रविवार, 27 फ़रवरी 2011

एक पुस्तक प्रेमी पोर्न स्टार से लन्दन के पब में साक्षात्कार : फ्रेंक हुज़ूर

लन्दन के मशहूर 'हार्प' पब में वीक-एंड की एक रंगीन शाम
"आई एम अ पोर्न स्टार. मैं स्टोकहोम, स्वीडन की बाशिंदा हूँ. 15 साल की उम्र से ही पेरिस और लन्दन की गलियों में गुलज़ार हूँ. क्या आपने 'दि गर्ल हू प्लेड विद फ़ायर' नॉवेल  पढ़ा है? जो कहानी इस नॉवेल की हीरोइन लिसाबेथ (Lisbeth Salander) की है, वही अफ़साना मेरा हैं. ये अफ़साना स्वीडन के फ्लैश मार्केट में चाइल्ड र्ट्रैफिकिंग का एक बेहतरीन नमूना हैं. मैं भी उसी बाज़ार से होते-होते गुजिस्ता दस सालों में अब मुरझाने सी लगी हूँ.":मिशेल. 

लन्दन के मशहूर पब 'हार्प' में वीक-एंड की एक रंगीन शाम मिशेल के साथ अनायास हुई अपनी मुलाक़ात की फ़ीचर-रपट पेश कर रहे हैं फ्रेंक हुज़ूर अपनी 'लन्दन डायरी' में. - शशिकांत 



"अब के गर तू मिले तो हम तुझसे ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ" अहमद फ़राज़ की यह ग़ज़ल दिल-ओ-दिमाग़ पर रह-रह के हमला करती है, जब भी मेरी नज़र लन्दन के हर गलियों में गुलज़ार पब में मदहोश पब्लिक पर पड़ती हैं. यूँ तो शुक्रवार और शनिवार की हर वो शाम लन्दन के करीब 2000 पबों के लिए महफ़िल सा शमा लाती हैं, जहां वीकेंड की धूम भरी महफ़िल हर दिल को जवाँ कर देती हैं. क्या जवाँ दिल और क्या बुजुर्ग, सभी की मस्त निगाहों में मोहब्बत और खुलूश का नशा गुलज़ार हो उठता हैं. 

सेंट्रल लन्दन के चार्रिंग क्रॉस से थोड़ी ही दूर है लन्दन का मशहूर पब- 'हार्प.' पूरे ब्रिटेन के करीब ५२,000 पबों में इसे सबसे हरदिल अज़ीज़ पब का दर्ज़ा हासिल है.

मिशेल से मेरी मुलाक़ात 'हार्प' में उस वक़्त हुई जब उसने बड़े एहतराम से मुझसे बियर की एक पैग लेने की गुज़ारिश कर डाली. थोड़ी देर के लिए तो मेरे होश उड़ गए, मगर जल्दी ही मैंने खुद को संभाला और मिशेल की मुस्कान के नाम मैंने बार टेंडर को एक लार्ज गिनिस बियर के ग्लास के लिए इशारा कर दिया. 

पब के जोशीले माहौल में लडकियां यहाँ ऐसा खूब करती हैं. खासकर जब वो देखती हैं कि कोई लड़का बिना किसी गर्लफ्रेंड के ग़मज़दा सा चमन का दीदार का भूखा है तो 'कैन यू बाई मी अ ड्रिंक?' कहती हुई करीब आ जाती हैं. मिशेल ने भी मुझसे यही कहा. ज़्यादा उम्रदराज भी नहीं.सुर्ख होठों पर गज़ब सा नशा. बॉब कट बाल उसके कानों को जैसे सहला रहे हैं. सफ़ेद रंग के पुल्लोवर के ऊपर उसने काले कलर का ओवेरकोट पहन रखा है. हाईट कोई पांच फुट पांच इंच.

मेरी नज़र चेहरे पर से फिसलती हुई मिशेल की टांगों पर पड़ी. उसके गोरे जिस्म पर काले रंग का लिबास देख असद बदायूंनी का वो शेर याद आ गया- "ज़मीन से खला की तरफ़ जाउंगा, वहां से खुदा की तरफ़ जाउंगा. बुखारा-ओ-बग़दाद-ओ-बसरा के बाद, किसी कर्बला की तरफ़ जाउंगा. चमन से बुलावा बहोत है मगर मैं दस्त-ए-बला की तरफ़ जाउंगा."

मिशेल में मेरी दिलचस्पी धीरे-धीरे गहरी होने लगी. वक़्त का खज़ाना मेरे पास भी पूरा है और मिसेल भी खूब फ़ारिग है आज की शाम. हार्प पब चारो तरफ शराबियों के शोर से सराबोर. बैठने के लिए न बेंच पर  कोई किनारा दिख रहा है न कोई  स्टूल. खड़े-खड़े हम दोनों ने दीवार के सहारे फायरप्लेस पर अपने ग्लास को रेज़ किया और गुफ्तगू का आगाज़ हुआ. थोड़ी देर के लिए मुझे गफ़लत भी हुईं कि लन्दन की ये लड़की अपना बियर ख़त्म करते ही रफ़ू चक्कर हो लेगी और मुझे किसी और नाज़नीन के लिए ड्रिंक खरीदना न पड़ जाए.

बहरहाल, मैंने मिशेल से जानना चाहा कि उसका पेशा क्या हैं. जब तक मिशेल आगे कुछ कहती, उसने अपने कोट के अन्दर से एक नोवेल निकला. मेरी नज़र नावेल के टाईटल पर पड़ी जिस पर लाल रंग में खुदा हुआ था- 'दि गर्ल हू प्लेड विद फायर.' रायटर का नाम स्टिग लारस्सन.( Stieg Larsson) नॉवेल और उसकी टाइटल मेरी नज़रों में गड़ती जा रही थी, तभी मिशेल ने एक बम-सा गिराया मेरे कानों  के पर्दों पर- 'आई एम अ पोर्न स्टार.' 

जैसे ही ये लफ्ज़ मैंने सूना थोड़े वक़्त के लिए बस मेरी निगाहें मिसेल की आँखों में सैर करने लगी और ऐसा लगा जैसे उसकी आँखों में एक गहरी सुरंगनुमा खाई है और उसका कोई आखिरी मोड़ मुझे नज़र नहीं आ रहा हैं. सोहो (लन्दन का रेडलाइट एरिया) की सरपट गलियों के बहुत क़रीब होकर भी मैंने किसी सेक्स वर्कर से मिलने की उम्मीद ज़रूर लगाई थी, मगर किसी पोर्न स्टार से मेरी मुलाक़ात 'हार्प' पब में यूँ होगी, जिसके हाथों में एक नोवेल होगा, मैंने तसव्वुर भी नहीं किया था. ज़िन्दगी शायद ऐसे ही लम्हों का एक नोवेल हैं.

