बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

हमारे अनुरूप ही है त्योहार का यह दिखावा : पवन के वर्मा


पवन के वर्मा

भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी  पवन के वर्मा भारतीय मध्यवर्ग के विशेषज्ञ हैं. 'द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' उनकी बहुचर्चित किताब है. पवन जी इन दिनों भूटान में भारत के राजदूत हैं. पवन जी का मानना है कि दीपावली को तड़क-भड़क का पर्व मध्य वर्ग ने बनाया है, बाज़ार ने तो बस इसमें सहयोग दिया है. आज 26 अक्टूबर 2011 को दीपावली के अवसर पर दैनिक हिंदुस्तान में पढ़िए पवन के वर्मा के साथ शशिकांत की बातचीत पर आधारित यह लेख. - शशिकांत 


हमारे अनुरूप ही है त्योहार का यह दिखावा

  • पवन के वर्मा

(लेखक भूटान में भारत के राजदूत हैं)

आज हमारे देश में दीपावली समृद्धि, सम्पन्नता और दिखावे का त्योहार बन गयी है। होली, दीपावली, दशहरा आदि पर्व-त्योहार प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाए जाते रहे हैं। चूंकि आज कुछ लोगों के पास ज्यादा पैसे आ गए हैं इसलिए इस तरह के धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सवों या कहें पर्व-त्योहारों में पैसे के साथ-साथ दिखावा ज्यादा होने लगा है। त्योहारों के अवसर पर कुछ लोगों में होड़ रहती है कि इस प्रदर्शन में कौन अव्वल रहता है। सन 1991 के बाद एक ख़ास तबके में यह बदलाव ख़ासतौर से आया है। 

दरअसल दिखावे कि इस पृवृत्ति पर उंगली उठाने से पहले हम यह भूल जाते हैं कि नैतिकता अपनी जगह है और हमारा व्यवहार अपनी जगह। दरअसल हमारे देश में संवेदनशीलता का अभाव है। हम सिर्फ त्योहारों को ही क्यों देखते हैं। हमारे देश के विशाल मध्यवर्ग में जिस पैमाने पर शादियों और पार्टियों में ख़र्च बढ़ रहे हैं वह क्या है? देश के महानगरों और शहरों में बाजारों की चकाचौंध को देख कर लगता ही नहीं कि देश में इतनी बड़ी संख्या में ग़रीब लोग हैं।

सच पूछा जाए तो इस तरह के गैर जिम्मेदाराना व्यवहारों के बीज हमारी परम्परा में ही रहे हैं. हाँ इंडिविजुअलिस्टिक लोग हैं जो मानते हैं कि हर इंसान का अपना कर्म है और उसी के हिसाब से वह जीवन भुगतेगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस सन्दर्भ में हमें भारतीय परम्परा की भी जांच-पड़ताल करनी पड़ेगी। पीछे मुड़कर देखें तो पहले भी हमारे देश के लोगों का सामाजिक व्यवहार कोई आइडिअल नहीं था। हमारे यहाँ की वर्णाश्रम व्यवस्था इसकी मिसाल है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे यहाँ चार आश्रम थे। गृहस्थाश्रम के बारे में हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि इस अवस्था में धन बटोरना चाहिए। यानि धन बटोरना हमारी परंपरा में है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे हिन्दू धर्म में धन संग्रह और एश्वर्य से को वैधता प्रदान की गई है। फिर हमारे देश के परम्परागत लोगों को इससे इनकार क्यों होना चाहिए? विडंबना की बात यह है कि हमारे धर्मशास्त्रों में यह नहीं कहा गया है कि इस तरह के धन संग्रह और एश्वर्य से समाज के भीतर किस तरह की दिक्कतें पैदा होंगी।

हमारे सबसे लोकप्रिय हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ रामायण में सबसे बदतर आदमी की तुलना ग़रीब आदमी से की गयी है। कौटिल्य ने कहा है कि राजा को आर्थिक दृष्टि से समृद्ध होना चाहिए। दक्षिण भारतीय रामायण में भी इसका जिक्र है। हालांकि हमारे भारतीय संस्कृति में बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो एक दूसरे के विपरीत हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि हमारे देश में समाजवाद की कोई परम्परा रही है। बल्कि कटु सत्य यह है कि हमारा भारतीय समाज जातियों में बंटा रहा है। आज इक्कीसवीं सदी में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस परम्परागत जातीय बंटवारे को बदलने की है। दरअसल आज न कल हमें इस जाति व्यवस्था को बदलना ही होगा। 

जहां तक हमारे देश में उत्सवधर्मिता का सवाल है जिस चीज में भारत के विशाल मध्यवर्ग की दिलचस्पी होगी उसकी पूर्ति के लिए उसके आसपास बाज़ार उपलब्ध होगा। बाज़ार मुनाफे पर चलता है। मुनाफ़ा कमाने के लिए बाजार में सक्रिय ताकतें सभी तरह के कर्म करेंगी। आज हमारे देश के विशाल मध्यवर्ग के पास पैसा है। वह पैसे ख़र्च कर सकता है। इसके लिए उसे अवसर चाहिए. हमारे परमपरागत पर्व-त्योहार, शादी-विवाह आदि उसे यह अवसर प्रदान करते हैं। 

