परंपरागत नकारात्मक धारणाएं, सामाजिक उपेक्षा आदि के कारण आज इक्कीसवीं सदी में भी उनकी दशा ज्यों कि त्यों बनी हुई है। रोजी-रोटी चलाने के लिए ये आज भी बधाई देकर उपहार में मिले पैसों से अपनी जीविका चालाने को मजबूर हैं।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि देश में भिन्न यौन स्थिति के कारण सामाजिक एवं शक्षिक रूप से दीन-हीन हिजड़ों के पुनर्वास, उनके जीवन स्तर में सुधार, सामाजिक संरक्षण आदि के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया गया है। भारतीय नागरिक होने के बावजूद हिजड़े संविधान प्रदत्त अपने अधिकारों से वंचित हैं।

लैंगिक विकलांगों के प्रति समाज का नकारात्मक व्यवहार और टेलिविजन पर दिखाए जा रहे सोडा के एक विज्ञापन में देखा जा सऽता है। विज्ञापन में एक युवक झूला झूलते हुए पेड़ से टकराकर जमीन पर सीधा खड़ा होता है और सोडा के बोतल में मुंह लगाकर एक घूंट पीता है। उससे जब उसका स्वाद पूछा जाता है तो वह जवाब देता है, ‘‘यह ज्यादा मीठा नहीं फीका है।’’ तुरंत उससे दूसरे बोतल में बंद शीतल पेय का स्वाद पूछा जाता है, जिसे बिना पिए वह जवाब देता है, ‘‘यह न ज्यादा मीठा है न फीका।’’ उसके इस जवाब को सुनकर उसके पीछे खड़े नवयुवक हिजड़ों की नकल उतारते हुए व्यंग्य करते हैं, ‘‘यानि यह न इधर का है न उधर का। बीच का है।’’

आशाराम बापू के खिलाफ प्रदर्शन करते किन्नर
इस विज्ञापन में लैंगिक विकलांगों के प्रति पुरुष समाज में व्याप्त पूर्वाग्रह और उनकी नकारात्मक धारणाओं को दर्शाया गया है, जो उनकी लैंगिक स्थिति और यौन अस्मिता का मजा उड़ाता है। ‘यह ज्यादा मीठा नहीं फीका है’ का संदेश देकर उपभोक्ताओं को रिझानेवाले सोडा के इस विज्ञापन में एक शीतल पेय के विरुद्ध ‘यह न ज्यादा मीठा है न फीका’ अर्थात ‘न इधर का है न उधर का यानि बीच का है’ कहकर टिप्पणी की जाती है तो यह लैंगिक विकलांगों के प्रति बाकी समाज में व्याप्त परंपरागत पर्वाग्रह और उनकी नकारात्मक सोच को दर्शाती है।

क्या यह सच नहीं है कि आज भी मुख्यधारा के समाज में किसी व्यक्ति के साहस या उसकी वीरता पौरुष अथवा मर्दानगी पर सवाल लगाना होता है तो उसे ‘हिजड़ा’ कहकर दुत्कारा जाता है। यानि मुख्य यौनधारा के बहुसंख्यक पुल्लिंगी और स्त्रीलिंगी लोगों के लिए ‘हिजड़ा’ शब्द एक भद्दी गाली की तरह है। गर्भावस्था की गड़बड़ी के कारण पैदा होनेवाले एक खास तरह की लैंगिक स्थिति वाले लाखों हिजड़ों के बारे में मुख्यधारा की लैंगिक स्थिति वाले स्त्रियों और पुरुषों की यह नकारात्मक धारणा लैंगिक वर्चस्व का एक नमूना है।

बदलते दौर में हाशिए पर के अन्य समूहों की तरह लैंगिक विकलांग समूह भी आत्मचेतस हुआ है। अस्मिता बोध के कारण सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित इस समाज के कुछ लोगों में राजनीतिक चेतना बढ़ी है। 1994 में मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन ने लैंगिक विकलांगों के मतदान के अधिकार को मंजूरी दी थी। इससे उनके लिए राजनीति के रास्ते खुल गए। मतदाता के तौर पर किन्नरों को महिलाओं के रूप में दर्ज किया जाता है। राजनीति में सबसे पहली सफलता पानेवाली किन्नर हिसार, हरियाणा की शोभा नेहरू है। वह 1995 में हुए नगर निगम के चुनाव में शहर के वार्ड नबर नौ की पार्षद चुनी गई थी। इसके बाद श्रीगंगानगर, राजस्थान में एक किन्नर बसंती भी पार्षद चुनी गई। 

इसी साल के आरंभ में हुए चुनाव में शोभा नेहरू पुनरू पार्षद चुनी गई। राजनीति में अच्छी सफलता किन्नरों को मध्य प्रदेश में मिली। 2002 में वहां किन्नर विधायक, महापौर ओर पार्षद थे। देश की पहली किन्नर विधायक शबनम मौसी शहडोल जिले के सोहागपुर विधानसभा सीट से चुनी गई थी। प्रदेश में 2002 में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में चार किन्नर चुने गए थे। बेशक किन्नर समाज की यह राजनीतिक सक्रियता काबिलेगौर है।

एक अनुमान के मुताबिक, 2002 तक देश में बारह लाख से ज्यादा किन्नर थे तथा इनकी संख्या में हर साल चालीस हजार की बढ़ोतरी हो रही है। इस मामले में आश्चर्य की बात यह है कि पिछले दस सालों के दौरान देश भर में मात्र तीन सौ नपुंसक बच्चों के जन्म का ब्यौरा है। 1980 में अखिल भारतीय हिजड़ा ऽल्याण सभा द्वारा ऽराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, तब देश में हिजड़ों की कुल संख्या चार लाख के करीब थी। इसका मतलब साफ है कि जन्मजात हिजड़े कम होते हैं अन्य जबरन बनाए जाते हैं।

