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September, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अदम्य जिजीविषा का विनम्र कवि कुंवर नारायण

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मित्रो, बीते 19 सितम्बर को हिंदी के सम्मानित कवि कुंवर नारायण 85 वें साल में प्रवेश कर गए. कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिंदी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है. उनकी ख्याति सिर्फ लेखक की तरह नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखनेवाले रसिक विचारक की भी है. आज के 'हिंदुस्तान' में पढ़िए कुंवर जी पर मेरा आत्मीय आलेख शुक्रिया. - शशिकांत 'मेरी मां, बहन और चाचा की टीबी से मौत हुई थी। यह सन् 35-36 की बात है। मेरे पूरे परिवार में प्रवेश कर गयी थी टीबी। उन्नीस साल की मेरी बहन बृजरानी की मौत के छह महीने बाद 'पेनिसिलीन' दवाई मार्केट में आयी। डॉक्टर ने कहा था, 'छह महीने किसी तरह बचा लेते तो बच जाती आपकी बहन।' बीच में मुझे भी टीबी होने का शक था। चार-पाँच साल तक हमारे मन पर उसका आतंक रहा। ये सब बहुत लंबे किस्से हैं। बात यह है कि मृत्यु का एक ऐसा भयानक आतंक रहा हमारे घर-परिवार के ऊपर जिसका मेरे लेखन पर भी असर पड़ा।

मृत्यु का यह साक्षात्कार व्यक्तिगत स्तर पर तो था ही सामूहिक स्तर पर भी था। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद सन् पचपन में मैं पौलेंड गया थ…

हिंदी की पहली अहम लड़ाई उसके अपने ही सांस्थानिक ढांचों से है: उदय प्रकाश

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मित्रो,  20 वीं सदी के उत्तरार्ध और 21 वीं सदी के जिस शुरुआती दौर के हम गवाह हैं यह एक भयानक समय है. यह एक ऐसा डरावना समय है जिसमें सत्ताएँ अपनी गिरोहबंदी, जातिवाद, क्षेत्रीयतावाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्ट आचरण वगैरह की वजह से व्यापक लूटतंत्र का हिस्सा बनकर आम जनता का विश्वास खो चुकी हैं. ऐसे कठिन समय में एक लेखक नाफा-नुकसान की फिक्र किए बगैर अपनी कहानियों और कविताओं में इस जटिल समय की माइक्रो रियलिटी को बेबाक तरीक़े से अभियक्त करने के ख़तरे उठाता रहा है और इसकी सज़ा भी भुगतता रहा है. हेर-फेर में लगी इन सत्ताओं को बार-बार आईना दिखाने का दुस्साहस करनेवाले इस कथाकार, कवि, पत्रकार, फिल्मकार का नाम है उदय प्रकाश. आज 17 सितम्बर के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली संस्करण में उदय प्रकाश ने हिंदी के सत्ता समाज में सक्रिय ऐसे ही मठाधीशों को आईना दिखाने वाला एक लेख लिखा है. आपकी खिदमत में पेश है, दैनिक भास्कर से साभार. पसंद आए तो श्री विमल झा को शुक्रिया बोल सकते हैं न पसंद आए तो...आपकी मर्ज़ी ! शुक्रिया. - शशिकांत    
सारे पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों को छोड़ कर इस सच को अब मान ही लेना चाहिए कि ‘हिंदी’ एक बहुत…

युवा पीढ़ी में लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेने का उत्साह

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मूसलाधार बारिश में भीगते हुए सैकड़ों छात्र-छात्राएं मोतीलाल नेहरू कॉलेज (साउथ कैम्पस) के गेट पर आज सुबह ८ बजे से ही स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में वोट डालने के लिए लाइन लगाकर खड़े थे. युवा पीढ़ी में लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेने का उत्साह और जूनून देख कर लगा कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र की ज़मीन बहुत मज़बूत है. काश, हमारे लोकतंत्र के पहरुओं को यह बात समझ में आ जाए और वे मुल्क़ की लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ न करें.