बुधवार, 24 मार्च 2010

कानू सान्याल अब हमारे बीच नहीं रहे : नबारुण भट्टाचार्य ने डॉ. शशिकांत से कहा

भारत में नक्सलवादी आंदोलन के मुखिया कानू सान्याल अब हमारे बीच नहीं रहे। यह एक बहुत ही दुखद संवाद है। ख़ासकर मेरे जेनरेशन के लिए तो यह बहुत ही फ्रस्ट्रेटिंग और ट्रेज़िक संवाद है। हमलोग जब युवा थे तो हमारे बीच कानू सान्याल का बहुत ज़्यादा क्रेज़  था। चारू मजूमदार के साथ मिलकर उन्होंने नक्सलबाड़ी जैसी छोटी जगह से इतना बड़ा मवमेंट खड़ा किया। वे एक बहुत बड़े आर्गनाइजर थे। बहुत अच्छे वक्ता थे। वे नौजवानों को अपनी बातों से बहुत जल्दी प्रभावित कर देते थे। हमारी पीढ़ी उनसे बहुत ज़्यादा प्रभावित हुई थी। 

आज मेरा कहना है कि उनका जिस तरह निधन हुआ वह निधन नहीं बल्कि हत्या है। किसी क्रांतिकारी की लाइफ़ इस तरह से ख़त्म नहीं होनी चाहिए। हालांकि हम उनकी लाइफ के बारे में ज़्यादा नहीं जानते हैं। पिछले कुछ सालों से वे एकदम अकेले हो गए थे। अपनी लाइफ और आजकल के हालात को देखकर बहुत फ्रस्टेटेड रहते थे। बहुत दिनों से बीमार भी थे। कई तरह के रोग के शिकार थे। उनके बारे में इतना तो हम जानते हैं लेकिन और भी बहुत सी पर्सनल बातें थीं जिनके बारे में हमें नहीं पता।

पिछले दिनों मैं सिलीगुड़ी गया था। जब मुझे पता चला कि वे बीमार हैं तो मैंने उनसे मिलने की भी कोशिश की लेकिन मेरी उनसे मुलाक़ात नहीं हो पाई। आज मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है। लेकिन जो कुछ हुआ यह अज़ीब हुआ। इसकी हमें उम्मीद नहीं थी। यह परेशान करनेवाली बात है। लेकिन उनकी इस तरह हुई उनकी मौत को अन्याय के खिलाफ़ लड़नेवाले एक शख्स का पर्सनल डिसीजन समझना चाहिए। उनकी ज़िन्दगी वाकई एक सच्चे क्रांतिकारी की ज़िन्दगी थी।

पहले चारू मजूमदार हमारे बीच से चले गए और अब कानू दा भी नहीं रहे, लेकिन मैं कहूंआ कि उनकी मौत का नक्सलवादी मूवमेंट पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कोई झटका नहीं लगेगा। यह मूवमेंट चलता रहेगा। जनता उनके पॉजिटिव योगदान को याद कर और उनकी राह पर चलकर गरीबी, भ्रष्टाचार और शोषण के विरुद्ध लड़ती रहेगी। 'ग्रीन हंट' कार्यक्रम एक क्रिमिनल औफेंस है। सरकार जनता के विरुद्ध है। यह ठीक बात नहीं है। 

1932 में दार्जिलिंग जिले के कर्सियांग में जन्मे कानू दा अपने पांच भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे। उनके पिता गोविंद सान्याल कर्सियांग के कोर्ट में नौकरी करते थे। 1946 में कर्सियांग के एम.ई. स्कूल से मैटिक की परीक्षा पास कर उन्होंने जलपाईगुड़ी कॉलेज में इंटर में दाख़िला तो ले लिया लेकिन बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। कुछ ही दिन बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधानचंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें हिरासत में ले लिया गया। 