मिशेल ने 'पोर्न स्टार' लफ्ज़ का इजहार बेहद संजीदगी से किया और उसके चहरे पर किसी भी क़िस्म का शिकन मैंने नहीं देखा. बिल्कुल बिंदास और अपने होशो-हवाश में वो गुफ़्तगू कर रही थी. उसने गिनिस का एक सिप लेते हुए मुझसे पूछा कि मैं क्या करता हूँ. मैंने कहा, 'मैं शब्दों के साथ थोड़ी सी अवाराखानी करता हूँ. आजकल एक मशहूर प्लेबॉय, जो मज़हब का सहारा लेकर अपने मुल्क के लोगो को जन्नत का ख्वाब बेचता है, उसकी ज़िन्दगी का अफ़साना लिख कर कुछ और करने की कोशिश कर रहा हूँ.' 

यह सुनकर मिशेल की सुर्ख होठों पर मुस्कराहट फ़ैल गई. 'फोरगेट मी, मिशेल. आई वांट टू नो यू,' मैंने कहा. "मैं स्टोकहोम,स्वीडन की बाशिंदा हूँ. मगर 15 साल की उम्र से ही पेरिस और लन्दन की गलियों में गुलज़ार हूँ. क्या आपने इस नॉवेल को पढ़ा है?" पूछते हुए  मिशेल ने 'दि गर्ल हू प्लेड विद फायर' को मेरे आँखों के सामने हिलाया. मैंने लार्सान के इस नॉवेल के मुताल्लिक़ सुना भी नहीं था. मिशेल कहती है, "जो कहानी इस नोवेल के हेरोइन लिसाबेथ (Lisbeth Salander) की है, वही अफ़साना मेरा हैं. ये अफ़साना स्वीडन के फ्लैश मार्केट में चाइल्ड र्ट्रैफिकिंग का एक बेहतरीन नमूना हैं. मैं भी उसी बाज़ार से  होते-होते गुजिस्ता दस सालों में अब मुरझाने सी लगी हूँ."

मिशेल के बात करने का अंदाज़ मुझे मदहोश करने लगा था. मैं उसकीं अंग्रेजी के धीमे एक्सेंट को एन्जॉय कर रहा था जिसमें क्लियरिटी थी. वो आगे कहती है, "पोर्न इंडस्ट्री में जब एक कमसिन हसीना 15 साल की होती हैं तब उसका रुतबा मर्लिन मुनरो जैसा होता हैं. जब वो पचीस साल की हो जाती हैं तो उसे बेकार और बूढी समझा जाने लगता हैं. मैं भी पचीस साल की हूँ और अब मुझमे वो नशा नहीं पाया जाता, जब मैं लोलिता की तरह आई थी."
फ्रेंक हुज़ूर 'हार्प' पब में
'आखिर उसे यह सफ़र कितना मज़ेदार लगा?' मेरे इस सवाल ने मिशेल को जैसे पुराने दिनों की गलियों में धकेल सा दिया. थोड़े वक़्त के अंतराल के बाद वो थोड़ी मेरी तरफ झुकी और मेरी आँखों में घूरते हुए कहा, "जब मैं लोलिता वाली उम्र में थी, मुझे अपने बॉयफ्रेंड के साथ ओउटडोर सेक्स करना बेहद रोचक लगता था. हम वीकेंड पर कार लेकर सडकों पर खूब मस्ती करते. सुनसान सड़कों को देखते ही कपडे खोल कर फेंक देते और एक दूसरे में समां जाते...

'मेरे स्कूल के साथी आंद्रे के पापा पोर्न इंडस्ट्री के टॉप शॉट थे. एक दिन उन्होंने हम दोनों को गार्डेन में सेक्स करते देख लिया. फिर क्या था. उन्हें मेरा अंदाज़ इतना नशीला लगा कि उन्होंने मेरे लिए बहुत सारे लेंट चोकोलाते का बंडल ला दिया. लेंट चोकोलाते की खुशबू मेरी कमजोरी थी. आंद्रे के साथ के मेरे सेक्स रोम्प को कैमरा में क़ैद करने के बाद स्वीडन के पोर्न इंडस्ट्री में उसकी खूब कीमत लगी और देखते-देखते मैं काफी पैसा बनाने लगी...

'मैंने अपने मम्मी पापा को ये कहा कि मैं पेरिस जा रही हूँ और फिर लन्दन स्टडी के लिए. और वो मान गए. सबसे ज़्यादा मज़ा मुझे पेरिस की ओर्गिस में आता था. हर बार नए-नए लड़कों के जिस्म से खेलना मेरा शौक़ बन गया था. और फिर पैसे भी खूब मिलते थे. मगर जैसे-जैसे मेरी उम्र बीस के ऊपर जाने लगी पोर्न बाज़ार में मेरी कीमत कम होने लगी. अंग्रेजों के मुकाबले फ्रेंच ज़्यादा मज़ेदार हैं मस्ती के इस खेल में.'

मिशेल की बातों का मेरे दिमाग़ पर गहरा असर होता जा रहा था. उससे मैंने सवाल किया, "तुमने मुझे ही क्यों ड्रिंक के लिए चुना, जबकि यहाँ 'हार्प' में इतने गोरे मजमा लगाए हुए हैं?" मिशेल कहती है, "मुझे अपनी जैसी चमड़ी वालों पर ड्रिंक खरीदने का उतना एतबार नहीं रहा जितना की तुम्हारे जैसे एशियन पर. तुम एशियन, ब्लैक बालों वाले ज़्यादा ज़ेनेरस होते  हों और लड़कियों के मामले में बेहद संगीन. मैं अब खुद ड्रिंक कभी नहीं खरीदती. कोई भी पोर्न स्टार अपने वाल्लेट से ड्रिंक नहीं लेता. उसे आदत हो चली होती हैं मनचले लड़कों से हर चीज़ लेने की, उसमे ड्रिंक भी ज़रूरी चीज़ हैं." 

मिशेल ने यह कहकर  मुझे थोड़ा हैरत में डाल दिया कि गोरे लड़के एक पेनी भी किसी लड़की पर उडाना पसंद नहीं करते जब तक कि कोई महबूब साथ न हों. मिशेल ब्रिटिश लड़कियों को उतनी एरोटिक नहीं मानती जितनी वो अपने मुल्क स्वीडन या फ्रांस की हसीनाओं को मानती है.

लन्दन पब के इस खूबसूरत हाट में गोरी, काली और पीली लड़कियों की एक से एक दिलचस्प अफसाने 
हैं. लोगबाग यहाँ हर साल करीब 18 अरब पौंड का शराब और बीयर पी जाते हैं और क्लबिंग और गम्बलिंग में भी अरबों पौंड का जुआ खेलते हैं.  लड़कियां हमसफ़र होती हैं और हर लम्हे में नशा घोल रही होती हैं.

