मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

ये इश्क नहीं आसां...!

मित्रो, 
आज प्रेम दिवस है- वेलेंटाइन्स डे. 'दुनिया में इतनी हैं नफ़रतें..' के बीच कुछ मासूम  दिलोंमें में पनप रही चाहतों का हम सबको ख़ैर मख्दम करना चाहिए, पश्चिम-पूरब की बहस को छोड़कर. प्रेम प्रेम होता है देसी-बिदेसी नहीं...ख़ैर, पिछली साल वेलेंटाइन्स डे पर राजस्थान पत्रिका के लिए लिखा गया यह लेख आपके हवाले कर रहा हूँ. शुक्रिया. - शशिकांत. 
 
‘ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजै
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’’
मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ां ‘ग़ालिब’ ने यह नज़्म यूं तो उन्नीसवीं सदी में लिखी थी। आज भी मुहब्बत के पहरेदारों से जूझ रहे प्रमियों पर उनकी यह नज़्म उतनी ही सटीक बैठती है और सैकड़ों सालों से मिथ बने उन आशिकों पर भी, जिनका प्यार परवान नहीं चढ़ा और अपने प्यार की खातिर उन्होंने जान तक कुर्बान कर दी। 

हिदुस्तान से लेकर अरब और यूरोप की ज़मीं पर उगीं ऐसी अनंत प्रेम कथाएं हैं, जो हर जुबां पर आज भी जिं़दा हैं। राधा-कृष्ण, शकुंतला-दुष्यंत, सावित्री-सत्यवान जैसी पौराणिक प्रेम कथाएं और रानी रूपमती-बाज बहादुर, सलीम-अनारकली, लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, ढोला-मारू, शीरीं-फरहाद, रोमियो-जूलियट जैसे प्रेम चरित्रों की गाथाएं इसकी मिसाल हैं।

विडंबना यह है कि मुहब्बत की राह पर शहीद हुए इन आशिकों का प्रेम-प्रसंग आज भी जिं़दा है। बस उसके रूप और शरीर बदल जाते हैं। अक्सर हर गांव और कसबे में हर वक्त ऐसा जोड़ा पैदा होता हे लेकिन जाति-बिरादरी, संप्रदायवाद, अमीरी-गऱीबी और अन्य वजहों से तंगनजऱ लोगों के हाथों मौत के घाट उतार दिया जाता है या खुदकुशी करने को बाध्य हो जाता है। 

दरअसल लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलियट हर ज़माने में पैदा होते हैं और हो रहे हैं लेकिन हमारे समाज में प्रेम के मामले में पाल्थी मारकर बैठी वर्जनाएं हज़ारों लैला-मजनूओं की कुर्बानी के बाद भी नहीं टूट रही हैं। वेलेंटाइन डे के अवसर पर पेश है कुछ ऐसी ही जगत प्रसिद्ध प्रेम चरित्रों की संघर्ष गाथाओं का संक्षिप्त सार -

लैला-मजनूं: अरब के प्रेमी युगल लैला-मजनूं सदियों से प्रेमियों के आदर्श रहे हैं। कैस-लुबना, मारवा-अल मजनूं अल फ रांसी, अंतरा-अबला, कुथैर-अजा, लैला-मजनूं सरीखी प्रेम कहानियां इसकी मिसाल हैं। और रहें भी क्यों नहीं, इन्होंने अपने अमर प्रेम से दुनिया को दिखा दिया है कि मोहब्बत इस जमीन पर तो क्या जन्नत में भी जिंदा रहती है। इनमें लैला-मजनूं की प्रेम कहानी जगजाहिर है। 

अरबपति शाह अमारी के बेटे कैस की किस्मत में यह प्रेमरोग हाथ की लकीरों में ही लिखा था। उसे देखते ही भविष्य वक्ताओं ने कहा कि कैस प्रेम दीवाना होकर दर-दर भटकता फिरेगा। उनकी भविष्यवाणी को झुठलाने के लिए शाह अमारी ने खूब मन्नतें कीं कि उनका बेटा इस प्रेमरोग से महरूम रहे, लेकिन कुदरत अपना खेल दिखाती ही है।

