शनिवार, 23 जनवरी 2010

अपने हिस्से का औरों को पिला देते थे फ़राज़

भारतीय उपमहाद्वीप के चोटी के शायरों में शुमार अहमद फ़राज़ साहब ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की बेहतरी की हिमायत की. 25 अगस्त 2008 को इस्लामाबाद में उन्होंने आख़िरी सांस ली. फ़राज़ साहब गुर्दे की बीमारी से पीड़ित थे.

संसद पर आतंकी हमले के बाद जब लंबे समय तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच रिश्ते ख़राब रहे और सन 2004 में रामपुर, उत्तर प्रदेश में हिंद-पाक दोस्ती के लिए अंतरष्ट्रीय मुशायरे का आयोजन किया गया तो सेहत ठीक न होने के बावजूद इस तरक्कीपसंद शायर (फ़राज़ साहब) ने उसमें शिरकत की. एक हफ्ते की हिंदुस्तान यात्रा में उन्होंने तीन-चार दिन दिल्ली में भी बिताये. इस दौरान उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हिंद-पाक संबंधों पर एक लेक्चर भी दिया था. उस मौके पर उनसे हुई अविस्मरणीय बातचीत हुई.

1 जुलाई 2004 की सुबह जब मुझे ख़बर मिली की फ़राज़ साहब रामपुर से दिल्ली लौटकर आ गए हैं तो ख़याल आया कि क्यों न आज अपने पसंदीदा शायर से मिल लिया जाए. नई दिल्ली में  इंडिया इन्टरनेशनल सेंटर के कमरा नंबर 29 में ठहरे हुए थे फ़राज़ साहब. झट से उन्हें फोन किया. तो उन्होंने अपनी ख़राब सेहत का हवाला देते हुए दिनभर कमरे में आराम फरमाने, देहली के दोस्तों से मिलने-जुलने और शाम की फ्लाइट से इस्लामाबाद लौट जाने की बात कही.

जल्दी-जल्दी तैयार होकर आई.आई.सी. पहुंचा. उनके कमरे में दाखिल हुआ. फ़राज़ साहब सोफे पर चुपचाप बैठे थे. अकेले थे और कुछ असहज लग रहे थे. कमरे का एयरकंडीशन भी ऑफ़ था. सामने पड़ी कुर्सी पर उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया. सोफे के सामने टेबल पर बिखरे थे कुछ काग़जात, फाइलें, डायरी आदि सामान, और एश ट्रे में सुलग रही थी सिगरेट. इन सबके बीच पड़ी  थी उर्दू की एक मोटी सी किताब. उसके कवर पेज पर फ़राज़ साहब की तस्वीर थी. मेरी निगाह को भांपते हुए उन्होंने बताया, "हमारी शायरी और नज्मों का यह कलेक्शन हमें परसों ही मिला है. इसे इस्लामाबाद के दोस्त पब्लीकेशन ने छापा है."

कट्टरपंथियों की धमकी और फतवे की वजह से अपनी जान बचाने की खातिर भागे-भागे फिरनेवाले और गुमनामी की ज़िन्दगी जीनेवाले हिन्दुस्तानी मूल के लेखक सलमान रुश्दी और पड़ोसी मुल्क बंगलादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन के अलावा अहमद फ़राज़ भारतीय उपमहाद्वीप के तीसरे ऐसे शायर थे जिन्हें देश में रहते हुए अपनी बेबाक कलम का खामियाजा भुगतना पड़ा था.

पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक़ शासनकाल में फौजी हुकूमत के ख़िलाफ़ कवितायें लिखने के एवज में सन 1982 में उन्हें वतन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. 5 साल लन्दन में बिताने क बाद सन 87 में वे पाकिस्तान लौट आए थे.
(शेष अगले अंक में........)

क्रिकेट, नेता, एक्टर - हर महफिल की शान.../ निदा फाजली


"क्रिकेट, नेता, एक्टर - हर महफिल की शान, स्कूलों में कैद है गालिब तेरा दीवान" - हमारे देश की मौजूदा हालत कुछ ऐसी ही है। क्रिकेट का खेल आज करोड़ों में घूम रहा है। दूसरी कलाएं भी बाजार का दामन थामकर फल-फूल रही है लेकिन शब्द और उसकी संस्कृति की कद्र दिन-ब-दिन कम होती जा रही है।


ऐसे माहौल में साहित्य और उसके सरोकारों की गंभीर बातें पढ़ने-सुनने में न किसी की रुचि है न किसी के पास फुरसत। जब साहित्य का ही महत्व नहीं रह जाएगा तो फिर साहित्यकारों की क्या जिम्मेदारी बनेगी। साहित्य की सबसे बड़ी खासियत कहें या दिक्कत यह है कि वह हमेशा जेनुइन सवाल पूछता है और राजनीति के सामने खतरा पैदा करता है।

आजादी के बाद भारत ने काफी तरक्की की है- यह एक सच है लेकिन यह तरक्की महानगरों और शहरों के मध्य और उच्च वर्ग तक सीमित है। इंडिया शाइनिंग का दूसरा सच यह है कि देश की तीन-चैथाई आबादी आज भी गरीबी और भूख से बेहाल है। हाल के दिनों में बेतहाशा बढ़ी महंगाई ने यहां के गरीब और आम आदमी का जीना दुश्वार कर दिया है।


तरक्की का झुनझुना बजानेवाले ज्यादा दूर न जाएं, अपने महानगर या शहर की झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवाल, मेहनत करनेवाले गरीब मजदूरों की हालत देखें कि आज के समय में वे किस मुश्किल हालात में जी रहे हैं। कामन मैन की हालत भी बहुत खराब है। यह अफसोस की बात है कि आजादी के इतने साल हो गए लेकिन यह आजादी भारत के चंद घरों तक ही सीमित है। इस तीन-चैथाई आबादी को यदि आजादी दिलाना चाहते हैं तो इसका एकमा़त्र उपाय है कि हम बहुत सारे अंबेडकर, गांधी, जेपी, विनोबा, ज्योति बसु सरीखे नेता पैदा करें।