ऑल इंडिया हिजड़ा कल्याण सभा के अध्यक्ष खैरातीलाल भोला कहते हैं, ‘‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जन्मजात हिजड़ों की संख्या बहुत कम है और ज्यादातर हिजड़े जबरन बनाए गए हैं। भोले-भाले युवकों के यौनांग काटकर उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता है। यह सब काम पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे होता है लेकिन कोई इसे रोकनेवाला नहीं है। हिजड़ों ने अपने डॉक्टर रखे हुए हैं जो युवकों के लिंग काटकर उन्हें हिजड़ा बनाने का काम करता है। मगर किसी को परवाह नहीं है।’’

ए एस पंडियन ने ‘संस्कृति और अधीनस्थ चेतना’ शीर्षक लेख में लिखा है कि निम्नवर्गीय लोग ही सिर्फ उच्चवर्गीय लोगों की नकल नहीं करते बल्कि उच्चवर्गीय लोग भी निम्नवर्गीय लोगों की चेतना को प्रभावित करते हैं। जयपुर में घटी एक घटना आम बेरोजगार नवयुवकों में किन्नर चेतना के प्रभाव को दर्शाती है। शहर के मालवीय नगर इलाके में तीन नौजवान- प्रमोद, मधु और राजू रोज की तरह हिजड़े बनकर कॉलोनी के घरों में गए। वहां उन्होंने वे सब कर्मकांड किए जो हिजड़े करते हैं। बाकायदा गोदभराई की रस्म भी कराई और नेग-चार के नाम पर तीन हजार रुपए भी वसूल किए। शहर के उस हिस्से की मालकिन हिजड़ा मुन्नीबाई को जब यह खबर लगी तो वह अनी साथिनों के साथ वहां आ पहुंचीं और उन नकली हिजड़ों पर टूट पड़ीं। उन्होंने उनके बाल काट दिए, उनके कपड़े फाड़ दिए और नंगी होकर भीड़ से न्याय करने को कहा।

इसी तरह, हिजड़ों की जीवटता का समाज की मुख्यधारा के अभिजात लोग भी अपने हित में इस्तेमाल ऽरते हैं। इसका एक उदाहरण मुबई में देखने को मिला, जब एक दक्षिण भारतीय सेठ ने हिजड़ों के अश्लील हुड़दंग का सहारा लेकर अपने डूबते रुपए वसूल किए।

समाज में अब तक हिजड़ों की कोई सुनिश्चित जगह नही है। किन्नरों की सामाजिक आर्थिक दशा और समाज द्वारा उनके साथ किए जा रहे उपेक्षापूर्ण व्यवहार चिंताजनक स्थिति है। बधाई मांगने के लिए टोलियों में गली-गली घूमनेवाले लैंगिक विऽलांगों की सामाजिक उपेक्षा उन्हें संगठित होकर जीविकोपार्जन करने के लिए बाध्य ऽरती है। 

इसीलिए आम लोगों की हिजड़ों के प्रति शिकायत रहती है कि वे जबरन घर में घुस आते हैं और मनमाना पैसा मांगते हैं। समाज मांगलिक अवसरों पर प्रसन्नता से इन्हें दान देता और ये भी हंसी-खुशी के इन मौकों पर कुछ श्लील कुछ अश्लील मगर एक हद तक मर्यादित बतरस और हाव-भावों से लोगों को गुदगुदा कर अपना नेग चार इनाम-इकराम लेकर दुआएं बिखेरते हुए चले जाते थे। अब जबतब ये अश्लीलता पर उतरते देखे जाते हैं।

मुख्यधारा के समाज को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने लैंगिक रूप से विकलांग लोगों के बुनियादी हक देने में भी कटौती कर रहे हैं। सामाजिक आर्थिक तौर पर ये असुरक्षित हैं। किसी तरह का काम-धंधा हम इन्हें नहीं देते, न सरकारी और न गैर सरकारी स्तर पर। हमारा शासन इनको लेकर पूर्णतरू उपेक्षा का निर्दयी भाव रखता है। 

अपने को कल्याणकारी राज्य कहनेवाली एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में इनके अधिकारों की असरदार पैरवी के लिए हमारा सामाजिक और राजनैतिक संगठन कभी खड़ा नहीं होता है। और तो और हमारे एनजीओ को भी समाज के हाशिए पर रह रहे इन लोगों की चिंता नहीं है। अभी हाल में दिल्ली नगर निगम ने हिजड़ों को हर महीने एक हजार रुपए पेंशन देने की घोषणा की है। लेकिन किन्नरों की स्थिति में बदलाव के लिए यह कदम ऊंट के मुंह में जीरा के समान होगा। 

(विचार परिक्रमा, दिसंबर 2010-मार्च 2011 अंक में प्रकाशित )

