शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

लोग धीरे-धीरे कमोडिटी बनते चले गए : बद्री रैना ने शशिकांत से कहा


चार साल पहले मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से रिटायर हुआ। आज के ग्लोबल वर्ल्ड में जो मूवमेंटस चल रहे हैं उन पर देश-विदेश के जर्नल्स में लेख लिखता हूं। पीछे करीब एक साल तक बीमार रहा। उस दौरान घर बैठे लिखने का काम किया। तबीयत ठीक रहती है तो देश के विभ्न्नि हिस्सों में चल रहे सामाजिक आंदोलनों में भी शरीक होता हूं।

1958-59 में मैं दिल्ली आया था। उस वक्त दिल्ली में इतनी कारें नहीं थीं। मोबाइल फोन नहीं थे। कंप्यूटर नहीं थे। इतना बाजारीकरण नहीं था। यह कहना चाहिए कि उस वक्त सोच के केंद्र में लोग होते थे, मनुष्यता होती थी लेकिन आज उनकी जगह कंज्यूमरिज्म ने ले ली है।

पिछले 30-40 साल में हिंदुसतान में कैपिटलिज्म काफी तेजी से बढ़ा और लोग धीरे-धीरे कमोडिटी बनते गए। उस वक्त के लोगों में एक-दूसरे को सुनने का जो धैर्य होता था वो भी धीरे-धीरे खत्म होता गया। लोग अपने-अपने दड़बों में घुसते चले गए। जो नया मध्य वर्ग  बना वो एकाकी हो गया। बच्चे मां-बाप से दूर हो गए। उसकी जगह धर्मांधता ने ले ली। कैपिटलिज्म और धर्मांधता का जो समन्वय हुआ उसका खमियाजा आज हमारे सामने है।
 

आज के मध्य वर्ग की नई पीढ़ी को बड़ी से बड़ी गाड़ी चाहिए। ज्यादा से ज्यादा गजैटस चाहिए। महंगी से महंगी टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और न जाने क्या क्या चाहिए। गांधी जी ने दो तरह की स्वतंत्रताओं की बात कही थी- एक, हमारे पास जितनी सुविधाएं होंगी वो हमें स्वतंत्र करेंगी, और दूसरी, हम किसके लिए, किस काम के लिए और किस आदर्श के लिए स्वतंत्र होना चाहते हैं।

मशीन ने हमें कई तरह की सुविधाएं दी हैं लेकिन आज हम मशीन के गुलाम हो गए हैं। कमोडिटी बन गए हैं। इसका असर यह हुआ कि समाज से जुडी सोच-विचार धीरे-धीरे गायब हो गए। परंपराएं खत्म हो गईं। लोगों को लोगों के काम आना चाहिए- ये सोच उलट-पुलट गई। समाज के नीचे के लोगों और गरीब तबकों के बारे में हमने सोचना-विचारना छोड़ दिया। आज हमारी नई पीढ़ी इसी रास्ते पर चल रही है। देखादेखी में दूसरे लोग भी इस रोग से ग्रस्त हो गए। जिन्हें ये सब नहीं मिलता वे तीन तिकड़म करते हैं।

आज पॉलिटिक्स का असर कम हुआ है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अब आम लोग राजनीति के केंद्र में नहीं रह गए हैं। कुछ महानगरों और शहरों का हवाला देकर हम कह रहे हैं कि हम डेवलप कर रहे हैं। शहर से लेकर गांव तक महिलाएं आज सुरक्षित नहीं हैं तो ये हमारे डेवलपमेंट का इश्यू नहीं है। सामूहिक परिवार लोगों को जो सुरक्षा देती थी उसे हमने तहस-नहस कर दिया। न्यूक्लियर फेमिली ने उसकी जगह ले ली। 

अपने लोगों के पास तरह-तरह की चीजें हमने उपल्ब्ध तो करा दी लेकिन सर्विस का जो कल्चर होता है वो हमने नहीं सीखी। औरत है या मर्द, गरीब है कि अमीर, गोरा है या काला- ये सब देखकर नौकरी दी जाती है। ये सब आज के हिंदुस्तान में चल रहा है। आज अमेरिका में अब यह आवाज उठ रही है कि कैपिटलिज्म के बारे में हमें सोचना पड़ेगा लेकिन हम अभी भी उसी राह पर चल रहे हैं।