दरअसल हाल के वर्षों में हमारे देश में जनसंचार के क्षेत्र में जो क्रांति हुई है उससे यहाँ के विशाल मध्यवर्ग की स्पेंडिंग कंडीशन पर व्यापक असर पड़ा है। मीडिया और जनसंचार के विभिन्न माध्यमों और बाज़ार ने दीपावली एवं दूसरे पर्व-त्योहारों को मनाने के लिए हमारे यहाँ के विशाल मध्यवर्गीय लोगों को तरह-तरह के ऑब्जेक्टिव ऑफ़ डिजायर दिए हैं। इसलिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाज़ार का मूल धर्म है पैसे बनाना और और अपनी जगह वह सही भी है। लेकिन निश्चित रूप से बाज़ार के पैरोकारों ने यह माहौल बनाया है कि आर्थिक समृद्धि ही सब कुछ है, बाक़ी सब बेकार है।

मुझे लगता है कि सन 1990 के बाद हमारे देशके लोगों की जीवनशैली में बुनियादी परिवर्तन आया है और हमारी मान्यताएं भी बदली हैं। यह वही समय था जब हमारे देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई थी। उसी के साथ-साथ देश में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति और टेलीविजन क्रांति भी हुई। उसके बाद हमारे यहाँ टेलीविजन, कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन, बड़ी तीजी से इस्तेमाल बढ़ा है। इन सबके कारण न केवल हमारे देश के लोगों के जीवनशैली बदली है बल्कि इसने हमारे लगभग पूरे समाज के सोच को ही बदल कर रख दिया है। 

हमारे यहाँ आज महानगर और बड़े-छोटे शहर ही नहीं बल्कि अब तो गाँव-देहात तक में अलग-अलग कंपनियों के करोड़ों टेलीविजन सेट्स हैं जिन्हें करोड़ों लोग रोज देख रहे हैं। हाल के वर्षों में हमारे देश के भीतर कम्प्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन का भी बड़ी तेजी से इस्तेमाल बढ़ा है। कई देसी और विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियों ने इस धंधे में निवेश किया है। टेलीविजन, कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन आदि आज बाज़ार और उपभोक्ता सामग्रियों के विज्ञापन का बहुत बड़ा जरिया बन गए हैं। हमारे देश के आम लोगों के व्यावहारिक जीवन में बाज़ार की दख़ल लगातार बढ़ती जा रही है।

यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सन 1991 के पहले हमारे बाज़ार में गिने-चुने प्रोडक्ट्स होते थे जो अब बेहिसाब संख्या में आ गए हैं। आपका पड़ोसी अगर यह सब खरीद रहा है और आप ऐसा नहीं करना चाहते हैं तो आपके बच्चे आपको इसे खरीदने के लिए विवश कर दे रहे हैं। आज हमारे जीवन प्रणाली हमारे एसेंशियल कैरेक्टर से मिलती हैं। इसीलिए मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि समाजवाद के जमाने में जो हो रहा था वह मात्र दिखावा था। और आजकल हमारे आसपास जो कुछ हो रहा है वह रीयल सायकी है. इसलिए इस दौर को हमें ऐतिहासिक दृष्टि से समझने की कोशिश करनी चाहिए । 

इसाई धर्म में कहा गया है कि सुई के छेद से ऊँट निकाला सकता है लेकिन धनी आदमी स्वर्ग नहीं जा सकता। हमारे हिन्दू धर्म में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बात की गयी है। इसीलिए हमारे यहाँ मान्यता है कि हर हिन्दू के घर में लक्ष्मी है और उनकी पूजा होती है। जिसके घर में लक्ष्मी आती हैं उसकी सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। इसीलिए आज के बाजारवादी दौर में भौतिक समृद्धि को महत्व दिए जाने को देखकर हमें हैरानी क्यों हो रही है? इसमें कोई दो राय नहीं कि 1991 इस मामले में एक वाटर शेड था, उससे पहले लोगों में गिल्ट होता था कि वे पैसे कमा रहे हैं. वह अपराध-बोध आज के समय में ख़त्म हो गया है।

(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)


असली दिखावे की समृद्धि : कुर्रतुल ऐन हैदर



 कुर्रतुल ऐन हैदर
उर्दू की विख्यात लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर एक अमीर और अभिजात परिवार में पैदा हुई थीं, लेकिन उन्हें पैसे के दिखावे से वितृष्णा थी और ग़रीब लोगों के प्रति उनमें गहरी संवेदनशीलता थी. लगभग दस बरस पहले (मजहर कामरान के साथ साहित्य अकादेमी के लिए फ़िल्म बनाने के दौरान) हुई बातचीत में उन्होंने अमीरी के बदलते अर्थों पर बात की थी जो आज भी प्रासंगिक है. पेश है, बीते 23 अक्टूबर 2011 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित लेख. - शशिकांत :