रविवार, 3 अप्रैल 2011

कठघरे में है अपने हित के लिए लिखा इतिहास: उदय प्रकाश

उदय प्रकाश
मित्रो, पिछले दिनों बर्कले, कैलिफोर्निया विवि में अज्ञेय की जन्मसदी पर वसुधा डालमिया ने एक गोष्ठी आयोजित की थी. उसमें भारत से उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, आलोक राय और संजीव कुमार ने हिस्सा  लिया था. उदय प्रकाश ने उस गोष्ठी में अज्ञेय की क्रांतिकारिता, प्रगतिशीलता और आधुनिकता की पहचान की  और साथ-साथ अज्ञेय-विरोध के पीछे की प्रगतिशील वामपंथी साजिशों का खुलासा भी किया था. उदय प्रकाश का मानना है कि औपनिवेशिक काल से ही भारत में वामपंथ की कई धाराएं रही हैं लेकिन सन 47 से पहले और बाद में मुख्यधारा के वामपंथ ने सत्ता-सुख के लिए इसे हाईजेक कर लिया...और  दूसरे कई प्रगतिशील  समाजवादी लेखकों के ख़िलाफ़ झूठा दुष्प्रचार किया. 
पेश है उदय प्रकाश का यह लेख, जो आज (3 अप्रैल  2011) के राष्ट्रीय सहारा के उमंग रविवारीय परिशिष्ट में छपा है. यह लेख मेरे साथ बातचीत पर आधारित है. - शशिकांत  

किसी भी लेखक या कलाकार के बारे में फतवे और फैसले जिन दो शिविरों से आते हैं, वे शिविर ज्यादातर धर्म-संप्रदाय और राजनीति के हुआ करते हैं। यह हमशा ध्यान रखना चाहिए कि समाजवादी विचारक और नेता लोहिया ने अपने विख्यात वक्तव्य में  इन दोनों को एक ही माना था : ‘धर्म लंबे समय की राजनीति है और राजनीति छोटे समय का धर्म।’ 

फिर ऐसे समाजों में जहां पश्चिम की औद्योगिक आधुनिकता पूरी तरह आई नहीं, लेकिन किसी संयोग से वहां की राजनीति और उसके सांस्थानिक ढांचे आ गए, तो किसी भी लेखक या कलाकार के बारे में दिए जाने वाले फतवे में इन दोनों, यानी धर्म और राजनीति की एकजुट सक्रियता को अलगाना खासा मुश्किल हो जाता है। ये दोनों एक-दूसरे में एक-दूसरे को छुपाते हुए एक साथ बहुरूपिया-कपट के साथ सक्रिय होते हैं।

हिंदी भाषी कहे जानेवाले इलाके में, जहां पूर्व-आधुनिक सामंती मूल्यों-मान्यताओं की जकड़बंदी सबसे विकट है और जहां पिछले साठ से भी अधिक सालों में बरती गई चुनावी या संसदीय लोकतंत्र की राजनीति ने जातिवाद और सांप्रदायिक अस्मिताओं को लगातार सशक्तऔर सांस्थानीकृत किया है, वहां इनमें से किसी भी एक की चीरफाड़ दूसरे की फोरेंसिक रिपोर्ट बन जाती है। पश्चिम के विकसित औद्योगिक देशों में विचाधाराओं के महावृत्तांतों का अंत अन्य कारणों से हुआ होगा, उत्तर-भारत की इस पट्टी में उनका विघटन और पतन धर्म, सांप्रदायिकता, जाति, क्षेत्रीयता, स्वार्थ और लगातार भ्रष्ट होती जाती राजनीति की बदौलत हुआ।

हिंदी की ‘मुख्यधारा’ की बलशील राजनीतिक अथवा सांस्थानिक आलोचना के हाथों बार-बार अपने समय के सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार, जो समाज में सक्रिय सांस्कृतिक चेतना की ऐसी क्षुद्र संरचनाओं (माइक्रोस्ट्रक्चर्स) को रेखांकित करते रहे हैं, हमेशा अपने जीवन के सक्रिय रचनाकाल में विवादों और हाशियों के पार धकेले जाते रहे हैं। और यह सब एक संगठित प्रायोजित राज्य-पोषित उपक्रम के तहत किया जाता रहा है। जिन महत्वपूर्ण रचनाकारों-कलाकारों के साथ ऐसा किया गया, उसकी सूची राहुल-हुसैन से लेकर आज तक लगातार लंबी ही होती जा रही है।

पिछले दिनों जन्मशती की शुरुआत के साथ ही अज्ञेय के संदर्भ में ऐसे ही विवाद फिर से उठाने की संगठित कोशिशें हुईं। अगर साठ के दशक के प्रगतिवाद बनाम प्रयोगवाद की छद्म शीतयुद्धवादी राजनीति के तहत उन्हें ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ का सदस्य घोषित किया गया तो अभी हाल में दिल्ली की एक लोकल टैबलायड ने उन पर 1942 में ब्रिटिश सेना की नौकरी करने पर उन्हें ब्रिटिश एजेंट बताने की हास्यास्पद और रोचक कोशिश की। 

हास्यास्पद इसलिए कि इन्हीं तर्कों पर भारतीय उपमहाद्वीप के महान क्रांतिकारी कवि, संयोग से से जिनकी जन्मशती का आयोजन भी इसी साल दुनिया भर में मनाया जा रहा है, पर भी यही आरोप ज्यों का त्यों लगाया जा सकता है। फैज ने भी 1942 में जर्मन नाज़ीवाद के विश्वव्यापी खतरे को भंापते हुए, ब्रिटिश फौज की बर्दी पहनी थी और अज्ञेय की तरह तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों के कहने पर आकाशवाणी में अपनी सेवाएं सौंपी थीं। क्योंकि नाजीवाद के विरुद्ध मोर्चा सिर्फ  जमीनी लड़ाई में ही नहीं, सूचना और संचार के मोर्चे पर भी जरूरी था।

अगर हर ईमानदार और महत्वपूर्ण रचनाकार के मुंह पर कालिख पोतने के धतकर्म में दशकों से सक्रिय राजधानियों के ऐसे गुटों-स्वार्थसमूहों की बात मानें तो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत समेत संसार की सभी कम्युनिस्ट पार्टियां और समाजवादी शक्तियां ‘एलाइड फौजों’ की एजेंट सिद्ध हो जाएंगी। फिर आप स्टालिन और सुभाषचंद्र बोस का क्या करेंगे? 