नक्सलवाद के विरोध को मैं बेवकूफी मानता हूं। देश में शताब्दियों से आम आदमी का शोषण न हो रहा है। यदि वे आवाज उठा रहे हैं तो इसमें क्या गलती है। सरकार और दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को इस मसले पर सोचना चाहिए। 

नक्सलवाद का मसला सिर्फ सरकार और नक्सलवादियों के बीच का मसला नहीं है, जिस तरह इराक का मसला सिर्फ अमेरिका और सद्दाम हुसैन के बीच का मसला नहीं था और न है। अमेरिका के हमले के बाद वहां अब तक तीन लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।


भारत में भी नक्सलवाद सरकार और देश के आम आदमी के बीच का मसला है। दिक्कत यह है कि आज सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी अपनी दुकान चला रही हैं चाहे वह कांगेस पार्टी हो या मुलायम सिंह की पार्टी या कोई और पार्टी, हिंदुस्तान की आम जनता के दुख-दर्द और उसकी परेशानियों से किसी भी दल का कोई लेना-देना नहीं।


वामपंथियों से उम्मीद थी लेकिन सीपीआई और सीपीएम के विभाजन के बाद देश में लेफ्ट मूवमेंट पर असर पड़ा। यह विभाजन देश के लिए गलत था। ऐसे मुश्किल हालात में कामरेड ज्योति बसु लेफ्ट मूवमेंट के साथ ठीक उसी तरह खड़े रहे जिस तरह सज्जाद जहीर और मुल्कराज आनंद प्रोग्रेसिव मूवमेंट के साथ खड़े थे। 

आज कामरेड ज्योति बसु की मौत के साथ वामपंथी आंदोलन का वो गोल्डन कालखंड भी खत्म हो गया है। उनकी मौत के बाद लेफ्ट अब वो लेफ्ट नहीं रह गया है। कामरेड ज्योति बसु की मौत से एक पूरा युग खत्म हो गया है। वे भारत के एक ऐसे नेता थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आम आदमी की राजनीति करते हुए गुजार दी। 1996 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला था लेकिन उनकी पार्टी ने उन्हें बनने नहीं दिया। यदि उस वक्त उन्हें प्रधानमंत्री बनने दिया जाता तो मुल्क में आज लेफ्ट मूवमेंट का दूसरा रूप होता।


आज ज्योति बसु के इंतकाल के बाद जब मैं उनकी शख्सियत और उनके कामनमैन बेस्ड पालिटिकल कंसर्न पर गौर करता हूं तो मुझे लगता है कि वे आधुनिक भारत के इतिहास में महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के कद के नेता थे, बल्कि कई मायने में वे पंडित नेहरू से भी बड़े थे। वे महात्मा गांधी की तरह आम जनता के आदमी थे। पंडित नेहरू ने "डिस्कवरी आफ इंडिया" लिखी जिसका "भारत: एक खोज" नाम से अनुवाद हुआ। मैंने उस पर एक शेर लिखा था- "स्टेशन पर खत्म हुई भारत तेरी खोज, नेहरू ने लिखा नहीं कुली के सिर का बोझ।"


महात्मा गांधी कामन मैन के आदमी थे और पंडित नेहरू हिंदुस्तानी मिडिल क्लास के। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कामरेड ज्योति बसु लंदन में पढ़ाई करके हिंदुस्तान की राजनीति में आए और पूरी जिंदगी आम जनता को हक दिलाने की राजनीति करते रहे। मेरा एक शेर है- "कोई न हिंदू, न मुसलिम, न ईसाई है, सबने इन्सान बनने की कसम खाई है"- ये कसम महात्मा गांधी ने खाई थी और आखिरी दम तक उन्होंने इसे निभाया। उसके बाद इस राह पर कामरेड ज्योति बसु ही चले।


आज जब कामरेड ज्योति बसु हमारे बीच नहीं हैं तो मुझे मिर्जा गालिब का एक शेर याद आ रहा है। गालिब साहब का यह शेर बीसवीं सदी के इन्सान पर पुरजोर ढंग से लागू होता है, चाहे वो आम शख्स हो या खास। शेर है- "बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना।" मतलब यह कि हर कोई मां के पेट से आदमी के रूप में पैदा होता है लेकिन उनमें से कोई-कोई अपने जीवन संघर्ष से इन्सान बनता है। 

ज्योति बसु आदमी के रूप में पैदा हुए और इन्सान बनकर हमारे बीच से रुखसत हुए। पार्टी के सिद्धांत पर चलते हुए वे देश की आम जनता के दिलों की धड़कन बने रहे। जब भी भारत का इतिहास लिख जाएगा तो उनका नाम गोल्डन अक्षरों में लिखा जाएगा।
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित/23 जनवरी, 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

बुधवार, 20 जनवरी 2010

नई पीढ़ी पर बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी / विश्वनाथ त्रिपाठी

एक बुजुर्ग के पास अतीत होता है और एक नौजवान के पास भविष्य- मेरे हिसाब से नई और पुरानी पीढ़ी के बीच का सबसे बड़ा फ़र्क यही है। आज मैं 79 साल का हूँ। नौकरी से रिटायर हुए 16-17 साल हो चुके हैं। भले ही एक बुजुर्ग के रूप में ही सही मैं आज 21 वीं सदी के हिंदुस्तान में सुकून से रह रहा हूं। इसके लिए मैं अपने समाज और इतिहास का कृतज्ञ हूं। हां कभी-कभार वर्तमान को अतीत से जोड़कर देखता हूं तो नई पीढ़ी को देखकर हैरानी होती है। अपने अनुभव से मैं यह कह रहा हूं कि आज के मेधावी विधार्थी पहले के जीनियस विधार्थी से कहीं ज्यादा जानते हैं।