(डॉ. रैना सेवानिवृत्त अध्यापक, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली वि.वि.)
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली, 25 फरवरी, 2010 प्रकाशित)

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

आज के समय का यथार्थ बड़ा कड़वा है : प्रो. निर्मला जैन ने शशिकांत से कहा

लोग यह मानते हैं कि लेखक सामान्य नागरिक से अलग होता है। यह एक तरह का भ्रम है, आदर्श है। प्रेमचंद के समय में कहा जाता था कि लेखक समाज को रास्ता दिखानेवाला होता है। भक्ति आंदोलन समाज में पहले आया साहित्य में बाद में, दरबारी संस्कृति समाज में पहले आई रीति साहित्य बाद में और नवजागरण भी समाज में पहले आया और साहित्य में बाद में। यह सच है कि साहित्य पहले एक वैकल्पिक सुझाव देता था और एक वैकल्पिक व्यवस्था सुझाता था। आज हर तरफ कितना भ्रष्टाचार है। डॉक्टर, वकील या अन्य दूसरे पेशे से जुड़े लोग अपना उतरदायित्व क्या निभा रहे हैं। चारि़त्रिक गिरावट यदि आज हर पेशे में हो रही है तो लेखक और शिक्षक इससे कैसे अप्रभावित रहेंगे।

स्वप्न देखना बुरी बात नहीं है, लेकिन आज का यथार्थ बड़ा कुत्सित है। हम इसका पुनर्सृजन नहीं कर रहे हैं। यह आज के समय की एक बड़ी मुश्किल है। हम देख रहे हैं कि लेखक भी आज बाजारवाद के शिकार हो रहे हैं। एथिक्स की दृष्टि से इतना पतन होना ठीक नहीं है। बाजार ने विकल्प मुहैया कराया है। युवाओं को रोजगार दे रहा है। लेकिन इससे एक गड़बड़ हुई है कि इसने लोगों की इच्छाएं बढ़ा दी हैं। बाजार में नैतिक बोध और मूल्यबोध भी नहीं है। सामान्य आदमी इसके चक्कर में फंसकर गलत रास्ते पर आ जाता है। आज पेटी क्राइम बढ़ गए हैं। खाने-पीने की चीजों में बहुत गड़बड़ियां हैं. खराब से खराब चीज को भी बाजार आकर्षक पैक में बेच रहा है।

असल में दिक्कत यह है कि हमने अमेरिका को अपना मॉडल बना लिया है। भारतीय इकानमी मुख्यतः कृषि पर आधारित है। लेकिन देश में कृषि की लगातार उपेक्षा हो रही है, किसानों की हालत खराब है। मनुष्य यदि जमीन की उपेक्षा करेगा तो दिक्कत हो जाएगी। पिछले दिनों गृहमंत्री ने बयान दिया कि देश के 33 जिलों में नक्सलवाद की समस्या बेहद गंभीर है और अन्य 80 जिलों में यह सिर उठा रही है। इस तरह की समस्या तब उभरती है जब समाज में अत्याचार और बराबरी को लेकर के एक तबके में विद्रोह पैदा होता है। दिक्कत तब तब होती है जब यह गलत दिशा ले लेती है।

सवाल यह है कि नक्सलियों को साधन कहां से आ रहे है। इसका फायदा पड़ोसी दुश्मन देशों को मिल रहा है। अगर यह असंतोष अपनी जमीन तक सीमित रहे और इनसे बातचीत होनी चाहिए। लेकिन उन इलाकों में उन्हीं का कानून चलता है। एक प्रजातंत्र में यह कैसे चल सकता है। जनता सचेत हो रही है। समाज में सजगता आ रही है, लेकिन दूसरी तरफ आज समाज के ज्यादातर लोग पीड़ित हैं, परेशान हैं। पूंजी और और सत्ता आज काफी ताकतवर हो गई है। आज कोई भी नेता ऐसा नहीं जो करोड़पति न हो।

माक्र्सवादी विचारधारा को लेकर मेरे मन में कोई शिकायत नहीं है लेकिन जेनुइन माक्र्सवादी मुझे कम मिले हैं। मैंने उनमें अवसरवादिता और मौकापरस्ती देखी है। विचारधारा और प्रतिबद्धता की बातें करनेवाले मौका मिलने पर ढुलक जाते हैं। ज्योति बसु को देख लीजिए। पूंजीपतियों के बीच इतना स्वीकृत, समादृत लेफ्ट का कोई दूसरा लीडर नहीं था। उनके बेटे ने अथाह धन कमाया। बुद्धदेव भट्टाचार्य आदर्शवादी हैं। गांधीवाद सबसे पहले त्याग की बात करता है। आज के समय में नेताओं में जब तक यह प्रवृत्ति नहीं पनपेगी तबतक लोग उसे कैसे स्वीकार करेंगे।