अगर ध्यान दें तो अज्ञेय के साथ-साथ उनके सहकर्मी रह चुके ‘झूठा-सच’ और ‘दादा कॉमरेड’ जैसे बहुचर्चित उपन्यासों के प्रतिबद्ध माक्र्सवादी लेखक यशपाल को भी विवादों में घेर कर हाशिए में डाल दिया गया। अगर अज्ञेय को व्यक्तिवादी प्रतिक्रियावादी कह कर खारिज किया गया तो यशपाल को मनोविकार और काम भावना का चितेरा कहा गया।

यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि आजादी के पहले, तीसरे दशक में, राष्ट्रवादी-समाजवादी आंदोलन में यशपाल और अज्ञेय दोनों एक ही समाजवादी विचारधारा के संगठन में सक्रिय थे। जिसमें भगत सिंह, धन्वंतरी, चंद्रशेखर आजाद, उधम सिंह, सुखदेव, अशफाक, राजगुरू, भगवतीचरण बोहरा, प्रकाशवती और दुर्गा भाभी आदि सक्रिय थे। अज्ञेय का ‘शेखर एक जीवनी’ और ‘विपथगा’ कथा-संग्रह की कहानियां और यशपाल का ‘सिंहावलोकन’ तथा ‘झूठा सच’ साथ-साथ पढ़ें तो उस समय की राजनीति को समझा जा सकता है। इस राजनीति से इन दोनों रचनाकारों के मोहभंग और उससे विरक्ति या अलगाव के कारणों को भी समझा जा सकता है। 

इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखें कि 1947 में विभाजन के दौरान भयावह सांप्रदायिकता, रक्तपात और उससे जुड़े सांप्रदायिक, जातीय, व्यक्तिवादी (राजनीति में जिसे ‘अधिनायकवादी’ कह सकते हैं।) और राजनीतिक यथार्थ को हिंदी के जिन दो रचनाकारों ने सर्वाधिक प्रमाणिकता और विस्तार के साथ प्रकट किया उनमें से एक थे अज्ञेय और दूसरे थे यशपाल।
आज समय के इस बिंदु पर जब बर्लिन की दीवार नहीं है, सोवियत संघ का पुराना झंडा और लेनिनग्राद कहीं नहीं है, तेलंगाना-त्रिभागा जनआंदोलन की लाल-सेनाएं नहीं हैं, जब उस जमाने की लोकप्रिय वामपार्टियां हिंदी की समूची पट्टी में जनता का विश्वास खो चुकी हैं और एक विधायक तक चुनवा पाने की स्थिति में नहीं हैं, जब एक दूसरे ‘द्वितीय शीतयुद्ध’ की शुरुआत हो चुकी है, जो दो दो सुपर पावर्स के बीच नहीं, नयी वैश्विक अर्थव्यवस्था की कोख से जनमे नव-साम्राज्यवाद और उसकी हिंसा और दमन को झेलते-सहते वंचित नागरिकों-प्रजाओं के बीच है, तब हम अतीत और पिछले राजनीतिक इतिहास को नयी आंख से देख और समझ सकते हैं। उस समय की दुरभिसंधियों और रहस्यों के उत्तर पाना भी बहुत आसान हो गया है।

क्या यह सिर्फ  संयोग है कि भारत के विभाजन और सांप्रदायिक दंगों पर मार्मिक संवेदना, ईमानदारी और साहसिकता के साथ लिखनेवाले लगभग सभी महत्वपूर्ण रचनाकारों को मुख्यधारा की सांस्थानिक आलोचना ने हाशिए में फेंक दिया। अज्ञेय, उपेंद्रनाथ अश्क और यशपाल इनमें प्रमुख हैं। क्या सरहद के इस पार अज्ञेय और यशपाल के साथ जो हुआ वही उस पार फैज, मंटो, हबीब जालिब के साथ नहीं हुआ। क्या कारण था कि मलयालम के प्रेमचंद कहे जाने वाले वैक् कम मोहम्मद बषीर आजादी के पहले ब्रिटिश और आजादी के बाद देशी जेल में रहे। नजरुल आजादी के पहले संदिग्ध और आजादी के बाद विक्षिप्त माने गए।

राजनीति की ओर देखें तो राष्ट्रीय कांग्रेस में नेहरू और पटेल से भी अधिक लोकप्रिय सुभाशचंद्र बोस आजादी के पहले जर्मनी और जापान के एजेंट और विश्वयुद्ध के बाद ‘युद्ध-अपराधी’ घाषित किए गए। मानवेंद्रनाथ राय, अरबिंद घोष, सरलादेवी, मैडम कामा, जतींद्रनाथ, रासबिहारी बोस, सतीनाथ भादुड़ी, करतार सिंह, लाला हरदयाल, आचार्य नरेंद्रदेव, जयप्रकाश नारायण, जैसे असंदिग्ध समाजवादी क्रांतिकारियों के नामों से भरपूर यह सूची बहुत मार्मिक और दहशतनाक तरीके से बहुत लंबी हो जाती है। 

इन सब के छवि-भंजन करने और उन्हें संदिग्ध बनाने का संगठित अभियान लगातार चलता रहा। दरअसल 1947 में अंग्रजों द्वारा सत्ता हस्तांतरण के बाद से ही एक ऐसी सत्तापरस्त दलाल राजनीतिक संस्कृति ने अपना वर्चस्व स्थापित किया जो सिर्फ  हिंदी तक ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी उतना ही प्रभावी रही।