दमिश्क के मदरसे में जब उसने नाज्द के शाह की बेटी लैला को देखा तो पहली नजऱ में उसका आशिक हो गया। मौलवी ने उसे समझाया कि वह प्रेम की बातें भूल जाए और पढ़ाई में अपना ध्यान लगाए, लेकिन प्रेम दीवाने ऐसी बातें कहां सुनते हैं। कैस की मोहब्बत का असर लैला पर भी हुआ। 

नतीजा यह हुआ कि लैला को घर में कैद कर दिया गया और लैला की जुदाई में कैस दीवानों की तरह मारा-मारा फि रने लगा। कुछ कथाओं में यह कहा गया है कि मजनूं को जब यह पता चला तो वह पागल हो गया और इसी पागलपन में उन्होंने कई कविताएं रचीं। उसकी दीवानगी देखकर लोगों ने उसे ‘मजनूं’ का नाम दिया। आज भी लोग उसे ‘मजनूं के नाम से जानते हैं और मजनू मोहब्बत का पर्याय बन गया है।

लैला-मजनूं को अलग करने की लाख कोशिशें की गईं लेकिन सब बेकार साबित हुईं। लैला की तो बख्त नामक व्यक्ति से शादी भी कर दी गई। लेकिन उसने अपने शौहर को बता दिया कि वह सिर्फ मजनूं की है। मजनूं के अलावा उसे और कोई नहीं छू सकता। बख्त ने उसे तलाक दे दिया और मजनूं के प्यार में पागल लैला जंगलों में ‘मजनूं-मजनूं’ पुकारने लगी। जब मजनूं उसे मिला तो दोनों प्रेमपाश में बंध गए। लैला की मां ने उसे अलग किया और घर ले गई। मजनूं के गम में लैला ने दम तोड़ दिया। लैला की मौत की खबर सुनकर मजनूं भी चल बसा।

उनकी मौत के बाद दुनिया ने जाना कि दोनों की मोहब्बत कितनी अजीज थी। दोनों को साथ-साथ दफ नाया गया ताकि इस दुनिया में न मिलने वाले लैला-मजनूं जन्नत में जाकर मिल जाएं। लैला-मजनूं की कब्र आज भी दुनियाभर के प्रेमियों की इबादतगाह है। समय की गति ने उनकी कब्र को नष्ट कर दिया है, लेकिन लैला-मजनूँ की मोहब्बत जिंदा है और जब तक दुनिया है जिंदा रहेगी। मजनूँ के काल्पनिक होने के संबंध में कई कथन वर्णित हैं। लेकिन सदियों से लैला-मजनूँ की प्रेम कहानी दुनिया भर के प्रेमियों के लिए मिसाल बना हुआ है।

प्रेमी युगल आज भी लैला मजनूं की मजार पर सजदा करते हें। भारत-पाकिस्तान की सीमा के साथ लगते गांव बिंजौर (अनूपगढ़) में लैला-मजनूं की मजार पर देशभर से आए प्रेमी- प्रेमिकाओं का हजूम एकत्र होकर उनकी मजार पर माथा टेकते हैं। प्रेमी जोड़ों को विश्वास है कि सैंकड़ों वर्ष पुरानी इस मजार पर मत्था टेकने से उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होंगी। 

ऐसा माना जाता है कि लैला व मजनूं ने इसी गांव में अपनी जान दी थी। इस मजार पर पूजा करने के लिए दूर- दूर से नव विवाहित जोड़े आते हैं और साथ में प्रेमी-प्रेमिकाओं का हुजूम भी उमड़ता है।

लैला मजनूं की प्रेम कहानी पर हिंदी में पहली फि ल्म इसी नाम से 1953 में ऑल इंडिया पिक्चर्स के बैनर तले बनी थी जिसके निर्देशक थे - अमरनाथ। उस फि ल्म में बेगम पारा, नूतन, रतन कुमार, शम्मी कपूर आदि कलाकारों ने काम किया था। 

उसके बाद हरनाम सिंह रवैल ने रिशी कपूर और रंजीता को लेकर ‘‘लैला मजनूं’ फि ल्म बनाई थी जो 1976 में रिलीज हुई। उसमें गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे और संगीत मदन मोहन का था। फि ल्म बनाने के दौरान ही 1975 में मदन मोहन की मौत हो गई और फिर संगीत पूरा करने की जिम्मेदारी जयदेव को सौंपी गई थी।