स्त्री और दलित विमर्श से सिद्धांततः मैं सहमत हूं क्योंकि ये हाशिए की आवाजें हैं। इन विषयों पर लिखनेवाले को अनुभव और शिल्प के स्तर पर प्रभावित करना चाहिए। लेकिन मैं यह नहीं मानती कि स्त्री ही सत्री पर लिखे और दलित दलित पर, दूसरे लोग भी लिख सकते हैं। लेखक जब लिखता है तो वह खुद का अतिक्रमण करता है, अपने दिल पर हाथ रखकर लिखता है।

आज समय को लेकर मेरे मन में कई तरह की बातें आती हैं। यह एक अजीब समय है। आज की नई पीढ़ी की कोई निष्चित दिशा ही नहीं है। पता नहीं यह कहां जाना चाहती है। अंधाधुंध दौड़े चले जा रहे हैं सभी। ऐसा परिदृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था। आज किसी को फुरसत नहीं। मित्रता और संबंधों के मानदंड बदल गए हैं। इस माहौल से बचे रहनेवाले लोग आज अपवाद में ही मिलेंगे। जीवन का छंद ही बदल गया है।

आशा की एक किरण इस रूप में दिखती है कि कहीं कोई बड़ी घटना होती है तो लोग आज एकजुट होते हैं। मोहल्ले में या पार्क में यदि गंदगी है तो लोग इकट्ठा होकर साफ-सुथरा करवाने का जिम्मा लोग उठाते हैं। जनता की भागीदारी जब जरूरी दिखती है तो लोगों के भीतर की मानवीयता आज सामने आ जाती है। दूसरी तरफ देखती हूं कि गरीब मजदूर, रिक्सा चलानेवाले भी अब अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

छोटे कस्बे के लोग भी एजुकेशन में लड़के-लड़कियों को बराबर निगाह से देखते हैं। लोगों की सोच में एक खुलापन आया है। एक अच्छी बात और है आज के पूरे परिदृश्य में। आज की पीढ़ी ने यह सोचना छोड़ दिया है कि लोग क्या कहेंगे। गुड़गांव में घर से निकलती हूं तो रिक्षा चलानेवाले, ठेला लगानेवाले को अखबार पढ़ते देखती हूं। मुझे लगता है कि यह सर्वशिक्षा अभियान का असर है। ये छोटे-छोटे द्वीपों की तरह दिखाई देती हैं मुझे। ये सब देखकर नहीं लगता कि हमने सबकुछ खो दिया है।

इसके बावजूद आज के लोगों में हमें व्यापक चेतना दिखाई नहीं देती, गोया कि इतनी ऊर्जा है नई पीढ़ी में। इसमें गंभीर सोच नहीं है। एक बेसब्री है। इस पीढ़ी को तुरंत परिणाम चाहिए। आखिर इतना उतावलापन क्यों? इतनी महत्वाकांक्षाएं क्यों? आदमी यह क्यों सोचे कि वो जो काम करे उसका उसे हमेशा अच्छा ही फल मिले। आज के बच्चों में अपनी हार, अपनी असफलताओं को सहने की सहने की क्षमता कम होती जा रही है।

लोगों में असफलताओं को सहने की क्षमता होनी चाहिए, एक पॉजिटिव सोच होनी चाहिए। समाज और देश में मची आपाधापी के कारण व्यक्ति आत्मनिष्ठ होता चला जाता है। सवाल यह है कि आखिर आज की पीढ़ी किधर जाना चाहती है। क्या सिर्फ पैसे कमाना चाहती है। खुद के लिए जीना चाहती है। क्या हम सिर्फ अपने उपर के लोगों को देखें। नई पीढ़ी को खुद सोचना चाहिए कि आखिर उसके जीवन का क्या लक्ष्य है। ये सारी बातें एक निश्चित परिवर्तन का संकेत देती हैं। 
(प्रो. जैन हिंदी की सुप्रसिद्ध आलोचक हैं. दिल्ली वि.वि.,हिन्दी विभाग की हेड रह चुकी हैं)
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में 13 फरवरी, 2010 को प्रकाशित)