आज की नई पीढ़ी से मेरी एक गुजारिश है कि आज की नई पीढ़ी अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी को भी समझे। बड़े दुख के साथ मैं यह कह रहा हूं कि हमारी आज की नई पीढ़ी में सामाजिक ज़िम्मेदारी कम हो गई है। नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि इतिहास ने उसके कंधे पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी है। समाज में फैली कुरीतियों के ख़िलाफ इस पीढ़ी को खड़ा होना चाहिए। फ़िजूलखर्ची रोकना चाहिए और पैसे के दिखावे से बाज आना चाहिए।


पीछे पलटकर जब अपने अतीत को देखता हूं तो 60-61 साल पहले की स्मृतियां आखों के सामने आ जाती हैं। सन 1959 से मैं इस दिल्ली महानगर में रह रहा हूं। काशी विश्वविद्यालय से एमए करने के बाद मैंने एक साल नैनीताल में पढ़ाया। अक्टूबर 1959 को दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में मुझे लेक्चरर की नौकरी मिली। आज यह बताने में मुझे कोई संकोच नहीं होता कि जब मैं दिल्ली आने के बाद मैं अकेले में रोता था। खुद को अकेला महसूस करता था। इसकी एक वजह तो यह थी कि नैनीताल में मेरा मन लग गया था। नैनीताल ख़ूबसूरत शहर तो था ही वहां एक साल में ही विद्यार्थियों का मुझे बहुत प्यार मिला था।


नैनीताल और बनारस से दिल्ली बिल्कुल अलग थी। यहां के अध्यापकों के रहन-सहन और अमीरी ने मुझे सबसे ज़्यादा अचंभित किया। अमूमन अध्यापक लोग सादगीपूर्ण तरीक़े से रहना पसंद करते हैं लेकिन यहां के अध्यापक तब भी अच्छे-अच्छे कपड़े पहनते थे और उनके घरों में तमाम तरह की आधुनिक सुख-सुविधाएं दिखती थीं।


बनारस वाया नैनीताल होते हुए दिल्ली आए एक साधारण परिवार के 27 साल के युवक को अचंभित करने के लिए यह काफ़ी था। यहां शुरू-शुरू में कॉलेज के विधार्थी ही नहीं बल्कि शिक्षक लोग भी मुझे चिढ़ाते थे। खैर, साल पढ़ाने के बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में व्याख्याता के पद पर मेरा चयन हुआ। जहां साल पढ़ाने के बाद मैं रिटायर हुआ। आज जब उस जमाने को याद करता हूं तो बदलते दौर में कई अच्छाइयां और कई बुराइयां भी दिखती हैं।


वो नेहरू युग था। हर जगह नई-नई योजनाएं बन रही थीं। नए-नए कॉलेज, नए-नए विश्वविद्यालय, नई-नई अकादमियां बन रही थीं। उस वक्त के पढ़े-लिखे लोगों के जीवन में समाज और देश के प्रति कुछ मूल्य और कुछ आदर्श होते थे, आशाएं और आकांक्षाएं होती थीं। हम एक-दूसरे से प्रेरणा लेते थे। लेकिन आज के युवाओं के आत्मकेंद्रित व्यवहार को देखता हूं तो लगता है कि जमाना कितना बदल गया है। हां, स्त्री और दलित चेतना में आज के समय में जो बदलाव आया है यह काबिलेतारीफ़ है। (डॉ. त्रिपाठी दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त अध्यापक हैं और यह लेख शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित है / 21 जनवरी 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

अटल बिहारी वाजपेयी - सेक्स और राजनीति का रिश्ता

करोड़ों भारतीयों के अजीज हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दामन पर भी लगी हुई है दाग !

जी हाँ, यह कड़वा सच कोई वामपंथी नहीं बल्कि दक्षिणपंथी विचारधारा के ही एक दिग्गज महापुरुष बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा में लिखा है -

".....मुझे अटल बिहारी और नाना देशमुख की चारित्रिक दुर्बलताओं का ज्ञान हो चुका था। जगदीश प्र० माथुर ने मुझसे शिकायत की थी की अटल (बिहारी वाजपेयी) ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है. वहां नित्य नई-नई लड़कियाँ आती हैं। अब सर से पानी गुजरने लगा है। जनसंघ के वरिष्ठ नेता के नाते मैंने इस बात को नोटिस में लाने की हिम्मत की। मुझे अटल के चरित्र के विषय में कुछ जानकारी थी। पर बात इतनी बिगड़ चुकी है, ये मैं नहीं मानता था। मैंने अटल को अपने निवास पर बुलाया और बंद कमरे में उससे जगदीश माथुर द्वारा कही गई बातों के विषय में पूछा। उसने जो सफाई दी बात साफ़ हो गई। तब मैंने अटल (बिहारी वाजपेयी ) को सुझाव दिया कि वह विवाह कर ले अन्यथा वह बदनाम तो होगा ही, जनसंघ की छवि को भी धक्का लगेगा।....."
("ज़िन्दगी का सफ़र" - ३, पेज . 25 से उद्धृत )

सोमवार, 18 जनवरी 2010

दिल्लीवासियों में प्रतिरोध की क्षमता कम हो गई है / पूर्व ए.सी.पी. चौधरी अतर सिंह

आज से कोई 45 साल पहले मैंने दिल्ली पुलिस में बतौर थानेदार के रूप में ज्वाइन किया था। उस वक्त मैं दिल्ली से परिचित नहीं था। देहात से यहां आया था। यूपी में मेरठ जिले में मेरा गांव है। उस वक्त देश में नौकरी की इतनी मारामारी नहीं थी जितनी कि आजकल है। मैं हिस्ट्री में एमए कर रहा था। दिल्ली पुलिस में रिक्तियां निकलीं। मैंने उसमें दरख्वास्त दे दी और मुझे नौकरी मिल गई। उस वक्त ऐसा लगा जैसे पता नहीं मैंने क्या हासिल कर लिया है। दिल्ली में उस वक्त पुलिस ट्रेनिंग की कोई सुविधा नहीं थी। हमें फिल्लौर, जालंधर ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। वहां से लौटने के बाद नई दिल्ली में पार्लियामेंट थाने में पहली पोस्टिंग हुई।