हमें यह हमेशा ध्यान में रखना होगा कि हमारे देश में प्रगतिशील और वामपंथी आंदोलनों का जन्म 1917 में हुई सोवियत क्रांति और उसके बाद उसके प्रभाव से बननेवाले राजनीतिक दलों के बहुत पहले से हो चुका था। यह रूस और विलायत का मुखापेक्षी ऐतिहासिक तौर पर नहीं रहा। स्वयं प्रेमचंद, 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी बनने के सात साल पहले समाजवादी सिद्धांतों के ‘कायल’ हो चुके थे। 

मुझे कई बार लगता है कि अगर प्रेमचंद की इतनी लोकप्रियता न होती और अगर ‘संयोग’ से वे 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता न करते, तो क्या उनके साथ भी वाम कही जाने वाली हिंदी की ‘मुख्यधारा’ की समस्याग्रस्त आलोचना वही कुछ करती, जो उसने राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, यशपाल आदि के साथ किया।

दरअसल बीसवीं सदी की शुरुआत में ही बंगाल में हुए नवजागरण और वहां की राष्ट्र्रवादी चेतना ने क्रांतिकारी और वामपंथी आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करनी शुरू कर दी थी। अगर आप प्रमथ मित्र और अरविंदो घोष का समय देखें और ‘अनुशीलन’ और ‘जुगांतर’ के दौर को देखें तो ‘सोवियत क्रांति’ के एक दशक पूर्व ही बंगाल राष्ट्रवादी और वामपंथी (समाजवादी) गतिविधियों का केंद्र बन चुका था। 

बंगाल में आनेवाले नवजागरण के प्रभाव को हिंदी के प्राध्यापक-आलोचक-मीडियाकार जिस लोलुप आतुरता से स्वीकार करते हैं, आश्चर्य है कि वे वहीं से उपजी राष्ट्र्रीय और क्रांतिकारी प्रेरणा और प्रमुख क्रांतिकारियों के योगदान के बारे में चुप्पी साध जाते हैं। वे यह तथ्य भरसक छुपाने की कोशिश करते हैं कि 1919 में जालियांवाला बाग जैसे जनसंहार, जिसकी तुलना आज भी लातीनी अमेरिका के ‘बनाना रिपब्लिक’ के बर्बर जनसंहार के साथ की जाती है, के बाद पंजाब में पनपे क्रांतिकारी उभार का सीधा संबंध बंगाल से था। भगत सिंह, सीताराम तिवारी उर्फ  चंद्रशेखर आजाद, अशफाक आदि का जन्म भले ही उत्तर-भारत के इलाकों में हुआ हो, वे बंगाल से आनेवाली क्रांतिकारी चेतना के ही ‘मानस-पुत्र’ थे।


1925 में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनी उसके पहले से ही कई राष्ट्र्रवादी और वामपंथी क्रांतिकारी संगठन उस दिशा में काम कर रहे थे। अविभाजित पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियों की जो लहर आई उसका संबंध बंगाल से ही था। अज्ञेय, यशपाल और उन सरीखे अन्य विप्लवी और सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़े लेखकों को हाशिए पर धकेलने का प्रमुख कारण यह था कि वामपंथ, समाजवाद और प्रगतिशीलता आदि को परिभाषित करने का इकहरा पैमाना उसी ब्रिटेन में जनमे और पनपे राजनीति और विचारों के आधार पर बनाया गया जिसे हम कैंब्रिज के ‘फेबियन समाजवाद’ के नाम से जानते हैं। 

यह विचारधारा कांग्रेस के प्रमुख नेताओं पंडित जवाहरलाल नेहरू और मुख्य धारा के वामपंथी नेताओं में समान थी। यही कारण है कि आजादी के बाद सत्ता के सामने पैदा होनेवाले संकटों की हर घड़ी में दोनों हमेशा बार-बार एक साथ होते रहे। 1975 के आपातकाल ही नहीं अभी पिछले यूपीए काल तक यह सत्तापरस्ती जारी रही। साहित्य और संस्कृति के इलाके में तो खैर यह बदस्तूर निरंतर और शाश्वत है।

आज हम इक्कीसवीं सदी के इस उत्तर औपनिवेशिक नव साम्राज्यवादी समय में हैं। वहां से हम इस अतीत को साफ-साफ  देख सकते हैं। और तब हमें यह दिखाई देता है कि एक नहीं बल्कि अनेक राजनीतिक दलों की तरह, जो लोकतंत्र और राष्ट्रीयता के एक जैसे दावे करते थे, उसी तरह सामाजिक समानता और वर्गीय शोषण के अंत का दावा करनेवाले वामपंथी दल भी बहुसंख्यक थे, एक नहीं। 

भारत में समाजवाद सिर्फ  सोवियत संघ की क्रांति से बरास्ता ब्रिटेन ही नहीं आया था बल्कि भारतीय समाज के अंतर्विरोधों की देशी जमीन में उसकी गहरी जड़ें थीं, और उसको समय-समय पर समर्थन देनेवाले पश्चिम के एक नहीं कई देश थे। पश्चिम के विकसित औद्योगिक पूंजीवादी देशों की आपसी टकराहटों के कारण भारत ही नहीं बल्कि अन्य औनिवेशिक दशों के राष्ट्रीय और क्रांतिकारी आंदोलनों को मदद और समर्थन मिलता था।

