शनिवार, 29 जनवरी 2011

30 जनवरी 1948 : बापू के आख़िरी क्षण...!

बापू के आख़िरी क्षण
आज है, 30 जनवरी, बापू की पुण्यतिथि...!

64  साल पहले
यानि 30 जनवरी सन 1948.
नव-स्वाधीन भारत का वह काला दिन
उग्र हिन्दुत्ववादी 
दक्षिणपंथी 
विचारधारा से
ताल्लुक रखने वाले
एक दिग्भ्रमित युवक  ने
(मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता)

बापू को
हमसे छीन लिया था.

आज तक बापू को,
बापू के बारे में
(खिलाफ़ और पक्ष में)
बहुत कुछ पढ़ा, सुना
और कुछ फ़िल्में भी देखीं

पिछले दिनों
फेसबुक पर विचरते हुए
बापू के आख़िरी क्षण का
फोटो मिला -

(उनके हत्यारे के हाथ में है पिस्तौल
उंगली घोड़े पर
बहस कर रहा है बापू से
फिर गोलियां चलाएगा!)
......................
हे राम !

इतने कार्पोरेटिया गए कि पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए?

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी
भ्रष्टाचार, महंगाई और अन्य दुश्वारियों से जूझ रहे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए 28 जनवरी की तारीख़ ख़ास थी, इस लिहाज से कि एक सौ पच्चीस करोड़ की आबादी वाले दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क़ में लोकतंत्र आज भी महफूज़ है. भले मज़बूरी में ही सही!  

लेकिन तकलीफ़ इस बात की है कि कार्पोरेट मीडिया घराने की चाकरी करते-करते हिन्दुतान के हमारे कुछ पत्रकार भाई/बहन इतने कार्पोरेटिया गए हैं कि वे पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए हैं! 

"सरकार केरोसिन की कालाबाज़ारी रोकने के लिए क्यों इसका मूल्य निर्धारण बाज़ार पर छोड़ नहीं देती?" (मतलब यह कि सरकार ग़रीब लोगों को केरोसिन पर दे रही सब्सिडी ख़त्म क्यों नहीं कर देती?) यह सवाल आज हिंदुस्तान के पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी से प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया। 

यह सवाल पेट्रोलियम के धंधे कर रही इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेटोलियम, रिलायंस जैसी किसी तेल कंपनी के नुमाइंदे ने उनसे नहीं पूछा, पूछा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के नुमाइंदों ने, और वो भी दिनदहाड़े प्रेस कॉन्फ्रेंस में।  

ऐसे सवाल पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने वाले पत्रकार ही पूछ सकते हैं. और ऐसे माफिया पत्रकारों की एक अच्छी ज़मात तैयार हो गई है हिन्दुस्तान में आजकल. यह हिन्दुस्तानी मीडिया का भयानक रुझान है.

दरअसल, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने 28 जनवरी को एक प्रेस कॉन्फेंस किया। यह कॉन्फ्रेंस महाराष्ट्र के मालेगांव में यशवंत सोनावने की तेल माफियाओं द्वारा सरेआम तेल छिड़ककर ज़िंदा जला
देने की घटना को लेकर बुलाया गया था.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ पत्रकारों ने पेट्रोलियम मंत्री मुल्क़ में सक्रिय तेल माफिय़ा पर लगाम लगाने के लिए किरासन तेल पर से सरकारी सब्सिडी को ख़त्म करने और उसकी कीमतें बाज़ार के आधार पर निर्धारत करने का जनविरोधी सवाल उठाया।

पत्रकारों के इस सवाल पर जयपाल रेड्डी को मज़बूरन यह कहना पड़ा कि मैं सैद्धांतिक रुप से सहमत हूं कि अगर केरोसीन की क़ीमतें बाज़ार आधारित हों तो कालाबाज़ारी रुकेगी लेकिन इस तरह का फ़ैसला लेना राजनीतिक रूप से कठिन है. सरकार तेल माफिया पर नियंत्रण के लिए उपाय कर रही है ताकि इसकी कालाबाजारी रुके लेकिन सरकार केरोसीन पर सब्सिडी हटाने का राजनीतिक फ़ैसला नहीं कर सकती है.

उन्होंने कहा कि जब मैं 'राजनीतिक' कहता हूं तो इसका मतलब समग्रता में लिया जाना चाहिए. देश में बड़ी आबादी है जो बहुत गऱीब है जिन्हें कम क़ीमत पर केरोसीन मिलना चाहिए.

सैद्धांतिक रुप से सहमत होने के बावजूद पेट्रोलियम मंत्री का यह बयान काबिलेतारीफ़ तो है ही लोकतंत्र की भी जीत है. भले मज़बूरी में उन्हें यह बयान देना पड़ा हो. लेकिन यहाँ पर सवाल उन चाँद पत्रकारों से पूछा जाना चाहिए जिन्होंने पेट्रोलियम मंत्री से इस तरह का जनविरोधी सवाल क्यों पूछा. 


जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भ्रष्टाचार है इसलिए सरकार को पीडीएस ख़त्म कर देना चाहिए, पहले केरोसिन, फिर चीनी, चावल, गेहूं- सबकुछ बंद! वाह पत्रकार बंधु वाह! 

जानते हैं, तमाम करप्शन के बावजूद पीडीएस की कितनी बड़ी भूमिका है मुल्क के गरीबीरेखा के नीचे जी रहे लोगों के कुपोषण को दूर भगाने में? और मुल्क में गरीबी की पहचान के लिए गठित सरकारी कमिटियों के मुताबिक़ कितनी प्रतिशत जनता ग़रीब है? 35 से 85. जानते तो ऐसे बेवकूफ सवाल नहीं पूछते.

कार्पोरेट मीडिया घराने की चाकरी करते-करते इतने कार्पोरेटिया गए कि पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए? क्यों बदनाम कर रहे हैं मीडिया को? जाइये इस मुल्क में दलाली करने के बहुत सारे ठिकाने खुले हैं आप जैसों के लिए.

इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि लोकतंत्र  के चौथे स्तम्भ पर आजकल ऐसे ही कुछ दलाल पत्रकारों का दबदबा है जो लूटतंत्र के हिस्से और हिमायती हैं, और आम जनता के विरोधी. ये कुछ पत्रकार लोकतंत्र के खिलाफ़ सरकार को भडक़ाने का काम कर रहे हैं. यह दुखद और निंदनीय है और इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए.

मौजूदा दौर में जब मुल्क़ संक्रमण के दौर से गुजर रहा है तो पत्रकारों का यह फ़र्ज़ बनता है कि वे आम आदमी की दुश्वारियों को मद्देनजऱ रखते हुए अपने पेशे की गंभीरता को समझें और सत्ता-व्यवस्था को उचित सलाह दें. 


हिदुस्तान आज यदि दुनिया के नक्से पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क़ के तौर पर अपना ख़ास मुकाम बना पाया है तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी रही है कि यहाँ पत्रकारिता मिशन के तौर पर काम करती रही है. 

हमारे पत्रकार भाई-बहनों को यह समझना चाहिए कि पत्रकारिता करते हुए लोकहित का ख़याल रखना लाजिमी है. जिस दिन हिंदुस्तान या किसी भी लोकतंत्र के पत्रकार लोकहित को तजकर सत्ता, व्यवस्था, पूंजी, बाज़ार आदि के हित में कलम चलाने लगेगा फिर लोकतंत्र के मज़बूत से मज़बूत किले को कोई ढहने से रोक नहीं सकता. 

जिस लोकतंत्र पर हमें फ़ख्र है उसे बनाए रखने और मज़बूत करने के जि़म्मेदारी हम सबकी है. आज मुल्क़ में और हिन्दुस्तानी  समाज में कई ऐसी समस्याएँ और मुद्दे हैं जिन्हें बड़ी संजीदगी से सामने लाने की जि़म्मेदारी मीडिया की है.ताकि सरकार और व्यवस्था लोकतान्त्रिक विकास की राह पर मुल्क़ को आगे ले जाने का दबाव बनाया जा सके. एक सौ पच्चीस करोड़ हिन्दुस्तानियों का हित इसी में है.


इसलिए हम मांग करते हैं कि सरोकारों की पत्रकारिता में विश्वास रखनेवाली पत्रकार बिरादरी केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी से ऐसे जनविरोधी सवाल पूछनेवाले पत्रकार/पत्रकारों की भर्त्सना करे. 
 