मिशेल की कहानी मेरे लिए अजूबा नहीं थी, मगर ये हादसा ज़रूर कुछ सबक सिखा गया. चलते चलते जब मिशेल को मैंने कहा की मेरा वतन हिंदुस्तान है तो वो खिलखिला के हँस पड़ी और बोली, "वाउ, हिंडुस्टान... दि लैंड ऑफ़ कामसूट्रा. यू गाइज़ वाच अ लॉट ऑफ़ पोर्न. आय नो. हाउ मेनी ऑफ़ यू आर ओवर अ बिलियन."

लन्दन और आसपास के शहरों के पब को देखकर एक एहसास यह होता हैं कि वाइन, व्हिस्की, बिअर और सिदर के अलावा हर पब का अपना ख़ास साइन बोर्ड हैं. ये साइन बोर्ड ब्रिटेन पब संस्कृति के हेरिटेज को बखूबी दर्शातें हैं. हेनरी ८ ने जब तक कैथोलिक चुर्च से बगावत नहीं की थी तब पब के साइन बोर्ड मजहबी सिम्बल ज्यादा होते थे मगर उसके बाद 'किंग'स हेड', 'कुईं'स हेड', 'शकेस्पारे', 'कूपर आर्म्स', 'टोबी कार्वेरी', 'रोज़ गार्डेन' और जितने भी रोमांटिक हो सकते हैं, होने लगे. कुछ पब के नाम 'दि क्रिकेटर', 'स्मगलर हंट' और 'हाइवे मैन' भी है.

मिशेल है तो स्वीडन की मगर उसने मुझे ब्रिटेन के मर्दों और लड़कियों की अजीब सी दास्ताँ से रूबरू कराया.


(फ्रेंक हुज़ूर लेखक और स्वतंत्र पत्रकार हैं. लन्दन में रह रहे हैं. सुप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी  इमरान खान  पर लिखी उनकी किताब "इमरान वर्सेस इमरान : द अनटोल्ड स्टोरी" जल्दी ही प्रकाशित होनेवाली है.  उनके साथ frankhuzur@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.)

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

साथियो, स्त्री और विज्ञापन मसले पर लगातार बहस होती रही है. सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी लेखिका प्रभा खेतान जी से 2003 में IIC में इंटरव्यू में जब मैंने यह सवाल किया कि- "ये बताइये, विज्ञापनों में स्त्री के इस्तेमाल का दक्षिणपंथी भी विरोध करते हैं और वामपंथी भी. दोनों के विरोध में क्या फर्क है?" आदरणीय प्रभा जी नरभसा गईं. बेशक विज्ञापन का बाज़ार स्त्री को मौक़ा, रोज़गार, पैसा, आइडेनटिटी...बहुत कुछ दे रहा है...स्त्री की देह उसकी देह है, वो जैसा चाहे इस्तेमाल करे, पुरुष कौन होता है स्त्री देह की शुचिता का चौकीदार?...मामला बेहद जटिल है...देहवादी महिलाओं की अलग धारणा है, गैर देहवादी की भिन्न. जनसत्ता (20 मई 2000 और 8 जनवरी 2002) तथा SFI की पत्रिका  'स्टूडेंट स्ट्रगल'  के फरवरी 2002 अंक में प्रकाशित 3 लेखों को मिलाकर पेश कर रहा हूँ यह लेख. - शशिकांत