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

भ्रष्टाचार के खिलाफ नई पीढ़ी आवाज उठाए : टी एस आर सुब्रमण्यम ( पूर्व कैबिनेट सचिव, भारत सरकार)

कैबिनेट सेक्रेटरी के पद पर से रिटायर हुए आज मुझे 12 साल हो गए हैं। 72-73 साल की उम्र में भी मैं आज दिल्ली के पड़ोस नोएडा में रहते हुए 3-4 चैरिटी आर्गनाइजेशन से जुड़कर सोसायटी के डेवलपमेंट के लिए काम कर रहा हूं। अभी मैं एक कैनेडियन एनजीओ "मैक्रो न्यूट्रीशन" का चेयरमैन हूं। 
हमारा एक स्कूल यूपी के बुलंदशहर जिले में में सिकंदराबाद के पास चल रहा है। अभी हमने आस-पास के गांव-देहात के 200 गरीब बच्चे लिए हैं। दूसरा स्कूल हम सीतापुर में खोलने जा रहे हैं। उसके बाद एक और स्कूल गोरखपुर खोलेंगे। इन स्कूलों में हम हर साल 6000 बच्चे लेंगे और उन्हें देश के अच्छे और महंगे स्कूलों जैसी शिक्षा देंगे। अभी हम कंप्यूटर खरीदने के बारे में सोच रहे हैं। 
हमारा मानना है कि हमारे देश में गांवों के बच्चों को मौके नहीं मिलते हैं। यदि उन्हें मौके दिए जाएं तो वे बहुत अच्छा कर सकते हैं। यह हौसला मेरे भीतर भारती प्रशासनिक सेवा में ईमानदारी और मेहनत से काम करते हुए आया है।
 तमिलनाडु में तंजावुर से तमिल मीडियम में स्कूलिंग करने के बाद मैं कलकता युनिवर्सिटी आ गया। वहां अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाई होती थी। शुरू में थोड़ी दिक्कत हुई लेकिन छः महीने में मैं खुद को एडजस्ट कर लिया। उसके बाद लंदन के इंपीरियल कालेज गया। वहीं से मैंने 1961 में आईएस की परीक्षा दी और सलेक्ट हो गया। मुझे यूपी कैडर मिला था। 
मसूरी के एकेडमी में ट्रेनिंग के बाद मेरी पहली पोस्टिंग मुरादाबाद में एडिशनल एसडीएम प्रोबेनर के तौर पर हुई। आज तो मैं अच्छी तरह हिंदी बोल लेता हूं, उन दिनों हिंदी एकदम नहीं आती थी। पहले सोचा कहां आकर फंस गया, लेकिन धीरे-धीरे मालूम पड़ा कि फील्ड में काम करने का अलग मजा है। उसके बाद पर्सनल सेक्रेटरी बनकर लखनउ आया। वहां से 1979 में कामर्स मिनिस्ट्री में सेक्रेटरी बना।
1983 में गैट, डब्ल्यूटीओ में जेनेवा गया। 5-6 साल वहां रहकर 1990 में जब वापस भारत आया तो फिर यूपी में मुझे डिस्इन्वेस्टमेंट सेक्रेटरी बनाया गया। फिर यूपी में ही कृषि उत्पादन आयुक्त बना। यूपी जैसे कृषि प्रधान राज्य में इस पद पर रहते हुए मैंने किसानों की पानी; बिजली, बीज आदि की दिक्कतें दूर करने के लिए काफी मेहनत की। उसके बाद में टेक्सटाइल मिनिसट्री में सेक्रेटरी बनकर दिल्ली आ गया।

