रविवार, 20 फ़रवरी 2011

भटका हुआ आंदोलन है नक्सलवाद: दिलीप सिमियन

माओवाद पर लिखी दिलीप सिमियन (सीनियर फेलो, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी) की किताब 'रिवोल्यूशन हाइवे' इन दिनों चर्चा में हैं. आज से कोई पांच-एक साल पहले वे यह किताब लिखने की तैयारी कर रहे थे. तब पटपडगंज स्थित उनके घर पर मिलना एक सुखद और विचारिक अनुभव था, ख़ासकर माओवादी विचारधारा पर उनके साथ बात करना. 1 अप्रैल 2006 को 'एक भटका हुआ आंदोलन है नक्सलवाद' शीर्षक से नवभारत टाइम्स ने उस बातचीत को प्रकाशित किया था. साथियों के हवाले कर रहा हूँ.      - शशिकांत 

यह कहना सही नहीं होगा कि हाल के वर्षों में नक्सली गतिविधियों में तेजी आई है। सच तो यह है कि 1967 में नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत के समय से ही उनकी गतिविधियां जारी हैं। हां, उनमें थोड़ा उतार-चढ़ाव आता रहा है। देश में 92 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं।
मजदूरों के खिलाफ ठेकेदार, बिचौलिये, मालिक या जमींदार की तरफ से हिंसा की जाती है। जिन उत्पादक रिश्तों में हिंसा एक दैनिक कर्म हो, वहां नक्सलवाद जैसी प्रतिरोधी गतिविधियों का होना स्वाभाविक है। हालांकि मैं नक्सलियों की हिंसात्मक गतिविधियों के पक्ष में नहीं हूं।
दूसरी बात यह कि देश में अपराध न्याय संहिता पूरी तरह फेल हो गई है। जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू आदि हत्याकांडों के मामलों पर गौर कीजिए। मध्यवर्ग के साथ जब अन्याय हुआ तो क्रिमनल जस्टिस सिस्टम पर सवाल उठाए जाने लगे लेकिन आम आदमी रोज अन्याय और अत्याचार झेलता है।
न्याय के लिए पुलिस, प्रशासन और कानून की शरण में जाता है लेकिन वर्षों तक कोर्ट-कचहरी में चप्पलें घिसने के बाद भी जब पैसे और ऊंची रसूख वालों के पक्ष में फैसले आते हैं, तो उस पर क्या असर पड़ता है, सोचा जा सकता है।
न्याय व्यवस्था बिगड़ने से ही नक्सलवाद पनप रहा है। अगर राज्य सत्ता अपनी वैधता को पिघलते हुए देख रही है तो वैकल्पिक सत्ता हथियाएगी ही। यदि इस समस्या से निजात पानी है तो हमें पॉलिटिकल डेमोक्रेसी के साथ-साथ सोशल डेमोक्रेसी भी लागू करनी पड़ेगी।
दिलीप सिमिय
लेकिन माओवादियों को भी यह सोचना चाहिए कि हिंसा के जरिए क्या वे अपना लक्ष्य हासिल कर पाएंगे? नेपाल में माओवादी हिंसा की एक वजह यह है कि वहां आम आदमी लोकतंत्र का हिमायती है और माओवादी इसकी आड़ में अपना अजेंडा चला रहे हैं। वे चाहते हैं कि वहां से राजतंत्र हट जाना चाहिए। लेकिन नेपाल के माओवादियों ने जिस   तरह चितवन जिले में चलती पैसेंजर बस को विस्फ़ोट द्वारा 50 से    अधिक मासूम लोगों को मार डाला, क्या यह भी एक निरंकुश प्रकार की राजनीति नहीं? यह है नेपाल, जहाँ लोकतंत्र नहीं है...