''आज की हमारी सोसायटी एक कंज्यूमरिस्ट सोसायटी है। हमलोग कंज्यूमरिज्म की ओर जा रहे हैं। बाजार जाकर देखिये कि कितनी दुकानें खुल गयी हैं और उनमें क्या-क्या बिक रहा है। किस-किस तरह के गुडस भरे पड़े हैं। पर्व-त्योहारों, सादियों, पार्टियों वगैरह में लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। आजकल के लोगों कों दौलत को प्रदर्शित करने में शर्म  नहीं आती। इसमें गरीब और लोअर मिडिल क्लास के लोग पिसते हैं और गलत रास्ते अख्तियार करते हैं।'' 'आग का दरिया', 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' सरीखी कालजयी कृतियों की लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर उर्फ ऐनी आपा ने आज से कोई दसेक साल पहले बड़ी कोफ्त के साथ यह बात कही थी। उनका गुस्सा जायज था इसलिए भी क्योंकि वह ख़ुद एक रईस ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती थीं. 

दरअसल फिजूलखर्ची और दौलत का भौंडा प्रदर्शन ऐनी आपा को नापसंद था। इस तरह की हरक़त को वह 'बेवकूफ़ाना हरक़त' कहती थीं। उनकी इस सोच की वजह थी सामाजिक सरोकारों के प्रति उनका ख़ास रिश्ता। अपने साक्षात्कारों में ग्लोबलाइजेशन के दौर में मुल्क के अंदर पैदा हुए नवदौलतियों की भर्त्सना करते हुए वह इनकी तुलना मुल्क के कुछ पुराने ख़ानदानी रईसों से करती थीं जो दौलतमंद होने के बावजूद सादगी से रहना पसंद करते थे और दौलत का भौंडा प्रदर्शन करने से परहेज करते थे। हालांकि अदब की दुनिया में अपने कददावर पर्सनेलिटी के लिए मशहूर ताउम्र अविवाहित रहनेवाली अपने तमाने की बेहद खूबसूरत इस लेखिका को दौलत और लेखन विरासत में मिली थी। 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर के करीब नेहटौर कस्बे में एक जमींदार खानदान में हुई थी ऐनी आपा की पैदाइश। उनकी आलीसान हवेली आज भी वहां महफूज है। इसके अलावा डालनवाला में भी उनका एक बड़ा बंगला था। बकौल ऐनी आपा, 'हमारी मदर नज़र सज्जाद हैदर और फादर सैयद सज्जाद हैदर यलदरम- दोनों रायटिंग करते थे। फादर पीसीएस में कलक्टर ग्रेड में थे। अंडमान में रेवेन्यू कमिश्नर के रूप में उन्होंने कई साल तक काम किया। बाद में उनका ट्रांसफर लखनउ हो गया था। उस वक्त उनके पास अमेरिका की ऑकलैंड कार थी। उन दिनों गिने-चुने लोगों के पास मोटरकार होती थी। एक कार थी 'हिलमैन'। 'स्कोडा' चेकोस्लोवाकिया की कार थी। बाहर से ही आती थी, हिंदुस्तान में कहां बनती थी। अजी, उस जमाने की बात छोड़िये, वो जमाना दूसरा था। नुमाइश नहीं करते थे उस जमाने के लोग। उस जमाने में था कि अपनी अमीरी की अकड़ मत दिखाइये। इसे छिछोरापन समझा जाता था।'

महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर आज भी लोग परेसान हैं लेकिन इक्कीसवीं सदी के शुरुआती सालों में इन्हीं मसलों पर उर्दू की इस बहुचर्चित लेखिका की परेशानी भी काबिलेगौर है। हिन्दुस्तान की आज़ादी या कहें कि पार्टीशन के आसपास अपनी स्टूडेंट लाइफ के वक्त को याद करते हुए ऐनी आपा ने कहा, 'महंगाई और करप्शन के बारे में तो मत पूछिये। लखनउ में उन दिनों हॉस्टल और यूनिवर्सिटी की मेरी पूरी फीस चालीस रुपये मासिक हुआ करती थी। आज कंज्यूमरिज्म इतना बढ़ गया है कि...! यह सब वर्ल्ड ट्रेड का मामला है। मार्केट में तरह-तरह के प्रॉडक्ट आ गए हैं। उसकी मैन्युफैक्चरिंग बढ़ गयी है। इंडस्ट्रियलाइजेशन बढ़ गया है। भ्रष्टाचार की वजह भी है- पैसा। हर किसी का सटैंडर ऑफ लिविंग बढ़ गया है। पहले यह नहीं था। आज जिसके पास एक कोठी, एक कार है वो चाह रहा है कि दो हों। यह सब देखादेखी में हो रहा है। मैं आपको बताउं कि जिस तरह का दिखावा आजकल है, यह पहले नहीं था। पता नहीं आज के लोगों को क्या हो गया है।'
राजनीति और भ्रष्टाचार निःसंदेह रूप से आज एक-दूसरे के पर्याय माने जा रहे हैं। आज के राजनीतिज्ञों के नाम रोजमर्रा तौर पर भ्रष्टाचार के मामले में सामने आ रहे हैं। ऐनी आपा ने इन करप्शन की इन घटनाओं पर अफसोस जाहिर करते हुए अपने जमाने की एक ऐसी मिसाल पेश की जिसे सुनकर आज कोई भी अचंभित हो सकता है। उन्होंने कहा, 'मेंरी एक दोस्त थीं अनीस किदवई। इंदिरा गांधी की कोठी के बगल में उनकी कोठी थी। एक दिन अनीस इंदिरा जी के यहां गयीं। उनके यहां एक शॉल बेचनेवाला आया हुआ था। अस्सी रुपये की एक शॉल उनहें पसंद आयी। इंदिरा जी बहुत देर तक उस शॉल को उलट-पलट कर देखती रहीं। लेकिन आखिरकार उन्होंने महज अठारह रुपये की एक शॉल खरीदा, क्योंकि गलत नहीं थीं वो। ईमानदार औरत थीं। आजकल के लीडरध्मिनिस्टर तो अठारह रुपये की शॉल खरीदते हैं।'