कुछ ही महीने बाद बाबरी मस्जिद की घटना घटी। तब मुझे यूपी के चीफ सेक्रेटरी का पद संभालने को कहा गया। उस राजनीतिक गहमागहमी के माहौल में मैंने लखनऊ में रहकर काम किया। सालभर बाद वहां मुलायम सिंह की सरकार बनी। सितंबर में मुझे फिर से वापस कपड़ा मंत्रालय में भेजा गया। वहीं से मैं अगस्त 1996 men चीफ सेक्रेटरी बना और
31 मार्च 1998 को रिटायर हुआ।
आजकल सोशल वर्क के साथ-साथ मैं दो किताबें भी लिख रहा हूं। मेरा मानना है कि पिछले 60 सालों में देश के अपर और टॉप क्लास के 20 प्रतिशत लोगों ने फायदे उठाए हैं बाकी 80 प्रतिशत पीछे रह गए हैं। 
सक्सेना कमिटी और तेंदुलकर कमिटी की रिपोर्टें बताती हैं कि देश में आज करीब 60 करोड़ लोग गरीब हैं। हमारे देश में आज प्राइमरी एजुकेशन, प्राइमरी हेल्थ की सबसे खराब हालत है। यही हाल रहा तो 15-20 साल बाद इन अनपढ़ और बीमार लोगों के सहारे हम कैसे आगे बढ़ेंगे. 
इमरजेंसी के बाद देश में राजनीति में ऐसे लोग आए हैं जिनका उद्देश्य सोशल वर्क करना कम और पैसे कमाना ज्यादा है। ब्यूरोक्रेशी में भ्रस्टाचार भी इन्हीं के कारण फैला है। हमने अपने नेताओं को भगवान बना लिया है। अमेरिका और ब्रिटेन में ऐसा नहीं है। भ्रष्टाचार का सबसे बुरा असर गरीब और आम आदमी पर पड़ता है। इसके खिलाफ नई पीढ़ी को आवाज उठाना चाहिए।
(11 फरवरी 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

आज कुछ लोग सिर्फ अपने बारे में साचते हैं : अरुंधति घोष TOLD TO शशिकांत


आज मैं सत्तर साल की हूं। 1962 में मैंने विश्व भारती से अंग्रेजी में एम. ए. किया। 1962 में ही मैंने यूपीएससी का एग्जाम दिया और आईएफएस में सलेक्ट हो गई। मसूरी में शुरुआती ट्रेनिंग के बाद दिल्ली आई। यहां से मुझे आस्ट्रिया स्थित भारतीय एम्बैसी में भेजा गया। उस वक्त फारेन सर्विसेज वालों को फारेन लैंग्वेज में एग्जाम पास करना होता था। मैंने जर्मन लैंग्वेज का एग्जाम पास किया तब कहीं जाकर मेरी सर्विस कन्फर्म हुई। उसके बाद मैंने मिस्र, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देशों में राजदूत के रूप में काम किया।

आज हमारी नई पीढ़ी को यह यकीन नहीं होगा कि उस वक्त भारत से बाहर के देशों में भारत के राजदूत के रूप में काम करना कितना कठिन था। एक उदाहरण मैं देना चाहंगी। 1965 मे हालैंड में मरी पोस्टिंग हुई थी। जिस दिन मैंने वहां ज्वाइन किया उसी दिन मैंने देखा कि वहां के लोग चर्च में घंटी बजाकर भारत में पड़े अकाल के लिए चंदे इकट्ठे कर रहे थे। 

उन दिनों बिहार में भरी अकाल पड़ा था। जबकि उनके यहां एक जगह है बियाफ्रा, वहां खुद लड़ाई चल रही थी और गृहयुद्ध जैसा माहौल था। उसके बाद जब भी मैं वहां के लोगों से मिलती तो वे भारत के धर्म, यहां की गरीबी, भुखमरी, अकाल आदि की ही बातें करते। मैं अपने देश को डिफेंड करती थी।

उस वक्त हमारे भारत के बारे में लगभग पूरी दुनिया की सोच कुछ ऐसी ही थी, जैसी आज हमलोग हैती और अफ्रीकी देशों के बारे मे रखते हैं। उस वक्त मैं युवा थी। अपने देश के बारे में सोचती थी। जिन-जिन देशों में मेरी पोस्टिंग हुई मैंने वहां भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए दिन-रात काम किया। उसके बाद सुयुक्त राष्ट्र में राजदूत बनकर आई तो वहां भारत के लिए काम करना मेरे लिए काफी चुनौती पूर्ण था।  

उस वक्त संयुक्तराष्ट्र में भारत को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती थी जितनी आज दी जाती है। आज यह देखकर खुशी होती है कि हर मसले पर पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है कि इसके बारे में भारत क्या सोच रहा है। यह सब हमने महज 18-20 सालों में हासिल किया है। इसका सारा श्रेय मैं तत्कालीन फाइनेंस मिनिस्टर मनमोहन सिंह को देती हूं।