विज्ञापन, बाज़ार और स्त्री 
पिछले दिनों अंग्रेज़ी के एक अखबार (THE HINDU) ने पहले पन्ने पर एक आयुर्वेदिक दवा कंपनी का विज्ञापन छापा. विज्ञापन की पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं: "क्या आपकी पत्नी हर सुबह आपको इस फल (करेले का चित्र) का रस पिलाने की जिद करती है? एक अच्छी पत्नी आपकी हर समस्या का ख़याल रखती है और उसमें आपकी भागीदार बनती है...."
इसी तरह, करवा चौथ के मौक़े पर दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी के एक अखबार (हिन्दुस्तान) में पहले पन्ने पर एक अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा संस्थान से संबद्ध एक हेल्थकेयर सेंटर का विज्ञापन छपा. विज्ञापन में नीले आकाश में चौथ के चाँद के चित्र के नीचे मोटे अक्षरों में जो सन्देश दिया गया था, वह इस तरह है: "इस करवा चौथ केवल चाँद की तरफ नहीं अपने पति की सेहत की तरफ भी देखिए. हर साल आपने उनकी सेहत और लम्बी उम्र के लिए व्रत रखा. इस साल अपनी प्रार्थना को सशक्त कीजिए. उन्हें .....हेल्थ केयर सेंटर के प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप का उपहार दीजिए." 
लगभग एक चौथाई पृष्ठ के इस विज्ञापन में 'चेकअप' शब्द के ऊपर किनारे पर तारे का एक छोटा-सा निशाँ था. सिगरेट की डिब्बी पर 'वैधानिक चेतावनी' की तरह विज्ञापन के नीचे कोने में तारे के निशाँ के सामने छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा था: 'शुल्क एक हज़ार नौ सौ पचास रुपये से तीन हज़ार चार सौ पचास रुपये, उम्र  पर निर्भर.'
पहले विज्ञापन से स्पष्ट है कि यह न केवल पुरुष प्रधान भारतीय समाज में पति (पुरुष) द्वारा पत्नी (स्त्री) से की गई अपेक्षाओं को व्यक्त करता है, बल्कि परिवार और समाज में स्त्री की दशा को भी दर्शाता है. विज्ञापन की भाषा पर गौर करें तो हम पाएंगे कि यह विज्ञापन पुरुषों को संबोधित है. यानि उक्त दवा कंपनी एहतियात के तौर पर मधुमेह के मरीजों को फल या करेले का रस पीने की अगर सलाह देती है तो इसका  हक़दार सिर्फ पुरुष वर्ग ही है. 
यानि उत्पादक आयुर्वेदिक दवा कंपनी और पुरुष वर्ग के बीच सीधा संवाद है जिसमें न केवल पूरी आधी स्त्री आबादी गायब कर दी गई है बल्कि उससे अपेक्षा की गई है कि वह पुरुषों की सेहत-रक्षा के लिए एहतियात के तौर पर कदम उठाए, उनकी हर समस्या का ख़याल रखे और उसमें उनकी भागीदार बने. ऐसा करने पर ही वह अपने पति या पुरुष वर्ग से 'एक अच्छी पत्नी' का खिताब पाने की हक़दार होगी. 
यहाँ पर एक सवाल यह उठता है कि दवा कंपनी जिस मधुमेह से बचने के लिए एहतियात के तौर पर करेला का रस पीने की सलाह देती है, क्या यह बीमारी सिर्फ पुरुषों को होती है? लैंगिक विषमता वाले पुरुष प्रधान भारतीय समाज में ही यह संभव है कि स्त्री से 'एक अच्छी पत्नी' बनने की अपेक्षा की जाए.
उक्त विज्ञापन की भाषा से एक और बात तह झलकती है कि पुरुष आमतौर पर अपनी और बीवी-बच्चे की सेहत के प्रति लापरवाह रहते हैं, इसलिए स्त्रियों को चाहिए कि वे अपने पति की सेहत का ख़याल रखे. अगर 'एक अच्छी पत्नी' अपने पति की हर समस्या का ख़याल रखती है और उसमें उसकी भागीदार बनती है तो क्या पति की भी यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि वह अपनी पत्नी की हर समस्या का ख़याल रखे और उसमें बराबर का भागीदार बने?
विज्ञापन में विडम्बना यह है कि दवा कंपनी ही बतला रही है कि सेहत के मामले में स्त्रियों के साथ भेदभाव किया जाता है. सेहत और लिंग-भेद से संबंधित अध्ययनों से यह निष्कर्ष पहले ही निकल चुका है कि स्त्रियाँ अपनी सेहत संबंधी समस्याओं को तब तक छुपाती रहती हैं, जब तक स्थिति गंभीर नहीं हो जाती है. 
आज जबकि महिला और स्वास्थ्य संगठन, सरकारी-गैर सरकारी संस्थाएं, मीडिया वगैरह इस मुद्दे को उठाकर स्त्री स्वास्थ्य के प्रति स्त्रियों और पुरुषों में जागरूकता पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं, वहां यह विज्ञापन इस मुहिम को क्या कमज़ोर नहीं करता है? 
दरअसल, यह पहला ऐसा विज्ञापन नहीं है. टेलिविज़न और पत्र-पत्रिकाओं में ढेरों ऐसे विज्ञापन दिखलाए और छापे जा रहे हैं जिनमें लैंगिक भेदभाव स्पष्ट रूप से दिखता है. समाजशास्त्रियों का कहना है कि हमारे-आपके घर-परिवार और समाज में यदि लिंग-भेद है तो विज्ञापनों या अन्य बाज़ारवादी तंत्रों में भी यह दिखेगा, क्योंकि उत्पादक और उपभोक्ता ही नहीं बल्कि विज्ञापन निर्माता भी हमारे-आपके बीच के ही लोग होते हैं.
क्या यह सच नहीं है कि भोजन हो या शिक्षा अथवा चिकित्सीय देखभाल और पालन-पोषण, हमारे घर-परिवार और समाज में स्त्रियों के साथ हर जगह और हर मामले में भेदभाव किया जाता है. विकास और समानता का ढिंढोरा हम भले पीटते रहें लेकिन इसी लैंगिक भेदभाव की वजह से देश में बड़े क्रूर तरीक़े से हर साल करीब पचास लाख कन्या भ्रूणों की ह्त्या कर दी जाती है, जिसके परिणामस्वरूप न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया का स्त्री-पुरुष अनुपात प्रभावित हुआ है. 