ग्लोबलाइजेशन के दौर में शुरू हुए तथाकिथत विकास को ऐनी आपा  असंतुलित विकास मानती थीं। उन्हें सुनिये उनकी ही जुबानी, 'जिसे आज डेवलपमेंट कहा जा रहा है वास्तव में वह बड़ा अनबैलेंस्ड डेवलपमेंट है। आज के इस माहौल में लोगों में पैसे कमाने की शॉर्टकट प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज हमारे यहां स्टैंडर ऑफ लिविंग कितनी बढ़ गयी है। टेलिविजन पर विज्ञापनों में एक से एक प्रोडक्टस को बेचा जा रहा है। गरीब आदमी के पास न तो टेलिविजन है और न उस पर दिखायी जानेवाली लड़की। फिर चोरी, डकैती, अपहरण, बलात्कार, दहेज, हत्या वगैरह घटनाएं बढ़ रही हैं। जब आप लड़कियों को बाजार में खड़ी करके बेच रहे हैं तो फिर अपने आपको सिविलाइज्ड कैसे कहते हैं।'

ऐनी आपा को नयी पीढ़ी की दौलतपरस्ती से शिकायत थी, 'सबसे हैरानी की बात है कि आज पढ़ने-लिखने का किसी को शौक नहीं रह गया है। इस वक्त के लड़के कहते हैं कि ऐसा कौन सा ऐसा बिजनेस शुरू करूं कि जिसमें जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा पैसे कमा लूं यह आज के वक्त का जेनरल टेड है- दे वांट क्विक मनी। आज के यूथ में इस तरह की अनबैलेंस्ड थिंकिंग आ गयी है। हमारे रहन-सहन और सोच-विचार सभी पर इस अनबैलेंस्ड इकॉनमी का प्रभाव पड़ा है। इस पर आप कितनी कहानियां, कविताएं या नॉवेल लिख लें, लोग भले पढ़ लेंगे लेकिन पढ़कर रख देंगे एक ओर। लिखने-पढ़ने को कोई प्रभाव नहीं पड़ता उन पर। इसलिए कहती हूं कि लिटरेचर का अब कोई प्रभाव नहीं रह गया है।'

ऐनी आपा उत्तर प्रदेश के अपने गांव नेहटौर से निकलकर लखनउ, अलीगढ़, देहरादून, कराची, लाहौर, लंदन, मंबई, दिल्ली और नोएडा में रहीं। पार्टीसन के बाद उन्हें भाई के साथ पाकिस्तान शिफ्ट होना पड़ा। वो पाकिस्तान तो शिफ्ट कर गयीं लंेकिन उन्होंने पार्टीशन को कभी कुबूल नहीं किया। हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी संस्कृति को आधार बनाकर वह महज तीस साल की उम्र में 'आग का दरिया' जैसा नॉवेल लिखकर उर्दू अदब की दुनिया में धमाकेदार तरीके से दाखिल हुईं। लेकिन पाकिस्तान के कटटरपंथियों को यह कबूल नहीं था। कहते हैं कि तंग आकर उन्होंने ख्वाजा अहमद अब्बास की मदद से पहले बीबीसी लंदन में नौकरी कीं और फिर मौलाना अबूल कलाम आजाद और पंडित नेहरू की मदद से वापस मुंबई हिंदुस्तान सिफ्ट हो गयीं। 