जेल में उनकी मुलाक़ात चारू मजूमदार से हुई। जेल से बाहर निकलने के बाद उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली। 1964 में पार्टी में विभाजन के बाद उन्होंने माकपा में रहना मुनासिब समझा। 1967 में उन्होंने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन का नेतृत्व किया। आगे चलकर यह नक्सलवादी आंदोलन के रूप में भारत के कई राज्यों से लेकर पड़ोसी मुल्क़ नेपाल तक में फैला। वे क़रीब 14 साल जेल में रहे। भाकपा माले के महासचिव के बतौर वे लंबे समय तक सक्रिय रहे। ज़िन्दगी के आख़िरी पल उन्होंने नक्सलबाड़ी से लगे हाथीघिसा गांव में बिताया।
(डॉ. शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित. 23 मार्च, 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

शनिवार, 20 मार्च 2010

अंधेरे में जलती कंदील की तरह है अज्ञेय का सृजन : उदय प्रकाश

अभी पिछले दिनों मैं कुशीनगर गया था, जहां गौतम बुद्ध का निर्वाण हुआ था। उनके निर्वाण स्थल से कुछ ही दूर मैंने वह स्थान देखा जहां अज्ञेय के इच्छानुसार एक संग्रहालय का निर्माण होना है। 

मेरे जैसे उनके असंख्य पाठकों की यह आकांक्षा होगी कि उनके जन्मशती वर्ष में यह संग्रहालय बनकर तैयार हो। बुद्ध ने भी इस समाज की जड़ताओं को तोड़ने की कोशिश की थी। बुद्ध का यही प्रेत आज भी प्रतिगामी बुद्धिजीवियों को बार-बार सताता है। जो भी बुद्ध की ओर जाता है, उसे सताया जाता है। पिछले साल मेरे ऊपर भी कुछ प्रतिगामी बुद्धिजीवियों की ओर से हमले हुए, शायद इसकी वजह भी यही है।

एक बात अक्सर ध्यान देने लायक है, और वह है- अज्ञेय का अपनी जन्मस्थली कुशीनगर से लगाव। वे बार-बार कुशीनगर जाना चाहते थे। उनके भीतर का तथागत उन्हें अपनी ओर बार-बार खींचता था। आज हिंदी के वर्चस्वशील बौद्धिक मानस में बुद्ध के प्रति जो सहजात भय है, कहीं उसी का दंड राहुल, नागार्जुन, भदंत आनंद कौशल्यायन और आंबेडकर जैसे व्यक्तियों की तरह अज्ञेय को तो नहीं मिला!

अज्ञेय जी से मैं सिर्फ दो ही बार मिल पाया। वे हिंदी के एक बहुत बड़े लेखक थे। कविता, कहानी, पत्रकारिता- सभी क्षेत्रों में उनकी मौलिकता असंदिग्ध थी। ‘तारसप्तक’ के रूप में उन्होंने हिंदी कविता को उसके ऐतिहासिक संदर्भों में एक नए रूप में प्रस्तुत किया। यह मानकर चलें कि कविता, कहानी या कोई भी विधा हो- जड़ीभूत नहीं होती है, समय और समाज के परिप्रेक्ष्य के साथ वह हमेशा परिवर्तित होती रहती है।

अज्ञेय संभवत: समूची हिंदी भाषा के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कविता, पत्रकारिता और आख्यान- इन सभी विधाओं में जो विभाजक परिवर्तन था, प्रस्थान की जो नई दिशा थी, उसे पहचाना और चिन्हित किया। 

कविता के क्षेत्र में ‘तारसप्तक’, पत्रकारिता में समाचार साप्ताहिक ‘दिनमान’ की अवधारणा और संपादन, आख्यान में “ शेखर : एक जीवनी’ जैसा अपूर्व संरचना का मौलिक प्रयोगात्मक उपन्यास और आलोचना के क्षेत्र में नई पदावलियों की खोज़, विनिर्माण और उनका अर्थांतरण- ये सभी उनकी विदग्ध और निस्संग प्रतिभा के साक्ष्य हैं।

एक बार सुप्रसिद्ध जर्मन भाषाविद तथा अज्ञेय की कविताओं के अनुवादक प्रो. लोठार लुत्से ने अपने साक्षात्कार में कहा था कि हिंदी कविता में आधुनिकता की आहट उन्हें छायावाद, उत्तर छायावाद या प्रगतिवाद में नहीं बल्कि अज्ञेय की कविताओं दिखाई देती है। उन्होंने कहा था- "आधुनिकता का सबसे प्रामाणिक लक्षण यह है जब लेखक अपनी भाषा, विधा और विचार पर शंशय करता हो।"

