रविवार, 25 सितंबर 2011

अदम्य जिजीविषा का विनम्र कवि कुंवर नारायण

कुंवर नारायण
मित्रो, बीते 19 सितम्बर को हिंदी के सम्मानित कवि कुंवर नारायण 85 वें साल में प्रवेश कर गए. कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिंदी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है. उनकी ख्याति सिर्फ लेखक की तरह नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखनेवाले रसिक विचारक की भी है. आज के 'हिंदुस्तान' में पढ़िए कुंवर जी पर मेरा आत्मीय आलेख शुक्रिया. - शशिकांत 
 
'मेरी मां, बहन और चाचा की टीबी से मौत हुई थी। यह सन् 35-36 की बात है। मेरे पूरे परिवार में प्रवेश कर गयी थी टीबी। उन्नीस साल की मेरी बहन बृजरानी की मौत के छह महीने बाद 'पेनिसिलीन' दवाई मार्केट में आयी। डॉक्टर ने कहा था, 'छह महीने किसी तरह बचा लेते तो बच जाती आपकी बहन।'
बीच में मुझे भी टीबी होने का शक था। चार-पाँच साल तक हमारे मन पर उसका आतंक रहा। ये सब बहुत लंबे किस्से हैं। बात यह है कि मृत्यु का एक ऐसा भयानक आतंक रहा हमारे घर-परिवार के ऊपर जिसका मेरे लेखन पर भी असर पड़ा।

मृत्यु का यह साक्षात्कार व्यक्तिगत स्तर पर तो था ही सामूहिक स्तर पर भी था। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद सन् पचपन में मैं पौलेंड गया था। विश्वनाथ प्रताप सिंह भी गए थे मेरे साथ। वहाँ मैंने युद्ध के विध्वंस को देखा। तब मैं सत्ताइस साल का था। इसीलिए मैं अपने लेखन में जिजीविषा की तलाश करता हूँ। मनुष्य की जो जिजीविषा है, जो जीवन है, वह बहुत बड़ा यथार्थ है।


लोग कहते हैं कि मेरी कविताओं में मृत्यु ज्यादा है लेकिन मैं कहता हूँ कि जीवन ज्यादा है। देखिए, मृत्यु का भय होता है लेकिन जीवन हमेशा उस पर हावी रहता है। दार्शनिकता को मैं न जीवन से बाहर मानता हूँ और न कविता से। कविता में मृत्यु को मैंने इसलिए ग्रहण किया क्योंकि वह जीवन से बड़ा नहीं है। इसे आप मेरी कविताओं में देखेंगे। मैंने हमेशा इसको ‘एसर्ट’ किया है। ‘आत्मजयी’ कविता में भी मैंने इसी शक्ति को देखा है।'

अपनी कविता के केंद्र में मृत्यु की वजह बतलाते हुए कुंवर जी भावुक नही होते, क्योंकि मृत्यु को उन्होंने करीब से देखा है और उससे जूझकर निकले हैं। वे कहते हैं, 'हम मृत्यु पर विजय नहीं पा सकते लेकिन मृत्यु के भय पर विजय जरूर पा सकते हैं। मृत्यु मनुष्य को भयाक्रांत करता है। कुछ लोग मृत्यु के भय से टूट जाते हैं। साहित्य मृत्यु के इस भय से निकलने में हमारी मदद करता है। वह हमारे अंदर की जिजीविषा को जगाए रख सकता है। 'आत्मजयी' और अपनी अन्य रचनाओं में मैंने यही कोशिश की है।'

इस संदर्भ में कुंवर जी प्रख्यात दार्शनिक सुकरात की जिंदगी के आखिरी लम्हो में घटी एक घटना को उद्धृत करते हैं, 'सुकरात को जब जहर दिया जा रहा था तो उससे ठीक पहले वे संगीत का एक नया राग सीख रहे थे। किसी ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने कहा, 'मरने से पहले यदि कोई नयी चीज सीख लूं तो इसमें क्या हर्ज है? मैं मरने से पहले एक नया राग सीख लेना चाहता हूं।'

फिर कहते हैं, 'गालिब को पढि़ये। गालिब एक जिंदादिल शायर थे। गालिब ने मृत्यु पर बहुत से अशआर लिखे हैं। लेकिन गालिब मृत्यु के शायर नहीं,, जिंदगी के शायर हैं।'