मुंबई में 'इम्प्रिंट' पांच साल व 'इलस्ट्रेटेड वीकली' छह साल का सम्पादन और एस मुखर्जी की फिल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना' की पटकथा एवं संवाद लिखनेवाली ऐनी आपा दरअसल एक यायावर लेखिका थीं। लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव पर वह 'आग का दरिया' पर किसी तरह की बातचीत करना पसंद नहीं करती थीं। दरअसल उनके इस इस नॉवेल पर इतनी बातें हुई कि वो उब चुकी हैं। सुनिये उन्होंने क्या कहा, 'आग का दरिया' को अब छोडिये! उसके बाद मैंने 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ', 'चांदनी बेगम', 'आखिरी सब के हमसफर', 'पतझड़ की आवाज' वगैरह लिखा है। इन पर कोई बात क्यों नहीं करता। लोगों की भी भेंड़चाल होती है। एक ही ढर्रे पर चलते हैं। 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो' के बारे में उन्होंने बताया, लखनउ में वर्किंग क्लास की औरतों लेकर मैंने यह लंबी कहानी लिख दी थी जिन्हें एक्सप्लॉयट किया जाता है।'

ऐनी आपा शायरों, फनकारों और लिटरेचर को सम्मान दिलाना चाहती थीं। दिन-ब-दिन लिटरेचर के घटते महत्व को लेकर ऐनी आपा की चिंता समझी जा सकती है, 'मेंरा मानना है कि इस वक्त लिटरेचर की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। आज के वक्त में जिसके पास पॉलिटिकल पावर है वही ताकतवर है, वही सबकुछ है- लेखक और कलाकार सेकेंड्री हो गये हैं। अच्छी-अच्छी किताबों से भरी लाइब्रेरी हें, आर्ट गैलरी हैं- एक बम फूटा कि सबकुछ तबाह हो गया। यह कितनी बड़ी ट्रेजेडी है। सबसे कोफ्त की बात यह है कि पॉलिटिकल पावर आज कुछ अनपढ़ लोगों के हाथ में है। नेहरू जी और मौलाना आजाद के वक्त शायरों, फनकारों और साहित्यकारों का सम्मान था, वह आज खत्म हो गया है। मैं समझती हूं कि इस वक्त हिदुस्तान ही नही बल्कि पूरी दुनिया में रायटर्स-आर्टिस्ट की कोई आवाज नहीं रह गयी है। अच्छी से अच्छी चीजें लिखी जा रही हैं। लोग उन्हें पढ़ते भी हैं लेकिन पढ़कर साइड कर देते हैं। बावजूद इसके मैं लिटरेचर के बारे में होपफुल हूं कि कोई ऐसा समय आएगा जब लोग इसके महत्व को समझेंगे।'

इतना ही नहीं, हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब को लेकर ऐनी आपा आखिरी दम तक काफी संजीदा थीं, 'देखिये, हमारे हिंदुस्तान का कल्चर काफी रिच रहा है। यहां दिवाली, दशहरा, रामलीला, ईद, मुहर्रम, क्रिसमस आदि पर्व-त्योहारों ने एक ऐसा गंगा-जमुनी कल्चर बनाया जिसका असर हमारे घर-परिवार, समाज और हमारे रहन-सहन, बोलचाल, आचार-विचार-व्यवहार, वेशभूषा आदि पर भी पड़ा। हमें याद है, हमारे यहां की औरतें घर में आपसी बातचीत में एक से एक मुहावरे इसतेमाल करती थीं। मुसलिम औरतें भी रामायण के मुहावरे बोलती थीं मसलन फलां औरत कैकेयी है। हिंदू और अन्य धर्मों के लोग ईद और मुहर्रम में तहेदिल से शरीक होते थे। मलिक मुहम्मद जायसी ने हिंदुओं को केद्र में रखकर 'पदमावत' जैसा महाकाव्य लिखा। ग़ालिब और मीर जैसे शायर इसी जमीन पर पैदा हुए। मुगल काल को आप देखिये! हमारे हिंदुस्तान के बादशाह संगीत, कला और साहित्य से खास ताल्लुक रखते थे। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि नवाब वाजिद अली शाह, शाह आलम और बहादुर शाह ज़फर बहुत बड़े फनकार भी थे। दुनिया में ऐसे बहुत कम मुल्क हैं जिनके बादशाह म्यूजिशियन, आर्टिस्ट, परफॉर्मर और रायटर रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह सब खत्म होता जा रहा है। आजकल के लीडर्स को इन सब चीजों से कोई लेना-देना नहीं। मुल्क के दीगर हिस्सों में जब-तब दंगे-फ़साद के बारे में सुनती हूं तो बड़ी मायूसी होती है। मुझे याद है जब मैं मुबई में रहती थी तो एक ही बिल्डिंग में अलग-अलग फ्लोर पर अलग-अलग कम्युनिटी के लोग रहते थे और मिलजुल कर रहते थे। मेरा मानना है कि अपनी आइडेंटिटी को लेकर हाल के वर्षों में लोग कॉशस हुए हैं। इसी वजह से क्लेश होने लगे हैं।'