उदाहरण के लिए जब प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होने के पहले फ्रांस ने ब्रिटेन का साथ देना शुरू किया तो भयभीत जर्मनी को अपनी रक्षा के लिए यह जरूरी लगा कि वह ब्रिटेन की ताकत के असली केंद्र को कमजोर करे। और वह केंद्र था औपनिवेशिक भारत। इतिहास के तमाम दस्तावेज मौजूद हैं कि जर्मनी ने भारत के उपनिवेशवाद के विरुद्ध चलाए जा रहे राष्ट्रवादी आंदोलनों को हर तरह से मदद पहुंचाने की कोशिश की। बल्कि 1914-15 में ठीक 1857 की गदर की तरह भारत में सैन्य विद्रोह की कोशिशें की भी गईं। 

‘बर्लिन कमेटी’ बनी, ‘इंड्स-जर्मन कांस्पिरेसी’ के तथ्य हैं। भारत में क्रांति और राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए समर्पित लोग सिर्फ मास्को और लंदन ही नहीं गए, उन्होंने सैनफ्रांसिस्को, बर्लिन, पेरिस, स्विट्जरलैंड, टोक्यो आदि विदेशी शहरों में भी जाकर काम किया। कहने का आशय सिर्फ  यह कि बीसवीं सदी में औपनिवेशिक देशों के अपने अंतर्विरोध और टकराहटों का असर भारत के राजनीतिक आंदोलनों, और उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों पर पड़ रहा था। यहां कोई एक वामपंथ और कोई एक प्रगतिशील विचारधारा न पहले थी न आज है। आज भी प. बंगाल की वाममोर्चा में एक-दो नहीं सोलह वामपंथी राजनीतिक दल हैं जिनमें सुभाषचंद्र बोस का फॉरवर्ड ब्लॉक भी है। 

अज्ञेय जब अपनी युवावस्था में लाहौर आए थे तब उनका संबंध भारत नौजवान सभा और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के साथ हुआ। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरू, सुखदेव अशफाक सब उसी दल में थे। अज्ञेय, भगवतीचरण वोहरा और यशपाल भी। 1919 का जालियांवाला बाग का भयानक हादसा उन्हीं दिनों हुआ था। उन्होंने भगत सिंह को लाहौर से छुड़ाने की असफल योजना में भी हिस्सा लिया था। 1930 में अज्ञेय को 19 साल की उम्र में आम्र्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था और दोबारा 1931 में दिल्ली षडयंत्र केस में ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों के पास उनके विरुद्ध बम बनाने और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के तमाम प्रमाण मौजूद थे।

अज्ञेय ने अपना महत्वपूर्ण उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ का आधार पाठ इसी कैदी जीवन में लिखा। यहीं रहते हुए वे प्रेमचंद और जैनेंद्र के संपर्क में आए और ‘अज्ञेय’ नाम हासिल किया। और यहीं उनके विचारों में वह मूलगामी परिवर्तन हुआ जिसने उन्हें सशक्तहिंसक आंदोलनों से अलग बदलाव के दूसरे विकल्पों की ओर बढऩे के लिए प्रेरित किया। 

इस वैचारिक परिवर्तन का आधार था 1915 में गांधी का भारत आगमन और जनता का उनके अहिंसक आंदोलनों में हिस्सा लेना। यह कुछ ऐसा ही दृश्य था जैसा अभी हाल में मिस्र, ट्यूनिशिया, सीरिया आदि देशों में दिखाई दे रहा है। यह ध्यान रखने की बात है कि 1930 में गिरफ्तार होने से पहले अज्ञेय कांग्रेस सेवा दल में वोलंटियर के रूप में शामिल हो चुके थे और उनपर गांधी का साफ प्रभाव दिखने लगा था।
बौद्ध-दर्शन उनकी चेतना के केंद्र में बचपन से ही था। 

क्या यह सिर्फ  संयोग ही है कि अज्ञेय और उनके उपन्यास के नायक ‘शेखर’, दोनों का जन्म उसी एक जगह होता है, जहां स्वयं बुद्ध का देहपात हुआ था, यानी कुशीनगर। और दोनों हिंदू जातिवादी व्यवस्था को त्यागते हुए उसी दिशा में बढ़ते हैं, जिधर बुद्ध और उनके बाद अंबेडकर, राहुल, नागार्जुन, भदंत कौशल्यायन आदि गये। 

अगर ‘शेखर: एक जीवनी’ और अज्ञेय की अन्य रचनाएं पढें तो इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। यह विडंबना ही है कि बुद्ध और गांधी के मार्ग पर जानेवाले हर समाजवादी लेखक विचारक को हिंदी की मुख्यधारा  की राजनीतिक संस्कृति ने हमेशा हाशिए पर धकेला। क्या यह स्वयं राज्य और बाजार के हितों के लिए निर्मित और आज तक कार्यरत सांस्थानिक-आधिकारिक राजभाषा ‘हिंदी’ के प्रच्छन्न मानस या उसकी आंतरिक चेतना के असली बनावट को उद्घाटित नही करती।

अज्ञेय एक और वजह से हाशिए पर धकेले गए, वह था उनकी व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति गहरी निष्ठा। किसी भी राजनीतिक राज्य-व्यवस्था में व्यक्ति-इकाई के रूप में जीवित नागरिक की स्वतंत्रता। निर्मल वर्मा, मुक्तिबोध आदि अन्य रचनाकार भी इसी के शिकार बने। इन सबको ‘सामूहिक-समवेत’ सुर में ‘व्यक्तिवादी’, ‘आत्मकेंद्रित’ लगभग ‘अ-सामाजिक’ तक घोषित किया गया और स्कूलों-विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में अध्यापकों द्वारा यही युवा छात्रों को पढ़ाया जाता रहा। क्या ऐसे पाठ्यक्रमों और जातिवाद तथा राजनीति के चोर दरवाजों से संस्थानों में दाखिल ऐसे प्राध्यापकों की ‘आलोचना’ को खारिज करने का समय नहीं आ गया है।