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 19 सितंबर 1927 को पैदा हुए कुंवर नारायण इस भयानक पारिवारिक हादसे के बाद लखनऊ आ गए। आगे की दास्तान-ए-जिंदगी उन्हीं की जुबानी सुनिये, 'फैजाबाद में आज भी मेरा पुश्तैनी घर है लेकिन अब वहाँ कोई नहीं रहता। बहुत शुरू में सन् ’40 के दशक में मैं लखनऊ आ गया था। लखनऊ आने की एक वजह वहां की शिक्षा व्यवस्था थी और दूसरी टीबी से मां, बहन और चाचा की मौत। उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ था और पढ़े-लिखे लोगों के बीच उसकी काफी चर्चा रहती थी।'    

पारिवारिक मौत के इन हादसों के बीच उनके अंदर की अपार जिजीविषा ही थी जिसकी बदौलत नयी कविता आंदोलन का यह सशक्त हस्ताक्षर आज भी हमारे बीच उपस्थित है। कुँवर जी अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ के प्रमुख कवियों में रहे हैं।


अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए भी कुँवर जी प्रसिद्ध हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित इस कवि का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं। कुंवर जी की मूल रचना विधा कविता भले रही है लेकिन उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाम माध्यमों पर भी बखूबी लेखनी चलायी है। उनकी कविताओं का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के अपने दिनों को याद करते हुए कुँवर जी बतलाते हैं, 'कॉलेज और यूनिवर्सिटी के अनुभव का मैं कृतज्ञ हूँ। स्कूल के अनुभव अच्छे नहीं थे। कॉलेज में विज्ञान का छात्र था। विज्ञान के अध्ययन ने मेरी सोच-समझ को भी प्रभावित किया। अधिक तर्कसम्मत एवं विश्लेषणात्मक ढंग से चीजों और घटनाओं को देखने का नजरिया विकसित हुआ लेकिन वैज्ञानिक सोच का जो असर हुआ उससे मनुष्य जीवन को मानवीय और भावनात्मक ढंग से सोचने में थोड़ा व्यवधान पड़ा है। सारी चीजों को हम तर्कसम्मत ढंग से नहीं समझ सकते, भावनात्मक ढंग से भी सोच सकते हैं।'

एक कवि के लिए जीवन का कोई भी अनुभव साधारण नहीं होता है। वह साधारण को भी असाधारण बना देता है। बतौर कवि कुंवर नारायण कहते हैं, 'कविता में मैं कोशिश करता हूँ कि ज्यादा से ज्यादा चीजें आएँ। मुझे विविधता और विस्तार पसंद है। कविता का यह काम है कि वह हमारी जीवन दृष्टि को बढ़ाती है। सोचने-समझने की दृष्टि देती है। जीवन का अनुभव तो सबके साथ है, लेकिन कविता के द्वारा कवि कितना बड़ा स्पेश बना लेता है, यह कवि पर निर्भर करता है। और कवि जब उसमें सफल हो जाता है तो पढ़ने वाले को लगता है कि अरे ये तो मैं जी चुका हूँ।'

रचनाकार एक वैकल्पिक समाज, देश और दुनिया का निर्माण करना चाहता है, जहां हर किसी के लिए जगह हो। कुंवर जी कहते हैं, 'आज जब देश और समाज के बार में सोचता हूँ तो लगता है कि विविधता जरूरी है, एकता जरूरी है लेकिन विविधता नष्ट नहीं हो क्योंकि भारतीय संस्कृति में विविधता का बहुत अधिक महत्त्व है।’

हिन्दुस्तान की बहुलतावादी संस्कृति का जिक्र करते हुए वे संगीत में मुसलमानों की भूमिका और अपने संगीत प्रेम पर बोलने लगते हैं, ‘आज हम कलाओं में मुसलमानों को अलग-थलग करना चाहें तो भी नहीं कर सकते। इस तरह की कुचेष्टा राजनीति खासकर अंग्रेजी राजनीति ने की है। करीम खाँ, बिस्मिल्ला खाँ, बड़े गुलाम अली खाँ आदि के योगदान को हम कैसे भूला सकते हैं। स्वयं अकबर के दरबार में तानसेन नवरत्नों में एक थे। डागर बंधुओं का संगीत सुनिए। लखनऊ गया था। रहीमुद्दीन खाँ डागर से मिला तो वेद की ऋचाओं को शुद्ध उच्चारण सुनकर दंग रह गया। मेरे दिमाग में उनका उच्चारण और श्लोक आज भी है।