यह कभी न भूलें कि अज्ञेय अपने समय के सबसे निर्भय तर्कशील मेधा थे। उन्होंने अपने सामने अनेक चुनौतियां खड़ी कीं, जिनमें वे घिरते चले गए और जीवन भर उस घेरेबंदी के शिकार रहे। 


कई बार ऐसा लगता है कि जड़ीभूत मानसिकता से ग्रस्त सामाजिक, राजनीतिक सत्ताएं जिन लोगों से उनके वतन छीनती हैं और उन्हें निर्वासन में भेजती हैं, उससे कम यंत्रणादायक और संत्रास भरा जीवन इस घेरेबंदी में नज़रबंद लेखक की नहीं होती है।

आज के हमारे समय में जब हम तमाम लघु अस्मिताओं का सर्वव्यापी उत्थान और आक्रमण देख रहे हैं। धर्म, जाति, नस्ल, समूहगत हित, मूल्यों का क्षरण, सत्तालोलुपता और भ्रष्ट अतिचार आदि ने एक भयानक डरावना अंधेरा निर्मित किया है। ऐसे समय में अज्ञेय का व्यक्तित्व और उनका सृजन मुझे अंधेरे में जलती कंदील की तरह दिखाई देता है। 

यह एक विडंबना ही थी कि अज्ञेय अपनी बौद्धिकता और सृजन के शिखर पर तब हुए जब समूची दुनिया और हमारा देश-समाज भी शीत-युद्ध के दो विरोधी शिविरों में बंटा था। 

जिन विचारधाराओं के अंत की बात अब की जा रही है, वे सर्वसत्तावादी सिद्धांत अपने चरम पर थे। अज्ञेय इसलिए महत्वपूर्ण हो उठते हैं कि शिविरबंदी के उस दौर में भी उन्होंने लोकतांत्रिक सहिष्णुता और वैचारिक खुलेपन का विरल दृष्टांत पेश किया।
 

यह ध्यान रखने की बात है कि अज्ञेय विप्लवी, विद्रोही और क्रांतिकारी थे। उनकी क्रांतिधर्मिता कागज़ी और ख्याली  बिरयानी नहीं थी। अपने जीवन में उन्होंने उस पर अमल किया था, जेल गए थे और भूमिगत हुए थे। 

‘तारसप्तक’ में जब उन्होंने पहले कवि के रूप में रामविलास शर्मा और फिर मुक्तिबोध का चयन किया तो एक और जहां उन्होंने सृजनात्मकता के धरातल पर राजनीतिक शिविरबंदी को सिरे से खारिज किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने संभवत: मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा में अपनी प्रतिबद्धताओं और ईमानदारी की झलक देखी और वे उन्हें अपने निकटतम लगे। 

भवानी प्रसाद मिश्र भी ‘तारसप्तक’ के कवियों में होते, अगर वे 1942-43 में रा’ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की लड़ाई में कानपुर की जेल में बंद न होते और ‘तारसप्तक’ के संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के आग्रह पर अपनी कविताएं भेज दी होती।
 

अज्ञेय प्रतिगामी और जड़ चेतना के संकीर्ण सताओं के कारागार में एक सज़ायाफ्ता मुज़रिम थे, लेकिन उनके कहानी संग्रह ‘विपथगा’ की कहानियां, जिसमें ‘रोज’ जैसी अनूठी कहानी, “शेखर : एक जीवनी’ जैसा आत्मवृत्तात्मक उपन्यास, ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘असाध्य वीणा’, ‘हीलीबोन की बत्तखें’ जैसी तमाम कविताएं, ‘दिनमान’ और ‘एवरीमेन्स’ जैसी हिंदी और अंगरेजी की बौद्धिक सामाजिक पत्रिकाओं के संपादन और अभिकल्पन की प्रतिभा ही नहीं, ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहे जानेवाले आचार्य केशवदास पर लिखे उनके लेख जैसी तमाम रचनाएं यह साक्ष्य देती हैं कि अगर हिंदी में दूसरा मुक्तिबोध, दूसरा प्रेमचंद नहीं हो सकता तो कोई दूसरा अज्ञेय भी नहीं हो सकता। 