दुनिया में एक हज़ार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या जहां एक हज़ार छह है, वहीं दक्षिण एशिया में एक हज़ार पुरुषों पर महज़ नौ सौ अडसठ स्त्रियाँ हैं. भारत में बड़ी तादाद में स्त्रियाँ खून की कमी से ग्रस्त हैं. यौन रोग, गर्भावस्था में उचित देखभाल और पोषक आहार की कमी, प्रसव वगैरह के दौरान भी बड़ी तादाद में स्त्रियाँ दम तोड़ देती हैं. 
मासूम बच्चियों से लेकर वृद्धाओं के साथ बलात्कार की ख़बरों से अखबारों के पन्ने और न्यूज़ चैनल पटे रहते हैं. लाखों बच्चियों और स्त्रियों को बाल वेश्यावृत्ति और वेश्यावृत्ति के धंधे में ज़बरन धकेल दिया गया है. घर की देहरी से लेकर कार्य-स्थलों तक कहीं भी स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं है. दहेज़, दहेज़-ह्त्या, बाल विवाह, विधवाओं की दुर्दशा, स्त्रियों पर अत्याचार वगैरह घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं.
दूसरे (करवा चौथ) विज्ञापन को गौर से पढ़ने पर यह सवाल उठता है कि क्या वास्तव में यह विज्ञापन करवा चौथ व्रत के प्रति स्त्रियों में व्याप्त आस्था और अंधविश्वास को नकारता है या आधुनिकता और वैज्ञानिकता की आड़ में 'चिकित्सा सेवा' के बाज़ारीकरण को विज्ञापित करता है. 
यह सच है कि आधुनिक मानसिकता कई तरह की धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं, क्रिया-कलापों, व्रतों, पर्व-त्योहारों वगैरह को मध्युगीन दकियानूसी मानसिकता की उपज मानती है. दरअसल आधुनिक मानसिकता एक ऐसी वैज्ञानिक/प्रायोगिक मानसिकता होती है जो तर्क, बुद्धि और वैज्ञानिक कसौटी पर कसकर ही किसी वस्तु, विचार या कार्य-व्यवहार को देखती है. 
इसी वजह से समय-समय पर परंपराएँ बदलती रहती हैं और कुछ लम्बे वक्त तक चलती चली जाती हैं. चलती चली जाने वाली परम्पराएँ चूंकि लोक में व्याप्त होकर संस्कृति का वृहत्तर हिस्सा बन जाती हैं इसलिए ऐसा होता है. सती प्रथा, पर्दा पर्था, बाल विवाह, दहेज़ जैसी कुप्रथाओं का पीछे छूट जाना और पर्व-त्योहारों, व्रतों, धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठानों वगैरह का बने रहना इसकी मिसाल है.
दरअसल, करवा चौथ भारतीय विवाहिता स्त्रियों के द्वारा पूजा जानेवाला एक ऐसा व्रत है जिसे वे अपने पति की अच्छी सेहत और उनकी लम्बी आयु के लिए रखती है. हालांकि स्त्रीवादी नज़रिए से भी इस व्रत का मूल्यांकन करने की ज़रुरत है, लेकिन प्रसंगवश यहाँ गौर करने की बात यह है कि यह व्रत सिर्फ अनपढ़ या मध्ययुगीन मानसिकता वाली अन्धविश्वासी स्त्रियाँ ही नहीं, बल्कि बड़ी तादाद में पढी-लिखी, आधुनिक स्त्रियाँ भी रखती हैं, जो भलीभांति जानती हैं कि उनके पति की लम्बी आयु अच्छी सेहत के लिए उनके खान-पान और रहन-सहन के तौर-तरीक़े का ध्यान रखना ज़रूरी है और सेहत संबंधी किसी तरह की दिक्क़त होने पर उनका ईलाज करवाना ज़रूरी है. 
पति के अलावा भाइयों और बच्चों के लिए रखे जानेवाले व्रतों के साथ भी यही बात लागू होती है. पति, बच्चे या परिवार के सदस्यों पर आई इस तरह के 'संकट की स्थिति' में स्त्रियाँ अपने जातीय सेवा भाव की वजह से उनकी भलीभांति सेवा-सुश्रूसा, ईलाज और देखभाल करती हैं. 
इसीलिए उक्त विज्ञापन अपने व्यावसायिक हित के लिए पति की सेहत और उसकी लम्बी उम्र के लिए करवा चौथ का व्रत रखनेवाली लाखों-करोड़ों स्त्रियों की आस्था और  विश्वास को न केवल खंडित करता है, बल्कि उन्हें चिकित्सा बाज़ार का उपभोक्ता बनाने के लिए उकसाता भी है.
दरअसल आज के बाज़ारवादी माहौल में उपभोक्ताओं को रिझाना अब बाज़ार के बाएँ हाथ का खेल हो गया है. बाज़ार के हाथ में ग़रीब से ग़रीब और कृपण शख्स को भी उपभोक्ता बनाने की जादू की छड़ी है. बाज़ार यह जान गया है कि इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी उसका घर-परिवार, उसकी आस्था और उसका विश्वास होता है. इन सबके बीच घुसपैठ कर बाज़ार को व्यापक और विस्तृत किया जा सकता है, घटिया से घटिया और बेकार से बेकार उत्पाद बेचा जा सकता है. 
फिर हमारे यहाँ पुरुष और स्त्री की आस्था और विश्वास तथा घर-परिवार के प्रति उनके समर्पण-भाव में भी फर्क होता है. इसीलिए शायद हिन्दुस्तानी स्त्रियाँ व्रत-त्यौहार कुछ ज़्यादा ही करती हैं, क्योंकि वे पति, बच्चे और परिवार की हिफाज़त चाहती हैं. पराधीन जो ठहरीं! इन सबकी दुहाई देकर कंजूस से कंजूस स्त्री की भी अंटी से पैसा निकलवाया जा सकता है.
वास्तव में देखा जाए तो आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित निजी क्लीनिकों, हेल्थ केयर सेंटरों, नर्सिंग होमों और पाँचसितारा अस्पतालों के रूप में चिकित्सा क्षेत्र आज एक ऐसे बाज़ार के रूप में  विकसित होता जा रहा है, जहां 'सेवा परमोधर्मः' की जगह लिखा होगा 'पहले पैसा फिर सेवा.' राजधानी दिल्ली के कुछ पंचसितारा और निजी अस्पतालों में पिछले दिनों हुईं घटनाएं इसके प्रमाण हैं.
दरअसल, आज हम वैश्वीकरण के उस दौर में पहुँच गए हैं, जहां चौतरफ़ा बाज़ार बाज़ार ही बाज़ार है. बाज़ार के बाहर के कुछ भी नहीं है. आज बाज़ार इतना ताकतवर, लचीला और सर्वव्यापी हो गया है कि वह किसी की भी आस्था, विश्वास, भावना, व्यवहार, मूल्य, कर्म, मिथक, परम्परा, घटना, हालात वगैरह का अपने उत्पाद बेचने के लिए मनमाफ़िक इस्तेमाल कर सकता है.   