मैं जब उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी का उपाध्यक्ष बना तो मुझे संगीतकारों के संपर्क में और निकट आने का अवसर मिला। संगीत से पुराना नाता रहा है मेरा। मैं फैयाज खाँ, ओंकारनाथ ठाकुर, अच्छन महाराज, शंभु महाराज आदि से अक्सर मिलता-जुलता था। उनके सान्निध्य ने मेरे साहित्यिक संस्कृति को कई स्तरों पर प्रभावित किया। फिल्म फेस्टिवल पर भी लिखता रहा हूँ। विष्णु खरे, विनोद भारद्वाज और प्रयाग शुक्ल के साथ मिलकर हमने सोचा कि हिंदी में फिल्म समीक्षा उपेक्षित है। दरअसल बचपन से ही मुझे सिनेमा देखने का शौक था। हजरतगंज (लखनऊ) में तीन सिनेमा हॉल थे जिनमें रोज शाम को सिनेमा देखता था। ये सन् 40, 50 और 60 की बात है।'


फिल्मों में कुँवर जी की दिलचस्पी की एक खास वजह है। दरअसल कुंवर नारायण को फिल्म माध्यम और कविता में काफी समानता दिखती है। वह कहते हैं, 'जिस तरह फिल्मों में रशेज इकट्ठा किए जाते हैं और बाद में उन्हें संपादित किया जाता है उसी तरह कविता रची जाती है। फिल्म की रचना-प्रक्रिया और कविता की रचना-प्रक्रिया में साम्य है। आर्सन वेल्स ने भी कहा है कि कविता फिल्म की तरह है। मैं कविता कभी भी एक नैरेटिव की तरह नहीं बल्कि टुकड़ों में लिखता हूँ। ग्रीस के मशहूर फिल्मकार लुई माल सड़क पर घूमकर पहले शुटिंग करते थे और उसके बाद कथानक बनाते थे। क्रिस्तॉफ क्लिस्वोव्स्की, इग्मार बर्गमैन, तारकोव्स्की, आंद्रेई वाज्दा आदि मेरे प्रिय फिल्मकार हैं। इनमें से तारकोव्स्की को मैं बहुत ज्यादा पसंद करता हूँ। उसको मैं फिल्मों का कवि मानता हूँ। हम शब्द इस्तेमाल करते हैं, वो बिम्ब इस्तेमाल करते हैं, लेकिन दोनों रचना करते हैं। कला, फिल्म, संगीत ये सभी मिलकर एक संस्कृति, मानव संस्कृति की रचना करती है लेकिन हरेक की अपनी जगह है, जहाँ से वह दूसरी कलाओं से संवाद स्थापित करे। साहित्य का भी अपना एक कोना है, जहाँ उसकी पहचान सुदृढ़ रहनी चाहिए। उसे जब दूसरी कलाओं या राजनीति में हम मिला देते हैं तो हम उसके साथ न्याय नहीं करते। आप समझ रहे हैं न मेरी बात?', वे पूछते हैं।


क्या कला और साहित्य की कोई स्वायत्त दुनिया होती है या वह सीधे-सीधे हमारे सामाजिक जीवन से संचालित होती है?श् यह एक ऐसा सवाल है जो कला माध्यमों को एक तरफ स्वान्तः सुखाय बनाम बहुजन हिताय के विवाद की ओर ले जाता है और दूसरी ओर कला के लिए कला या जीवन के लिए कला की ओर! लेकिन कुंवर जी इस सवाल को व्यष्टि और समष्टि के अंतर्संबंध से भी जोड़ देते हैं, 'मैं इन्हें विभाजित करके नहीं देखता हूँ। चीजें सापेक्ष होती हैं। एक कविता के लिए, एक चित्रकार के लिए गुलाब का महत्त्व है, लेकिन कैसे इसके बारे में हम समग्रतापूर्वक सोचें, यह क्षमता अब क्षीण हो गई है। यह शायद विज्ञान ने किया है। हम तार्किक विश्लेषण करने लगे हैं। हमारे जीने और देखने में ये विरोधाभास है कि हम जीते और तरीके से हैं जबकि सोचते और तरीके से हैं। समाज इंटीगरल रूप में है इसीलिए हम व्यक्ति और समाज को एक-दूसरे के पूरक मानते हैं। एक भला आदमी उतना ही सामाजिक होता है जितना निजी होता है।'