ऐनी आपा एक लेखिका और पत्रकार तो थी ही फिल्म, चित्रकला, संगीत आदि में उनकी खूब दिलचस्पी थी। उन्होंने क्लासिकल म्युजिक का विधिवत प्रशिक्षण लिया था। पाकिस्तान और मुंबई में उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री  फिल्में बनाईं। चित्रकारी में तो उन्हें बचपन से ही लगाव था। अपनी कई किताबों की स्केचिंग उन्होंने खुद कीं। नोएडा के सैक्टर - 21 में जलवायु विहार के अपने घर के ड्राइंग रूम में टंगा अपने हाथों से बनाया मां का चित्र उनकी चित्रकारी का उत्कृष्ट नमूना था। लेकिन बहुमुखी प्रतिभा की धनी अपने जमाने की यह बेहद खूबसूरत लेखिका खुद को रायटर ही मानती थीं, ष्ष्रायटिंग ज्यादा अच्छी लगी। लेकिन मैंने कभी कम्प्रोमाइज नहीं किया। इसकी वजह से काफी नुकसान हुआ। जब आप कम्प्रोमाइज नहीं करेंगे तो आपको बहुत तरह के नुकसान होंगे।'

ताउम्र अविवाहित रहने के ऐनी आपा के फैसले की वजह भी शायद उनका कम्प्रोमाइज न करना ही था। हालांकि अदब की दुनिया में ऐनी आपा के अविवाहित रहने के कई किस्से हैं। बताते हैं कि ख्वाजा अहमद अब्बास और खुशवंत सिंह के साथ उनके करीबी रिश्ते थे। पदमा सचदेव ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ख्वाजा अहमद अब्बास के साथ उनका निकाह लगभग तय हो चुका था। एक अखबारवाले के द्वारा ख्वाजा की रायटिंग के बारे में पूछे सवाल पर इन्होंने उनको 'बेहूदा किस्म का लेखक' कह दिया इसलिए बात बिगड़ गयी। हालांकि मुझसे बातचीत के दौरान ऐनी आपा ने इससे साफ इनकार किया, 'मैंने कभी उनको ;ख्वाजा अहमद अब्बास को 'बेहूदा किस्म का लेखक' नहीं कहा।'

आज ऐनी आपा हमारे बीच भले नहीं हैं लेकिन उनकी कालजयी कृतियां, उनकी बहुमुखी प्रतिभा और उनका कददावर व्यक्तित्व अदब की दुनिया के बाशिंदों लिए ही नहीं पूरी मानवता के लिए एक धरोहर है। उनसे जुड़े ये संस्मरण वाकई आज हमारे लिए बेहद अहमियत रखते हैं। 

(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

gr8 indian techy boy...!

This is gr8 indian techy boy...ye kal US par kabza kar sakta hai...ab chet jaao beta obama...!


 gr8 indian techy boy

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

शक्ति-पूजा और भारतीय स्त्री: उदय प्रकाश/अनामिका

मित्रो, भारत में शक्ति-पूजा की परम्परा और भारतीय समाज में स्त्री की दशा के सन्दर्भ में उदय प्रकाश और अनामिका से बातचीत पर आधारित यह लेख पिछले साल दुर्गापूजा के अवसर पर राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हुआ था. आजकल नवरात्र चल रहा है इसलिए यह लेख प्रासंगिक है. पढ़ सकते हैं. शुक्रिया. - शशिकांत  

समाज की मुक्ति से जुड़ी है स्त्री की मुक्ति : उदय प्रकाश
उदय प्रकाश
मेरा मानना है कि यथार्थ को झुठलाने के लिए सबसे ज्यादा धर्म और आध्यात्म का इस्तेमाल किया जाता है, मामला चाहे स्त्री का हो या दलित का या हाशिए पर की अन्य अस्मिताओं का। हमारे यहां कहा जाता है कि काशी का राजा डोम था। उत्तर प्रदेश में ही विंध्यवासिनी देवी की पूजा की जाती है।

दरअसल जब से स्त्री की सत्ता छीनी गई तब से उसकी पूजा की जाने लगी। दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में आज भी कई जगहों पर मातृसत्तात्मक समाज है। लेकिन पूरे उत्तर भारत का समाज मातृसत्तात्मक है। 

यहां आज भी कन्या भ्रूण हत्या, दहेज और खाप पंचायतों द्वारा प्रेम करने पर स्त्रियों की जान ले ली जाती है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि यही समाज दूर्गा की भी पूजा करता है।


यथार्थ यह है कि स्त्रियों की स्थिति यहां अच्छी नहीं है। मुझे लगता है कि स्त्री सशक्तीकरण पर विचार करते हुए हमें पितृसत्तात्मक समाज की स्थापना पर गौर करना चाहिए। यूनानी सभ्यता में इडीपस की जीत पितृसत्तात्मक समाज की जीत मानी जाती है।


इस समय स्त्री पर ज्यादा जोर इसलिए दिया जा रहा है कि पुरुषसत्तात्मक समाज व्यवस्था के समने कई तरह की अस्मिताएं आ खड़ी हुई हैं। अस्मिताओं में बंटे समाज में जातियों, धर्मों आदि के टुकड़े करने पड़ेंगे। 