उस वक्त पूरी दिल्ली में गो-हत्या के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था। उसकी रोकथाम के लिए दिल्ली पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। उसके बाद मैंने करीब 38-39 सालों तक विभिन्न वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अंदर विभ्न्नि पदों पर सेवा कीआखिर में ए.सी.पी. के पद पर रिटायर हुआ. लगभग चार दशक की पुलिस सेवा में कई ऐसे मौके आए जहां मुझे चुनौतिपूर्ण हालात का सामना करना पड़ा जैसे 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो मैं मालवीय नगर थाने में पुलिस इंस्पेक्टर था। सिख विरोधी दंगे के दौरान करीब पाच-छह दिनों तक लगातार हम चौबीसों घंटे ड्यूटी पर तैनात रहे।

उस दौरान घटा एक हादसा जो मुझे अभी याद आ रहा है. वो हादसा तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन पर हुआ था। आसपास के कुछ गांववाले रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन को रोककर कई मुसाफ़िरों को ज़िंदा जलाने की कोशिश कर रहे थे। जैसे ही हमें ख़बर मिली दिल्ली पुलिस के कई आला अधिकारियों के साथ हम मौक़े पर पहुंचे और हिंसा पर उतारू भीड़ को तितर-बितर किया, घायलों को अस्पताल पहुंचाया और कई लोगों की जान बचाई।

आज मुझे रिटायर हुए आठ साल हो चुके हैं। मुझे लगता है कि आज के नौजवानों की सोच आज काफी बदल गई है। हमारे वक्त में बच्चों और अभिभावकों की अपेक्षाएं कम होती थीं। आज काम भी बढ़ गया है और वेतन भी। महंगाई और खर्चे भी बढे़ हैं। वेस्टर्न कल्चर के असर ने हमारी नौजवान पीढ़ी को पूरी तरह जकड़ लिया है। आजकल का हर बच्चा हायर स्टडी करके मल्टीनेशनल कंपनियों में जॉब करना चाहता है। हमारे वक्त में सरकारी नौकरी का ही जलवा था। इसी तरह देख रहा हूं कि आज के हर मां-बाप अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं और पढ़ा भी रहे हैं।

कुछ इसी तरह का बदलाव समाज में भी देखने को मिल रहा है। आज की यंग जेनरेशन अपनी ज़िन्दगी अपने तरह से जीना चाहती है। इसका नतीजा हम सामूहिक परिवारों की टूट के रूप में हम देख रहे हैं। आधुनिक औरत को मैं इसके लिए ज़्यादा जिम्मेदार मानता हूं। हां इसका एक सकारात्मक असर यह हुआ है कि आज की स्त्रियां पहले की बनिस्बत ज्यादा जागरूक हुई हैं।

आए दिनों हिंसा की बढ़ती घटनाओं को देख-सुन कर मुझे काफी दिक्कत होती है। हमारे शहरों और महानगरों में एक ऐसा समाज बन चुका है जो अपने आप तक सिमटा रहना चाहता है। कोई किसी से बात नहीं करना चाहता। सामाजिक और राष्ट्रीय मसलों पर एक चुप्पी देखी जाती है उनमें। जबकि पहले बसों के किराये बदने, बिजली, पानी, दूध आदि की किल्लत होते ही लोग सड़क पर उतर आते थे।

हमारे वक्त में दिल्ली में आए दिनों धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि निकलते रहते थे और कानून-व्यवस्था को संभालने के लिए हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन अब लगता है कि जैसे आज के दिल्लीवासियों में प्रतिरोध की क्षमता कम हो गई है। यह सच है कि सन 84 के बाद दिल्ली सहित पूरे देश में आतंकवाद का ख़तरा बढ़ा है और इस कारण दिल्ली पुलिस के सामने इससे निपटने की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली,19.01.2010 प्रकाशित)

(चौ. अतर सिंह दिल्ली पुलिस के पूर्व .सी.पी. हैं और यह लेख शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित है)