'मुझे कभी-कभी लगता है कि साहित्य एक ऐसी विधा है जो हर कला और विषय के बारे में अपनी एक सोच रखती है। एक राजनीतिज्ञ विशुद्ध रूप से राजनीतिज्ञ होता है और एक चित्रकार विशुद्ध रूप से एक चित्रकार। इस मायने में सत्यजीत रे को मैं उद्धृत करना चाहूँगा। वे साहित्यकार भी उतने ही बड़े थे जितने बड़े फिल्मकार। प्रेमंचद की कहानी 'शतरंज के खिलाड़ी' पर फिल्म बनाने के दौरान लखनऊ में अक्सर मेरे घर आकर बैठते थे। यह जानकर किसी को आश्चर्य हो सकता है कि वे वाल्टर बेंजामिन पर भी मेरे साथ उतने ही अधिकार से बातचीत करते थे जितनी फिल्मों पर', उन्होंने बतलाया।


अपने भीतर अपार जिजीविषा और जीवनानुभव का एक विराट संसार संजोए आज भी सक्रिय हैं कुंवर नारायण। उनका पूरा का पूरा रचना संसार इसका गवाह है। एक नहीं, कई-कई मौत के साक्षी रहे और खुद जानलेवा बीमारी को परास्त कर चैरासी साल की उम्र के कुंवरजी आज एक दार्शनिक, विचारक, इतिहासद्रष्टा, कला के विभिन्न माध्यमों का पारखी और कई-कई रूपों में हमारे बीच विद्यमान है।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

हिंदी की पहली अहम लड़ाई उसके अपने ही सांस्थानिक ढांचों से है: उदय प्रकाश


उदय प्रकाश

मित्रो, 
20 वीं सदी के उत्तरार्ध और 21 वीं सदी के जिस शुरुआती दौर के हम गवाह हैं यह एक भयानक समय है. यह एक ऐसा डरावना समय है जिसमें सत्ताएँ अपनी गिरोहबंदी, जातिवाद, क्षेत्रीयतावाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्ट आचरण वगैरह की वजह से व्यापक लूटतंत्र का हिस्सा बनकर आम जनता का विश्वास खो चुकी हैं. ऐसे कठिन समय में एक लेखक नाफा-नुकसान की फिक्र किए बगैर अपनी कहानियों और कविताओं में इस जटिल समय की माइक्रो रियलिटी को बेबाक तरीक़े से अभियक्त करने के ख़तरे उठाता रहा है और इसकी सज़ा भी भुगतता रहा है. हेर-फेर में लगी इन सत्ताओं को बार-बार आईना दिखाने का दुस्साहस करनेवाले इस कथाकार, कवि, पत्रकार, फिल्मकार का नाम है उदय प्रकाश. आज 17 सितम्बर के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली संस्करण में उदय प्रकाश ने हिंदी के सत्ता समाज में सक्रिय ऐसे ही मठाधीशों को आईना दिखाने वाला एक लेख लिखा है. आपकी खिदमत में पेश है, दैनिक भास्कर से साभार. पसंद आए तो श्री विमल झा को शुक्रिया बोल सकते हैं न पसंद आए तो...आपकी मर्ज़ी ! शुक्रिया. - शशिकांत    

सारे पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों को छोड़ कर इस सच को अब मान ही लेना चाहिए कि ‘हिंदी’ एक बहुत अधिक समस्याग्रस्त शब्द है। यह उतना निरापद और एकार्थी, सीधा-सादा और निर्दोष, सर्वानुमोदित और निर्विवाद शब्द नहीं है, जैसा इसके समर्थक और हिंदी से जुड़े राजकीय अथवा निजी संस्थान या व्यावसायिक उद्यम, जिसमें कई तरह के हित-समूहों के वर्चस्व के अधीन अखबार और मीडिया चैनल भी शामिल हैं, अपने-अपने विद्वानों के साथ दावा करते रहते हैं। 

हिंदी कोई ऐसी भाषा नहीं है, जो अपने विकास के किसी चरम को हासिल कर चुकी है और अब हमेशा के लिए जड़ीभूत हो कर स्थिर हो चुकी है। यह न संस्कृत की फॉसिल (जीवाश्म) है, न अन्य जीवित देशी-विदेशी-इलाकाई भाषाओं के साथ लगातार और रोजाना सहवास से अपवित्र और कुलटा हो चुकी उसका ऐसा ‘अपभ्रंश’, जिसे दैवी तत्सम के मंत्रोच्चार से पवित्र बनाने का राजसूय यज्ञ इसके राज-पुरोहित करने में खुसरो-भारतेंदु-प्रेमचंद युग से लेकर आजतक लगे हुए हैं। 

