गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

साहित्य की स्वायत्तता पर पहरेदारी / राजेंद्र यादव

आज हमें इस बात का बेहद अफसोस है कि हमारे यहां साहित्य और संस्कृति की कोई भी संस्था स्वायत नहीं है। वह या तो सरकारी लोगों से संचालित होती है या वहां पर कोई न कोई ऐसा तथाकथित साहित्यकार बैठा दिया जाता है जिसका एकमात्र उद्देश्य सत्ता का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करना होता है। मैं खुद दो साल प्रसार भारती बोर्ड का मेंबर था। हमें आष्वासन दिया गया था कि प्रसार भारती को, जिसके अंतर्गत आकाशवाणी और दूरदर्शन- दोनों आते हैं, को स्वायत्तता दी जाएगी लेकिन वे कभी स्वायत नहीं हुए।

सीईओ के नाम पर वहां हमेशा ऐसा सेक्रेटरी बैठा दिया जाता रहा था, जो एक तरफ मानव संसाधन मंत्रालय में सेक्रेटरी या ज्वाइंट सेक्रेटरी होता था और दूसरी तरफ प्रसार भारती का सीईओ यानी मुख्य कार्यकारी अधिकारी। मेरी और रोमिला थापर की हमेशा यही आवाज होती थी कि हमें अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए और हमारे पास फाइनेंस या गलत कदम उठानेवालों के खिलाफ कार्रवाई करने की शक्ति भी होनी चाहिए। इसके बिना स्वायतता का कोई मतलब ही नहीं था। जब सारा पैसा सरकार देगी तो किसकी नियुक्ति कहां करनी है, यह सरकारी प्रतिनिधि ही तय करेगा। ऐसी स्वायत्तता का क्या अर्थ रह जाता है ?

लगभग यही स्थिति साहित्य अकादमी की भी है। वहां हिंदी के नाम पर जिन बासी प्राध्यापकों को नियुक्त किया गया है उनका झुकाव दक्षिणपंथी राजनीति की तरफ है। जैसे इस बार दिया जानेवाला साहित्य अकादेमी पुरस्कार कैलाष वाजपेयी को मिला है। निष्चय ही कैलाश वाजपेयी बहुत सक्षम कवि हैं और मैं उनका बीसियों साल से सम्मान करता रहा हूं, लेकिन इधर वे जिस तरह आध्यात्मिक और रहस्यवादी हो गए हैं। वे निश्चय ही अकादमी के हिंदी प्रभारी के काफी निकट जान पड़ते हैं। इसी लाइन में अभी रामदरश मिश्र और कमल किषोर गोयनका भी बैठे हुए हैं। ईश्वर ने चाहा तो वे भी कृतार्थ किए जाएंगे।

मुझे साहित्य अकादमी जैसे बड़े संस्थानों के इन पुरस्कारों के मुकाबले मुझे छोटे-छोटे स्तर पर दिए जानेवाले पुरस्कार सार्थक लगते हैं। हालांकि हिंदी में आज ऐसे पुरस्कारों की संख्या सैकड़ों में है। खुशी की बात यह है कि ये सब के सब लगभग निर्विवाद रूप से कवियों को दिए जाते हैं। कविता की और कोई सार्थकता तो रह नहीं गई है। चलिए इस बहाने ही एकाध जगह तस्वीर निकल जाती है। यह उनकी जिंदगी संवारने के लिए काफी है। देखना यह है कि इस तरह से बांस लगाकर कविता के बिजूके को कितने दिनों तक और खड़ा रखा जा सकता है।

मुझे तकलीफ है कि आज नक्सलवाद को दूसरी आतंकवादी गतिविधियों के साथ रखकर कानून और व्यवस्था के कठघरे में डाल दिया गया है। अरुंधती राय ने इस कार्रवाई के बारे में ठीक ही कहा था कि दुनिया की लगभग सबसे बड़ी फौजी ताकत को नंगे-भूखे किसानों और आदिवासियों के खिलाफ कर दिया गया है। कोई विश्वास करेगा कि अपने ही देश में जरूरतमंद किसानों और आदिवासियों को सिर्फ इसलिए फौजों और हेलिकाप्टरों से भूना जा रहा है क्योंकि वे अपने जल, जंगल और जीमन की लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार उनकी जगह बड़ी-बड़ी कारपोरेट घरानों को दे रही है और करोड़ों के घूस और घपले खुलेआम संपन्न किए जा रहे हैं। मुझे किसी भी भाषा का कोई भी चिंतक, विचारक या साहित्यकार नहीं मिला जो इन सरकारी धांधलियों का पक्ष लेता हो। सबकी सहानुभूति नक्सलियों के साथ है मगर सत्ता की अंधी सरकारें उन्हें सिर्फ यही जुमला पकड़ा सकती हैं कि यदि उन्हें रोटी नहीं मिलती तो ब्रेड क्यों नहीं खाते?