रविवार, 17 जनवरी 2010

"बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना।" / निदा फाजली

कॉमरेड ज्योति बसु की मौत से एक पूरा युग गुजर गया है। अपनी पूरी जिंदगी उन्होंने आम आदमी की राजनीति करते हुए गुजार दी। 1996 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला था लेकिन उनकी पार्टी ने उन्हें बनने नहीं दिया।
यदि उस वक्त उन्हें प्रधानमंत्री बनने दिया जाता तो मुल्क में आज लेफ्ट मूवमेंट का दूसरा रूप होता। यह एक बड़ा सच है कि सीपीआई और सीपीएम के विभाजन के बाद मुल्क में लेफ्ट मूवमेंट कमजोर हुआ। ऐसे मुश्किल हालात में
कॉमरेड बसु लेफ्ट मूवमेंट के साथ ठीक उसी तरह खड़ेरहे जिस तरह सज्जाद जहीर और मुल्कराज आनंदप्रोग्रेसिव मूवमेंट के साथ खड़े रहे। आज उनके इंतकाल के बाद जब मैं उनकी शख्सियत और उनके कॉमनमैन बेस्ड पौलिटिकल कंसर्न पर गौर करता हूं तो मुझे लगता है कि आधुनिक हिंदुस्तान के इतिहास में महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के कद के नेता थे कॉमरेड ज्याति बसु, बल्कि कई मायने में वे पंडित नेहरू से भी बड़े थे। ज्योति बसु गांधी की तरह आम जनता के आदमी थे। पंडित नेहरू ने "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" लिखी जिसका "भारत: एक खोज" नाम से अनुवाद हुआ। मैंने उस पर एक शेर लिखा था- "स्टेशन पर खत्म हुई भारत तेरी खोज, नेहरू ने लिखा नहीं कुली के सिर का बोझ।"
दरअसल महात्मा गांधी कॉमन मैन के आदमी थे, पंडित नेहरू हिंदुस्तानी मिडिल क्लास के आदमी थे लेकिन कॉमरेड ज्याति बसु लंदन में पढ़ाई करके हिन्दुस्तान की राजनीति में आए और पूरी जिंदगी आम जनता को हक दिलाने की राजनीति करते रहे। मेरा एक शेर है- "कोई न हिंदू, न मुसलिम, न ईसाई है, सबने इन्सान बनने की कसम खाई है"- ये कसम महात्मा गांधी ने खाई थी और आखिरी दम तक उन्होंने इसे निभाया। उसके बाद इस राह पर कॉमरेड बसु ही चले।
आज जब कॉमरेड बसु हमारे बीच नहीं हैं तो मुझे मिर्जा गालिब का एक शेर याद आ रहा है। गालिब साहब का यह शेर बीसवीं सदी के इन्सान पर पुरजोर ढंग से लागू होता है, चाहे वो आम षख्स हो या खास। शेर है- "बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना।" मतलब यह कि हर कोई मां के पेट से आदमी के रूप में पैदा होता है लेकिन उनमें से कोई-कोई अपने जीवन संघर्ष से वह इन्सान बनता है। ज्योति बसु आदमी के रूप में पैदा हुए और इन्सान बनकर आज हमारे बीच से रुखसत हुए। पार्टी के सिद्धांत पर चलते हुए वे देश की आम जनता के दिलों की धड़कन बने रहे। जब भी भारत का इतिहास लिख जाएगा तो उनका नाम गोल्डन अक्षरों में लिख जाएगा।
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

आज का बाजार और लेखक समाज / प्रो0 असगर वजाहत

लेखक को अपने समय में समाज की समस्याओं पर पैनी निगाह रखना चाहिए और आम आदमी के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। यदि लेखक और समाज के बीच ऐसा कोई रिश्ता या तारतम्य आज बनता है तो वह निश्चित रूप से हमारे देश के लिए लाभदायक होगा। इस लिहाज से जब मैं आज के हिंदी-उर्दू लेखन और देश की सबसे बड़ी साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी की तरफ देखता हूं तो मायूसी होती है। हमारा आज का साहित्य मध्य वर्ग तक सीमित होकर रह गया है। ऐसा साहित्य नहीं लिखा जा रहा है जो मध्य वर्ग को कोई नई या सार्थक सोच दे सके। आज के हालात के समानांतर प्रतिरोधी दृष्टि विकसित करने में चुक गए हैं हम। अपनी आस-पास की दुनिया में हो रहे टूट-फूट पर ही हमारी कलम चल रही है। नई दुनिया रचने का काम हम नहीं कर रहे हैं।

आज के वक्त के बहुत बड़े सवालों से हमारा समकालीन हिंदी लेखन जूझ रहा है- ऐसा मुझे नहीं लगता। चाहे दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श का मुद्दा। हमारे साहित्य में भी इसे एक राजनीतिक मुद्दे की तरह उठाया जा रहा है, एक सामाजिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दे की तरह नहीं। स्त्री विमर्श एक हमारे पुरुषप्रधान भारतीय समाज के लिए एक ज्वलंत मुद्दा था, उसकी परिणति क्या हुई। स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ भड़काउ, कुछ स्त्री देह और भोग की कहानियां ही लिखी गईं। इसका सबसे बुरा असर नई पीढ़ी के लेखकों पर पड़ा। उन्हें लगा कि इसी तरह की कहानी लिखेंगे तभी वह छपेगी। इस तरह हमारे मध्यवर्गीय संपादकों ने स्त्री विमर्श को एक गंभीर मुद्दा बनाकर छोड़ दिया। दरअसल, मैं स्त्रियों और दलितों के मुद्दे को राजनीतिक नहीं, एक सामाजिक-आर्थिक समस्या के रूप में देखता हूं। इन पर राजनीति करने की जरूरत नहीं। इससे खतरा पैदा हो जाएगा। ये मुद्दे यदि हमारे समाज के लिए कंसर्न बनते हैं तो यह काबिलेतरीफ होगा। आज हमारे कुछ मध्यवर्गीय लेखक भी बाज़ार समर्थक हो गए हैं। यह एक अलग तरह का चिंताजनक मसला है। मथुरा या अलीगढ़ के जिस बाज़ार को देखते हुए हम बड़े हुए आज का बाज़ार वो बाज़ार नहीं है। आज का बाज़ार अपनी शर्तों पर सामान बेच रहा है। यह बायर्स मार्केट नहीं है सिर्फ सेलर्स मार्केट है। अपने माल बेचने के लिए वह हिंदी प्रदेश में हिंदी भाषा और साहित्य का प्रचार कर रहा है। प्रकाशक भी यदि कोई किताब छाप रहा है तो इसलिए कि उसे मुनाफा हो रहा है। पूरी दुनिया में आज जो बाज़ार फैला हुआ है वह साम्राज्यवादी बाजार है। ख़रीदार के साथ इस बाज़ार का बराबरी का कोई रिश्ता नहीं है। यह इतना आक्रामक है कि यह हमारे देश की नीतियां बदलवाने की क्षमता रखता है। आज हमारे यहाँ सरकारी नीतियां बाजार और बिचैलियों के पक्ष में ही बन रही हैं, आम आदमी के पक्ष में नहीं। यह बाज़ार आम इंसान का सबकुछ छीनकर उसे सड़क पर खड़ा कर देता है। यदि यह बाज़ार आम आदमी के पक्ष में होता तो ग़रीब लोग आज ठंड से मर नहीं रहे होते।