काल और संवत्सर की उनकी भारतीय अवधारणाओं में खुर्दबीन लेकर प्रतिगामी विचारों की खोज़बीन करनेवाले वेतनभोगी मीडियाकर आचार्यों को सबसे पहले अपने भीतर की संकीर्णताओं की खोज और सीनाख्त करनी चाहिए।  

अज्ञेय निस्संदेह प्रथमत: एक आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी और रचनाकार थे। उनके जन्मशती वर्ष में 20वीं सदी में हमें उनके होने का उत्सव मनाना चाहिए। उनकी रचनाओं की ओर जाना, आधुनिकता के महावृत्तांत की ओर बढ़ा हुआ एक मुक्तिगामी क़दम होगा। 
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित. 'अमर उजाला', 19 मार्च, 2010 प्रकाशित)

शनिवार, 13 मार्च 2010

ये है bbchindi.com की 'हिंदी'


" यह बीबीसी लन्दन है....!"  ट्रांजिस्टर पर जब यह आवाज़ निकलने लगती थी तो आस-पास के लोग इसके इर्द-गिर्द जमा  होने लगते थे. सात समंदर पार से आ रही इस आवाज़ में आख़िर ऐसा क्या जादू था?  सरकारी प्रसारण सेवा 'आकाशवाणी' से  ज़्यादा बीबीसी पर क्यों भरोसा करते थे लोग? 

 उत्तर औपनिवेशिक भारत में जनसंचार के  श्रव्य माध्यम को लोकप्रिय बनाने और  इसे जन-जन तक पहुंचाने  में बीबीसी हिंदी सेवा की  ऐतिहासिक भूमिका रही है. 20 सदी में बीबीसी हिंदी सेवा ने भाषाई पत्रकारिता के  प्रसारण की  एक नई भाषा गढ़ी.  

उम्र के 40 वें साल में यह कहते हुए फ़ख्र हो रहा है कि बिहार के अपने गाँव में गायों-भैंसों के बीच बथान में ट्रांजिस्टर पर आस-पास के लोगों के साथ हर शाम मैं बीबीसी लन्दन  के समाचार सुनता था. यकीन कीजिए, उस टूटे हुए ट्रांजिस्टर से प्रसारित समाचारों ने  इस कच्चे मन पर कुछ ऐसा असर  डाला कि मैं भी धीरे-धीरे ख़बरों की इसी दुनिया में दाख़िल हो  गया. आज पत्रकारिता मेरा जूनून है और मेरी रोज़ी-रोटी का ज़रिया भी.

आज भी मैं लगभग रोज़  www.bbchindi.com पर जाकर समाचार सुनता हूँ, ख़बरें पढ़ता हूँ और पसंदीदा ख़बरें  twitter और feshbook  के  साथियों के साथ बाँटता भी हूँ.

...लेकिन आज (13 मार्च,1010 ) bbchindi.com पर "दरियाई घोड़े का 'ज़ेब्रा' ब्रश"  ख़बर पढ़ कर काफ़ी तकलीफ़ हुई. बीबीसी की कॉपी में इतनी भयानक अशुद्धियाँ!  भाषाई पत्रकारिता के अपने 'रोल मॉडल'  से ऐसी उम्मीद नहीं थी. आप ख़ुद पढ़ कर देख लीजिये! 