यानी तबसे, जब से यह भाषा किसी कदर आधुनिक होकर जीवित ‘जनभाषा’ हो पाने के अपने अनिवार्य संघर्ष में पहली बार कभी सक्रिय हुई थी। इसके व्यावहारिक शब्दकोष में अब हर रोज इतने परदेशी और विजातीय शब्द सम्मिलित हो रहे हैं कि इसे थामा नहीं जा सकता। इसे न हिब्रू बना कर संरक्षित किया जा सकता है, न जेड या अवेस्ता। असली हिंदी जीवित जन-भाषा के रूप में बचे रहने के लिए प्राणपन से जूझ रही है। 

हिंदी की पहली अहम लड़ाई उसके अपने ही सांस्थानिक ढांचों, जो प्रतिगामिता और अतीतजीवी जड़ता के असली अड्डे या ‘मठ’ हैं, के साथ है। ठीक इसी तरह, इतनी ही गंभीर और निर्णायक लड़ाई इस भाषा की अपनी ही बद्धमूल अवधारणाओं और लगभग अंतिम तौर पर परिभाषित कर डाली गईं उन व्याख्याओं-विधानों-संहिताओं-प्रत्ययों के साथ है, जो और कुछ नहीं, इस भाषा के ही भीतर प्रच्छन्न रूप में सक्रिय हिंदीभाषी पट्टी की सामाजिक-जातीय-क्षेत्रीय संरचनाएं हैं। इन संरचनाओं की शिनाख्त और इनको समझे बिना किसी ‘भाषा’ के रूप में हिंदी के बारे में कोई वास्तविक विमर्श मुमकिन नहीं है। 

बीसवीं सदी में प्रख्यात भाषा-चिंतक वोलासिनोव, जिन्हें हम बाख्तिन के नाम से भी जानते हैं, ने किसी भी भाषा के हर शब्द को एक ऐसा संकेतक माना था, जो उस भाषा को बोलने वाले अलग-अलग वर्गों-समूहों को अलग-अलग, और अक्सर अंतर्विरोधी संकेत देता था। यानी किसी भी ‘शब्द’ का कोई भी एक ‘अर्थ’ सर्वानुमोदित, वर्गातीत और समाज-निरपेक्ष नहीं होता। जब कोई भी समाज अपने परिवर्तन के सबसे उथल-पुथल से भरे अतिसंवेदनशील और परिवर्तनकारी दौर में दाखिल होता है तो किसी भी भाषा का हर शब्द उन्हीं परस्पर विरोधी टकराहटों का केंद्र या नाभिक बन जाता है, जिन टकराहटों और अंतर्विरोधों से वह समाज गुजर रहा होता है। 

इतिहास गवाही देता है कि अठारहवीं सदी में फ्रांस में निरंकुश राज्यतंत्र को सत्ता से अपदस्थ करने वाला लोकतंत्र तब जन्मा था, जब ‘भूख’ जैसे मामूली और बुनियादी मानवीय शब्द का अर्थ राजा-रानियों के लिए ‘केक’ और गरीब जनता के लिए ‘रोटी’ हो गया था। एक ही भाषा के बिल्कुल साधारण और निरापद से लगने वाले शब्द ‘भूख’ के भीतर मौज़ूद दो अलग-अलग विरोधी संकेतों के ऐतिहासिक, सभ्यतामूलक महासमर के रक्तपात के बीच ही उस सन् 1789 वाले महान लोकतंत्र का जन्म हुआ था, जिसमें हम आज भी रह रहे हैं। 

आज भी हम जिन संकेतों अथवा शब्दों को अच्छी-खासी लापरवाही और बिना दुविधा के इस्तेमाल करते हैं, मसलन- ‘विकास’, ‘अधिकार’, ‘संपन्नता’, ‘शिक्षा’, ‘चिकित्सा’, ‘घर’ आदि, वे भी एकार्थी और सर्वानुमोदित या लोकानुमोदित नहीं हैं। इन सारे शब्दों के भीतर अर्थों-अभिप्रेतों के विकट अंतर्विरोध हैं। ‘केक’ और ‘रोटी’ की तरह ही, आर्थिक असमानता की हर रोज दुर्लंघ्य होती जाती खाई और अलग-अलग जातीय-वर्गीय समुदायों के बीच लगातार बढ़ी टकराहटों की वजह से, आज हिंदी भी गृहयुद्ध की स्थिति में हैं। 