इक्कीसवीं शताब्दी भारत के लिए भविष्य रहित और स्वप्नहीनता की शताब्दी है। आज ऐसा कोई सपना हमारे युवावर्ग के पास नहीं है जिसके लिए वह लड़ सके। सिर्फ छोटे-छोटे संस्थानों में नौकरियां पाने, विदेश यात्राएं करने या झटके से धन कमा लेने के सपने ही उनका भविष्य बनाते हैं। यह एक ऐसा मानसिक दबाव है जिसके कारण लोग ज्योतिषियों, नजूमियों, मौलवियों, भगवानों और अपराधी सरगनाओं की शरण में जा रहे हैं। आज का अखबार खेलिए! उसमें बैंक और दूसरों को लूटने की कम से कम दस घटनाएं आपके सामन होंगी। यहां आजकल दस-बीस लाख रुपये एक झटके में या एकआध हत्या करके लूट लिए जाते हैं।

रोजमर्रा की जरूरत के सामान के दाम मध्यवर्ग की पहुंच से बाहर हो गए हैं। सौ रुपये की एक किलो दाल और पचास रुपए का आटा खरीदकर कोई कितने दिन तक अपना घर चला सकता है। इन स्थितियों में लूटमार नहीं होगा तो क्या होगा। सरकारी आंकड़े और आष्वासन बाजीगरों के चमत्कार जैसे लगते हैं। अगर उदाहरण ही देना हो तो मैं ‘स्लमडाग मिलेनियर’ फिल्म का नाम देना चाहूंगा, जिसमें झोपड़पट्टी के अनगिनत भूखे-नंगे, दौड़ते-भागते बच्चों के साथ करोड़पति बनाने का खेल खेला गया है और झूठे-सच्चे जवाबों पर करोड़ों रुपये का इनाम दे दिया गया है। यह अपराध और सपने- दोनों को बेचने की कवायद है। यही हमारे आज के युवावर्ग का वर्तमान है।

साहित्य में भी आप देखेंगे कि भविष्य के सपने लगभग गायब हो गए हैं। कहानियां और उपन्यास सिर्फ तात्कालिक जातिवादी संघर्षों, जिंदगी से जूझते, घुटते हुए लोगों की तस्वीरों से भरी है। मुझे यह सारा परिदृष्य एक खौलते हुए तालाब की याद दिलाता है। हमेषा लगता है कि जैसे अभी कोई विस्फोट होगा और सारी चीजें बदल जाएंगी, मगर होगा कुछ भी नहीं। हम इसी तरह सरकार और माफियाओं के सत्ताचारों के बीच पिसते रहेंगे।

बहरहाल, कहा तो जाता है कि जो समाज के लिए सबसे बडे़ संकट के दिन होते हैं वह साहित्य के लिए सबसे उर्वर सामग्री पेश करते हैं। जब सारा समाज स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था तब एक से एक जबरदस्त रचनाएं सामने आई थीं। आज जब सबके सब जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं तब निश्चय ही ऐसा कुछ सामने आएगा जो इन सबको भविष्य के लिए एक दस्तावेजी चित्रावली नई पीढ़ी के हाथ में सौंपेगा। हो सकता है मेरा यह सोचना एक झूठी आशा हो, मगर इनमें कम से कम एक आशा तो है।
(२६ दिसंबर, 2009, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित)