हीर-रांझा: पंजाब की धरती प्रेमियों की धरती रही है। वहां कई प्रेम कथाओं का जन्म हुआ है। इनमें वारिस शाह रचित हीर-रांझा के किस्से को पूरी दुनिया जानती है। इस प्रेम कथा की नायिका हीर एक दौलतमंद खनदान से ताल्लुक रखती थी। वह बहुत खूबसूरत थी और हीर से बेहद प्रेम करती थी।

रांझा अपने चार भाइयों में सबसे छोटा था। भाइयों से विवाद के बाद वह घर छोडकर हीर के गांव पहुंच गया और उसके घर में वह पशुओं की रखवाली करने लगा। दोनों के बीच प्रेम पनपा और दोनों मिलने लगे। लेकिन हीर के ईष्र्यालु चाचा कैदो और माता-पिता को इन दोनों की दिल्लगी मंजूर नहीं थी। उन्होंने हीर का विवाह अन्यत्र कर दिया गया।

उसके बाद रांझा जोगी हो गया और अलख निरंजन कहकर गांव-गांव फिरने लगा। जोगी के वेश में वह एक बार हीर से मिला और दोनों भाग गए लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड लिया। लेकिन उसी रात पूरे शहर में आग लग गई। घबराए हुए महाराजा ने प्रेमियों को आजाद कर दिया और उन्हें विवाह की इजाजत दे दी। दोनों हीर के गांव वापस आ गए।

इस बार हीर के माता-पिता दानों के विवाह के लिए राजी हो गए। लेकिन हीर के ईष्र्यालु चाचा कैदो ने विवाह के दिन हीर को जहर खिला दिया। रांझा ने उसे बचाने का बहुत प्रयास किया लेकिन हीर नहीं बच सकी। हीर के मौत से आहत रांझा ने भी कुछ दिन बाद जान दे दी। इस तरह एक दारुण प्रेम कहानी खत्म हो गई।

सोहनी-महिवाल: पंजाब की ही धरती पर उपजी एक और प्रेम कथा है- सोहनी-महिवाल की। इस प्रेम कथा की प्रेयसी सोहनी सिंधु नदी के तट पर रहने वाले एक कुम्हार तुला की बेटी थी। वह अपने पिता द्वारा बनाए गए बर्तनों पर सुंदर चित्रकारी करती थी। 

एक दिन उजबेकिस्तान के बुखारा शहर से इज्जत बेग नाम का एक धनी व्यापारी व्यापार के सिलसिले में भारत आया और सोहनी से मिलने पर वह उसके सौंदर्य पर आसक्त हो उठा। सोहनी को देखने के लिए वह रोज सोने की मुहरें जेब में भरकर कुम्हार तुला के पास आता और उसके सारे बर्तन खरीद लेता। सोहनी भी उसकी तरफ आकर्षित हो गई। वह सोहनी के पिता के घर में नौकर बनकर भैंसें चराने लगा। इस तरह उसका नाम महिवाल पड गया।

तुला को जब उनके प्रेम का पता चला तो उसने सोहनी को बिना बताए किसी कुम्हार से उसकी शादी कर दी। उसके बाद महिवाल अपना घर, देश भूलकर फकीर हो गया। मगर दोनों प्रेमियों ने मिलना न छोडा। रोज जब रात में सारी दुनिया सोती, सोहनी नदी के उस पार महिवाल का इंतजार करती, और वह नदी तैरकर उससे मिलने चला जाता। 

एक बार महिवाल बीमार हो गया तो सोहनी एक पक्के घड़े की मदद से तैरकर उससे रोज मिलने आने लगी। एक दिन उसकी ननद ने सोहनी को देख लिया तो उसने पक्के घड़े की जगह कच्चा घड़ा रख दिया। सोहनी घड़े द्वारा नदी पार करने लगी और डूबकर उसकी मौत हो गई। महिवाल उसे बचाने के लिए नदी में कूदा, वह भी डूब गया। इस तरह यह दुख भरी प्रेम कहानी ख़त्म हो गई।