जहां तक साहित्य अकादमी का सवाल है तो पहले से ही वह देश के लेखकों और बुद्धिजीवियों की आकांक्षाएं पूरी नहीं कर रही थी, अब तो इसे बाज़ार में खड़ा किया जा रहा है। भारतीय साहित्य को सामने लाना इस संस्था का उद्येश्य था। उसमें वह पूरी तरह विफल रही। वहां से साल में दस-पंद्रह किताबें मुश्किल से छपती हैं। उनका भी सही ढंग से वितरण नहीं होता। दिक्कत यह है कि वहां सारे निर्णय बिकाउ संस्कृति के आधार पर लिए जा रहे हैं। मुझे लगता है साहित्य अकादमी चापलूस अफसरशाहों के गिरोह का अड्डा बनकर रह गयी है। धोखाधड़ी की राजनीति जाननेवाले लेखकों के कुछ दलाल लोग आज अकादमी में सक्रिय हैं, जो वहां की जोड़-तोड़ में माहिर हैं। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि यह संस्था साहित्य, कला और लेखक विरोधी काम कर रही है। यह बहुत दुखद है और इसका विरोध होना चाहिए। पूरे देश के लेखक मिलकर इस पर विचार करें कि जो साहित्य अकादमी लेखकों और बुद्धिजीवियों के सरोकारों के लिए बनाई गई थी उसका यह हश्र क्यों हुआ, कौन लोग ऐसा कर रहे हैं और इसे कैसे रोका जाना चाहिए। लेकिन अफसोस की बात है कि हमारे देश के लेखक बड़े दुर्बल, निष्क्रिय और संतोषी हैं। वे हस्तक्षेप ही नहीं करते। हमारे यहां के लेखकों की बिरादरी ऐसी है कि वह तटस्थ भाव से अन्याय देखती और सहती रहती है। आज के चिंताजनक माहौल में अजीब बात है कि लेखक संगठनों और अकादमियों में लेखकों की सक्रियता लगभग शून्य हो गई है। पिछले दिनों नक्सलवाद बनाम सरकार विषय पर खूब बहस हुई। इस मसले पर मेरा मानना है कि हमारे यहां की सत्ताधारी शक्तियां अंधी और बहरी हो गई हैं। ये देश का और भारतीय जनता का सबसे ज्यादा अहित कर रही हैं। गौर से देखने पर पता चलेगा कि जितना देशद्रोही सत्ता है उतना कोई नहीं। अभी ठिठुरती ठंड में एमसीडी ने दिल्ली में कई रैनबसेरों को तोड़ दिया। जब इसका विरोध हुआ तो फिर बनाया। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि देश की सबसे बड़ी दुश्मन सत्ता है। जो लोग इसको चुनौती दे रहे हैं उन्हें देशद्रोही कह दिया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे अंग्रजी साम्राज्यवाद के दौर में होता था। इस हिसाब से अंग्रेजों के शासन से अलग हमारी सत्ता नहीं है। आज देश में आम आदमी की जो दशा है उसे देखते हुए कौन देशद्रोही है और कौन देशभक्त - यह समझना जरूरी है। दरअसल, लंबे समय तक बना हुआ असंतोष विरोध के रूप में सामने आता है। और जब इस विरोध को दबाया जाता है तो वह और आक्रामक हो जाता है। आज हमारे देश की सरकार नक्सलवाद को खत्म करना चाह रही है। वह नक्सल प्रभावित इलाकों में सेना भेजेगी। 50-60 हजार लोग मारे जाएंगे। देश की आम जनता से आज की सत्ता और राजनीति से जुड़ी किसी भी ताकत का कोई लेना-देना नहीं है। यह अफसोसनाक बात है। ऐसे समय में लेखकों और बुद्धिजीवियों की भूमिका अहम हो जाती है। हमें आगे आना होगा। (लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली में प्रोफेसर हैं। यह लेख शशिकांत के साथ बातचीत के आधार पर लिखा गया है.)
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली,16.01.2010 प्रकाशित)

बुधवार, 13 जनवरी 2010

बदलाव के साथ बुजुर्गियत / रमण दत्ता

उम्र के छियासठवें साल में जी रहे इंसान के पास अपनी बीती ज़िन्दगी को याद कर उन्हें दोबारा जीने का वक्त ही वक्त होता है। सुबह या शाम को घर के पिछवाड़े के पार्क में घंटे भर की सैर, कुछ सोशल वर्क, फेंगसुई पर अंगेजी के एक अख़बार में साप्ताहिक कॉलम और घर के कुछ छोटे-मोटे काम - सर्विस से रिटायरमेंट के बाद का मेरा वक्तकुछ यूं ही कट रहा है। ज़िंदगी के इस मुकाम पर आज जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूं और आज के ज़माने की अपने जमाने से तुलना करता हूं तो लगता है जैसे मैं किसी और दुनिया में आ गया हूं। हमारी आज की नई जेनरेशन में इतनी जागरूकता आ गई है कि उन्हें देखकर कभी-कभी हैरानी होती है।

आज आम लोग भी जागरूक हो गए हैं, हमारे वक्त के अच्छे पढ़े-लिखे लागों से कहीं ज्यादा। एक चीज मुझे ख़ास दिखती है कि ज़िंदगी और करियर के प्रति आज के बच्चों का नज़रिया काफी बदल चुका है। शायद इसकी वजह आज का बदला हुआ माहौल है। पैसे में बड़ी ताकत होती है और टेक्नोलॉजी में भी। टेलिविजन, फिल्में, सीरियल्स, कम्प्यूटर आदि की इस बदलाव में बड़ी भूमिका रही है। एक पिता के नाते इस बदलाव को मैं अपने घर-परिवार में भी महसूस करता हूं। लेकिन मेरी खुशकिस्मती है कि मेरी दोनों बेटियां मेरा खूब ख़याल रखती हैं। इसकी बड़ी वजह शायद यह है कि मैं उनके साथ परंपरागत पिता की तरह नहीं बल्कि एक अच्छे दोस्त के रूप में पेष आता हूं। छोटी बेटी को बाइस-तेइस साल की उम्र में ही पढ़ाई के बाद एक अच्छी जॉब मिल गई। बड़ी बेटी भी मुंबई में जॉब करती है।