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

मातृभाषा से कोई समझौता नहीं

भारत का भाषाई नक्शा
साथियो, 
पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दू थोपे जाने के विरोध में 21 फरवरी, 1952 को ढाका में छात्रों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला के पक्ष में जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किए, जिसमें पुलिस और सेना की गोली से बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे गए। मातृभाषा के सवाल से शुरू हुआ यही आंदोलन बाद में बांग्लादेश की मुक्ति  के आंदोलन में बदल गया। पेश है 21फरवरी 2011को दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित गंगा सहाय मीणा का आलेख:

हममें से अधिकांश को शायद यह जानकारी नहीं है कि 21 फरवरी को दुनियाभर में 'अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। काफी समय से यूनेस्को भाषाओं को बचाने के प्रति जागरूकता फैलाने का काम कर रहा है। 
'अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाने की प्रथम घोषणा 17 नवंबर 1999 को यूनेस्को द्वारा ही की गई। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा औपचारिक रूप से प्रस्ताव पारित कर 2008 में इसे मान्यता दी गई। 2008 को संयुक्त राष्ट्र ने 'अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष' के रूप में मनाया।''अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाने का उद्देश्य निर्धारित किया गया- विश्व में भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिकता को बढ़ावा देना। 
उल्लेखनीय है कि इस दिन का संबंध भारतीय उपमहाद्वीप से है। पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दू थोपे जाने के विरोध में 21 फरवरी, 1952 को ढाका में छात्रों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला के पक्ष में जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किए, जिसमें पुलिस और सेना की गोली से बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मारे गए। 
मातृभाषा के सवाल से शुरू हुआ यही आंदोलन बाद में बांग्लादेश की मुक्ति  के आंदोलन में बदल गया। पूर्वी पाकिस्तान (पूर्वी बंगाल) के भाषा आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है- बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी ने उर्दू का विरोध करते हुए बांग्ला के पक्ष में आंदोलन कर यह साबित कर दिया कि भाषा का धर्म से अनिवार्य रिश्ता नहीं होता। बांग्लादेश में 1952 के शहीदों को याद करने के लिए 21 फरवरी को सार्वजनिक अवकाश रहता है।
यूनेस्को ने इस बार के 'अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' की थीम रखी है- 'भाषाओं और भाषाई विविधता को बचाने और प्रोत्साहित करने के लिए सूचना और संचार तकनीकें।' हमारी मातृभाषाओं पर सबसे ज्यादा हमला बाजार और तकनीक के द्वारा ही हो रहा है। अंग्रेजी और दूसरी बड़ी भाषाएं एकमात्र विकल्प के रूप में पेश की जा रही हैं। दुनियाभर में मातृभाषाएं खतरे में हैं। यूनेस्को ने एक इंटरेक्टिव एटलस तैयार कर ऐसी भाषाओं की सूची तैयार की है जो खतरे में हैं। इनमें भारत की कई भाषाएं भी शामिल हैं। 
दुनिया की तमाम भाषाएं, जो हजारों वर्षों से अस्तित्व में हैं और कहीं न कहीं आज भी अनेक समाजों की अभिव्यक्ति को शब्द देती हैं और विभिन्न मानव समुदायों की सांस्कृतिक पहचान हैं, उनके अस्तित्व को खतरा हमारी पूरी स्मृति को खतरा है। मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का गवाह है कि सभ्यताएं अपने वर्चस्व के लिए हथियारों के साथ विचारधारात्मक उपादानों का भी सहारा लेती रही हैं। 
आम जन को सत्ता से बेदखल करने का सबसे आसान उपाय होता है सत्ता को ऐसी भाषा में चलाना जो आम जनता समझती ही न हो। संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी इसके उदाहरण हैं। जब जनता सत्ता की कार्यपद्धति को समझेगी ही नहीं तो उस पर सवाल कैसे उठाएगी? लोकतंत्र, चूंकि जनता की भागीदारी का तंत्र माना जाता है, इसलिए इससे अपेक्षा होती है कि इसमें शासन को यथासंभव पारदर्शी बनाया जाए और शासन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। 
भारत में होना यह चाहिए था कि भारतीय भाषाओं (हिंदुस्तानियों की मातृभाषाओं) को राजभाषा बनाया जाता और उनके प्रोत्साहन की हरसंभव कोशिश की जाती। लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता ने अंग्रेजी को विकास का पर्याय मान लिया और भारतीय भाषाओं की लगातार उपेक्षा की। चीन, जापान, कोरिया, इटली, फ्रांस आदि देशों ने यह साबित कर दिया कि भाषा (कम से कम अंग्रेजी) का विकास से कोई अनिवार्य रिश्ता नहीं। 
पिछले वर्ष उत्तराखंड सरकार ने संस्कृत को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित कर दिया। इस कदम के पीछे वही रूढ़ मानसिकता काम कर रही है कि सारा ज्ञान संस्कृत में भरा पड़ा है और संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है। ये दोनों भ्रामक धारणाएं हैं। प्राकृतिक-विज्ञानों, समाज- विज्ञानों और कला-संस्कृति संबंधी तमाम शोधों से पहली धारणा निर्मूल सिद्ध हो चुकी है। 
भाषा-वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों से साबित कर दिया है कि संस्कृत से सभी भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति की बात में दम नहीं है। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, डॉ. रामविलास शर्मा आदि भाषाविदों के अध्ययन के मुताबिक संस्कृत कभी आमजन के बोलचाल की भाषा नहीं रही। 
आधुनिक भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत की तुलना में उन लोक-भाषाओं से हुई होगी जो तब आमजन के बोलचाल की भाषाएं थीं, जब संस्कृत सत्ता और साहित्य की भाषा थी। भारतीय स्थानों के नामों का अध्ययन करने पर भी संस्कृत से शेष भारतीय भाषाओं के पैदा होने की बात निर्मूल साबित होती है। किसी भाषा से दूसरी भाषा पैदा होने की तुलना में भारतीय आर्यभाषा परिवार की भाषाओं के संस्कृत से आदान-प्रदान की संभावना अधिक दिखती है। 
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर जिस सवाल पर हमें गहराई से विचार करने की आवश्यकता है, वह है- अपनी मातृभाषाओं की कीमत पर संस्कृत और अंग्रेजी जैसी भाषाओं के आगे घुटने टेकना कहां तक उचित है? मातृभाषाओं के विकास के लिए जरूरी है कि सरकार बोलियों और छोटी भाषाओं में भी रोजगार के अवसर पैदा करे। 
हिंदी के साथ भारत की राजभाषा तमिल, मलयालम, बांग्ला, मराठी आदि भारतीय भाषाएं होनी चाहिए और उत्तराखंड में संस्कृत के स्थान पर कुमायूंनी और गढ़वाली को द्वितीय राजभाषा बनाया जाना चाहिए (जिसकी मांगें भी उठ रही हैं)। भाषा के सवाल पर सोचते वक्त हमें लोकतंत्र की मूल प्रतिज्ञा -जनता की भागीदारी- को याद रखना है। अगर हम सत्ता  में जनता की भागीदारी के पक्षधर हैं तो हमें मातृभाषाओं को बचाना और उचित स्थान देना ही होगा। 
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई राज्यों में संस्कृत के लिए अलग मंत्रालय हैं, जबकि मातृभाषाओं की तरफ देखने वाला कोई नहीं। दुनियाभर के शिक्षाविद यह निष्कर्ष प्रस्तुत कर चुके हैं कि प्राथमिक शिक्षा के लिए सर्वोत्तम भाषा बच्चे की मातृभाषा होती है। इसी तरह मौलिक चिंतन भी अपनी भाषा में ही संभव है। भाषाएं सीखने से हमारा कोई विरोध नहीं है। व्यक्ति जितनी भाषाएं सीखे, उतना अच्छा है, लेकिन अपनी मातृभाषा की कीमत पर नहीं।

अंग्रेज़ी ही नहीं, हिंदी भी अभिजात भाषा है उनके लिए...!!!

गाँव की पंचायत 
मित्रो, 
14 सितम्बर - हिंदी दिवस कल बीत गयाकई साल पहले  राष्ट्रीय सहारा में 'आम आदमी की भाषा का सवाल' शीर्षक से प्रकाशित अपना यह लेख आपके हवाले कर रहा हूँ.  इस लेख में अंग्रेज़ी के साथ-साथ खड़ी बोली हिंदी से भी सवाल पूछ रही हैं हिंदुस्तान के दीगर हिस्सों में बोली जानेवाली वे सैकड़ों बोलियाँ जिन्हें दूर-दराज़ के ठेठ देहाती, आदिवासी, दलित, पिछड़े लोग बोलते-बतियाते हैं...जिनके लिए खड़ी बोली हिंदी भी कुछ-कुछ अंग्रेज़ी जैसी ही है...!!! -शशिकांत 

मनुष्य का इतिहास, उसकी परम्परा, संस्कृति, कला वगैरह भाषाओं और बोलियों के माध्यम से ही रूपाकार लेता है. हिन्दुस्तान अनंत भाषाओं और बोलियों का देश है. यहाँ अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र में रह रहे अलग-अलग मनुष्य समूह भिन्न-भिन्न भाषा-बोलियों के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करते हैं. 

इन भाषा-भाषियों के बीच, भाषा (बोली नहीं) को लेकर अक्सर बहस और विवाद होते रहे हैं. लेकिन इस भाषा विवाद का स्वरूप और इसकी प्रकृति क्या रही है, यह एक विचारणीय मुद्दा है. पिछले दो दशकों में कुछ ऐसे भी विमर्श हुए हैं जिनके कारण देश और दुनिया के हाशिए के मनुष्य के अधिकारों और अस्मिताओं की रक्षा के सवाल उठ रहे हैं. 

हिन्दुस्तान की अनपढ़ आबादी के लिहाज़ से देखा जाए तो यहाँ भाषा को लेकर हुए तमाम संघर्षों और विवादों के बीच एक सवाल यह भी उठता है कि क्या अनपढ़ नागरिकों की भाषा या उनकी बोलियों को लेकर कभी कोई विवाद या संघर्ष यहाँ हुआ है? शायद नहीं...!

अनपढ़ नागरिकों की भाषा और बोली का यह सवाल आज़ादी के पांच-छह दशक बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश के नागरिकों को संविधान द्वारा प्रद्दत्त अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार से जुडा हुआ एक अहम् मसला है. 

मशहूर फ्रांसीसी चिन्तक जॉक देरीदा ने लिखा है, "समाज में जो शासक समुदाय है और उसके जो बुद्धिजीवी हैं, वे संस्कृति, साहित्य और कला के क्षेत्र में एक केन्द्रीय परम्परा बनाए रखना चाहते हैं और दूसरी परम्परा को हमेशा हाशिए पर रखने की कोशिश करते हैं." बेशक, भाषा का सवाल इनसे अलग नहीं है. 