शीरीं-फरहाद: फारस की पृष्ठभूमि में जन्मी इस कहानी का पात्र फरहाद एक शिल्पकार था, जो राजकुमारी शीरीं से बेइंतहा मुहब्बत करता था। लेकिन राजकुमारी शीरीं इस एकतरफा प्रेम से अनभिज्ञ थी। निराश फरहाद पहाड़ों में जाकर रहने लगा और बांसुरी पर राजकुमारी की तारीफ में धुनें बजाने लगा। जब यह बात शीरीं को मालूम हुई तो वह फरहाद से मिली और उसके प्रेम पर वारी न्यारी हो गई। 

उनकी बेटी एक आम युवक से शादी करे, शीरीं के पिता और राजा को यह कतई मंजूर नहीं था। आखिर उन्होंने अपनी बेटी के सामने शर्त रखी कि यदि फरहाद पहाडों के बीच चट्टानों में नहर खोद दे तो वह शीरीं का विवाह उससे कर देंगे। यह बेहद मुश्किल कार्य था, लेकिन फरहाद ने नहर खोदनी शुरू की। उसकी अथक मेहनत देखकर राजा को लगा कि कहीं फरहाद अपना लक्ष्य प्राप्त न कर ले।

जब नहर पूरी होने को थी तो राजा घबरा गए। वे अपने दरबारियों के साथ अपनी बेटी शीरीं के विवाह की खातिर मशविरा करने लगे। उनके वजीर ने उन्हें सलाह दी कि किसी बूढ़ी स्त्री को फरहाद के पास भेजा जाए और उसे यह झूठी ख़बर दी जाए कि जिस राजकुमारी को पाने के लिए वह पहाड़ों के बीच चट्टानों में नहर खोद रहा है उसकी मौत हो चुकी है। 

वजीर का आइडिया राजा को भ गया। उसने एक बूढ़ी स्त्री को फरहाद के पास भेजा। वह बूढ़ी फरहाद के पास गई और जोर-जोर से रोने लगी। फ रहाद ने उससे रोने का कारण पूछा तो बुढिय़ा ने कहा, तुम जिसके लिए अपने शरीर को खटा रहे हो-वह तो मर चुकी है। 

यह सुनकर फरहाद को इतना सदमा पहुंचा कि उसने अपने औजारों से खुद को मार लिया, नहर बन चुकी थी, मगर पानी की जगह उसमें फरहाद का लहू बह रहा था। फ रहाद की मौत की खबर सुनकर शीरीं ने भी खुद को खत्म कर लिया। इस तरह एक और प्रेम कहानी असमय मौत की गोद में सो गई।

सलीम-अनारकली: मुगल सम्राट अकबर के चहेते और बाबा फरीद के आशीर्वाद से जन्मे बेटे सलीम ने अनारकली से प्रेम किया। अनारकली एक मूर्तिकार की बेटी थी और बेहद खूबसूरत थी। अकबर इस प्रेम के खिलाफ थे। अनारकली के प्रेम में पागल शाहजादा सलीम ने अपने पिता के खिलाफ़ बग़ावत तक कर दी। कहा जाता है कि दरियादिल माने जाने वाले मुगल सम्राट ने अनारकली को जिं़दा दीवार में चिनवा दिया गया। मुगले-आजम जैसी फिल्म ने इस प्रेम कथा को अमर कर दिया।

रोमियो -जूलियट: ‘‘प्रिय जूलियट... तुम ही मेरी आखिरी आशा हो। वो लडक़ी जिसे मैं विश्व में सबसे ज्यादा प्यार करता था, मुझे छोडक़र चली गई है...।’’ यह उन तमाम पत्रों में से एक है, जो इटली के वेरोना स्थित पोस्ट ऑफि स में जूलियट के नाम आते हैं और जिन पर पते के स्थान पर केवल इतना लिखा होता है... ‘टू जूलियट वेरोना।’ 

इतने संक्षिप्त पते के बावजूद चिठ्ठियाँ  वहां पहुंच ही जाती हैं, जहां उन्हें पहुंचना चाहिए, यानी जूलियट के पास। ठीक पहचाना आपने, यह वही जूलियट है... विश्व विख्यात रचनाकार शेक्सपियर की अमर कृति रोमियो-जूलियट की नायिका। मगर, वह तो एक काल्पनिक पात्र है। 