बुधवार, 26 जनवरी 2011

आम जन को मिले संविधान की सत्ता : उदय प्रकाश

उदय प्रकाश
साथियो, मौक़ा आज गणतंत्र दिवस की 62 वीं सालगिरह का है. हमारे गणतंत्र के समक्ष कई गंभीर चुनौतियाँ हैं. सत्ता और व्यवस्था कार्पोरेट लोकतंत्र की राह पर चल रही है. संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए अधिकार छीने जा रहे हैं. चौतरफ़ा मची लूट, अन्याय, भ्रष्टाचार, हिंसा वगैरह से मुल्क़ का आम नागरिक परेशान है, और सत्ता व्यवस्था बेखबर. संविधान की सत्ता वापस हिंदुस्तान की जनता को लौटाई जाए. पेश है हाल ही में साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए चुने गए हमारे दौर के बेहद लोकप्रिय लेखक उदय प्रकाश की इन्हीं मसलों पर बेबाक टिप्पणी, जो आज दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित हुई है. - शशिकांत
   
आज सबसे पहले हम यह देखें कि पिछले साठ सालों में लोकतंत्र की स्थापना के बाद आजाद भारत में वो क्या है जो बचा रह गया है, और वो किस रूप में आज हमारे सामने है। संविधान कहता है कि लोकतंत्र में सर्वोच्च सत्ता जनता के हाथ में होती है और संसद तथा कार्यपालिका में लोग या तो उसके द्वारा प्रदत्त किए गए अधिकारों के तहत काम करते हैं या जनता के सेवक होते हैं। यानि जनप्रतिनिधियों के पास जो भी संवैधानिक सत्ता है वह उन्हें देश के नागरिकों  के द्वारा दी गई हैं।   

इस मौके पर सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि देश में लोकतंत्र कितना बचा हुआ है और आम जनता की स्थिति क्या है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले वर्षों में लोकतंत्र का लगातार क्षरण होता गया है और सारी सत्ता उन गिने-चुने ताकतों के हाथ में रह गई है जो ऐसी योजनाएं बना रहे हैं, जो स्वयं लोकतांत्रिक हितों के विरुद्ध ठहरती है।  

हमें सोचना होगा कि हमारे देश की जनता वोट देकर जिस सरकार को बनाती है, उसी जनता के बहुत साधारण और न्यायिक मांगों के विरूद्ध सरकार को सेना और अर्धसैनिक बलों का प्रयोग क्यों करना पड़ रहा है। भोजन, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, बिजली, घर, जमीन, अभिव्यक्ति की आज़ादी और ऐसी हर चीज पर से देश के नागरिकों का अधिकार छिनता चला जा रहा है। 

कई बार तो ऐसा लगता है कि यह जो कारपोरेट डेमोक्रेसी है वह किसी भी तरह से अतीत की उन सर्वसत्तावादी, निरंकुश व्यवस्थाओं से अलग नहीं रह गई है जिन्होंने अपनी प्रजा से उसका सबकुछ छीन लिया था।

दूसरी बात यह है कि जब इक्कीसवीं सदी आई थी तो हम सबने बहुत विश्वास और आशा के साथ भविष्य की ओर देखा था। लेकिन पहला दशक बीतने के बाद जब हम पीछे की ओर देखते हैं तो वो दशक आर्थिक घेटालों, भ्रष्टाचार और वैश्विक आर्थिक मंदी का सबसे भयावह दौर भी इसी बीच आया। 

याद रखें, भ्रष्टाचार अपने आप में एक ऐसी ताकतवर विचारधारा (आइडियोलाजी) और व्यवस्था (सिस्टम) है, जो दूसरी किसी भी विचारधारा और व्यवस्था को निगल जाती है। आप खुद देख सकते हैं कि इसने समाजवाद और लोकतंत्र, दोनों को विफल कर दिया है।

विडंबना यह है कि हमारे प्रधानमंत्ऱी दुनिया के सबसे विश्वसनीय आर्थिक विशेषज्ञ राजनेता माने जाते हैं लेकिन उनके कार्यकाल में महंगाई और भ्रष्टाचार इतना बढ़ा कि गरीबों की थाली से दाल और प्याज भी गायब हो गए। उन्नीसवीं सदी के मध्य में आधुनिक हिंदी के पितामह कहे जानेवाले भारतेंदु का नाटक ‘अंधेर नगरी’ आज बार-बार याद आता है- ‘‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।’’ आज आप खुद देख लीजिए, प्याज पैंसठ रुपए किलो, पेट्रोल पैंसठ रुपए लीटर और बीयर पैंसठ रुपये बोतल।

इस नई उदारवादी अर्थनीति ने सामान्य भारतीय नागरिकों के सामने एक ऐसा संकट प्रस्तुत किया है जिसकी किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह हमारे इतिहास का अब तक का सबसे भयावह दौर है। जिस स्वतंत्र बाजा़र को सभी संकटों का स्वयं विमोचक कहा जा रहा था, आज उसके सामने बड़े सवालिया निशान हैं। चंद मुट्ठी भर व्यापारिक समूहों की आय और मुनाफा बढ़ा कर सकल घरेलू आर्थिक विकास का भ्रम पैदा करने वाले इस बाज़ार ने बेरोजगारी, महंगाई, कर्जदारी, आर्थिक-सामाजिक विषमता की डरावनी खाई जिस तरह पैदा की है, उसका भविष्य डरावना लगता है।

राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान परिषद के आंकड़े के अनुसार देश में हर सत्ताइस मिनट पर एक नागरिक आत्महत्या कर रहा है। आंध्र और विदर्भ में गरीबी और कर्ज में डूबे किसानों की हताशा के साथ शुरू हुआ आत्महत्या का संक्रामक रोग मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड और उत्तर प्रदेश तक पहुंच गया है। सरकार जीडीपी की उपलब्धियों के नाम पर पूरे देश को अंधेरे में नहीं रख सकती। अपनी जिस सेना पर हम कभी गर्व करते थे, वह सेना भी अब भ्रष्टाचार की चपेट में आ चुकी है। अंधाधुंध दौलत की हवस कहां तक जा पहुंचेगी, हमने कभी यह सोचा भी नहीं था।

कभी, रवींद्रलाथ टैगोर और महात्मा गांधी ने यह कहा था कि हमारा भारत देश यूरोप के राष्ट्र-राज्यों से इस मायने में भिन्न है क्योंकि यह किसी एक भाषा, धर्म, नस्ल तथा एक किसी साझा श़त्रु के द्वारा परिभाषित नहीं होती है। हमारे गणतंत्र का विचार ही विविधताओं और विभिन्नताओं के सहअस्तित्व और उनके सहकार की नींव पर टिका हुआ था। लेकिन आज आप देखिए कि इस देश के भीतर आंतरिक और बाहरी एक नहीं कई शत्रु हैं। 

लगता है जैसे यह परस्पर शत्रुओं के आपसी घमासान से भरा हुआ, किसी महाभारत काल का गणराज्य है। संविधान लगभग एक मिथक बनकर रह गया है। संविधान की सबसे ज्यादा धज्जियां कार्यपालिका और खुद न्यायपालिका ने बिखेरी है। 

आम नागरिक को तो ट्रैफिक का उल्लंघन करने पर भी जुर्माना भरना पड़ता है, किसान लगान देता है, जनता लगभग सभी शासकीय अनुदेशों का पालन करती है। लेकिन जो स्वयं शासक वर्ग है वह संविधान की मर्यादाओं के बाहर जा चुका हैं। यह बड़ा ही कठिन और चुनौतीपूर्ण समय है।

बहुत पहले से हम सब देखते आ रहे हैं कि अमेरिका, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोश के प्रभाव में आकर जिस अर्थनीति का पालन और अनुसरण दुनिया के अधिकांश देशों ने किया उसने उन देशों की सरकारों को भ्रष्ट, निरंकुश और आतताई व्यवस्थाओं में बदल दिया। 

इस नई अर्थनीति ने एक ऐसी लुटेरी व्यवस्था को जनम दिया है, जिसमें आज हमारे देश की सारी राष्ट्रीय संपदा और संप्रभुता ही नहीं सामान्य नागरिकों का जीवन भी खतरे में है। मानवाधिकारों, उपभोक्ताओं के हितों और नागरिकों के तकाजों की कोई परवाह इस शासक वर्ग में नहीं रह गई है।