यह एक अजीब विरोधाभास है कि जिस पूंजीवादी लोकतंत्र ने अपने जन्म के समय व्यक्ति की स्वतंत्रता का नारा सबसे पहले दिया था उसी ने अपनी व्यवस्था में स्वतंत्र व्यक्ति की जगह एक सर्वव्यापी निरंकुश स्वतंत्र बाजार का निर्माण किया, जिसमें ‘व्यक्ति’ का कोई शरण्य नहीं बचा। दूसरी तरफ  औद्योगिक-समाजवाद ने भी एक ऐसे सर्वसत्तावादी राज्य और नौकरशाही का निर्माण किया, जिसमें वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग करनेवाला हर नागरिक प्रति-क्रांतिकारी, व्यक्तिवादी और समाजविरोधी मान लिया गया।

बहरहाल, हम आज जिस समय में हैं उसमें सत्ता के तमाम हिंसाओं और दमन के बावजूद व्यक्ति कम से कम अभिव्यक्तिके मामले में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र है। और यह स्वतंत्रता उसे टेक्नोलॉजी, इंटरनेट, मोबाइल फोन, फेसबुक आदि ने दी है। अब अभिव्यक्ति की वैयक्तिक-नागरिक आजादी के असर दिखने शुरू हो गए हैं। एक जूलियन असांजे, वाएल गोनिम या तरुण तेजपाल कई बड़े दशों के बड़े राजनेताओं के सामने भारी पड़ रहे हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि अज्ञेय और दूसरे बड़े लेखकों के मूल्यांकन का काम अब बड़े संगठनों का मोहताज नहीं बल्कि व्यक्तिया व्यक्तियों के छोटे-छोटे नेटिव समूह भी कर सकते हैं। कहा जाता है कि अब अबोधताओं और मासूमियतों के युग का अंत हो चुका है। वह इतिहास अब संदेहों के कठघरे में है, जिसे समय-समय की सत्ताओं ने अपने हितों के लिए लिखा था। 

समय आ गया है कि अज्ञेय, फैज, मंटो, मुक्तिबोध, राहुल सांकृत्यायन, ऋत्विक घटक, निर्मल वर्मा, भवानी प्रसाद मिश्र आदि ही नहीं, अन्य पुराने और एकदम समकालीन रचनाकारों के सृजनात्मक योगदान की आलोचना के लिए नए प्रतिमान विकसित किए जाएं।
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

हिंदी की अकादेमिक आलोचना ने किया है हेर-फेर

मित्रो,  
इस बार का देवीशंकर अवस्थी सम्मान संजीव कुमार को उनकी किताब ‘'जैनेन्द्र और अज्ञेय : सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य'’ पर देने की घोषणा हो चुकी है। स्व0 देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में यह सम्मान समकालीन हिंदी आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है। आगामी  5 अप्रैल 2011 को नई दिल्ली में  एक समारोह में  उन्हें सम्मानित किया जाएगा।  
प्रस्तुत है युवा आलोचक संजीव कुमार से शशिकांत की बातचीत:

हिंदी की अकादमिक आलोचना ने किया है हेर-फेर : संजीव कुमार

संजीव जी, आपने अपनी किताब में जैनेन्द्र और अज्ञेय के बारे में हिंदी की अकादेमिक आलोचना में व्याप्त गलतफहमी का सप्रमाण प्रत्याख्यान किया है। आपकी निगाह में वह गलतफहमी क्या है?
असल में, मेरा ऐसा एक आलेख जैनेन्द्र और अज्ञेय के संदर्भ में हिंदी की अकादेमिक आलोचना के फ्रायड-मोह पर केंद्रित है। आप तो जानते हैं कि साहित्येतिहासों और उपन्यास विकास के आख्यानों में प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास के शुरुआती दौर को मार्क्स और फ्रायड से प्रभावित उपन्यास-धाराओं में बांट कर देखने का आग्रह रहा है। बाक़ायदा एक मनोविश्लेषणवादी स्कूल की बात की गई है जिसमें जैनेन्द्र और अज्ञेय को भी नामज़द किया गया है। 

इस नामज़दगी के लिए दो तरीके अपनाए गए। एक तरीका तो यह कि इस उपन्यास-धारा के आरंभिक परिचय में फ्रायड का विस्तार से उल्लेख कर दिया, पर जैनेन्द्र और अज्ञेय के उपन्यासों के विवेचन के मौके पर इस प्रभाव के ठोस उदाहरण दिखलाने की कोई ज़रूरत नहीं समझी, यह मानते हुए कि पात्रों के मनोव्यापार में प्रेमचंद से थोड़ी ज़्यादा और थोड़ी अलहदा किस्म/प्रकृति की दिलचस्पी अपने-आप में फ्रायडीय प्रभाव का सबूत है। 

कुछ और लोगों ने दूसरा तरीका अपनाया, जहां इस प्रभाव के सबूत ढूंढऩे की कोशिश की गई और इस प्रक्रिया में सिद्धांत और रचना, दोनों को दारुण कुपठन का शिकार होना पड़ा। मैंने कहा है कि यहां आलोचक की स्थिति उस पंडित के समान थी जो विवाह कराने के नेक इरादे से दोनों ओर की कुंडलियों के गुणों में हेर-फेर करता है। मेरी किताब के पहले अध्याय में ऐसी ही कोशिशों का उद्घाटन है।

अमूमन गैर अकादेमिक क्षेत्र के लेखक अकादेमिक आलोचना पर सवाल उठाते रहे हैं। आप खुद अकादेमिक क्षेत्र से आते हैं, फिर भी आपने अपनी इस किताब में अकादेमिक को कठघरे में खड़ा किया है। क्या आप मानते हैं कि अकादेमिक क्षेत्र में जैनेंद्र और अज्ञेय के साहित्य का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया गया है?