सबसे बड़ी समस्या असमानता है / नवारुण भट्टाचार्य

आजकल मैं इस बात को लेकर बहुत परेशान हूँ कि आज हमारे पार्लियामेंट में पांच सौ पैंतालीस सांसदों में करीब तीन सौ करोड़पति हैं। हमारे देश की राजनीति में यह एक खतरनाक ट्रेंड है। ये जनता के बारे में क्या सोचेंगे? आम आदमी की आवाज सुननेवाला अब कहां है। मैं समझता हूं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या असमानता है। दिन ब दिन यह असमानता बढ़ती जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों में बढ़ती हिंसा की वजह भी यही है। लालगढ़ में क्या हुआ? आजादी के इतने साल बाद भी वहां विकास नहीं हुआ। न शिक्षा, न स्वास्थ्य। सरकार को इसके बारे में सोचना होगा। सिर्फ पुलिस या सेना भेजकर वह हालात पर काबू नहीं पा सकती। बल्कि इससे जनता में और प्रतिरोध बढ़ेगा। सरकार जनता को कसूरवार ठहराना बंद करे। पष्चिम बंगाल में सीपीएम की आज जो दशा हुई है वह उसकी एंटी पीपुल नीतियों की वजह से ही हुई है। उसने इंडस्ट्रीयलाइजेशन को जबरन जनता पर थोपा है। आगे तो सीपीएम को और भी सेटबैक लगनेवाला है, यदि कोई मिरैक्कल ;चमत्कारद्ध नहीं हुआ तो।

नक्सलवाद की समस्या को ही देखिये! यह सच है कि नक्सलियों में बहुत से ग्रुप हैं। सभी ग्रुप माआवादी नहीं हैं। मेरा खयाल है कि सरकार का नक्सलियों के साथ डायलाग करना बहुत जरूरी है। माओवादियों से भी डायलाग करना चाहिए। पुलिस और सेना की दमन की कोशिशें बेकार साबित होंगी। सरकार बार-बार नक्सलियों को हथियार सरेंडर कऱने कह रही है। यह प्रस्ताव ठीक नहीं है। मगर सीसफायर हो सकता है। सीसफायर करके सरकार बातचीत कर सकती है। अभी माओवादियों के पास जितना हथियार है उससे दस गुणा हथियार पुलिस और सैनिक बलों के पास है। यह नक्सलवाद की समस्या का सोल्यूशन नहीं है, न यह निगोसियेषन की लैंग्वेज है। सरकार चाहे तो सीसफायर अभी हो सकता है। सरकार माओवादियों के साथ मीडिया के थ्रू नहीं बल्कि सीधे बातचीत करे। इस बातचीत में तीसरे पक्ष यानी सिविल सोसायटी की बात को भी सुनना होगा।

सरकार जिस तरह नक्सलवाद का दमन कर रही है उससे देश के वामपंथी बुद्धिजीवी आतंकित महसूस कर रहे हैं। यह माओवादियों ने नहीं बल्कि सरकार ने किया है। लेकिन इससे हमलोग नहीं डरेंगे। एक बहुत बड़ा तबका हमारे साथ है। महाश्वेता देवी, अरुंधति राय सरीखी शख्सियत हैं। आनेवाले समय में सरकार पर और प्रेशर बढ़ेगा क्योंकि यह रीयल आवाज है। सिविल सोसायटी की आवाज है। सरकार को इनकी आवाज सुनना चाहिए। उसको यह सोचना चाहिए कि जो लोग इस मसले को उठा रहे हैं वे सभी सोसायटी में सम्मानित हैं और उन्हें कोई लोभ नहीं है।

दरअसल असमानता अपर क्लास को इंस्टीट्यूशनालाइजेशन करती है, मिडिल क्लास को ग्लैमराइज करती है और गरीब को ब्रूटाइस करती है। इसलिए फ्यूचर मुझे बहुत डार्क दिख रहा है। ऐसे विकट समय में लेखक को जनता के साथ रहना चाहिए। उसे करोड़पतियों के साथ नहीं रहना चाहिए। साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों को सरकार प्राइवेटाइज कर रही है। यह बहुत निंदनीय है। सभी जगह प्राइवेटाइजेशन नहीं होता। प्रेम में प्राइवेताइजेशन नहीं होगा। सरकार की यह करतूत बहुत अफसोसनाक है और एक खतरनाक संकेत भी है। रेड सिग्नल है। हमारी सरकार यह सब करेगी, यह मैं सोच भी नहीं सकता। ऐसा पहले बंगलादेश में होता था। वहां लेखकों को फिलिप्स अवार्ड दिया जाता था। सैमसंग कंपनी रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर अवार्ड देगी तो इससे उनका इंसल्ट होगा। यह अधिकार उनको किसने दिया। सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर यह किया जा रहा है। सरकार सैन्य खर्च बढ़ा रही है। कामन वेल्थ गेम्स पर अंधाधुंध खर्च कर रही है। लेकिन वहां खेलेगा कौन? कितना मेडल हमें मिलेगा? यह बहुत शर्म की बात है। यह जो कुछ हो रहा है एक कल्चरल वर्कर होने के कारण मुझे बहुत शर्म और दुख हो रहा है।