मैं बार-बार यह कह रहा हूं कि देश में विकास का जो मॉडल पिछले दो-ढाई दशकों से अपनाया जा रहा है वह किसी मायने में विकास है ही नहीं। इस विकास के कारण  प्रकृति और नागरिकों को विनाश, विस्थापन और आर्थिक तबाही का सामना करना पड़ रहा है। सन 1947-48 में देश की कुल भूमि का छियालीस प्रतिशत वनाच्छादित था। आज इकसठवें वर्ष में यह ग्यारह-बारह प्रतिशत मात्र रह गया है। 

नदियां खत्म हो गई हैं। जैविक विविधताएं समाप्त हो रही हैं। ओजोन की परत में छेद ही छेद है। हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। पानी पीने के काबिल नहीं है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अपराध इतना कभी नहीं था। बेरोजगारी एक भयानक समस्या बन गई है। 

हर सत्ताइस मिनट में देश का कोई न कोई नागरिक आत्महत्या कर रहा है। गांवों से ऐसा पलायन कभी नहीं देखा गया। शहर और महानगर रोजगार की तलाश में पलायित होकर आनेवाली आबादी को सह नहीं पा रहे हैं। 

हर ओर अंधेरा ही अंधेरा है। लेकिन देश का जीडीपी फिर भी बढ़ रहा है। सेंसेक्स लगातार उछल रहा है। मीडिया में लाफ्टर चैलेंज, ग्लैमर, सेक्स, गॉसिप और रियलिटी शो जैसे कार्यक्रमों के जरिये टीआरपी बढ़ाया जा रहा है। अखबार रुपये लेकर राजनीतिक खबरें छाप रहे हैं। सांसद सार्वजनिक हितों से जुड़े सवाल संसद में उठाने के लिए रुपये मांग रहे हैं।   

मैं आग्रह करूंगा कि आगामी छब्बीस जनवरी को राजधानी में राजपथ पर राष्ट्रªपति भवन के सामने नए-नए टैंकों, लड़ाकू जहाजों, मिसाइलों की प्रदर्शनी नहीं बल्कि प्याज, लहसुन, प्राणरक्षक दवाइयों, विस्थापितों के पुनर्वास के लिए बने मकानों के मॉडल और देश के गरीब परिवारों के उपयोग में आ सकने वाले स्कूलों-अस्पतालों-बिजलीघरों-नलकूपों के नमूनों और उन जरूरी सामग्रियों का प्रदर्शन होना चाहिए जिनकी जनता को जरूरत है। हम सब वही देखना चाहते हैं। 

छब्बीस जनवरी को देश के नागरिकों को संविधान द्वारा दिये गये मूलभूत अधिकार और एक लोकतांत्रिक गरिमापूर्ण मानवीय जीवन उन्हें वापस लौटाई जाए। शायद देश के अस्सी प्रतिशत लोगों की यही आकांक्षा है। 
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

आज पैसे की अहमियत बढ़ गई है : नासिरा शर्मा

मेरी पैदाइश सन अड़तालीस में इलाहाबाद में हुई। शुरुआती पड़ाई-लिखाई भी वही हुई, बीए तक। हमारे घर का माहौल ही कुछ ऐसा था जहां सभी लिखते-पढ़ते थे। लेकिन कौन लेखक बन जाएगा ऐसा कुछ नहीं का जा सकता। 

जहां तक लिखने की बात है, तब मैं बहुत छोटी थी। अपने स्कूल के एक कॉम्पीटिशन में मैंने एक कहानी लिखी थी। फिर कॉलेज क मैगज़ीन में भी मेरी कहानियां प्रकाशित हुईं। लेकिन बड़े होकर मैंने 'बुतख़ाना' कहानी लिखी जिसे कमलेश्वर जी ने 'सारिका' के नवलेखन अंक में छापा। 

अठारह साल की उम्र में मैंने मैरेज़ की और लंदन चली गई क़रीब तीन साल बाद वहां से वापस जेएनयू लौट आई। लेकिन  एक लेखिका के तौर पर इलाहाबाद से कभी मरा कोई गुमान नहीं रहा। वहां उन दिनों बहुत बड़े-बड़े लेखक रहते थे लेकिन मैं कभी किसी से नहीं मिली। 

मेरा पहला कहानी संग्रह ‘‘सामी काग़ज़’’1980 में स्रीपत राय जी ने छापा। उसके बाद ईरान पर मैंने बहुत लिखा। यह सच है कि वहां जाने से मेरी रायटिंग खिली। ज़ोरदार तरीक़े से लिखने की शुरुआत हुई जिसकी ख़ूब चर्चा भी हुई।

इधर जो हमारा काम हुआ है वो सब लगभग इलाहाबाद पर ही केंद्रित है। ‘‘अक्षयवट’’ उपन्यास में इलाहाबाद शहर तो समझो हीरो हो गया है।  उसमें हां के तीन-चार इम्पोर्टेंट पात्र हैं- पुलिस, वकील, स्थानीय गुंडे वगैरह। उस उपन्यास में मैंने यह दिखलाने की कोशिश की है कि ये चारों मिलकर किस तरह वहां के पूरे सिस्टम को बिगाड़ रहे हैं। 

दूसरा मेरा उपन्यास है ‘‘कुइयांजान’’ वो भी इलाहाबाद पर ही है। ज़ीरो रोड में मैंने दिखाया है कि इलाहाबाद का एक ग़रीब लड़का किस तरह कबूतरबाजों की गिरफ़्त में फंसकर दुबई जाता है और वहां के मकउ़जाल में फंस जाता है। ‘

‘पारिजात’’ में हमने दिखाया है कि कि आज किस तरह हमारे पूरे मुल्क में नफ़रत की दीवारें खड़ी की जा रही हैं। हमारे कल्चर कितने रिच थे। हमारे यहां गंगा-जमुनी तहज़ीब थी लेकिन आज कैसे उन्हें नेस्तनाबूद किया जा रहा है।

हमेशा  इस बात की बेहद खुशी रही है कि मुझे मेरे हस्बेंड, रिश्तेदारों और दोस्तों से इंस्परेशन मिलता रहा। लेकिन मैं आजतक किसी रायटर से पूरी तरह मुतास्सिर नहीं हो पाई। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि मैं यह कहूं कि मुझे फलां की तरह लिखना अच्छा लगता है। मेरा मानना है कि हर लेखक का अपना एक स्टाइल होता है। 

आज हम महानगरों में विकास देखते हैं। लेकिन इलाहाबाद वैसा ही है जैसा था। यह अलग सवाल है कि इलाहाबाद के डेवलपमेंट पर क्यों नहीं तवज्जो दिया गया और इसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं।

लेकिन मुझे लगता है कि इलाहाबाद का कल्चर बर्बाद हुआ उन लोगों की वजह से जो आसपास के इलाकों से काम की तलाश में वहां माइग्रेट करके आए।

आज भी आप सिविल लाइंस जाकर वहां के पुराने लोगों से मिलिए, उनके साथ बातचीत और उनके आचार-व्यवहार में आपको तब्दीली नहीं दिखाई देगी। हालांकि वे अब बूढ़े हो गए हैं। 

नई जेनरेशन बहुत परेशान है। अपने इमोशनल रिलेशन को लेकर वे श्योर नहीं हैं।  उनकी नौकरी श्योर नहीं है। उनको अच्छा माहौल हमने नहीं दिया। एक जो ठहराव होता है अंदर का जिसमें कुछ हो या न हो मारे पास लेकिन फिर भी हम मस्त रहते थे। आज के ज़माने मैं पैसा बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। 
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित. दैनिक भास्कर में प्रकाशित)

रविवार, 23 जनवरी 2011

जयपुर साहित्य उत्सव में किस किस की जय हो !