भारतीय समाज की संरचना यूरोप से भिन्न है, इसलिए यहां यूरोप की तरह सिर्फ स्त्री और पुरुष के बीच समाज को बांट कर नहीं देखा जा सकता। दलित कहां जाएंगे? आदिवासी कहां जाएंगे? हाशिए पर की कई और अस्मिताएं कहां जाएंगी? जेंडर भारत का अकेला मसला नहीं है। इसके साथ और भी कई गंभीर मुद्दे हैं।


यह सच है कि भारत की स्त्रियां आज घर से बाहर निकल रही हैं, लेकिन वह शिकार भी हो रही हैं। रॉबर्ट जेनसेन की बहुचर्चित किताब ‘‘गेटिंग ऑफ: पोर्नोग्राफी एंड दि एंड ऑफ मेस्कुलिनिटी’’ में उन्होंने माना है कि भूमंडलीकरण के बाद विज्ञापन, बाजार और नव साम्राज्यवादी आचरण के पीछे सबसे पहला मुखौटा स्त्री का है।

रॉबर्ट जेनसेन बाजारवादी नारीवाद को ग्लोबल पोर्न इंडस्ट्री का ही विस्तार मानते हैं। स्त्री मुकित आंदोलन के इस रूप को बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों तक चलनेवाले उस स्त्री स्वाधीनता संग्राम के साथ जोड़ पाने में कई बार मुझे भी मुश्किल होती है जिसमें स्त्री ने समाज के दलित और वंचित तबकों की मुक्ति का सपना देखा था।

इस संदर्भ में देखें तो हमारे सामने क्लारा जेटकिन, क्रुप्स काया, लेनिन की बीवी, एरन गुल, सीमोन द बोउवार, केट मिलेट और भारत में कस्तूरबा से लेकर बहुत सारी महिलाएं थीं, और आज भी मेधा पाटकर, वंदना शिवा, अरुंधति रॉय, सुनीता नारायण, आंग सान सूकी, इरोम शर्मिला आदि ऐसी महिलाएं हैं जो आज की सत्ता के विरुद्ध समूचे मानवीय समाज की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन्होंने कभी जेंडर का नारा नहीं दिया। इनका कोई गॉड फादर नहीं है।

दरअसल भारत में स्त्री मुक्ति का सवाल हाशिए पर के कई अन्य समूहों की मुक्ति से जुड़ा हुआ है। स्त्री को मुक्त करते हुए हमें पूरे समाज को मुक्त करना होगा। यह सच है कि यह शताब्दियों से सबसे उत्पीड़ित अस्मिता रही है और जब तक यह ऐसी अन्य अस्मिताओं को साथ नहीं लेती तब तक वह बाजार और अन्य पितृसत्तात्मक सत्ता का लाभ लेकर भले लाभ उठाए, यह एक खास वर्ग का ही सत्तारोहण होगा, स्त्री की मुक्ति का नहीं। मुझे लगता है इस बात को जनता समझ चुकी है।

यह मत भूलें कि विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर इंदिरा गांधी, मार्गेट थैचर और सोनिया गांधी तक, जयललिता से लेकर मायावती तक और भंडारनायके से लेकर शेख हसीना वाजिद तक सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाली महिलाएं स्त्री नहीं बलिक पुरुष सत्ता की ही प्रतीक रही हैं, और यही बात संसकृति ओर साहित्य में भी लागू होती है। ये गॉड फादर्स की सत्ताएँ थीं और हैं, मां की सत्ता की प्रतिष्ठा कहीं नहीं हुई।


फासीवाद के बाद सबसे ज्यादा दमन फॉकलैंड वार में मार्गेट थैचर ने किया। इंदिरा गांधी ने भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार इमरजेंसी लागू किया और लागों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी। बेगम खलिदा जिया बांग्लादेश में फौजी शासन लागू किया। जेंडर की निगाह से सत्ता को देखना मेरे लिए कभी सुकूनदेह नहीं रहा, क्योंकि मेरे लिए मान्यताओं का मूल्यांकन मायने रखता है।

स्त्री मुक्ति की राह में देह सबसे बड़ी बाधा : अनामिका
अनामिका
भारतीय परंपरा में शिव का संबंध शक्ति से है। शक्ति का सीधा संबंध स्त्री से है, स्त्री का प्रकृति से और प्रकृति का संबंध शक्ति से। शक्ति का ताल्लुक दुर्गा से है और दुर्गा को आद्य शक्ति कहा गया है। शक्ति के बिना मनुष्य शव के समान है। शक्ति का संचार होते ही वह सजीव, सचेतन और सक्रिय हो जाता है। शक्ति के बिना शिव भी शव के समान माने जाते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी पदार्थ में शिवत्व की शक्ति मंगल भाव से आती है। जब हम किसी देवता के आगे सिर झुकाते हैं तो तो हम उसकी शक्ति के आगे सिर झुकाते हैं और हमें लगता है कि वहां से एक तरह की एनर्जी हमारे भीतर आ रही है। 