लेखकों को इस मामले में अहम रोल निभाना होगा। उन्हें प्रोटेस्ट कभी नहीं छोड़ना चाहिए। लेखन और लेखन के बाहर दोनों जगह प्रतिरोध होना चाहिए। हमलोग कभी इसको स्वीकार नहीं करेंगे। यह सीधी बात है।

राजकमल चैधरी को मैं बहुत बड़ा लेखक मानता हूं लेकिन उनको वो सम्मान नहीं मिला। वे बहुत पावरफुल रायटर हैं। उन पर अश्लीलता का आरोप लगाया गया। अश्लीलता सोसायटी पैदा करती है। यदि सोसायटी अश्लील होगा तो लेखक क्या करेगा? अष्लीलता एक सोशल प्रोड्यूस है। लेखक जब उसको देखता है तभी तो उसके बारे में लिखता है।
आज मुझे इस बात का डर है कि हमारी सोसायटी का अमेरिकीकरण हो रहा है। सिर्फ मलेटरी पावर, बिजनेस या ट्रेड का टर्नओवर बढ़ने से कोई कंट्री सुपर पावर नहीं हो सकता। कल्चरल पावर भी होना चाहिए क्योंकि यह महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस का भी दश है। जो कुछ बाहर चल रहा है उसका प्रभाव सोसायटी पर पड़ेगा ही लेकिन इसका विरोध करना लेखक का धर्म है। अफसोस इस बात का है कि आज मध्यवर्ग के कुछ लेखक भी बाजारवादी हो गए है। आनेवाले समय में यह और भी बढ़ेगा क्योंकि लेखन एक कमोडिटी बनता जा रहा है। जब कोई चीज कमोडिटी बन जाती है तो उसे अच्छा पैकेजिंग चाहिए। लेखक का एक अलग तरह का जीवन दर्षन होता है। सच्चे लेखक का जीवन, उसका दर्शन और उसका विचार समाज से बंधा हुआ है। यह कमोडिटी सेल नहीं है।

ऐसे हालात में जेनुइन रायटर की सांस बंद हो जाएगी। दिल्ली में पावर है, मनी है। यहां रहते हुए भी उदयप्रकाश यदि खुद को विक्टिम महसूस कर रहे हैं वे ट्रू लेखक हैं। यह आज के समय की असलीयत है। ऐसे समय में कुछ लोगों को विक्टिमाइज किसा जाएगा क्योंकि यहां लेखकों का एक तबका प्रो स्टेबलिशमेंट, प्रो सत्ता-प्रतिष्ठान है। लेकिन सच्चे लेखक का सबसे बड़ा प्रोटेक्षन होता है उसका रीडर और जनता को ऐसे लेखकों का सम्मान करना चाहिए। थर्ड वर्ल्ड में लेखक का व्यक्तिगत जीवन भी थर्ड वर्ल्ड की तरह होना चाहिए क्योंकि यह अमेरिका नहीं है, यूरोप नहीं है।

बोलियों के साहित्य का सरोकार / मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