एक रोचक वाक़या है- जब मेरी दूसरी बेटी हुई तो मेरी एक रिश्तेदार ने अस्पताल में ही नाक-भौं सिकोड़ना शुरू कर दिया। उस वक्त मुझे उन पर बहुत गुस्सा आया। आज जब सीरियलों में और आस-पास सास-बहू के झगड़े देखता-सुनता हूं तो खुशी होती है कि चलो न रहा बांस न बजी बांसुरी। वैसे भी आज के डेट में मां-बाप की देखभाल के लिहाज से बेटियां बेटों से बेहतर हैं। हां, इसके लिए ज़रूरी है मां-बाप को न्यू जेनरेशन के हिसाब से ख़ुद को बदलना। अगर आप नहीं बदलेंगे तो ऑटो एक्सपो में लगे विंटेज कार की तरह महज शो पीस बनकर रह जाएंगे और फ्रस्टेशन होगा सो अलग।


हमारी उम्र के कुछ लोग आज नई जेनरेशन के बारे में नेगेटिव ख़याल रखते हैं। मेरा मानना है कि आज के बच्चे प्रतिस्पर्धा के इस माहौल में भी अपनी इन्नोसेसी को बचाए हुए हैं। दरअसल ज़माना कोई भी हो इंसान बुरा नहीं होता, हालात बना देता है। किसी ख़ास परिस्थिति में बच्चे बदल जाते हैं, बहक जाते हैं।


जहां तक नेचर ऑफ़ जॉब का सवाल है तो उसमें हमारे ज़माने से आज के जमाने में भारी तब्दिली आई है। हमारे टाइम में दस से पांच का वक्त दफ्तर के लिए होता था, बाकी वक्त लोग अपने परिवार के साथ गुज़ारते थे। आज मोबाइल, लैपटॉप, इंटरनेट और 24 आवर सर्विस ने जॉब आवर के परंपरागत ढांचे को ही तोड़ दिया है। आज हमारे बच्चे घर पर रहकर भी परिवार के साथ तसल्ली से नहीं रहते, क्योंकि दफ्तर से बराबर उन्हें कॉल्स आती रहती हैं। लेकिन इसका एक फायदा भी हुआ है कि अब परिवार में झगड़े कम हो गए हैं। भारी कॉल्स कौम्पिटीशन के इस दौर में आज के बच्चे अक्सर देर रात को दफ्तर से लौटते हैं। दिमागी और शारीरिक स्तर पर इतने थक जाते हैं कि उनके पास लड़ने-झगड़ने की न तो क्षमता होती है न वक्त।


कुल मिलाकर, देखा जाय तो साहब बदलाव तो प्रकृति का नियम है - हम-आप चाहें या न चाहें। हर नई जेनरेशन अपने जमाने के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेती है। दिक्क़त पुराने ख़याल के उन लोगों को होती है जो इस बदलाव से मुंह मोड़ते हैं।

(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

शनिवार, 9 जनवरी 2010

समय और समाज का यथार्थ / उदय प्रकाश

अच्छा लिखना जीवन जीने की तरह है। हिंदी ही नहीं किसी भी भाषा में लिखी गई कहानियों की जड़ें यथार्थ में होती हैं। लेखक चाहे कितना ही बड़ा स्वप्नजीवी क्यों न हो, यथार्थ से जुड़कर ही श्रेष्ठ कहानियां लिख सकता है। किसी भी लेखक के लिए उसका पाठक वर्ग महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई लेखक अच्छा लिख रहा है तो इसका काफी हदतक श्रेय उसके पाठकों को दिया जाना चाहिए।

हिंदी भाषा की एक ख़ास तरह की सांस्कृतिक बनावट है। हमारे समाज और हमारी भाषा में भी जातिवाद और सांप्रदायिकता है। भाषा में जितना तीव्र संघर्ष होता है समाज में हमें दूसरे स्तर पर उन्हें झेलना पड़ता है। 'मोहनदास' कहानी मैंने बहुत डिप्रेशन की स्थिति में गांव में रहकर लिखा। पिछले साल उस पर फिल्म भी बनी। मोहनदास कोई कल्पित पात्र नहीं है। मेरे गांव से छह-सात किलोमीटर बगल में बसोर जाति के एक युवक की सच्ची दास्तान है यह कहानी।

आज का एक सच यह है कि जिसके पास ताकत नहीं है वह अपनी अस्मिता तक नहीं बचा सकता। इन्सान की बहुत सारी आकांक्षाएं होती हैं लेकिन जब उसके साथ घोर अन्याय होता है तो वह न्याय चाहता है। उसकी यह आकांक्षा कभी नहीं मरती। अच्छी कहानी कुछ इसी तरह की चिंताओं से उपजती हैं, उसके पात्र भी वहीं से आते हैं। मैं यह नहीं मानता कि 285 मिलियन इंडिया ही भारत है। बड़े षहरों से बाहर निकलकर देखिए! वहां भयानक अंधेरा है। गांववालों के दुख की बातें आज कौन कर रहा है। टीवी और अखबार वाले भी नहीं। हमारे यहां आज जोर-शोर से शहरीकरण हो रहा है, मॉल बनाए जा रहे हैं और इन सबके लिए धड़ल्ले से जंगल काटे जा रहे हैं। इस पर आज हम सबको मिलकर सोचना चाहिए। यह 'हिंद स्वराज' का 100 वां वर्ष है।