शुक्रिया.  
डॉ. शशिकांत

नोट : पीले रंग से रंगे बीबीसी के शब्द और वाक्य मेरे हिसाब से ग़लत हैं. उनकी  जगह  ( ) में दिए गए शब्द/वाक्य होने चाहिए थे.      
शनिवार, 13 मार्च, 2010 को 08:11 IST तक के समाचार
दरियाई घोड़े का 'ज़ेब्रा' ब्रश
दरियाई घोड़ा और ज़ेब्रा
इसे आप सहभागिता कहें, आपसी प्रेम कहें या फिर कुछ और, लेकिन स्विट्ज़रलैंड में ज़्यूरिख के चिड़ियाघर में जो हुआ, उससे कई लोगों की आँखें फटी रह गईं.
पहले तो सहसा उन्हें इसका यक़ीन ही नहीं हुआ लेकिन जब सच्चाई सामने थी, तो इन रोमांच और रोंगटे खड़े कर देने वाले क्षणों को दूर से कैमरे में क़ैद करने का उनके पास बेहतरीन मौक़ा था.
ज़्यूरिख के चिड़ियाघर की सैर कर रहे लोग उस समय चौंक (भौंचक रह) गए जब उन्होंने एक ज़ेब्रा को दरियाई घोड़े के जबड़े में झाँकते देखा.
लोगों को लगा अब को (तो) ज़ेब्रा की ख़ैर नहीं, लेकिन उन्हें तब और आश्चर्च  (आश्चर्य ) हुआ जब दरियाई घोड़े ने ज़ेब्रा को कुछ नहीं किया.
और क़रीब जाने पर लोगों को असली कहानी पता चली. उन्होंने देखा कि दरियाई घोड़ा तो आराम से अपनी दाँत की सफ़ाई करा रहा था (है) और ज़ेब्रा भी बिना भय के इस काम को बख़ूबी अंजाम दे रहा था. (है).
क्षण
फ़्लोरिडा की जिल सॉन्सटेबी ने भी इस असाधारण क्षण को अपने कैमरे में क़ैद किया. उन्होंने बताया कि दाँत की सफ़ाई की (का) काम क़रीब 15 मिनट चला और दरियाई घोड़े ने ज़ेब्रा को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया.
चिड़ियाघर के उसी इलाक़े में दरियाई घोड़ा अपने बच्चे साथ था, जहाँ ज़ेब्रा भी था. (चिड़ियाघर के उसी इलाके में एक तालाब में दरियाई घोड़ा अपने बच्चों के साथ था. तालाब के किनारे अठखेलियाँ करते हुए जैसे ही उसने अपना मुंह खोला, ज़ेब्रा उसके नज़दीक आ गया और उसके दांत चाटने लगा.) दरियाई घोड़े ने अपना मुँह खोला और ज़ेब्रा ने उसकी सफ़ाई शुरू कर दी. वहाँ मौजूद हर कोई तस्वीर खींच रहा था. उस क्षण वहाँ मौजूद रहना शानदार था
फोटोग्राफ़र सॉन्सटेबी
सॉन्सटेबी ने बताया, "चिड़ियाघर के उसी इलाक़े में दरियाई घोड़ा अपने बच्चे साथ था, जहाँ ज़ेब्रा भी था. दरियाई घोड़े ने अपना मुँह खोला और ज़ेब्रा ने उसकी सफ़ाई शुरू कर दी.(चिड़ियाघर के उसी इलाके में एक तालाब में दरियाई घोड़ा अपने बच्चों के साथ था. तालाब के किनारे अठखेलियाँ करते हुए जैसे ही उसने अपना मुंह खोला, ज़ेब्रा उसके नज़दीक आ गया और उसके दांत चाटने लगा.) वहाँ मौजूद हर कोई तस्वीर खींच रहा था. उस क्षण वहाँ मौजूद रहना शानदार था."
दरियाई घोड़े को दुनिया के सबसे आक्रामक जीवों में से एक माना जाता है. अपनी दाँतों से वह छोटे नाव को दो टुकडों(ड़ों) में कर सकता है.
तीन टन के वज़न वाला दरियाई घोड़ा ज़मीन पर पाया जाने वाला दुनिया का तीसरा बड़ा स्तनपायी जानवर है.
हालाँकि सामान्य तौर पर ये एक-दूसरे को जान से नहीं मारते लेकिन अफ़्रीकी देशों में लोगों पर सैकड़ों बार इनके जानलेवा हमले हुए हैं.
भारी-भरकम होने के बावजूद दरियाई घोड़ा छोटी दूरी की दौड़ में इंसान को भी पछाड़ सकता है.