सच तो यह है कि आज की व्यवहार में आने वाली हिंदी का कोई एक रूप नहीं है। इसमें इलाकाई ही नहीं, जातीय भिन्नताएं भी बहुत हैं, जो मीडिया और उच्च-वर्गीय साहित्यिक-सांस्कृतिक अथवा राजकीय हिंदी में भले ही न दिखता हो, लेकिन सृजनात्मक लेखन और बोल-चाल के धरातल पर आते ही, उसकी विविधता सामने आ जाती है। इस विविधता को सपाट नहीं किया जा सकता। यह न सिर्फ अलोकतांत्रिक होगा, बल्कि बहुतेरे कारणों से हर रोज बदलती हिंदी के विकास के विरुद्ध यह एक प्रतिगामी कदम होगा। 

सबसे बड़ी और क्षेत्र-जाति-धर्म बहुल भाषा होने के कारण ‘हिंदी’ अब निस्संदेह ‘पानीपत का मैदान’ या ‘महाभारत का कुरुक्षेत्र’ बन चुकी है। याद रखें, भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, एक मानवीय संसाधन भी है, जिस पर किसी भी अस्मिता या जाति के एकाधिकार को लंबे समय तक बनाए रखने की कोई भी दुरभिसंधि, वह चाहे जिन उदार, आधुनिक या प्रगतिशील मुखौटों के साथ प्रस्तुत हो, पहले की तरह अब अगोचर नहीं रह सकती। इसका छद्म उघड़ चुका है और यह अब भाषा के भीतर किसी भी प्रतिगामी और दकियानूस, लेकिन फिर भी वर्चस्वशील भ्रष्ट और क्रूर सत्ता-संरचना के रूप में पहचानी जा चुकी है। 

संयोग से वर्णाश्रम व्यवस्था की मध्यकालीन सामंती संस्कारों और जातीय बनावट में आज भी जी रहे हिंदी-समाज की भाषा हिंदी ही है, जो एक तरफ अब इस दायरे से बाहर निकल कर अन्य समाजों की ओर और दूसरी तरफ देश के अन्य सार्वजनिक संसाधनों (जिनमें से एक भाषा भी है) और अवसरों पर लोकतांत्रिक अधिकारों और बहुसंख्यक जातीय समुदायों की आनुपातिक साझेदारी के लिए बढ़ते दबावों को झेल रही है। 

साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और जन-संचार माध्यमों के इलाकों में किसी एक या एकाधिक खास जातियों की अब तक चली आ रही इजारेदारी के सामने यह पहली बड़ी ऐतिहासिक चुनौती का समय है। अपने हितों और लंबे निरंकुश भ्रष्ट शासन की हिफाजत में विचारधाराओं और छद्म राष्ट्रवाद से लेकर धर्म और संस्कृति जैसे तमाम महावृत्तांतों के वागाडंबर से खड़ी की जा रही इसकी भ्रष्ट किलेबंदी के विरुद्ध अब किसी एक वास्तविक भाषाई जन-लोकपाल की प्रतीक्षा है, जो इस भाषा पर भ्रष्ट जातिवादी वर्चस्व को तोड़ सके। 

अभी दो-तीन साल पहले हिंदी के व्यावहारिक-रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली साझी-शब्दावली या ‘शेयर्ड वोकेबुलरी’ में अंग्रेजी और अन्य विजातीय (विदेशी नहीं) शब्दों की बेतहाशा बढ़ती जाती संख्या के भय में ‘हिंदी के क्रियोलीकरण’ का मुद्दा बहुत जोर-शोर से उठाया गया था। यह निरर्थक था। सबसे अधिक भय अंग्रेजी के प्रति पैदा किया जा रहा था। अगर ध्यान से देखें तो स्वयं अंग्रेजी भी आज अन्य भाषाओं के शब्दों से अटी पड़ी है। 