ये न भूलें कि खुद मेरा काम अकादमिक आलोचना है, फुटनोटादिसंपन्न। इसलिए सवाल एस्सेंशियली अकादमिक-ग़ैरअकादमिक का नहीं, अच्छी और बुरी का है। सन् 2000 के अपने एक लेख (‘स्वाधीनता’ के शारदेय विशेषांक में प्रकाशित) में मैंने बतलाया था कि समकालीन आलोचना में कैसे बहुत विराट सामान्यीकरण बेहद नाकाफी ठहरने वाले आधारों पर टिकाए गए हैं और मुझे याद आता है कि वहां ज़्यादातर उदाहरण ग़ैर-अकादमिक क्षेत्र से ही लिए गए थे। 

जहां तक जैनेन्द्र और अज्ञेय का सवाल है, पीछे जिस विशेष संदर्भ की मैंने चर्चा की, उससे बाहर जाकर संपूर्ण मूल्यांकन के बारे में कोई बात कहने की योग्यता मैं अपने अंदर महसूस नहीं करता। अगर उस पर टिप्पणी करूंगा तो वह वैसा ही ग़ैर जिम्मेदाराना बरताव होगा जैसा वह जिसकी मैं आलोचना कर रहा हूं।

क्या आप मानते हैं कि जैनेंद्र, अज्ञेय, निर्मल वर्मा जैसे लेखकों के साहित्य के मूल्यांकन में अकादेमिक और गैर अकादेमिक आलोचना बंटी हुई है?

अकादमिक और ग़ैर-अकादमिक के मुहावरे में बंध कर कोई पैटर्न ढूंढऩा मुश्किल है।

क्या आप इस बात से सहमत हैं कि  मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होने की वजह से अकादेमिक आलोचना पूर्वाग्रह से ग्रस्त थी, और सोवियत संघ के पतन एवं नव पूंजीवादी दौर में उभरी नई विचारधाराओं, सैद्धांतिकियों के कारण साहित्य को देखने, समझने की एक नई दृष्टि दी और मार्क्सवादी आलोचना का तिलिस्म टूटा?

आपके सवाल में कई बातें हैं, पर उनसे एकमुश्त असहमत हूं। पहली बात, अकादमिक आलोचना में  मार्क्सवादियों से ज़्यादा बड़ी संख्या ग़ैर  मार्क्सवादियों या  मार्क्सवाद विरोधियों की रही है। यह अलग बात है कि उनमें से क़ायदे का काम अधिकतर  मार्क्सवादियों ने ही किया है। कौन-सा तिलिस्म था और वह कब टूटा, मैं नहीं जानता, पर इतना ज़रूर कह सकता हूं कि मार्क्सवाद कोई बंद विचारधारा नहीं, एक विकासमान विचारधारा है जो नए हालात में नए तरीके से सोचने और ज्ञान-क्षेत्र के नए उद्विकासों को अपने लिए उपयोगी बनाने पर बल देती है। 

 मार्क्सवाद के नाम पर जारी ग़ैर मार्क्सवादी संकीर्णताओं के अंत को अगर आप तिलिस्म का टूटना कहते हैं तो वह शायद सही है। ‘थियरी’ के सामान्य अभिधान के साथ प्रचलन में आए विचारों ने, निस्संदेह, पाठ के साथ एनगेजमेंट का और हर शै में मौजूद शक्ति-संरचना को समझने का व्यवस्थित तरीका सुझाया है। इससे तो, मेरे ख़याल में, उस आलोचना की नींव पर ज़्यादा गहरा प्रहार हुआ है जो साहित्य के ‘स्वराज’ का नारा लगाती थी और राजनीति द्वारा आलोचना के ‘औपनिवेशीकरण’ का विरोध करती थी। 

‘थियरी’ ने  मार्क्सवाद के इस बलाघात को ही आगे बढ़ाया है कि ऐसा ‘स्वराज’ एक ख़ामख़्याली है और जिसे आप ‘उपनिवेश’ कह रहे हैं, वह तो आपके जाने-अनजाने हमेशा से राजनीति के बेहद्दी ‘प्लेग्राउंड’ का हिस्सा रहा है।

विचारधारा और साहित्य के रिश्ते को आप किस रूप में देखते है? विचारधारा और सत्ता से अलग आज के समय की माइक्रो रियलिटी को अभिव्यक्त करनेवाली साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन के लिए आलोचना की कौन सी प्रविधि आपको मुफीद लगती है?

विचारधारा कहां नहीं है! विचारधारा से बाहर जाकर सोचने का दावा  भाषा से बाहर जाकर सोचने के दावे जैसा है। वही यह तय करती है कि आप दुनिया में चीज़ों के बीच के रिश्ते को किस तरह समझेंगे और कहां कितनी नजऱ टिकाएंगे। अगर आपका आशय ‘वाद’ के स्तर पर संगठित प्रचार पाने वाली, सचेत स्तर पर अपनायी गयी विचारधाराओं से है, तो यही कहूंगा कि जिस तरह भाषा का, उसी तरह विचारधारा का भी साहित्य में भांति-भांति का उपयोग मिलता है। कहीं वह बेहद सधा हुआ, रचनात्मक और नवोन्मेषी होता है, तो कहीं ठस्स, पिटा-पिटाया और अर्थापकारी।  

(3 अप्रैल 2011 राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली में प्रकाशित)