बुधवार, 23 दिसंबर 2009


दोस्तो, बशीरबद्र साहब ने कभी फरमाया था -

"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिजाज़ का शहर है ज़रा फासले से मिला करो।"

इधर हमारे बड़े भाई निदा फाजली साहब फरमा रहे हैं -

"बात कम कीजे जहानत को छुपाते रहिये

ये नया शहर है कुछ दोस्त बनाते रहिये।"

"
दुश्मन लाख सही ख़त्म कीजे रिश्ता
दिल मिले या मिले हाथ मिलाते रहिये।"

"
कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन
बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है।"

"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना।"

"घर को खोजे रात-दिन घर से निकला पाँव
वह रास्ता ही खो दिया जिस रस्ते था गाँव।"


1 टिप्पणी:

  1. maza ayaa aap ke is lekha par nida ji ko dekh kar ....
    is par mujhe bhi nida ji ne kabira ke dohe yaad dila diye .
    sai itna dijiye, ja me kutum samaye
    main bhi bhuka na rahu , sadhu na bhukha jaye.

    to aap ne to mang liya ab khaeye or khilaeye

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