1991 में जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खेलने का निर्णय किया तो उस वक्त कोई सोच भी नहीं सकता था कि इतनी जल्दी हम कहां से कहां पहुंच जाएंगे। इंडियन फाॅरेन सर्विसेज में काम करते हुए हम दुनिया के कई विकसित देशों में उस वक्त के फाइनेंस मिनिस्टर मनमोहन सिंह और कामर्स मिनिस्टर पी. चिदंबरम के साथ अपने उद्योगपतियों को लेकर में मीटिंग करते थे और उन्हें भारत में निवेश करने के लिए राजी करते थे।

जहां पहुंचने में दूसरे विकसित देशों को 100-150 साल लग गए वहां हम मात्र दो दशकों में ही पहुंच गए हैं। आज हमारे यहां 300 मिलियन मध्य वर्ग हैं जिनके पास हर तरह की सुख-सुविधाएं हैं। यह पूरे यूरोप की आबादी के बराबर है। लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए हमने काफी मेहनत की है। 

आज इन 300 मीलियन लोगों का फर्ज  बनता है कि वे बाकी 700 मीलियन लोगों के बारे में भी सोचें। सिर्फ सरकार के भरोसे यह नहीं हो सकता। आज मुंबई, महाराष्ट्र, तेलंगाना, तमिलनाडु आदि में कुछ नेता अपने बारे में सोच रहे हैं। हमें पूरे देश के बारे में सोचना चाहिए न कि सिर्फ अपने बारे में।  

(अरुंधती घोष UN में भारत की राजदूत रह चुकी हैं, आजकल DLF,गुडगाँव में रह रही हैं.)
 (9 फरवरी 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

Love With yellow Rose.

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

दौलत के पीछे भाग रही है नई पीढ़ी : प्रकाश सिंह, पूर्व पुलिस महानिदेशक, बी.एस.एफ. To शशिकांत

सन 1994 में मैं सीमा सुरक्षाबल के डीजी के पद से रिटायर हुआ। उससे पहले मैंने उत्तर प्रदेश और असम में डीजी के पद पर रहकर देश की सेवा की। आजकल अखबारों में डिमांड पर लिखता रहता हूं। 74 साल की उम्र में आज के जमाने को देखता हूं तो लगता है कि इस समय में सबसे ज्यादा मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है। चाहे राजनीति हो या प्रशासन या नागरिक समाज- हर तरफ यह ह्रास दिख रहा है।

हमारे जमाने के नेताओं, अफसरों और प्रबुद्ध नागरिकों में देश सेवा, समाज सेवा को लेकर एक जज्बा होता था। आज की नई पीढ़ी सत्ता और दौलत के पीछे भाग रही है। यह पीढ़ी जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक संपत्ति जमा करने लिए उतावली है। इस कारण हमारा पारिवारिक-सामाजिक ढांचा कमजोर हो रहा है। सामूहिक परिवार टूट रहे हैं, एकल परिवार का प्रचलन बढ़ रहा है, और अब तो पति-पत्नी के बीच के रिश्ते भी प्रभावित होने लगे हैं। 

यह सच है कि देश अपनी ताकत पर तरक्की कर रहा है लेकिन आज हमारा राजनीतिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। आज के नेता दलगत, क्षेत्रीय, जातीय और धार्मिक राजनीति का खेल खेल रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद जनता को भूलकर पैसे बनाने लगते हैं और परिवारवाद रास्ते पर चल पड़ते हैं। इन्हें देखकर नहीं लगता कि ये देश को महाशक्ति बनाने का सपना देख रहे हैं। उनकी यह हरकत लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ है।

शिवसेना राजनीति का भयानक खेल खेल रही है। बाल ठाकरे शाहरुख खान और आमिर खान को 'टू इडियट्स' कह रहे हैं। इससे मुंबई और देश में दंगा फैल सकता है। यह मराठी मानुस के नाम पर कर रहे हैं। ये नगा विद्रोहियों और कश्मीरी आतंकवादियों की तरह देश में अलगाव पैदा कर रहे हैं। ऐसे लोगों को रास्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बद कर देना चाहिए।

1959 में आइपीएस में मेरा चयन हुआ था। मुझे उ उत्तर प्रदेष कैडर मिला था। ट्रेनिंग करने के बाद जब मैं ज्वाइन करने आया तो उस वक्त मुझे पहली बार दो वरिष्ठ अधिकारियों का नाम बताया गया और कहा गया कि ये दोनों बेईमान हैं। इनसे आपको बचकर रहना है। ये कोई 1962-63 की बात है। यानी उस वक्त बेईमान अफसरों को उंगलियों पर गिना जाता था, आज ईमानदार अफसरों को ढूंढना पड़ता है। 100-50 करोड़ की संपति वाले ढेर सारे अफसर आज आपको मिल जाएंगे।