आज अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पर निर्भर देश के अंदर बढ़ रहे आक्रामक पूंजीवाद की पृष्ठभूमि में बाजार समर्थक लेखकों की उपस्थिति चिंताजनक है। इसी  आक्रामक पूंजीवाद के दौर में एक तरह का आक्रामक व्यक्तिवाद भी विकसित हो रहा है। हमारे यहां के मध्यवर्ग में उस विकृत चेतना का देखदेखी में विकास हो रहा है। यह वर्ग अपने लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएं जुटाना अब गुनाह नहीं मानता। निजी स्वार्थलिप्सा में डूबे हुए कुछ लेखक भी इस क्रम में दिखाई पड़ जाते हैं। ऐसे लेखक पद और पुरस्कारों के लिए सत्ता के गलियारे में चक्कर मारते हैं और विभिन्न अकादमियों के अध्यक्ष और सचिवों की चापलूसी करने में वे संकोच नहीं करते। ऐसे लेखकों के सामने रखकर अगर आज के साहित्यिक परिदृष्य को रखकर निष्कर्ष निकाला जाए तो वह एकांगी होगा।

दरअसल साहित्य का सृजन और साहित्य की जनता तक पहुँच एक व्यापक परिदृश्य में देखने के लिए आमंत्रित करती है। विभिन्न क्षेत्रों में खड़ी बोली हिंदी के हजारों की तादाद में ऐसे रचनाकार हैं जिनकी रचनाएं भले किताब के रूप में नहीं छपती हैं और न पत्र-पत्रिकाओं में आती हैं लेकिन ये विभिन्न अंचलों में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों में काव्य-पाठ, गीतों के गायन, कहानी-पाठ या नाटकीय ढंग से कोई वार्तालाप सुनाने की एक नई कला विधा के दारा अपनी रचनात्मकता और जन सरोकार प्रदर्षित करते हैं।

यहां एक-दूसरे प्रकार के साहित्य का उल्लेख भी जरूरी है। विभिन्न बोलियों के लेखक मैथिली, मगही, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, कन्नौजी, हरियाणवी आदि बोलियों में रचना कर रहे हैं। इनका साहित्य बहुत ज्यादा छपता नहीं लेकिन जनता के बीच में इन्हें लोकप्रिय रचनाकार का सम्मान हासिल है। ऐसे रचनाकारों में ग्रामीण जन-जीवन का हर पहलू अपनी तमाम तरह की धड़कनों के साथ मौजूद है। यहां तक की स्थानीय स्तर की राजनीति के नायक और खलनायक इनकी रचनाओं में बदलते रहे हैं और बोलियों के इन रचनाकारों से हिंदी-उर्दू क्षेत्र की राजनीति की गहमागहमी और जनता के रोष का पता भी इनकी रचनाओं से चलता है।

समकालीन हिंदी-उर्दू साहित्य की मुख्यधारा में अनेक प्रकार के रचनाकार हैं। चरण सिंह पथिक, विद्यासागर नौटियाल, दूधनाथ सिंह जैसे लेखक हिंदी-उर्दू क्षेत्र के आंचलिक परिदृश्य और ग्रामीण जीवन के मूलभूत विरोध को पूरी तीक्ष्णता और कलात्मकता के साथ प्रदर्शित कर रहे हैं। मध्यवर्ग के ऐसे भी रचनाकार हैं जो व्यक्तिगत दुख के माध्यम से समाज के दुख को देखते हैं और परिवर्तन की बेचैनी का इजहार करते हैं। इन रचनाकारों में जो लोग पूंजीवादी सांस्कृतिक बाजार में लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं उनकी रचनाषीलता के अनेक ध्रुव हैं। इनके सभी ध्रुवों पर व्यवस्था के प्रति असहमति और विषाद की छाया मौजूद है। तीसरे प्रकार के वे रचनाकार हैं जो सपाटबयानी के दारा या वाचालता के आरा जनता के हुंकार और दुख दर्द को प्रकट करते रहते है। चैथे प्रकार के रचनाकार हैं जो कहानियों में और उपन्यासों में खासतौर पर उन साममाजिक घटनाओं का दिग्दर्षन कराते हैं, जिनके गहरे अभिप्राय उन कृतियों के पाठ के बाद ही पकड़ में आ पाते हैं। इधर युवा रचनाकारों की बाढ़ आई है। अधिकतर युवा रचनाकार नए तरह की रचनाएं कर रहे हैं जिनमें समाज के प्रति गहरा सरोकार मौजूद है।