मेरा मानना है कि पाठक को ध्यान में रखकर कोई लेखक नहीं लिखता, अपने समय की संवेदना को ध्यान में रखकर लिखता है और वही पढ़ा जाता है। कृत्रिम लेखन को आप कुछ लोग आपस में मिलकर चाहे कितना ही ब्रह्म बना लें आपको पाठक नहीं मिलेगा। लेखन एक कला है और कलाएं युनिवर्सल होती हैं। वे अपने समय में सक्रिय तमाम तरह की सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं। विचार या कलाएं किसी व्यक्ति या जगह विषेष की नहीं होतीं। वे हर जगह और हर किसी के लिए होती हैं।

आज के समय में सिर्फ पूंजी का ही ग्लोबलाइजेशन नहीं हो रहा है बल्कि गरीबी, भूख, बीमारियों का भी हो रहा है। ईश्वर ने लेखक को एक ऐसा प्राणी बनाया है जो वहीं रहता है जहां वह दुख देखता है। लेकिन इसके बावजूद विडंबना यह है कि एक लेखक को अपनी जगह बचाए रखने के लिए इस दुनिया में काफी संघर्ष करना पड़ता है। मैंने अपनी कहानियों में आज के समय के जटिल यथार्थ को कहने की कोशिश की है। कभी कभार कहानियां तात्कालिक घटनाओं को आधार बनाकर भी लिखी जाती हैं। क्योंकि कुछ सच तत्काल कह देना चाहिए। लेखक नहीं कहेगा तो कोई नहीं कहेगा। शमशेर, मुक्तिबोध जैसे रचनाकार आज इसलिए हमारी स्मृति में जिंदा हैं क्योंकि वे बहुत संवेदनशील थे। इसीलिए मैंने ष्मोहनदासष् कहानी में शमशेर बहादुर सिंह को जज और गजानन माधव मुक्तिबोध को पुलिस अफसर बनाया है।

दरअसल यह सभ्यता एक ऐसे दौर में है जहां पावर ही सबकुछ है। सारा का सारा तंत्र उसी के इर्दगिर्द सिमटकर रह गया है। ऐसे समय में आम आदमी की जिंदगी बहुत कठिन हो गई है। इराक में एक भयानक झूठ के कारण करीब 15 लाख लोग मारे गए। इसका कौन जवाब देगा।

लेखक का सरोकार अपने समय और उस समय के आम मनुष्य के प्रति होता है। इन्हीं के प्रति वह प्रतिबद्ध होता है। राजनीति को भी होना चाहिए लेकिन सन 1980 के बाद हमारे यहां पावर लगातार करप्ट होता चला गया। दरअसल मनुष्य में कई तरह की कमजोरियां होती हैं। किसी विचारधारा में अब वह क्षमता रही नहीं। लगभग सारी की सारी विचारधाराएं पावर और सत्ता हथियाने का जरिया बन चुकी हैं। जबकि टेक्नोलॉजी एक ताकतवर माध्यम बनकर उभरा है। जो काम आज राजनीति नहीं कर सकती वह टेक्नोलॉजी कर रही है। आम आदमी तक पहुंच रही है।

हम तकनीक के एक नए दौर में पहुंच गए हैं। आज आपके भीतर यदि थोड़ी सी भी संवेदनशीलता है तो आप एक मामूली सी तितली की मौत पर विनाश का महाआख्यान लिख सकते हैं। लेकिन हम एक ऐसे वक्त में रह रहे हैं जहां मनुष्य के अंदर की मासूमियत खत्म होती जा रही है। ऐसे कठिन समय में लिखना कठिन हो गया है।

एक लेखक को अपने समय और समाज के यथार्थ को समझने के लिए यंत्रणाओं के भीतर से होकर गुजरना पड़ता है। जब आप अपने घर, परिवार से अलग बहुत तरह की सुरक्षाओं से वंचित होते हैं तभी आप अपने आसपास के समाज को सही झंग से जान पाते हैं। आप जहां रह रहे होते हैं, यह दुनिया आपको वहीं से दिखाई देती है। दुनिया के महान से महान लेखक ने अपने समय और अपनी जगह से ही दुनिया को देखकर लिखा है।
(9 जनवरी, 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित)

दौलतपरस्ती बनाम सादगी

'आग का दरिया ', 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो'.... सरीखी पोपुलर कृतियों की लेखिका महरूमा कुर्रतुल ऐन हैदर दौलतपरस्ती और उसके भौंडे प्रदर्शन को बेहद नापसंद करती थीं। हालांकि यह सच था कि वह ख़ुद एक रईस ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती थीं। बावजूद इसके इस तरह की हरक़त उनपर नागवार गुजरती थी। इसे वह 'बेवकूफ़ाना हरक़त' कहती थीं।

दरअसल उनकी इस सोच की वजह थी सामाजिक सरोकारों के प्रति उनका ख़ास रिश्ता अपने साक्षात्कारों में ग्लोबलाइजेशन के दौर में मुल्क के अंदर पैदा हुए नवदौलतियों की भर्त्सना करते हुए वह इनकी तुलना मुल्क के कुछ पुराने ख़ानदानी रईसों से करती थीं जो अथाह दौलतमंद होने के बावजूद सादगी से रहना पसंद करते थे और दौलत का कभी भौंडा प्रदर्शन नहीं करते थे। इस सिलसिले में वह स्व0 इंदिरा गांधी से जुड़ा अपना एक संस्मरण जरूर सुनाती थीं, जब इंदिरा जी ने मोलभाव करते हुए सौदा न पटने पर पसंद की हुई शॉल आखिरकार दुकानदार को लौटा दी थी।

आज न कुर्रतुल ऐन हैदर हमारे बीच हैं और न इंदिरा गांधी, लेकिन सामाजिक सरोकार से जुड़े उनके ये संस्मरण आज हमारे लिए बेहद अहमियत रखते हैं। क़ाश, हमारे नवदौलतिये इसे नजीर समझें और अपने गिरेबां में झांककर अपनी बेवकूफ़ाना हरक़तों से बाज आयें।
(9 जनवरी, 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित)