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हुस्न का एहतराम और इश्क की खुद्दारी...!

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 "दिल को सुकून रूह को आराम आ गया !
मौत आ गयी कि यार का पैगाम आ गया !!" *           *            * "हम को मिटा सके ये जमाने में दम नहीं !
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं !!"

अली सिकंदर जिगर मुरादाबादी सन 1880 में मुरादाबाद के एक घराने में पैदा हुए और ज़िन्दगी के कई उतार-चढ़ाव से गुज़रे. दरअसल जिगर उस तहजीब के वारिश थे, जिसमें अच्छाई-बुराई और नेकी-बदी की अलग-अलग पहचानें थीं. वह मिज़ाज से आशिक और तबियत से हुस्नपरस्त थे. उनकी ज़िन्दगी की तरह उनकी शायरी भी इन्हीं दो दायरों में सीमित है. 'जिगर मुरादाबादी : मुहब्बतों का शायर'  शीर्षक से निदा फ़ाज़ली साहब की किताब अभी हाल में वाणी प्रकाशन  से प्रकाशित हुई है. पेश है,जिगर साहब की कुछ गज़लें, जिनमें हुस्न का एहतराम है और इश्क की खुद्दारी भी : 
1.

कुछ इस अदा से आज वो पहलू नशीं* रहे
जब  तक  हमारे  पास  रहे  हम  नहीं रहे

या रब किसी के राज-ए-मुहब्बत के ख़ैर हो
दस्ते   जुनूँ*   रहे   न   रहे   आस्तीं   रहे  

मुझको  नहीं  क़ुबूल दो आलम के  वुअसतें*
क़िस्मत में कूए-यार* की दो गज़ ज़मीं रहे

जा और कोई ज़ब्त की दुनिया तलाश कर
ऐ …