अब यह ब्रिटिश राज की शाही और पवित्र अंग्रेजी नहीं है, जिसके पुरोधा नीरद सी. चौधरी जैसे लोग माने जाते थे, अब अंग्रेजी आप्रवासियों ही नहीं, उन सभी देशों-समाजों की भाषाओं के शब्दों की भीड़ से घिर चुकी है, जहां-जहां वह विश्व-भाषा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की भाषा होने के कारण पहुंच रही है। पॉपुलर कल्चर, कालसेंटर और आउटसोर्सिंग ने खुद अंग्रेजी को बदल डाला है। यही अंग्रेजी के लगातार विकसित होने की वजह और शक्ति भी है। सवर्ण पारंपरिक तत्सम प्रधान हिंदी अगर देखें तो खुद संस्कृत का क्रियोल है और इसकी वर्जनाएं इसकी अधोगति और जड़ता का कारण बनेंगी। 

ऐसा ही एक मुद्दा ‘लिपि’ को लेकर भी है। क्या आज की विस्तृत होती, अन्य भाषाई-सांस्कृतिक इलाकों और देशों तक पहुंचती जाती हिंदी को सिर्फ किसी एक लिपि में कैद रखा जा सकता है ? यूनिकोड और मोबाइल-नेट की नई संस्कृति की नई दखल ने हिंदी की लिपि-बद्धता की सीमाओं को लांघना और तोडऩा शुरू कर दिया है। 

यह सच है कि अभी तक किसी भी भाषा की लिपियां और उसकी वर्णमालाएं महज किसी भाषा को लिखित में संरक्षित करने का माध्यम या उपकरण भर नहीं, बल्कि जातीय-सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी थीं। लेकिन आज हम जिस सार्वभौमिक यथार्थ के सामने हैं, उसने अपने लिए एक अनोखी और ऐतिहासिक दृष्टि से अभूतपूर्व ‘लिपि-संसार’ का निर्माण भी करना शुरू कर दिया है। हम अब सिर्फ आर्थिक-राजनीतिक ग्लोबल-गांव में ही नहीं रह रहे हैं, बल्कि धीरे-धीरे ‘ग्लोबल-लिपिग्राम’ के वाशिंदे भी होते जा रहे हैं। दूसरे कई देशों की लिपियां अपनी मूल भाषाई परिवार और अब तक जड़ीभूत हो चुकी सांस्कृतिक-चिन्हों को छोड़ कर, दूसरी, विजातीय लिपियों को अपनाने लगी हैं। 

अगर आपको याद हो तो जब तुर्की के आधुनिक और लोकप्रिय नेता कमाल अतातुर्क ने तुर्क-भाषा को उसकी पुरानी मध्यपूर्वी अरबी-फारसी लिपि से मुक्त करके, आधुनिक पश्चिमी यूरोप की रोमन लिपि से जोड़ा था और इसके लिए सख्त राजकीय आदेश निकाले थे, तब उनका धार्मिक कट्टरपंथियों ने बहुत विरोध किया था। लेकिन अगर तुर्क-भाषा पश्चिमी लिपि से जुड़ कर आधुनिक न हुई होती तो उसमें क्या नाजिम हिकमत जैसे कवि और ओरहान पामुक जैसे नोबेल पुरस्कार प्राप्त कथाकार हो पाते। यह प्रक्रिया आज और भी तेज है। 

अल्जीरिया और मोरक्को जैसे देश भी अपनी भाषाओं के लिए अरबी को छोड़कर रोमन अपना रहे हैं। सबसे रोचक और ताजा उदाहरण तो चेचन्या का है, जहां जब तक रूस का दबदबा रहा, उसकी भाषा की लिपि ‘क्रिलिक’ थी, जिसमें रूसी भाषा लिखी जाती थी, आजाद होने के बाद वहां भी रोमन अपनाई जा चुकी है। 

हिंदी के साथ भी यह होगा। ऐसा होना भी चाहिए तभी यह मात्र एक-दो जातियों की औपनिवेशिक दासता की जंजीरों से मुक्त होकर आधुनिक संसार में सांस ले सकेगी।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

युवा पीढ़ी में लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेने का उत्साह



मूसलाधार बारिश में भीगते हुए सैकड़ों छात्र-छात्राएं मोतीलाल नेहरू कॉलेज (साउथ कैम्पस) के गेट पर आज सुबह ८ बजे से ही स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में वोट डालने के लिए लाइन लगाकर खड़े थे. युवा पीढ़ी में लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेने का उत्साह और जूनून देख कर लगा कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र की ज़मीन बहुत मज़बूत है. काश, हमारे लोकतंत्र के पहरुओं को यह बात समझ में आ जाए और वे मुल्क़ की लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ न करें.