मित्रो, आज जयपुर साहित्य उत्सव और कपिल सिब्बल के काव्य संग्रह 'किस किस की जय हो' के  लोकार्पण के मसले को लेकर फेसबुक पर ख़ूब बहस हुई. आपके हवाले कर रहा हूँ. शुक्रिया. -शशिकांत

भाई सुयश सुप्रभ ने फेसबुक पर बहस शुरू करते हुए लिखा, "जयपुर में साहित्य का जो उत्सव 

मनाया जा रहा है उसकी सार्थकता को लेकर मन में 

कई शंकाएँ उठ रही हैं। इस उत्सव के प्रायोजकों में 

ऐसी कई कंपनियाँ शामिल हैं जो राष्ट्रमंडल खेलों के 

घोटाले में शामिल थीं। अगर लेखकों का उद्देश्य 

समाज को वैकल्पिक सोच देना और सत्ता के आगे 

घुटने टेक देने की मानसिकता को बदलने की कोशिश 

करना है तो ऐसे आयोजनों में शामिल होकर वे मेरे जैसे पाठकों को निराश ही करेंगे।"

शशिकांत, "भाई सुयश जी आज हम एक ऐसे समय में जी-मर रहे हैं जिसमें हमारे दौर के बहुत सारे लेखक अलग-अलग गिरोह बनाकर सत्ता, पूंजी, बाज़ार, माफ़िया तत्वों और भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर मलाई खा रहे हैं और लूटतंत्र के हिस्से बन गए हैं. ऐसे लेखकों, लेखक संगठनों और गिरोहों से समाज को वैकल्पिक सोच देने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है."

Anjule Elujna , "
 क्या साहित्य को सत्य की परवाह नहीं होती? या वह उन मौकों की तलाश में रहता है जब विभिन्न ताकतें अपना वर्चस्व बनाये रखने की कोशिश में उसे अपने साथ जोड़ लेती हैं? क्या साहित्य उस झूठ के फेर में होता है जो एक आभासी सच गढ़ता है, लोगों के व्यापक हित के बारे में महज़ अवधारणात्मक उछाल-कूद करता है जबकि दरअसल वह व्यावसायिक मठों की चाकरी भर कर रहा होता है?
 
अगर इस उत्सव में हिस्सा ले रहे लेखक मानते हैं की एक बेहतर जीवन संभव है और उसे हासिल किया जाना चाहिए, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि यथास्थिति को बनाए रखने में उनकी मिलीभगत उनकी मान्यताओं के बिल्कुल उलट है. अनैतिक और पापपूर्ण व्यापारिक समूहों के सहयोग से आयोजित एक साहित्य उत्सव को एक खूबसूरत अवसर के रूप में प्रस्तुत करना क्या सिर्फ़ सम्मोहन कि कोशिश-भर नहीं है?
कुछ कहने में नाकाम हूँ मैं क्या कहना चैये क्या नहीं, नहीं पता!"

शशिकांत,  "भाई @anjule Elujna जी आपने बिल्कुल दुरुस्त फ़रमाया है, "अगर इस उत्सव में हिस्सा ले रहे लेखक मानते हैं की एक बेहतर जीवन संभव है और उसे हासिल किया जाना चाहिए, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि यथास्थिति को बनाए रखने में उनकी मिलीभगत उनकी मान्यताओं के बिल्कुल उलट है."
...कथनी और करनी में फ़र्क से भी नीचे गिर गए हैं ऐसे लेखक. 
क्या समझते हैं "अनैतिक और पापपूर्ण व्यापारिक समूहों के सहयोग से आयोजित" साहित्य उत्सव में प्रतिभागी बने लेखक बेबस, लाचार और अभिजात सत्ता समाज के उत्पीडन के शिकार आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए लिखेगा? 
साहित्य को सत्ता और पूंजी के साथ सांठ-गाँठ कर ख़ुद अपना और अपने बेटी-दामाद, चमचे, चापलूस और पिछलग्गुओं के जीवन ज़रूर बेहतर बना रहे हैं ये लेखक."
Ernest Albert ‎"दि मीन्स प्रूव  दि  एंड...." क्रिया और कारक.
मनीष रंजन : उनको प्रेमचंद से प्रेरणा लेनी चाहिए. क्या.....?  
(नोट : फेसबुक पर बहस  जारी है...)

इसी बीच, पेंगुइन हिंदी ने ख़बर दी, "आज शाम ६ बजे 
 
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में दरबार हॉल में कपिल सिब्बल 
 
के काव्य संग्रह 'किस किस की जय हो' का लोकार्पण होगा. 
 
आपकी मौजूदगी से कार्यक्रम को गरिमा मिलेगी. लोकार्पण के 
 
बाद कपिल सिब्बल और अशोक चक्रधर कविताओं का पाठ 
 
करेंगे." 

उस पर शशिकांत ने कहा, "मित्रो, कभी अटल बिहारी वाजपेयी 'महान कवि' बनकर उभरे थे, आज कपिल सिब्बल. बंधु, यह विडम्बना है कि हिंदी कविता अब सत्ता के गलियारे से निकल रही है राजपथ से जनपथ की ओर. दरबारी कविता! ...क्या सचमुच रीतिकाल दोबारा आ रहा है?" 

रामप्रकाश अनंत बोले, "यह रीतिकाल से आगे की चीज़ है. रीतिकाल में राजाओं के यहाँ कवि होते थे. अब सत्ता साहित्य संगीत पैसा - कुछ भी हाथ से निकलने नहीं देना चाहती. उसे पेंगुइन और राजकमल जैसे प्रकाशक भी मिलेंगे और यही लोग इनके लिए नामवरों की व्यवस्था कर देंगे. सारी शक्तियां पूंजी में निहित हैं और हम पूंजीवाद की उच्च अवस्था की ओर बढ़ रहे हैं. कपिल सिब्बल आज जहाँ हैं उसके चलते तो कोई भी प्रकाशक उनके बयानों को भी कविता के रूप में छापने को तैयार हो जाएगा.

शशिकांत : हाँ,...इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया की ख़बर बनेगी. फिर पत्र-पत्रिकाओं में रिव्यू का सिलसिला शुरू होगा.

जय कौशल : जब सत्ता में आने के बाद अचानक कवि- प्रतिभा जगे, कविताओं की गहराई इसी से पता चलती है...खैर, लोकार्पण के बाद वाजपेयी जी की तरह जनता इनको भी जान जाएगी की सिब्बल जी का विश्वास  'किस-किस की जय' में है...

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल : "सवाल तो अशोक चक्रधर से पूछा जाना चाहिये कि बंधु! किस-किस की जय हो?"

जय कौशल : "सर, अशोक जी अब लगता है ऐसे सवालों से ऊपर उठ गए हैं.

(नोट : फेसबुक पर बहस  जारी है...)

बुधवार, 19 जनवरी 2011

हिन्दुस्तानी मीडिया में युद्धोन्माद और वर्चस्ववाद !

मित्रो,

हिन्दू कॉलेज के सखा और मीडिया में सहकर्मी-दोस्त मनोज, जो अब वैधानिक रूप से फ्रैंक हुज़ूर बन गए हैं, ने हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रौनिक मीडिया के युद्धोन्मादी, साम्प्रदायिक और गैर ज़रूरी पाक विरोधी प्रसारणों पर बेबाक टिप्पणी करती हुई अपनी यह पोस्ट साथियों के हवाले करने का हुक्म फरमाया है. यह लेख मीडिया, बाज़ार और लोकतंत्र पर केंद्रित 'समयांतर' के फरवरी 2011 अंक में प्रकाशित हुआ है.  फ्रैंक

 

अंग्रेजी के पत्रकार और लेखक हैं. उनकी लिखी क्रिकेटर इमरान खान की जीवनी, ‘इमरान वर्सेस इमरान : द अनटोल्ड स्टोरी’ जल्द ही आने वाली है. 
हुज़ूर की रिहाइश आजकल लन्दन है.
फ्रैंक से frankhuzur@rediffmail.com और  frankhuzur@live.co.uk पर संपर्क कर सकते हैं. - शशिकांत 

हिन्दुस्तानी मीडिया में युद्धोन्माद और वर्चस्ववाद !

फ्रैंक हुज़ूर 
 
वो 26 नवम्बर 2008 की ही शाम थी. दिल्ली और मुंबई के बाज़ारों में गहमागहमी अपने उफ़ान पर थी. लोगबाग अपनी-अपनी ज़िंदगी में मशगूल थे. मैं भी दिल्ली के पहाड़गंज में आवारागर्दी कर रहा था. एक दुकान पर गोल्डफ्लेक सिगरेट को जैसे ही मैने चिंगारी के हवाले किया, मेरी नज़र सामने लगे एक मशहूर न्यूज़ चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ पर थम गईं - "मुंबई पर पाकिस्तान का हमला"... "हत्या और दरिन्दगी का सिलसिला बदस्तूर जारी"... विजुअल्स मुंबई की लगातार वीरान हो रही सड़कों के थे. 

कुछ ही पल में कैमरा हेरिटेज होटल ताज की सुर्ख मीनारों पर फ्लैश डांस करने लगा. इस विचित्र और रहस्यमय मंज़र की हक़ीक़त वहां मौजूद लोगों को समझ नहीं आ रही थी. अचानक मदन कैफ़े के विदूषक बैरे रामसिंह ने ऐलान कर दिया, "आतंकवादी हमला." जैसे ही आतंकवादी शब्द रामसिंह के मुंह से बाहर आया, कुछ फिरंगी मेहमानों के हाथ से गरम चाय की प्याली छलकते-छलकते बची. मदन कैफ़े पहाड़गंज में विदेशी सैलानियों की गुफ़्तगू का एक ज़बरदस्त अड्डा है, जहां वे हिन्दुस्तान के हर कोने से जमा होते हैं और क़रीब के सस्ते होटलों में मस्ती करते हैं.

इंडिया टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ का आगाज़ करने वाला एंकर कोट और पतलून पहना हुआ था. अंग्रेजों की माफ़िक उसने अपनी छाती के ऊपर ख़ूबसूरत  फ़िरोज़ी रंग की टाई लहरा रखी थी. उसकी जबान ज़बान जैसे-जैसे ‘आतंकवाद, ज़ेहाद, इस्लाम और पाकिस्तान पर वार करती, उसकी आंखें और सूर्ख़ होती चली जातीं, चेहरा भयानक होता जाता.

भयानक सूरत
 और सुर्ख आँखों वाले कोट-पतलून पहने उस एंकर की आवाज़ एक चीख़ बनकर मेरे कानों पर हमला कर रही थी. रामसिंह के हाथ कांपने लगे थे. उससे कोई भी डिश परोसी नहीं जा रही थी. बीड़ी पे बीड़ी सुलगाए जा रहा था. मैंने अपनी नज़र दाएँ और बाएँ दौड़ाई तो क़रीब में जमा हुए राहगीरों में मैंने दो-तीन मुस्लिम चेहरों को न्यूज़ चैनल के विस्फोटक ब्रॉडकास्टिंग का दीदार करते हुए पाया.

हमले के आग
 उगलते धुएं ने कैफ़े  के बाहर एक लम्बी दाढ़ी वाले भगवाधारी साधू को भी भिनभिनाने के लिए उत्साहित कर दिया था. उसकी आवाज़ उस एंकर की तरह शैतानी कहकहा लगाने लगी. मुसलमान और पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने और हर एक मुसलमान को चीर फाड़ देने का वो उचक-उचक कर ऐलान करने लगा. हमले के बमुश्किल एक घंटे भी नहीं बीते थे, मगर मुंबई के क़त्लेआम का मुजरिम पाकिस्तान और मुसलमान हर जबान पे साया हो चला था. ये जादू था उस कोट-पतलून पहने हुए एंकर का, जो अकेला नहीं था अपनी वहशत-ए-जंग में.

जब मेरी नज़र
अपने करीब दो मुसलमानों के चेहरे पे पड़ी तो उनके सूर्ख़ होंठ सफ़ेद पड़ चुके थे. आँखों से रौशनी ग़ायब थी. मैंने साफ़ महसूस किया कि उनके मन-मस्तिस्क से सुकून रफू चक्कर हो चला था. ऐसा लग रहा था जैसे वो क़साईख़ाने के बकरे हों और उनके दिल फड़क-फड़क दुआएं मांग रहे हों कि जल्दी से टीवी स्क्रीन पर नाच रहे दरिंदगी के विजुअल्स का इंतकाल हो जाए.

रामसिंह ने
 मासूमियत से लबरेज उन दोनों मुस्लिम लड़कों की बुझी-बुझी आँखों में बड़े एहतराम से झाँका और चाय की चुस्की लेने का इशारा किया. तभी मैंने देखा कि भगवा कुरता पहने साधू ने बमुश्किल चार फुट के रामसिंह की कोहनियों पर जोर से धक्का दे मारा, ” कैसा हिन्दू है तू राम सिंह, दुश्मन-आतंकवादी को चाय पिला रहा है?” ज़लज़ला एक हज़ार मील दूर अरब सागर के किनारे बसे हिंदुस्तान के चमचमाते शहर मुंबई में आया था मगर इसकी गूंज का असर मदन कैफ़े के रामसिंह से लेकर मैडम सोनिया गाँधी तक देखा जा सकता था.

इंडिया टीवी
 के एंकर की आवाज़ बदले के ज़ोश से सराबोर थी. उसके लिए पाकिस्तान का मतलब वो जगह थी जहां-जहाँ गुसल फ़रमाए जाने के अलावा और कोई काम नहीं हो सकता, एक चौड़ी-उथली नाली जिसके पानी में दहशतदर्गी का झाग मिला हो. मदन कैफ़े के हाक़िम, जिसे बंटी भैया कहते है, ने अपने टीवी के  रिमोट कंट्रोल को मोबाइल की माफ़िक  दबाना शुरू किया और एक के बाद एक सभी हिंदी और अंग्रेज़ी  ख़बरिया चैनलों पर दनादन चल रहे इस दहशतगर्दी के दर्दनाक सर्कस का लुत्फ़ उठाने लगा. “जब हमारी माओं, बहनों और भाइयों को खून में नहलाया जा रहा हो तो ...” एक अज़ीब-सी नफ़रत भरी यह आवाज़ एक न्यूज़ चैनल पर हिन्दू परिषद के किसी कारकून की थी.

ख़बरिया चैनलों के बीच
गलाकाट प्रतिस्पर्धा अपने उरूज पर थी. पाश्चात्य लिबासों में करन जौहर के क्रॉसओवर सिनेमा के चरित्र लग रहे एंकर लोग 'गर्द ही गर्द', 'खून ही खून', 'पाकिस्तान', 'लश्कर' और 'ज़ेहाद' जैसे शब्दों की चीख-चीख कर हर गली, बाज़ार और शहर को पैट्रियट (देशभक्त) बनाने पर तुले हुए थे. ये प्लास्टिक पैट्रियोटिज्म की हुंकारी थी. जो भी इससे बचने की कोशिश करेगा उसे 'देशद्रोही' करार दिया जाएगा. युद्धोन्माद (जिन्गोइस्म) कोट और पतलून पहने सैकड़ों एंकरों की आवाज़ों को चीखों में बदल दिया था. युद्धोन्माद का यह सिलसिला उतना है जितनी दहशतगर्दी.

एडवर्ड लोयूईस बार्नेस
 को पब्लिक रिलेसंस का भीष्म पितामह कहा जाता है. बार्नेस फ्रॉयड की बहन का बेटा था. पहले विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी अवाम के अवचेतन में युद्धोन्माद भड़काने का ज़िम्मा बार्नेस के हाथों में सौपा गया था. बार्नेस भीड़ मनोवृत्ति (हर्ड इंस्टिंक्ट) को प्रोपगंडा के तहत काबू में रखना अहम मानता था. उसकी नज़र में जम्हूरियत में जनता के विचारों में जोड़-तोड़ ज़रूरी है.


ऑस्ट्रलियन विद्वान
 जॉन पिल्गर ने शिकागो में दिए एक व्याख्यान में कहा कि प्रोपेगंडा करने वाला मीडिया एक अदृश्य सरकार (इनविज़िबल गवर्नमेंट) का प्रतिनिधि है. पिल्गर ने बार्नेस के विचारों को पब्लिक रिलेसंस की बाइबल गोस्पेल की माफ़िक बताया और यह भी कहा कि ‘अदृश्य सरकार’ वास्तव में असली हुकूमत है. क़रीब अस्सी साल पहले बार्नेस अपनी बात अमेरिकी अवाम पर गाहे-बगाहे लाद रहा था. एक तरह से यही कॉर्पोरेट जर्नलिज्म का बीजारोपण भी था.

बार्नेस ने
 सन 1965 में अपनी आत्मकथा प्रकाशित की. वो एक जगह लिखता है कि कार्ल वन विगंद हर्स्ट अख़बार का विदेश संवाददाता था. वो मुझसे गोएबल्स के नाज़ी प्रोपेगंडा के मुतालिक़ बहस कर रहा था. गोएबल्स ने कार्ल विगंद की किताब क्रिस्टलाइजिंग पब्लिक ओपिनियन से प्रेरणा लेने की बात कुबूली.

उसने लिखा है कि
 नाज़ी सत्ता को अबेध बनाने में और यहूदियों के खिलाफ़ अभियान चलाने में इस किताब का असर था. गोएबल्स ने विगंद को अपनी प्रोपेगंडा लायब्रेरी भी दिखाई. यह देखकर विगंद  खौफ़ज़दा हो गया था. उसके मुताबिक़ यहूदियों पर हमला किसी ‘भावना का विस्फ़ोट’ नहीं बल्कि नाज़ियों की एक सोची-समझी रणनीति थी.

एक अमेरिकी आलोचक
 मर्लिन पिएयेव ने बार्नेस को ‘ यंग मैकियावेली ऑफ़ आवर टाइम” कहा था. ये ख़िताब हिंदुस्तान के ख़बरिया चैनलों के सिपहसालारों पर ख़ूब जमता है.

भारत में ख़बरिया चैनलों का कॉरपोरेट चेहरा 1993 में बेपर्दा हुआ जब एक चावल के धंधे से  ख़बरों के सौदागर बने सुभाष चन्द्र गोयल ने जी न्यूज़ का आगाज़ किया. ये दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के ठीक बाद का वक़्त था. जब पूरा मुल्क मज़हबी हत्याओं और लूट-मार के तांडव से जंग लड़ रहा था. जी न्यूज़ के हाक़िम को नाज़ी प्रोपगंडा और विचारों से सरोकार रखने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविरों में सफ़ेद कमीज़ और ख़ाकी हाफ़ पैंट में सलामी ठोंकते देखा जाता रहा है.

इस तरह
आज़ाद हिंदुस्तान में चौबीस घंटे के न्यूज़ चैनल की शुरुआत करने वाला संघ की भेदभाव वाली राजनीति पर भरोसा करने वाला शख़्स था. आप इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की टीवी मीडिया में सीधे दख़ल के तौर पर भी देख सकते हैं. ज़ी न्यूज़ ने ख़बरों को साम्प्रदायिक बनाने की जो नींव रखी वो आज कमोबेश हर टेलीविजन चैनल पर जारी है.

टेलीविजन चैनलों की रिपोर्टिंग में बार-बार धार्मिक पूर्वाग्रह दिखते रहे हैं. मुंबई धमाकों की रिपोर्टिंग के वक़्त भी ये बात खुलकर सामने आई. इसने समाज का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पहले से ही पाकिस्तानी ख़ुफिया एंजेंसी आईएसआई ने अपनी करतूतों से हिन्दुस्तान के मुसलमानों को मुश्किल में डाल रखा था. 


इस घटना के बाद माफ़िया डॉन दाऊद इब्राहीम के रास्तों पर चलते हुए मीडिया के अंडरवर्ल्ड में भी हिंदू बनाम मुसलमान की खाई दिखाई देने लगी. इस्लाम को आतंक का पर्याय बनाकर पेश करने का चलत बढ़ता ही गया. ठीक इसी तरह आतंकवाद का खौफ़ दिखाकर अमेरिकी मीडिया पहले ही अपना धंधा चमका चुका था.

भारतीय मीडिया भी
 उसी के नक्शे कदम पर चल निकला. सुभाष चंद्र गोयल की विचारधारा यहां हर तरफ़ थी, जिनको पाकिस्तान, तालिबान, लश्कर, ज़ेहादी इस्लाम के अलावा और किसी दुश्मन से देश की संस्कृति और परंपरा को ख़तरा नज़र नहीं आता. उन्हीं लोगों ने गुजरात होलोकास्ट के बाद नरेन्द्र मोदी को 'विकास पुरुष'  का होलोग्राम देने में कसर नहीं छोड़ी.

जिस तरफ नज़र डालता हूँ
 अँधेरा ही अँधेरा नज़र आता हैं. हमारे शाइनिंग मीडिया के साहबज़ादों के ऐसे लक्षण हैं कि पाकिस्तान और दहशतगर्दी की ख़बरों को पेश करते वक़्त वो अपने विवेक से मरहूम मालूम पड़ते हैं और अलक़ायदा के वहाबी टेररिस्ट की कब्र पर फातिहा एक हिंदुत्ववादी वहाबी की तरह पढ़ते हैं. वतनपरस्ती की ये आग सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान को ही लेकर उफ़ान पे सैलाब की तरह इन्हें क्यों चपेट में ले लेती है?

इतनी बेचैनी
देशवाशियों के दिलो-दिमाग़ पर अमेरिका और चीन के काले मंसूबों को लेकर क्यों नहीं चीख-चीख कर बताई जाती है? युनियन कार्बाइड  ने भोपाल में जो आतंक मचाया उसका खामियाज़ा लाखों लोग भुगत रहे हैं, फिर भी वारेन एंडरसन और अमेरिका के लिए हमारे दिल में कारपोरेट मीडिया के दीवानख़ाने ने नफ़रत के क़त्बे क्यों नहीं बनाए?

इस खिसिआनी हँसी के ब्रॉडकास्टिंग को लेकर टीआरपी के ख़तरनाक खेल ने मीडिया के अपने  अख़लाक़ को ही गिराया है. उन करोड़ों लोगों, जिनके बड़ों के कब्रिस्तान हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बंटकर बिखर चुके हैं, हमारी मीडिया ने उनकी आस्था में सिर्फ ख़लल ही नहीं डाला है बल्कि ज़हर घोलने का ज़ुर्म किया हैं. जो ख़ानदान एक जगह जिया, एक जगह मरा अब उसकी कब्र तीन कब्रिस्तानों में बंटी हुईं है.

ये बात दुरुस्त है कि हमारे मुल्क़ में पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने दहशतगर्दी की बीज बोई है और इसकी बुनियाद को नेस्तनाबूद करने की जंग चलती रहेगी. मगर इस जंग को हम एक मज़हबी लिबास पहनाकर आख़िर कब तक ‘कुफ्रिस्तान और क़ब्रिस्तान’ करार देते रहेंगे?

कारगिल लड़ाई को
 जिस तरह मीडिया ने हमारी आँखों में बसाया उसने भी राष्ट्रवाद का परचम लहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वहां मारे गए नौजवानों के ताबूत में घोटाला कर लोग मलाई खाते रहे. उनकी  क़ुर्बानी को तिरंगे में लपेटकर वोट का ख़ूब खेल हुआ. 


एक जांबाज़ जवान की ज़िन्दगी को कुर्बान कर बार्नेस की प्रयोगशाला से बरखा दत्त जैसी मॉडल महिला पत्रकार अवतरित हुईं जिन्होंने कॉर्पोरेट मीडिया को राडिया जैसे फ़नकारों और हुकूमत के सिकंदरों को मिलाकर नई मिसाल पेश की. यह ख़बरिया महाकुम्भ ऐसा चला आ रहा है, जहां अलगाव ज़्यादा है और जुड़ाव कम. इसमें परंपरा, धर्म, संस्कृति और वतनपरस्ती के मायने गढ़ने का हक सिर्फ़ कुछ दक्षिणपंथी पत्रकारों को ही हासिल है.

सन 1928 में
 एडवर्ड बार्नेस ने अपनी मशहूर किताब "प्रोपगंडा" में लिखा है, "लोगों के विचारों की दुनिया को तहस-नहस कर उसे एक ख़ास शक्ल देना जम्हूरियत का तकाज़ा होना चाहिए. लोगों की संगठित आदतों और विचारों में सचेत और होशियारी से जोड़तोड़ करना (कॉन्शियस एंड इन्टेलिजेंट मेन्यूपुलेशन)  ज़रूरी है. जो लोग इसे करने में क़ामयाब होते हैं वही असली हुकूमत करते हैं."

निजी टेलीविजन चैनलों के
 न होने की वजह से बाबरी मस्जिद विध्वंस का लाइव प्रसारण नहीं हुआ था. मगर 30 सितम्बर 2010 को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने फैसला सुनाने का दिन  मुक़र्रर किया तो ख़बरिया चैनलों ने बड़े धड़ल्ले से प्रसारण कर ख़ुद को देशभक्त और सुसंस्कृत होने का परिचय दिया.