लेकिन भारत में तो लोकतंत्र है। फिर यहां खूनी खेल क्यों खेल रहे हैं नक्सली? त्रुटियों के बावजूद पिछले 5-6 दशकों से यहां संवैधानिक संस्थाएं काम कर रही हैं यदि इसमें सुधार लाना है तो प्रगतिशील शक्तियों को व्यापक पैमाने  पर जन  आन्दोलन का गठन करना पड़ेगा;  जो लोकतांत्रिक एवं अहिंसक शैली से  ही कायम हो सकता है 
दुर्भाग्यवश नक्सली विचारधारा मानती है कि यहां की लोकतांत्रिक सत्ता एक झूठ है। वह मानती है कि भारत एक अर्ध सामंती, अर्ध औपनिवेशिक राज व्यवस्था है। हथियारों के माध्यम से वे यहां पीपल्स डेमोक्रेसी यानी सर्वहारा की सत्ता स्थापित करना चाहते हैं।
उग्र वामपंथी (नक्सली) और उदार वामपंथी इसे अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। उदार वामपंथी यानी सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (माले) जैसी राजनीतिक पार्टियां संवैधानिक संस्थाओं में आस्था जताकर लोकतांत्रिक तरीके से राजसत्ता हासिल करना चाहती है जबकि नक्सली इन्हें झूठ मानते हैं। उनकी गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य है पीपल्स आर्मी गठित करना। यह एक तरह का वामपंथी सैन्यवाद है।
उग्र वामपंथियों और उदार वामपंथियों के बीच विभाजन की मुख्य वजह ही है हिंसा। मेरा सवाल है कि आखिर ये नक्सली मॉडरेट डिमांड्स को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई लड़ने के लिए तैयार क्यों नहीं होते? लोगों को मारने की क्या जरूरत है? वे मानव प्राण को तिरस्कृत रूप से क्यों देखते हैं? यह एक नैतिक अपराध है। 
मैंने जहां तक समझा है मानव प्राण के प्रति सम्मान ही समाजवादी आंदोलन की बुनियाद है। मुझे समझ नहीं आता कि निरीह, निर्दोष लोगों का कत्ल करने की वैचारिक वैधता नक्सलियों ने कहां से खोज निकाली। यह उन्हें मनुवादी विचारधारा के निकट पहुंचाती है.
नक्सलियों की उनकी बहुत सारी मांगों और आदर्शों को मैं उचित मानता हूँ; लेकिन क्योंकि हत्या उनकी    मुहिम और राजनीति का आधार बन चुका है, वे जाने-अनजाने दक्षिणपंथी शक्तियों को फ़ायदा प्रदान कर रहे  हैं.
नक्सली जिस राह पर चल रहे हैं उससे अंतत: फायदा होगा वॉर इंडस्ट्री को। इनकी घोर क्रांतिकारिता बकवास है। 
माओवादियों का कहना है कि राजनीतिक त्रुटियों का उद्घाटन माओ की (1976 में)  मौत के बाद ही हुआ. वह शायद भूल गए कि 1971 में माओ  के नेतृत्व में, चीन ने पाकिस्तान के तानाशाह याह्या खान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों के घोर दमन में साथ दिया. वह बात    अलग है कि माओ के देहांत के बाद चीन ने 1979 में विएतनाम पर सैनिक आक्रमण भी किया.
माओ त्से तुंग साम्यवादी होते हुए के राष्ट्रवादी भी थे. धीरे-धीरे उनकी राजनीति में कम्युनिस्ट अंतर-राष्ट्रवाद के  स्थान पर घोर  राष्ट्रवाद  की  छाया पड़ने लगी. और क्या यह सोचने लायक बात नहीं कि एक कम्युनिस्ट पार्टी में कोई नेता अपना उत्तराधिकारी कैसे चुन सकता है? 
नक्सली या माओवादी यदि खून-खराबा और हिंसा त्याग दें और बाकी मांगें रखें तो यह संघर्ष समाज और देश के लिए बेहतर होगा। जैसे मादा भ्रूण हत्या, नवजात बच्चियों की हत्या, न्यूनतम वेतन, न्याय प्रणाली में सुधार, कृषि मजदूरों और शहरी मजदूरों की जीवन स्थिति में सुधार, सांप्रदायिकता आदि को कॉमन इश्यू बना सकते हैं। लेकिन इन्हें कौन समझाए। इन्हें अपनी अंतरात्मा में झांककर देखना चाहिए कि समाजवादी आंदोलन कहां था और आज कहां है।
मेरी सलाह है कि नक्सलियों को मैक्सिमम प्रोग्राम त्यागकर मिनिमम प्रोग्राम अपनाने चाहिए। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आखिर ज्ञान का आधार क्या है और उसकी वैधता का मानदंड क्या है? वे यदि इस सिस्टम को अवैध मानते हैं तो बंदूक की नोक पर बनाई गई उनकी प्रणाली अच्छी होगी, इसकी क्या गारंटी है?
दरअसल नक्सलियों की राजनीतिक वैधता का कोई आधार नहीं है। जिनके हाथ में बंदूक है, उनसे क्या बातचीत होगी। आम लोगों के जो बड़े-बड़े दुश्मन हैं, नक्सलियों ने आज तक उन्हें धमकाया तक नहीं चाहे वे बड़े से बड़े सांप्रदायिक क्यों न हों। जो खूंखार फासिस्ट हैं, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिराई उनसे नक्सली क्यों नहीं लड़े? गुजरात और देश के बाकी हिस्सों में सांप्रदायिकता के खिलाफ ये क्यों नहीं खड़े हुए?
खेद की बात है कि नक्सलियों में बहुत से दिलवाले भी हैं, जोशीले हैं, बुद्धिजीवी हैं और आम लोगों का भला चाहते हैं लेकिन उन्होंने चिंतन को, विचार को त्याग दिया है। (दिलीप सिमियन नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में सीनियर फेलो हैं.)
बातचीत : शशिकांत

    1 टिप्पणी:

    1. This is a very eye-opener interview. Must read for everyone in India. I agree with Dilip Simeon.
      Thanks to Sashi saheb for sharing the interview, very enlightening one.

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