देवी की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि उन्हें शक्ति स्वरूपा माना जाता है। उनके अंदर ममता, क्षमा, न्याय की शक्ति होती है। ममता और क्षमा से जब बात नहीं बनती तब न्याय की बात की जाती है। सांस्कृतिक रूप से इसे समझा जा सकता है।

आज की स्त्री जितनी थकी और हारी हुई है और सशक्तीकरण के लिए संघर्ष कर रही है उसे आधुनिकता के संदर्भ में समझने की जरूरत है। दरअसल स्त्री सशक्तीकरण की प्रक्रिया एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। मध्यकालीन भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्रियों की दशा अनुकूल नहीं थी।

उन्नीसवीं सदी में भारत में जब नवजागरण की शुरुआत हुई और स्वाधीनता आंदोलन में भारतमाता की जो छवि गढ़ी गई उसमें शक्ति का वही स्वरूप देखी गई। उस दौरान राजाराम मोहन राय एवं अन्य नवजागरणवादियों ने सती प्रथा, बाल विवाह का विरोध किया और विधवा विवाह की हिमायत की। लेकिन मुझे लगता है कि उस वक्त स्त्रियों के राजनीतिक चेतना की बात नहीं उठाई गई।

महात्मा गांधी जब आए तो उन्होंने कहा कि अगर मानसिक और नैतिक बल की बात की जाए तो स्त्रियां ज्यादा नैतिक और सशक्त हैं। मुझे लगता है कि महात्मा गांधी ने पहली बार इस बात को समझा कि भारतीय स्त्रियां जब पढ़-लिख कर अपनी राजनीतिक चेतना के साथ सड़क पर आएंगी तो वे दहेज एवं अन्य सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ ताकतवर रूप से खड़ी होंगी, और तभी भारतीय स्त्री समाज में सच्चे नवजागरण की शुरुआत होगी। उसके बाद हमने देखा कि भारतीय स्त्रियां पढ़-लिकर चेतना संपन्न होने लगी और बहुत सारी स्त्रियों ने आजादी की लडाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

आजादी के बाद भारतीय स्त्रियों पर एक बड़ी जिम्मेदारी आई। पहले की स्त्री तन और मन से अपने परिवार की सेवा करती थी लेकिन आजादी के बाद वह तन, मन और धन से अपने परिवार की सेवा करने लगी, जिसके दायरे में रक्त और यौन संबंध के अलावा घर से बाहर, समाज, राजनीति और कार्यस्थलों पर बनाए गए उसके कई संबंध भी शामिल हुए। यानि कहा जा सकता है कि आधुनिक स्त्री ने अपने दिल का दायरा बढ़ाया।

जहां तक स्त्री शक्ति का सवाल है तो हर पुरुष की जिंदगी का सबसे यादगार संबंध किसी न किसी स्त्री से जुड़ा होता है, चाहे वह मां के साथ जुड़ा हो या बहन के साथ अथवा प्रेमिका, पत्नी और बेटी के साथ। जब कभी काई पुरुष बाहर की दुनिया से थक-हार कर घर आता है तो उसे सबसे ज्यादा नैतिक और भावनात्मक सुरक्षा और समर्थन उसे स्त्री की तरफ से ही मिलती है। 

लेकिन आज भी स्त्री के सामने पुरुष का चेहरा उसे कमतर ही आंकते हुए, उसे आंखें दिखाते हुए और मारते-पीटते हुए ही आता है। पुरुषों ने अपना चित्त विस्तार नहीं किया। पुरानी मानसिकता के पुरुषों में आज भी पूर्वग्रह बचे हुए हैं। उनको मांज-मांज कर ठीक करना है, जिस तरह गंदे बर्तन को मांज-मांज कर चमकाया जाता है उस तरह।

स्त्री आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि स्त्रियां मनोवैज्ञानिक तरीके से आंदोलन करती हैं। स्त्री के हक की लड़ाई लड़ रही स्त्रियों ने कभी शस्त्र नहीं उठाया है। स्त्री सशक्तीकरण आंदोलन हमेशा निःशस्त्रीकरण को प्रश्रय देता रहा है। इस पर गौर करने की जरूरत है।


पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जूझ रही हैं स्त्रियां। स्त्रियां हमेशा अपने समय के जो वृहत्तर संदर्भ रहे हैं उन्हें साथ लेकर चलती रही हैं। पश्चिम में रेडिकल फेमिनिज्म अश्वेतों के अधिकार दिलाने की लड़ाई में उनके साथ खड़ा था।


आज यह देखकर खुशी होती है कि भारत में गांव-गांव की स्त्रियों में भी यह चेतना आ रही है। वे अपने और अन्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। स्त्री के अंदर की दुर्गा शक्ति अब जाग चुकी है। 

गांव-देहात से लेकर चौपाल तक वह अपने और वृहत्तर मानवीय सरोकारों के लिए उठ रही है। हालांकि देह अभी भी स्त्री मुक्ति की राह में एक बड़ी बाधा है। दुर्गा को भी इसीलिए शस्त्र उठाना पड़ क्योंकि महिषासुर उनके साथ विवाह करना चाहता था।
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित. राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित.)