रविवार, 7 मार्च 2010

मां-बाप को साथ नहीं रखना चाहते आज के बच्चे : एच. एल. सैनी

जनवरी 2005 में मैं डीडीए से रिटायर हुआ। वहां मैं कन्स्ट्रशन डिपार्टमेंट में इंजीनियर था। आज भी मैं सुबह-शाम पार्क में घूमता हूं और अपना काम खुद करता हूं। पार्क की भी देखभाल करता हूं। मैं देखता हूं कि पार्क में बुजुर्ग औरत-मर्द ही सैर के लिए आते हैं। कुछ बच्चे खेलते रहते हैं। लेकिन आजकल के युवक-युवतियों को पार्क में सुबह-शाम सैर करने की फुरसत कहां। 

घंटे-दो घंटे घूम-फिरकर जब घर पहुंचता हूं तब देखता हूं कि बच्चे सोकर उठ रहे हैं। हमारे बच्चों की शादी हो चुकी है। वे सभी जॉब  कर रहे हैं। आज हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है क्योंकि हमने उन्हें अच्छे संस्कार दिए हैं।

लेकिन समाज में आज कुछ ऐसे बदलाव हो रहे हैं जिन्हें देखकर मन कभी-कभी दुखी हो जाता है। आज के बच्चों के कैरेक्टर बदल गए हैं। मैं गांव से दिल्ली आया हूं। गांवों में पड़ोसियों के साथ एक खास तरह का अपनापन होता था। गांव-मोहल्ले की बहू-बेटियों को इज्जत की निगाह से देखते थे लोग। आजकल के 10-12 वीं के बच्चे गर्लफ्रेंड रखते हैं। यह सच है कि दूसरी फील्ड में आज के बच्चे ज्यादा आगे जा रहे हैं। उनमें नॉलेज ज्यादा होती है। अब सीखने के साधन बढ़ गए हैं। उस वक्त की पढ़ाई से बहुत अंतर आ गया है।

मैंने गांव के स्कूल में पढ़ाई की। टेंट में हमारी क्लासें लगती थीं। बैठने के लिए घर से बोरी लेकर स्कूल जाते थे। होमवर्क नहीं करने पर स्कूल में पिटाई होती थी और गलती करने पर घर में भी। आजकल के बच्चों को आप पीट नहीं सकते, भले वे कितनी गलतियां करें।

बचपन में जब हम गिरते थे तो बड़े-बुजुर्ग कहते थे- गिरने दो, चोट लगने से बच्चे मजबूत होते हैं। उस वक्त हम पैदल चलते थे। खाने-पीने पर ज्यादा खर्च होता था, बाकी के खर्च कम थे। आज खाने का खर्च कम हो गया है और बाकी के खर्च बढ़ गए हैं। हमारी पीढ़ी के लोगों में इसका फायदा आपको दिखेगा। आज 65 साल की उम्र में भी हम पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपना सारा काम खुद करते हैं। नई पीढ़ी के बच्चों को कार से उतरने में भी दिक्कत होती है। वे हांफते हुए घर पहुंचते हैं। पिज्जा, बर्गर और गलत खान-पान ने आज के बच्चों की रेसिस्टेंस पावर कम कर दी है।

आजकल के बच्चे अपने पैरेंट्स से आइसोलेटेड हो गए हैं। जो मां-बाप उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं - बड़े होकर उन्हीं को वे घर से निकाल देते हैं। बच्चों के सताए बुजुर्गों की तकलीफ सुनकर कभी-कभी लगता है कि जमाना कितना बदल गया है। नजफगढ़ में हमारा पुश्तैनी मकान है। अभी हाल तक हम पांचों भाई  इकट्ठे रहते थे। ज्वाइंट फेमिली थी हमारी। साथ खाना बनता था। 

अब तो शादी हुई नहीं कि बच्चे अलग हो जाते हैं। आज के बच्चे नहीं समझते कि बूढ़े मां-बाप को अपने बच्चों के साथ रहने में सबसे ज्यादा खुशी मिलती है। उन्हें और कुछ नहीं चाहिए। आज के जमाने में प्यार उपर से नीचे होता है, नीचे से उपर नहीं होता। यानी आप बेटे, पोते को चाहे कितना प्यार करें लेकिन उन्हें आपसे कोई मतलब नहीं, वे आपसे बात करने से भी कतराएंगे।
(श्री सैनी डी.डी.ए. के रिटायर्ड इंजीनियर हैं. 3 मार्च 2010 दैनिक भास्कर, दिल्ली में प्रकाशित)