फैसला आने से पहले
  क़रीब पूरे महीने सन 1990-92 के आडवाणी की रथयात्रा की उत्पाती फूटेज गरिमामयी अंदाज़ में दिखायी गई. इस तरह मीडिया ने लोगों के मन-मस्तिस्क में लगातार ड्रिल करने की कवायद जारी रखी कि आडवाणी और उनकी चौकड़ी ने राम राज्य के वास्ते मंदिर बनाने के लिए देशव्यापी “आन्दोलन” किस तरह छेड़ा था.

युद्धोन्मादी और वर्चस्वादी
मीडिया के कारसेवक बॉलीवुड की रिपोर्टिंग में भी नज़र आते हैं. नई शताब्दी के आरम्भ में शाहरुख़ ख़ान की लोकप्रियता को टक्कर देने के लिए ऋतिक रोशन को हिन्दू ह्रदय सम्राट की तरह पेश करने की कोशिश की गई. बाल ठाकरे को इस विभाजित करने वाली विचारधारा को तो हवा देनी ही थी. उनकी चीख दक्षिणपंथी मीडिया के लिए टॉप न्यूज़ आइटम में ऐसे ही शामिल नहीं होती है. 


सदी के महानायक का तिलस्मी तगमा लिए हिन्दू धर्मस्थलों की सैर करनेवाले अमिताभ बच्चन को मीडिया कार्निवल के अंदाज़ में प्रचारित करता है. अमिताभ नस्ली नरसंहार के केवट नरेन्द्र मोदी के वाइब्रेंट गुजरात के ब्रांड एंबेसडर होने के साथ ही देश के धनवंत मंदिरों के भी राजदूत हैं.

ख़बरिया चैनलों को
 ठंडा गोश्त परोसने से कोफ़्त होती है. लोगों की निगाहें स्क्रीन पर जमी रहें इसके लिए उन्हें सुपर ग्लू वाली ख़बरों की तलाश होती है. वो गर्मी उन ख़बरों में कैसे आ सकती है जो मालेगांव धमाकों में हिंदू आतंकवादियों पर सवाल उठाए. तब मासूम मुसलमानों को जेल में ठूंस कर उन्हें दहशतगर्द बना दिया गया था लेकिन बाद में असली मुज़रिम हिंदुत्व के सिपहसलार निकले.


ठीक उसी तरह
 जिस तरह न्यूयॉर्क टाइम्स के पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता जुडिथ मिलर ने किया था. मिलर ने बेहद मासूमियत से लिखा की सद्दाम हुसैन के  ज़खीरे में विध्वंसक हथियार हैं. मिलर की रिपोर्ट को बुश ने अमेरिकी अवाम के सामने लहराते हुए कहा था कि हम किस वक़्त का इंतज़ार कर रहे हैं, चलते हैं न सद्दाम के बग़दाद में बेसबॉल खेलने.

26 नवम्बर को
 पाकिस्तानी दहशतगर्दी की रिपोर्टिंग ने यकीन दिला दिया है कि जितना जोर से चिल्लाया जाएगा, दर्शकों को उतना ही ज्यादा लुत्फ़ और मज़ा आएगा. उन्होंने जो तड़का लगाया उससे प्राइम टाइम पर युद्धोन्मादी ख़बरों के प्रसारण से दस  फ़ीसदी की उछाल दर्ज़ की गई. इस तरह मीडिया ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध का माहौल बनाने में पूरी भूमिका निभाई.

पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान की जीवनी लिखने के सिलसिले में मुझे वहां के मीडिया को क़रीब से जानने का अवसर मिला. जिओ टीवी के एंकर हामिद मीर ने मुझसे एक बार पूछा, "हिन्दुस्तानी मीडिया पाकिस्तान में दहशतगर्दी के अलावा कोई और चीज़ क्यों नहीं देखना चाहता? हामिद का कहना था कि आपका मीडिया क्यों हिदुस्तानियों को अक्सर पाकिस्तान से जंग के लिए भड़काता रहता है. हमारा मीडिया तो ऐसा नहीं करता." मेरे पास जवाब तो कई थे मगर मैं मुस्कुराने के अलावा क्या कर सकता था.

पिछले साल
 अगस्त में पाकिस्तान ने सदी की सबसे भयानक बाढ़ झेली, जब उनके तीन करोड़ की अवाम बेघर हो गई और हज़ारों लड़के-लड़कियों को लश्कर-ए-तयबा के दहशतगर्दों ने अगवा कर लिया. पाकिस्तान के मीडिया ने इस ख़बर को दबाने की कोशिश नहीं की कि मासूम हिन्दू और ईसाई लड़के-लड़कियों को सैलाबग्रस्त इलाकों से अगवा किया जा रहा है. 


तब इस तरह की दिल दहला देने वाली पाकिस्तानी ख़बरों पर हमारे मीडिया की नज़र क्यों नहीं पड़ी? फिर मुझे ऐसा लगा जैसे पाकिस्तानी मीडिया को कश्मीर और बॉलीवुड की ख़बरों के अलावा बाकी हिंदुस्तान की ख़बरों में दिलचस्पी नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे हमारे कॉर्पोरेट मीडिया को भी  हाफ़िज़ सईद, तालिबान और अजमल क़साब की नर्सरी आईएसआई के अलावा किसी और पाकिस्तानी चीज़ में मज़ा नहीं आता है.

पाकिस्तानी मीडिया में हिंदुस्तान को लेकर युद्धोन्मादी ऑब्सेशन मैंने उतना नहीं देखा. अक्टूबर 2009 में मैं पाकिस्तान के दौरे पर था वहां तहरीक़ -ए-तालिबान ने दहशतगर्दी फ़ैला रखी थी. ठीक उसी दरमियान हिंदुस्तान में भी विद्रोह तेज़ हो रहा था. तब मैंने जीओ टीवी के एंकर कामरान खान के शो में माओवादी हमले की ख़बर को देखा- “नाज़रीन, सिर्फ आपका मुल्क़ ही वॉयलेंस की चपेट में नहीं है, पड़ोस में भी हिंदुस्तान की सिक्यूरिटी फोर्सेस को माओवादी इन्सर्ज़ेंसी से जूझना पड़ रहा है.”

कामरान खान की
 रिपोर्ट में मैंने हिन्दुस्तान को लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं देखा. जिस भी जवान शख्स से मेरी लाहौर और इस्लामाबाद की सड़कों और गलियों में मुलाक़ात होती, ये जानते ही कि मैं हिंदुस्तान से तसरीफ  लाया हूँ वो थोड़े वक़्त के लिए हैरान होते, फिर फ़ौरन कहते, "कोई तकलीफ तो नहीं आपको? भाई, आपकी खैरियत हमारे अमानत की तरह है. हम भी हिंदुस्तान जाना चाहते हैं. हमारे बहुत सारे दोस्त हैं फेसबुक पर, ऑरकुट पर. हमने शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय की सारी फिल्में देखने का खूब शौक़ है. मगर आपकी हुकुमत हम सब नौजवानों को दहशतगर्द समझती है और वीसा ही नहीं देती. क्या हम सचिन तेंदुलकर के दीवाने आपको दहशतगर्द नज़र आतें है?”

कुछ ऐसी ही जबान में
 अपनी तड़प को रफ़ीक जां ने भी बयां किया था ज़ब मैं उनसे इमरान खान के पार्टी, तहरीक़-ए-इन्साफ़  के इस्लामाबाद दफ़्तर में मिला था. रफ़ीक पेशावर के पठान हैं और तेंदुलकर के कवर और अस्क्वैर लेग के बीच से चीरते हुए बुलेट शॉट के मुरीद हैं.

रफ़ीक और न जाने
 कितने रफ़ीक से मेरी गुफ़्तगू ज़ब भी होती मैं दिल ही दिल उनकी बातों को अपने हिन्दुस्तानी दोस्तों और साथियों की पाकिस्तान को लेकर जो अज़ीज ख़याल हैं उसके बारे में सोचता. कौन हिन्दुस्तानी सिर्फ सैर-सपाटे के लिए भी पाकिस्तान जाना चाहता है? कोई सिरफिरा ही लगता है जो वाघा बोर्डर के उस पार जाने की जुर्रत करे. जो नफ़रत का गुसलख़ानी ख़याल शरहद के उस पार के लोगों के लिए हमारे शहरों और गाँव में गढ़ा गया है उसमें पाकिस्तान के आईएसआई का जितना हाथ है उतना ही हाथ हमारी मदमस्त कारपोरेट मीडिया का भी है.


