सोमवार, 18 जनवरी 2010

दिल्लीवासियों में प्रतिरोध की क्षमता कम हो गई है / पूर्व ए.सी.पी. चौधरी अतर सिंह

आज से कोई 45 साल पहले मैंने दिल्ली पुलिस में बतौर थानेदार के रूप में ज्वाइन किया था। उस वक्त मैं दिल्ली से परिचित नहीं था। देहात से यहां आया था। यूपी में मेरठ जिले में मेरा गांव है। उस वक्त देश में नौकरी की इतनी मारामारी नहीं थी जितनी कि आजकल है। मैं हिस्ट्री में एमए कर रहा था। दिल्ली पुलिस में रिक्तियां निकलीं। मैंने उसमें दरख्वास्त दे दी और मुझे नौकरी मिल गई। उस वक्त ऐसा लगा जैसे पता नहीं मैंने क्या हासिल कर लिया है। दिल्ली में उस वक्त पुलिस ट्रेनिंग की कोई सुविधा नहीं थी। हमें फिल्लौर, जालंधर ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। वहां से लौटने के बाद नई दिल्ली में पार्लियामेंट थाने में पहली पोस्टिंग हुई।

उस वक्त पूरी दिल्ली में गो-हत्या के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था। उसकी रोकथाम के लिए दिल्ली पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। उसके बाद मैंने करीब 38-39 सालों तक विभिन्न वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अंदर विभ्न्नि पदों पर सेवा कीआखिर में ए.सी.पी. के पद पर रिटायर हुआ. लगभग चार दशक की पुलिस सेवा में कई ऐसे मौके आए जहां मुझे चुनौतिपूर्ण हालात का सामना करना पड़ा जैसे 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो मैं मालवीय नगर थाने में पुलिस इंस्पेक्टर था। सिख विरोधी दंगे के दौरान करीब पाच-छह दिनों तक लगातार हम चौबीसों घंटे ड्यूटी पर तैनात रहे।

उस दौरान घटा एक हादसा जो मुझे अभी याद आ रहा है. वो हादसा तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन पर हुआ था। आसपास के कुछ गांववाले रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन को रोककर कई मुसाफ़िरों को ज़िंदा जलाने की कोशिश कर रहे थे। जैसे ही हमें ख़बर मिली दिल्ली पुलिस के कई आला अधिकारियों के साथ हम मौक़े पर पहुंचे और हिंसा पर उतारू भीड़ को तितर-बितर किया, घायलों को अस्पताल पहुंचाया और कई लोगों की जान बचाई।

आज मुझे रिटायर हुए आठ साल हो चुके हैं। मुझे लगता है कि आज के नौजवानों की सोच आज काफी बदल गई है। हमारे वक्त में बच्चों और अभिभावकों की अपेक्षाएं कम होती थीं। आज काम भी बढ़ गया है और वेतन भी। महंगाई और खर्चे भी बढे़ हैं। वेस्टर्न कल्चर के असर ने हमारी नौजवान पीढ़ी को पूरी तरह जकड़ लिया है। आजकल का हर बच्चा हायर स्टडी करके मल्टीनेशनल कंपनियों में जॉब करना चाहता है। हमारे वक्त में सरकारी नौकरी का ही जलवा था। इसी तरह देख रहा हूं कि आज के हर मां-बाप अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं और पढ़ा भी रहे हैं।

कुछ इसी तरह का बदलाव समाज में भी देखने को मिल रहा है। आज की यंग जेनरेशन अपनी ज़िन्दगी अपने तरह से जीना चाहती है। इसका नतीजा हम सामूहिक परिवारों की टूट के रूप में हम देख रहे हैं। आधुनिक औरत को मैं इसके लिए ज़्यादा जिम्मेदार मानता हूं। हां इसका एक सकारात्मक असर यह हुआ है कि आज की स्त्रियां पहले की बनिस्बत ज्यादा जागरूक हुई हैं।

आए दिनों हिंसा की बढ़ती घटनाओं को देख-सुन कर मुझे काफी दिक्कत होती है। हमारे शहरों और महानगरों में एक ऐसा समाज बन चुका है जो अपने आप तक सिमटा रहना चाहता है। कोई किसी से बात नहीं करना चाहता। सामाजिक और राष्ट्रीय मसलों पर एक चुप्पी देखी जाती है उनमें। जबकि पहले बसों के किराये बदने, बिजली, पानी, दूध आदि की किल्लत होते ही लोग सड़क पर उतर आते थे।

हमारे वक्त में दिल्ली में आए दिनों धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि निकलते रहते थे और कानून-व्यवस्था को संभालने के लिए हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन अब लगता है कि जैसे आज के दिल्लीवासियों में प्रतिरोध की क्षमता कम हो गई है। यह सच है कि सन 84 के बाद दिल्ली सहित पूरे देश में आतंकवाद का ख़तरा बढ़ा है और इस कारण दिल्ली पुलिस के सामने इससे निपटने की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली,19.01.2010 प्रकाशित)

(चौ. अतर सिंह दिल्ली पुलिस के पूर्व .सी.पी. हैं और यह लेख शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित है)

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