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ये इश्क नहीं आसां...!

मित्रो,  आज प्रेम दिवस है- वेलेंटाइन्स डे. 'दुनिया में इतनी हैं नफ़रतें..' के बीच कुछ मासूम  दिलोंमें में पनप रही चाहतों का हम सबको ख़ैर मख्दम करना चाहिए, पश्चिम-पूरब की बहस को छोड़कर. प्रेम प्रेम होता है देसी-बिदेसी नहीं...ख़ैर, पिछली साल वेलेंटाइन्स डे पर राजस्थान पत्रिका के लिए लिखा गया यह लेख आपके हवाले कर रहा हूँ. शुक्रिया. - शशिकांत.  ‘ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजै
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’’
मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ां ‘ग़ालिब’ ने यह नज़्म यूं तो उन्नीसवीं सदी में लिखी थी। आज भी मुहब्बत के पहरेदारों से जूझ रहे प्रमियों पर उनकी यह नज़्म उतनी ही सटीक बैठती है और सैकड़ों सालों से मिथ बने उन आशिकों पर भी, जिनका प्यार परवान नहीं चढ़ा और अपने प्यार की खातिर उन्होंने जान तक कुर्बान कर दी। 
हिदुस्तान से लेकर अरब और यूरोप की ज़मीं पर उगीं ऐसी अनंत प्रेम कथाएं हैं, जो हर जुबां पर आज भी जिं़दा हैं। राधा-कृष्ण, शकुंतला-दुष्यंत, सावित्री-सत्यवान जैसी पौराणिक प्रेम कथाएं और रानी रूपमती-बाज बहादुर, सलीम-अनारकली, लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, ढोला-मारू, शीरीं-फरहाद, रोमियो-ज…

विवाद और संवाद के बीच अभिव्यक्ति : गीतांजलि श्री

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मित्रो, 2012के जयपुर साहित्य उत्सव पर सलमान रुश्दी विवाद पूरी तरह छा गया. सलमान रुश्दी इससे पहले भारत आ चुके हैं, लेकिन इस बार संभवतः पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने 'द सेटेनिक वर्सेस' को फिर से विवादों में ला दिया. साहित्य पर राजनीति की इस छाया के बाद अब सवाल साहित्य का नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बन गया है. प्रख्यात लेखिका गीतांजलि श्री यहाँ पर राजनीति और असहिष्णुता के बरक्स साहित्य की लोकतांत्रिकता और संवादधर्मिता पर चर्चा कर रही हैं. शशिकांत के सात बातचीत पर आधारित यह लेख 29 जनवरी 2012 के दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ है. शुक्रिया.
कुछ लोगों की निगाह में सलमान रुश्दी का उपन्यास 'द सेटेनिक वर्सेस' एक घटिया रचना है। कुछ और लोगों की निगाह में सलमान रुश्दी ही घटिया लेखक हैं। मैं खुद ऐसा नहीं मानती। पर शुरू में ही इस बात को इसलिए कह रही हूं कि जो विवाद इस वक्त उठ खड़ा हुआ है वह एक लेखक विशेष या उसकी किसी एक रचना के मूल्यांकन का नहीं है। 
असल मसला है कि अपने को सभ्य माननेवाला कोई समाज रचनात्मक/कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में क्या…