गाँव का हाट 
दरअसल, भाषा और बोली आदिम युग से ही मनुष्य की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है. लेकिन कालान्तर में यह कुछ दबंग समूहों/वर्गों के भाषिक-वर्चस्व का साधन बनती गई. इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि एक समूह/वर्ग की अभिव्यक्ति का माध्यम (भाषा या बोली) , दूसरे समूह/वर्ग पर वर्चस्व कायम करने का साधन बन जाए...!

वस्तुतः हिन्दुस्तान की अनपढ़ जनता जिस भाषा-बोली में बोलती-बतियाती, सोचते-समझती, हंसती-रोती है, हमारे राज-काज की भाषा में क्या उनका इस्तेमाल होता है? यदि नहीं होता है तो क्या अब नहीं होना चाहिए? 

हिन्दुस्तान के एक सौ पच्चीस करोड़ नागरिकों को अनपढ़ और पढ़े-लिखे वर्ग में बाँट कर देखा जाए तो हम पाएँगे कि सन सैंतालिस के बाद के वर्षों में मुख्य धारा में पढ़े-लिखे अभिजात और प्रबुद्ध वर्ग के लोग ही रहे हैं और देश के कुल संसाधनों के एक बहुत बड़े हिस्से का इसी वर्ग के लोगों ने उपभोग किया है. 

यही नहीं, देश के नीति निर्माण के क्षेत्रों जैसे शासन, सत्ता, शिक्षा, न्याय, अर्थव्यवस्था, व्यापार, उद्योग, देसी-विदेशी संस्थाओं, संगठनों और उनसे मिलनेवाले धन एवं सुविधाओं पर इसी वर्ग के लोगों का कब्ज़ा है. अनपढ़ तबका तो हाशिए पर रहते हुए सिर्फ शासित होता रहा है और कमरतोड़ मेहनत-मज़दूरी करके भी फटेहाली में जी-मर रहा है. 

सभा-सोसायटियों, दफ़्तरों वगैरह में यदि अंग्रेज़ी न पढ़ने-समझनेवाले हीनता से ग्रस्त रहते हैं तो हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं वाले माहौल में एक-दूसरी भाषाओं और हिन्दी के क्षत्रीय बोलियों का इस्तेमाल करनेवाले कम पढ़े-लिखे लोगों की हालत भी असहज होती है. जबकि देश के करोड़ों अनपढ़ लोग ऐसी जगहों पर हाशिए से भी बाहर होते हैं. 

डा. राम मनोहर लोहिया के शब्दों में कहें तो, "भाषा और भूषा का यह अलगाव शासितों के मन में हीन भाव पैदा करता है. उनको लगता है कि शासक उनसे बहुत ऊंचा है और वे ख़ुद इतना नीचे हैं कि राजकाज उनके बस की चीज़ नहीं."

दरअसल, सन सैंतालिस के बाद सुनियोजित षडयंत्र के तहत दफ़्तरों, कोर्ट-कचहरियों वगैरह में राजकाज की अभिजात भाषा को बढ़ावा दिया गया. भाषिक वर्चस्व और उसके प्रतिरोध की जो राजनीति की गई, वह भी अलग-अलग विकसित भाषाओं के अभिजात वर्ग के भाषिक वर्चस्व के ख़याल तक ही सीमित रही. जबकि  क्षेत्रीय बोलियों और अनपढ़ों, मज़दूरों, ग़रीब किसानों, कामगारों, आदिवासी, दलित वगैरह हाशिए के समूहों की रोज़मर्रा की भाषा और बोलियों का सवाल इनके भाषा आन्दोलन का कभी सवाल नहीं बना. 

आज के वक्त यह ज़रूरी हो गया है कि भाषा के सवालों के भीतर इन सवालों को शामिल किया जाए, क्योंकि भाषा और बोली का यह सवाल मनुष्य की ज्ञान प्राप्ति से जुडा हुआ मसला भी है. देश की राजनीतिक  व्यवस्था, क़ानून या नीति निर्माण के क्षत्र में पढ़े-लिखे अभिजात वर्ग का कब्ज़ा भले हो, लेकिन वह अपनी भाषा-बोलियों, दृष्टि, जीवन पद्धति, मूल्य और समाज को देखने-परखने के नज़रिए को मानने के लिए शेष अनपढ़ और अशिक्षित जनता को बाध्य नहीं कर सकता. 

हिन्दुस्तान की भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता को बनाए रखने के लिए यह अपरिहार्य है.  

 

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

भटका हुआ आंदोलन है नक्सलवाद: दिलीप सिमियन

माओवाद पर लिखी दिलीप सिमियन (सीनियर फेलो, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी) की किताब 'रिवोल्यूशन हाइवे' इन दिनों चर्चा में हैं. आज से कोई पांच-एक साल पहले वे यह किताब लिखने की तैयारी कर रहे थे. तब पटपडगंज स्थित उनके घर पर मिलना एक सुखद और विचारिक अनुभव था, ख़ासकर माओवादी विचारधारा पर उनके साथ बात करना. 1 अप्रैल 2006 को 'एक भटका हुआ आंदोलन है नक्सलवाद' शीर्षक से नवभारत टाइम्स ने उस बातचीत को प्रकाशित किया था. साथियों के हवाले कर रहा हूँ.      - शशिकांत 

यह कहना सही नहीं होगा कि हाल के वर्षों में नक्सली गतिविधियों में तेजी आई है। सच तो यह है कि 1967 में नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत के समय से ही उनकी गतिविधियां जारी हैं। हां, उनमें थोड़ा उतार-चढ़ाव आता रहा है। देश में 92 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं।
मजदूरों के खिलाफ ठेकेदार, बिचौलिये, मालिक या जमींदार की तरफ से हिंसा की जाती है। जिन उत्पादक रिश्तों में हिंसा एक दैनिक कर्म हो, वहां नक्सलवाद जैसी प्रतिरोधी गतिविधियों का होना स्वाभाविक है। हालांकि मैं नक्सलियों की हिंसात्मक गतिविधियों के पक्ष में नहीं हूं।
दूसरी बात यह कि देश में अपराध न्याय संहिता पूरी तरह फेल हो गई है। जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू आदि हत्याकांडों के मामलों पर गौर कीजिए। मध्यवर्ग के साथ जब अन्याय हुआ तो क्रिमनल जस्टिस सिस्टम पर सवाल उठाए जाने लगे लेकिन आम आदमी रोज अन्याय और अत्याचार झेलता है।
न्याय के लिए पुलिस, प्रशासन और कानून की शरण में जाता है लेकिन वर्षों तक कोर्ट-कचहरी में चप्पलें घिसने के बाद भी जब पैसे और ऊंची रसूख वालों के पक्ष में फैसले आते हैं, तो उस पर क्या असर पड़ता है, सोचा जा सकता है।
न्याय व्यवस्था बिगड़ने से ही नक्सलवाद पनप रहा है। अगर राज्य सत्ता अपनी वैधता को पिघलते हुए देख रही है तो वैकल्पिक सत्ता हथियाएगी ही। यदि इस समस्या से निजात पानी है तो हमें पॉलिटिकल डेमोक्रेसी के साथ-साथ सोशल डेमोक्रेसी भी लागू करनी पड़ेगी।
दिलीप सिमिय
लेकिन माओवादियों को भी यह सोचना चाहिए कि हिंसा के जरिए क्या वे अपना लक्ष्य हासिल कर पाएंगे? नेपाल में माओवादी हिंसा की एक वजह यह है कि वहां आम आदमी लोकतंत्र का हिमायती है और माओवादी इसकी आड़ में अपना अजेंडा चला रहे हैं। वे चाहते हैं कि वहां से राजतंत्र हट जाना चाहिए। लेकिन नेपाल के माओवादियों ने जिस   तरह चितवन जिले में चलती पैसेंजर बस को विस्फ़ोट द्वारा 50 से    अधिक मासूम लोगों को मार डाला, क्या यह भी एक निरंकुश प्रकार की राजनीति नहीं? यह है नेपाल, जहाँ लोकतंत्र नहीं है...