शेक्सपियर की अनुपम कृति रोमियो-जूलियट की प्रेम दास्तान पर भरोसे के बूते ही दुनिया भर के प्रेम पीडि़त जूलियट के बुत के नाम आज भी पत्र लिखते हैं और उनके जवाब भी पाते हैं। यही तो है हम इन्सानों के धडक़ते नन्हे दिल के जिंदा होने का सबूत।

अचंभित होने की जरूरत नहीं है। प्रेम में जब इन्सान को खोने का अहसास होता है, तो वह उसे हासिल करने के लिए कोई कसर नहीं रहने देना चाहता। 

जूलियट तो फिर भी एक अमर हस्ती है, भले ही काल्पनिक ही क्यों न हो। दरअसल वेरोना दुनिया की शायद एकमात्र जगह है, जिसे प्रेम नगरी कहा जाता है। यह वही वेरोना नगर है, जिसे शेक्सपियर ने अपनी रचना रोमियो-जूलियट की पृष्ठभूमि बनाया था। यहां की हरेक चीज रोमियो-जूलिएट को समर्पित है। इस खूबसूरत नगरी को देखने दुनिया भर से हर साल कोई पांच लाख पर्यटक यहां आते हैं।

यहां पर एक दरगाह है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह जूलियट का मकबरा है एवं यहां पर लगी जूलियट की कांस्य प्रतिमा को छूकर लोग अपने प्रेम हेतु मन्नतें मांगते हैं। यह एक मिथ है, फिर भी लोगों को इस पर अटूट भरोसा है। इस भरोसे को बनाए रखने का श्रेय जाता है, वेरोना स्थित जूलियट क्लब को, जिन्होंने जूलियट को मिलने वाले इन बेशुमार पत्रों को आदर देने का संकल्प लिया हुआ है।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग तरह की परेशानियों से भरे पत्र इनके पास आते हैं, जिनका जवाब देने हेतु एक ऐसी टीम मौजूद है, जिसमें अनेक अनुवादक, मनोविज्ञानी आदि शामिल हैं। वे जानते हैं कि उनके पत्र लिखने से उन प्रेमियों की समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला, पर डूबते को तिनके का सहारा ही काफी होता है। 

इस लिहाज से जूलियट का पत्र पाकर प्रेम में निराश शख्स को कुछ तो सहारा मिलेगा ही। जूलियट क्लब के अध्यक्ष ग्यूलियो कहते हैं, ‘‘जूलियट क्लब को मिलने वाले ज्यादातर पत्र प्रेम का इजहार न कर पाने, दिल टूटने, साथी की तलाश जैसी कठिनाइयों के बारे में बताते हैं और इस ट्रेंड की ओर इशारा करते हैं कि अब लोग पहले से ज्यादा एकाकी और असुरक्षित महसूस करते हैं।’’
कहते हैं कि वेरोना को अपनी कथा की पृष्ठभूमि बनाने वाले शेक्सपियर कभी इटली गए ही नहीं थे। रोमियो-जुलियट लिखते समय उन्होंने आर्थर ब्रुक की एक कविता को अपनी कहानी का आधार बनाया था, जो तीस साल पहले प्रकाशित हुई थी।

दरअसल आस्था और तर्क में छत्तीस का आंकड़ा हमेशा से रहता आया है। आस्थावान प्रेमियों को वैज्ञानिक तर्कों से कोई लेना-देना नहीं। उनके लिए वेरोना एक तीर्थ है एवं जूलियट प्रेम की एक देवी है, जो उनकी मनोकामना पूर्ण कर सकने में सक्षम है। यह भरोसा आज भी बना हुआ है, क्योंकि प्रेम पर से भरोसा खत्म नहीं हुआ है।

वक्त बीत रहा है। ज़माने बदल रहे हैं। नई-नई पीढिय़ां आ रही हैं और पुरानी हो जा रही हैं लेकिन लैला-मजनूं,, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, शीरीं-फ रहाद, सलीम-अनारकली की कहानी हो या फिर रोमियो-जूलियट की दास्तान, इन कहानियों का जादू कभी कम नहीं हो सका है। हर जमाने, हर समाज और वक्त के बदलाव के हर पहिये के साथ-साथ घूम रही हैं ये प्रेम कहानियां।

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