आज का हिंदी लेखन बहुआयामी है और उसकी अनेक अंतर्धाराएं हैं। इन रचनाओं का सारतत्व कोई एक दृष्टि से समाहारमूलक नहीं बताया जा सकता। बोलियों के साहित्य को साहित्य न मानकर जो भी आलोचनात्मक चर्चा होती है वह वह कुलीन मनोविरोध मात्र है। यह इसलिए हुआ कि मुद्रण यंत्र के आने के बाद पिछले दो सौ सालों में खड़ी बोली का जो साहित्य आया उससं भिन्न वाचिक साहित्य परंपरा की मानो हम कल्पना ही नहीं करते। हालांकि वाचिक परंपरा के लोग हर अंचल में अपनी रचना अपने ढंग से करते हैं और छोटी-छोटी गोष्ठियों, पारिवारिक आयोजनों, त्योहार-उत्सवों, किसी के स्मृति दिवस, 15 अगस्त या 26 जनवरी के मौके पर ये अपनी रचनाएं सुनाते हैं।

इन बोलियों में जो परंपरा शामिल है उसमें जनजीवन की उष्मा के कारण उसमें जिस सृजनशील लेखक का संबंध है उसकी सृजनात्मकता में कई नई रचनाओं का उत्कर्ष दिखाई देता है और जिन लोगों का संबंध बोलियों से दूर हो गया है, जो शहरी हो गए हैं, मध्यवर्गीय कुलीन बनना चाहते हैं उनकी रचना बाजार भाषा में लिखी जा रही है। बेशक ऐसी रचनाओं का संबंध जनता से टूट चुका है। जहां तक कवि सम्मेलनों, मुशायरों के व्यापक स्तर पर आयोजनों की बात है उसमें निष्चय ही फूहड़ और विदूषक किस्म की रचनाओं का बाहुल्य है। इस दिशा में वैकल्पिक कवि गोष्ठियों के आयोजन के प्रयास भी जगह-जगह हो रहे हैं।

इन आयोजनों में एक सुसंबद्ध रूप नहीं धारण किया, लेकिन कभी स्वाधीनता आंदोलन की याद में या क्षेत्रीय स्तर के किसी बड़े रचनाकार की याद में स्थानीय स्तर के आयोजनों में भी जनता की बड़ी उपस्थिति यह बताती है कि आम जनता का साहित्य से संबंध नहीं कटा है। उदाहरण के लिए दिनकर के गांव में जो आयोजन होते हैं, निराला के इलाके में जो अयोजन होते हैं, माखनलाल चतर्वेदी की स्मृति में, मजरूह सुल्तानपुरी, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, साहिर लुधियानवी आदि से जुड़े आयोजन में जनता की भागीदारी देखी जा सकती है और इन आयोजनों के कार्यक्रमों में जिस तरह का व्याख्यान होता है उसका स्तर उन्नत किस्म का होता है।

अभी दिनकर जी के गांव सिमरिया गया था, उनकी सौवीं वर्षगाँठ के अवसर पर। पूरे दिन के कार्यक्रम में बारह-तेरह सौ लोग शरीक हुए थे जिनमें युवा और ग्रामीणों की समान भागीदारी थी। वहां स्थानीय स्तर के अनेक रचनाकारों ने अपनी कविताओं के पाठ किए। उन रचनाओं का स्तर मुख्यधारा के रचनाकारों से कमतर नहीं कहा जा सकता। ऐसे ही र्काएक्रम 1857 के कार्यक्रमों में झांसी में हुए थे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिंदी पट्टी की बोलियों में रचा जा रहा साहित्य आज भी आम जनता के सरोकारों से जुड़ा हुआ है, उसमें मिट्टी की महक भी है और प्रतिरोध की धार भी।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009


दोस्तो, बशीरबद्र साहब ने कभी फरमाया था -

"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिजाज़ का शहर है ज़रा फासले से मिला करो।"

इधर हमारे बड़े भाई निदा फाजली साहब फरमा रहे हैं -

"बात कम कीजे जहानत को छुपाते रहिये

ये नया शहर है कुछ दोस्त बनाते रहिये।"

"
दुश्मन लाख सही ख़त्म कीजे रिश्ता
दिल मिले या मिले हाथ मिलाते रहिये।"

"
कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन
बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है।"

"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना।"

"घर को खोजे रात-दिन घर से निकला पाँव
वह रास्ता ही खो दिया जिस रस्ते था गाँव।"


सोमवार, 14 दिसंबर 2009