लेकिन भारत में तो लोकतंत्र है। फिर यहां खूनी खेल क्यों खेल रहे हैं नक्सली? त्रुटियों के बावजूद पिछले 5-6 दशकों से यहां संवैधानिक संस्थाएं काम कर रही हैं यदि इसमें सुधार लाना है तो प्रगतिशील शक्तियों को व्यापक पैमाने  पर जन  आन्दोलन का गठन करना पड़ेगा;  जो लोकतांत्रिक एवं अहिंसक शैली से  ही कायम हो सकता है 
दुर्भाग्यवश नक्सली विचारधारा मानती है कि यहां की लोकतांत्रिक सत्ता एक झूठ है। वह मानती है कि भारत एक अर्ध सामंती, अर्ध औपनिवेशिक राज व्यवस्था है। हथियारों के माध्यम से वे यहां पीपल्स डेमोक्रेसी यानी सर्वहारा की सत्ता स्थापित करना चाहते हैं।
उग्र वामपंथी (नक्सली) और उदार वामपंथी इसे अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। उदार वामपंथी यानी सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (माले) जैसी राजनीतिक पार्टियां संवैधानिक संस्थाओं में आस्था जताकर लोकतांत्रिक तरीके से राजसत्ता हासिल करना चाहती है जबकि नक्सली इन्हें झूठ मानते हैं। उनकी गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य है पीपल्स आर्मी गठित करना। यह एक तरह का वामपंथी सैन्यवाद है।
उग्र वामपंथियों और उदार वामपंथियों के बीच विभाजन की मुख्य वजह ही है हिंसा। मेरा सवाल है कि आखिर ये नक्सली मॉडरेट डिमांड्स को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई लड़ने के लिए तैयार क्यों नहीं होते? लोगों को मारने की क्या जरूरत है? वे मानव प्राण को तिरस्कृत रूप से क्यों देखते हैं? यह एक नैतिक अपराध है। 
मैंने जहां तक समझा है मानव प्राण के प्रति सम्मान ही समाजवादी आंदोलन की बुनियाद है। मुझे समझ नहीं आता कि निरीह, निर्दोष लोगों का कत्ल करने की वैचारिक वैधता नक्सलियों ने कहां से खोज निकाली। यह उन्हें मनुवादी विचारधारा के निकट पहुंचाती है.
नक्सलियों की उनकी बहुत सारी मांगों और आदर्शों को मैं उचित मानता हूँ; लेकिन क्योंकि हत्या उनकी    मुहिम और राजनीति का आधार बन चुका है, वे जाने-अनजाने दक्षिणपंथी शक्तियों को फ़ायदा प्रदान कर रहे  हैं.
नक्सली जिस राह पर चल रहे हैं उससे अंतत: फायदा होगा वॉर इंडस्ट्री को। इनकी घोर क्रांतिकारिता बकवास है। 
माओवादियों का कहना है कि राजनीतिक त्रुटियों का उद्घाटन माओ की (1976 में)  मौत के बाद ही हुआ. वह शायद भूल गए कि 1971 में माओ  के नेतृत्व में, चीन ने पाकिस्तान के तानाशाह याह्या खान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों के घोर दमन में साथ दिया. वह बात    अलग है कि माओ के देहांत के बाद चीन ने 1979 में विएतनाम पर सैनिक आक्रमण भी किया.
माओ त्से तुंग साम्यवादी होते हुए के राष्ट्रवादी भी थे. धीरे-धीरे उनकी राजनीति में कम्युनिस्ट अंतर-राष्ट्रवाद के  स्थान पर घोर  राष्ट्रवाद  की  छाया पड़ने लगी. और क्या यह सोचने लायक बात नहीं कि एक कम्युनिस्ट पार्टी में कोई नेता अपना उत्तराधिकारी कैसे चुन सकता है? 
नक्सली या माओवादी यदि खून-खराबा और हिंसा त्याग दें और बाकी मांगें रखें तो यह संघर्ष समाज और देश के लिए बेहतर होगा। जैसे मादा भ्रूण हत्या, नवजात बच्चियों की हत्या, न्यूनतम वेतन, न्याय प्रणाली में सुधार, कृषि मजदूरों और शहरी मजदूरों की जीवन स्थिति में सुधार, सांप्रदायिकता आदि को कॉमन इश्यू बना सकते हैं। लेकिन इन्हें कौन समझाए। इन्हें अपनी अंतरात्मा में झांककर देखना चाहिए कि समाजवादी आंदोलन कहां था और आज कहां है।
मेरी सलाह है कि नक्सलियों को मैक्सिमम प्रोग्राम त्यागकर मिनिमम प्रोग्राम अपनाने चाहिए। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आखिर ज्ञान का आधार क्या है और उसकी वैधता का मानदंड क्या है? वे यदि इस सिस्टम को अवैध मानते हैं तो बंदूक की नोक पर बनाई गई उनकी प्रणाली अच्छी होगी, इसकी क्या गारंटी है?
दरअसल नक्सलियों की राजनीतिक वैधता का कोई आधार नहीं है। जिनके हाथ में बंदूक है, उनसे क्या बातचीत होगी। आम लोगों के जो बड़े-बड़े दुश्मन हैं, नक्सलियों ने आज तक उन्हें धमकाया तक नहीं चाहे वे बड़े से बड़े सांप्रदायिक क्यों न हों। जो खूंखार फासिस्ट हैं, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिराई उनसे नक्सली क्यों नहीं लड़े? गुजरात और देश के बाकी हिस्सों में सांप्रदायिकता के खिलाफ ये क्यों नहीं खड़े हुए?
खेद की बात है कि नक्सलियों में बहुत से दिलवाले भी हैं, जोशीले हैं, बुद्धिजीवी हैं और आम लोगों का भला चाहते हैं लेकिन उन्होंने चिंतन को, विचार को त्याग दिया है। (दिलीप सिमियन नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में सीनियर फेलो हैं.)
बातचीत : शशिकांत