भ्रष्टाचार आज हमारे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। आज बहुत से नेता और आइएएस-आइपीएस अफसर वर्दी पहनकर माफियाओं के साथ उनके गोरखधंधों में संलिप्त हैं। इससे देष की डेवलपमेंट प्लानिंग तो प्रभावित हो रही है, सोशल डेमोक्रेशी भी खत्म होती जा रही है। सरकारी स्तर पर डेवलपमेंट की योजनाएं तो बनती हैं लेकिन भ्रस्टाचार की वजह से वे कागजों पर ही रह जाती हैं।

जंगल और जमीन के वाजिब हकदारों को बेदखल कर दिया जाता है। इसमें मुंशी, पटवारी, थानेदार से लेकर कलेक्टर तक की मिलीभगत होती है। यानी आज हमारा पूरा प्रशासनिक तंत्र खोखला हो गया है। चैतरफा अन्याय, असमानता, शोषण की घटनाएं काफी बढ़ गई हैं। नक्सलवाद इसके विरुद्ध उठनेवाली एक आवाज है। प्रशासनिक ताकत से आप कुछ देर के लिए इसे दबा सकते हैं लेकिन अंततः ये समस्याएं दूर करनी ही होगी। देश की प्रगति के लिए पुलिस और नागरिकों संबंध में सुधार भी जरूरी है।
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली, 4 फरवरी, 2010 प्रकाशित)

मातृभाषा की कीमत पर अंग्रेजी स्वीकार्य नही:अशोक वाजपेयी

आज का हमारा समय बेहद तेज, आक्रामक, हिंसक और बाजारू समय है। दुर्भाग्य से हमारा हिंदी समाज इसका हिस्सा बनता जा रहा है, खासकर मध्य वर्ग। हमारे हिंदी समाज में मध्य वर्ग के भीतर एक ऐसा तबका उभरकर सामने आया है जो इस समय ज्ञान-शून्यता, लूटपाट, अवसरवाद, उपभोक्तावाद और बाजारवादी सफलता की चपेट में आ गया है। 

ऐसे कठिन समय में जो लोग आज समतामूलक, न्यायपरक समाज बनाना चाहते हैं, वे ऐसा तभी कर सकते हैं जब समाज में सकिय शक्तियों का इन्हें समर्थन मिले। फिलहाल हिंदी समाज में ऐसी क्तियां कम दिखाई दे रही हैं।
हमारे हिंदी समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह पुस्तकों से मुंह फेरे हुए है। अव्वल तो यह है कि समाज में पुस्तक के प्रति रुझान हो, सम्मान हो और पढ़ने-लिखने में लोगों की रुचि हो, जैसा कि मलयालम और दूसरी अन्य भारतीय भाषाओं में है। 
इस मामले में हमारे दिल्ली महानगर की हालत कुछ ज्यादा ही निराशाजनक है। हां, पटना, रायपुर, भोपाल जैसे मझोले हरों की स्थिति थोड़ी-बहुत अच्छी जरूर है, बजाय दिल्ली के। 
एक ऐसे समय में जब सभी लोग तेजी से भाग रहे हैं, परेशानी की बात यह है कि हमारे हिंदी क्षेत्र का मध्यवर्ग इसका सबसे अधिक शिकार हो रहा है। यदि इस वर्ग के लोगों की रुचि साहित्य और पुस्तकों में होती तो हालात कम से कम इतने दुखद नहीं होते।
साहित्य की एक खासियत है कि यह हमें मानसिक स्वाद देता है, ज्ञान देता है और यह ज्ञान पुस्तकों से ही संभव है। हमारे हिंदी समाज में पिछले सालों में सूचना को लेकर भूख जरूर बढ़ी है लेकिन ज्ञान को लेकर नहीं। शिक्षा के लिए सूचना से ज्यादा जरूरी है ज्ञान, और ज्ञान किताबों से ही हासिल की जा सकती है।
हिंदी क्षेत्र में अखबारों, किताबों की बिक्री जरूर बढ़ी है लेकिन जिस अनुपात से यहां साक्षरता बढ़ी है उस उस अनुपात में नहीं। दुर्भाग्यव हमारे हिंदी क्षेत्र में शिक्षा की दुर्दशा को तो हम देख ही रहे हैं। शिक्षा का सबसे बड़ा दारोमदार हमारे हिदी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों पर है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों समेत हिंदी प्रदेश में राज्यों में आज एक भी उच्च कोटि का का कोई संस्थान नहीं है।
जहां तक बाजार का सवाल है तो आज के समय में बाजार की चुनौती को ज्यादा आलोचनात्मक ढंग से समझने की जरूरत है। बाजार ने बेशक हमारे सामने आज बहुत बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं लेकिन कुछ सकारात्मक बातें भी हुई हैं। 
एक तरह से बाजार ने हर खासोआम लोगों में समानता की भूख को बढ़ाया है। न्याय-बुद्धि भी सक्रिय हुई है। रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल में आनेवाली कुछ उंसी चीजें हैं जिन्हें बाजार ने सबको मुहैया कराया है। 


ये बाजार के पक्ष की कुछ बातें हैं लेकिन जहां तक साहित्य अकादेमी के सैमसंग बहुराष्ट्रीय कंपनी दारा प्रायोजित पुरस्कार शुरू करने का मामला है तो एक लेखक के रूप में मैं इसको मान्यता नहीं दे सकता। 
बाजार में सक्रिय कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी चाहे तो अनुवाद के किसी प्रोजेक्ट को फंड दे सकते हैं। साहित्य अकादेमी का पुरस्कार एक दूसरी बात है। यह साहित्य और लेखन को जांचने का मसला है। अब तक साहित्य अकादेमी यह जांच करती रही है लेकिन सैमसंग जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी यह जांच कैसे कर सकती है।
जहां तक मैं समझता हूं यदि अकादमी को पुरस्कारों के लिए फंड चाहिए तो वह सरकार से इसकी मांग करे। तमाम विवादों के बावजूद साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कारों की लेखक-पाठक समाज में प्रतिष्ठा है। साहित्य में इतने सारे प्रतिष्ठित पुरस्कार हैं, ऐसे में किसी कंपनी से वितीय अनुदान लेकर नए पुरस्कार शुरू करने की मुझे कोई जरूरत महसूस नहीं होती।
आज कुछ लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के उत्कर्ष की बात करते है। मैं ऐसा कोई उत्कर्ष नहीं देखता। हिंदी के एक लेखक के नाते मुझे अपने हिंदी क्षेत्र में हिंदी के उत्कर्ष की चिंता है। 50 करोड़ हिंदी बोलनेवाले हिंदी क्षेत्र में जबतक हिंदी की प्रतिष्ठा नहीं होगी तब तक हिंदी का उत्कर्ष संभव नहीं। 
बुनियादी बात यह है कि हम अपने घर में क्या कर रहे हैं। सवाल यह है कि अपनी मातृभाषाओं, अपनी रास्ट्रभाषा के प्रति हमारा क्या रवैया है। दुर्भाग्यवश राष्ट्रभाषा हो या मातृभाषा- हिंदी के मध्यवर्ग की भूमिका निंदनीय ही कही जा सकती है।
मातृभाषा से वंचित लोग ज्ञान आधारित समाज का निर्माण नहीं कर सकते। इसीलिए हम चाहते हैं कि हमारे हिंदी क्षेत्र की आगे की आनेवाली पीढ़ियां अपनी मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई पढ़े और फिर अंगे्रजी और दूसरी भाषाएं सीखे। 
सारी दुनिया के शिक्षा मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चों की शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए- तभी बच्चों की ज्ञान की क्षमता, भाषिक क्षमता में वृद्धि होगी और उनका भलीभांति बौद्धिक विकास भी होगा।
आज हमारे हिंदी क्षेत्र के अभिभावकों में बच्चों को अंगेजीदां पब्लिक स्कूल में पढ़ाने की होड़ मची हुई है। मेरा पोता रिभु हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ रहा है। अभी वो छोटा है लेकिन मैं उसकी  उसकी ज्ञान की क्षमता भाषिक क्षमता और बौद्धिक क्षमता से सुतुष्ट हूं। अंग्रेजी मेरे लिए वर्जित नहीं है लेकिन मातृभाषा की कीमत पर मैं अंग्रेजी को स्वीकार नहीं कर सकता।
(6 फरवरी 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)