अंधेरों के समुंदर के बीच
 में ‘अमन की आशा’ की जो अलख टाइम्स ऑफ इंडिया और जंग ग्रुप ऑफ़ पेपर्स पाकिस्तान ने जगाई है, उससे थोड़ी तसल्ली ज़रूर होती है. मगर ये नफ़रत के नखलिस्तान के बीच में ओएसिस की तरह ही है. हम कब तक दीवारों की ऊँचाई सरहदों पर और लम्बी करते चले जाएंगे?

हिंदुस्तान और पाकिस्तान की मीडिया में एक समानता ज़रूर दिखाई दे रही है पिछले कुछ सालों से और वो है दक्षिणपंथ की तरफ खुलूसी झुकाव. ये वही क़ातिलाना टिल्ट है जिसने सलमान तासीर जैसे खुले विचारों वाले लिबरल सियासतदां  को मौत के घाट उतार गयी. जब से सलमान तासीर ने काले ब्लासफेमी लव के  खिलाफ़   मोर्चा खोला तभी से पाकिस्तान के मीडिया ने मज़हबी लीडरान के भड़काने वाले बयान ब्रॉडकास्ट करने का आगाज़ किया. देओबंदी और वहाबी इस्लाम के ये ठेकेदार एक तरह से खुले सुपारी दे रहे थे तासीर की ज़िन्दगी की. ठीक उसी तरह जिस तरह हमारी मीडिया आरएसएस के लीडरान को.


इसी दक्षिणपंथी मीडिया के
खौफ़ ने तासीर को मौत के बाद भी विलेन बना दिया और इसी तरह की मानसिकता वाली हमारी मीडिया ने बाल ठाकरे, उमा भारती, लालकृष्ण आडवाणी, नरेन्द्र मोदी, प्रवीण तोगड़िया जैसों को हमारे देश का मुस्तकबिल सँवारने का ठेका दे रखा है. 


अल्लामा इकबाल के ग्रेट ग्रैंड सन नदीम इकबाल ने मुझसे पिछले अक्टूबर इस्लामाबाद में कहा था, "हमारे पुरे खित्ते में – हिंदुस्तान-पाकिस्तान –  में हमारी मीडिया ने वतनपरस्ती का एक प्लास्टिक मॉडल विकसित किया है और उसे वो ऑर्गेनिक फार्म के एक नो-साइड इफेक्ट वाले प्रोडक्ट की तरह प्राइम टाइम पर बेचती है. ये प्लास्टिक पेट्रियोटिज्म ठीक उस चायनीज प्लास्टिक डौल या किसी इलेक्ट्रोनिक गजट की ही तरह है, क्योंकि ये अन्दर और बाहर दोनों  तरफ से खोखला है. हम इसे प्राइम टाइम पे साया करके “पोप पेट्रियोटिज्म’ बना देते हैं और हम सब इस ज़हरीले नशे में खो जाते हैं जैसे युवा दिल रेव  पार्टियों में."

मीडिया से रूबरू होते वक़्त
पाकिस्तानी प्रेसिडेंट आसिफ अली ज़रदारी ने 19 जनवरी 2009 को कहा था, "जर्नलिस्ट आर वर्स दैन टेररिस्ट.”  यूँ तो मीडिया को ज़रदारी साहेब से किसी सर्टिफ़िकेट की दरकार नहीं, मगर मीडिया को ये नसीहत बेनजीर भुट्टो के वीडोवेर से लेने में कोई नुकसान भी क्या है भला!

संदर्भ:

सैमुएल जांसन : पेट्रियोटिज्म इज द लास्ट रेफ़ुज ऑफ़ स्काउंड्रल्स,
 7 अप्रैल 1775, लन्दन
एडवर्ड लुईस बार्नेस(1927) : क्रिस्टलाइजिंग पब्लिक ओपिनियन, होरेस लीवरराइट पब्लिशिंग कॉर्पोरेशन, न्यूयॉर्क,
एडवर्ड लुईस बार्नेस (1928), होरेस लीवरराइट, न्यूयॉर्क
द प्रोपगंडा गेम : एडिटोरिअल इन
 1928 बी मर्लिन पीव
प्रोपगंडा : एडवर्ड लुईस बार्नेस
ISBN-10: 0970312598
दि प्रोपगंडा गेम : एडिटोरिअल इन 928 बी मर्लिन पीव

सोमवार, 17 जनवरी 2011

पुण्यतिथि के बहाने मंटो को याद करते हुए !


सआदत हसन मंटो
मित्रो, बीते 18 जनवरी को मंटो की पुण्यतिथि थी। संयोग से इसी साल 11 मई को उनका जन्म शताब्दी साल भी शुरू हो रहा है। पुण्यतिथि के बहाने मंटो को याद करते हुए यह टिप्पणी साथियों के हवाले कर रहा हूँ. इसके कुछ शुरुआती अंश 15 जनवरी 2011 को दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित हो चुके हैं. - शशिकांत

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि कुछ महान शख्सियतें काग़ज़ के पन्नों पर इन्सानी ज़िन्दगी, समाज और इतिहास की विडंबनाओं की परतों को उघाड़ने में जितनी माहिर होती हैं उनकी ख़ुद की ज़िन्दगी उन्हें इतना मौक़ा  नहीं देती कि वे बहुत ज़्यादा वक्त तक लिखते रहें। शख्सियतों की इसी फेहरिस्त में एक नाम है- सआदत हसन मंटो।

हिंद-पाक विभाजन की त्रासदी और मनवीय संबंधों की बारीक़ी को उकेरने वाली ‘कितने टोबाटेक सिंह’, ‘काली सलवार’, ‘खोल दो’, ‘टेटवाल का कुत्ता’, ‘बू’ सरीखी कहानियां लिखनेवाले भारतीय उपमहाद्वीप के इस लेखक और उसके सृजन पर आज पूरी अदबी दुनिया को फख्र है। 

लेकिन मंटो की शख्सियत की ख़ुद की ज़िन्दगी के दीगर पहलुओं, उनकी ज़द्दोज़हद, उनकी तकलीफ़ों और बेसमय हुई उनकी मौत से जब वाकिफ़ होते हैं तो मन अचानक मायूस हो जाता है।

हालांकि ताउम्र बदनामी और विवादों से घिरे रहनेवाली इस लेखक शख्सियत के कुछ दिलचस्प पहलू भी रहे हैं। बेशक इनमें से कुछ मंटो की शख्सियत को जानने-समझने में हमारी मदद करते हैं लेकिन कुछ को पढ़ते हुए कभी-कभी अचंभा भी होता है।

दरअसल मंटो बड़े ही मनमौजी क़िस्म के इन्सान थे। उनके मन में जो आता था वे वही करते थे, भले उसका अंज़ाम कुछ भी हो। अपने मन की बात कहने या लिखने में उन्हें कभी किसी तरह की कोई झिझक नहीं होती थी। 

अपनी इस फ़ितरत का उन्हें बेशक खामियाजा भी भुगतना पड़ा था। और तो और लिखते हुए वे उस दौर की महान शख्सियतों को भी नहीं बख्शते थे। उनकी ये हरकतें या हिमाकत कभी-कभार तो उस दौर की महान शख्सियतों को इतनी नागवार लगती थी कि वे मंटो साहब के लिए आपत्तिजनक लफ़्ज़ों का भी इस्तेमाल करते थे।

मसलन, सन् 18 जनवरी सन 1955 में मंटो का इंतकाल हुआ। उनकी मौत पाकिस्तान ही नहीं पूरे भारतीय उप-महाद्वीप की अदबी बिरादरी के लिए एक बड़ा सदमा था। इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी बेबाक लेखनी तो थी ही, कम उम्र में इस जहां से उनका रुखसत हो जाना भी था। 

उनके इंतकाल के बाद बहुचर्चित नृत्यांगना सितारा देवी को किसी ने मंटो साहब के इंतकाल की ख़बर दी। ख़बर सुनते ही सितारा देवी ने अपना मुंह बिगाड़कर कहा, ‘‘बड़ा ही बदतमीज और बेवकूफ आदमी था। मेरा चैन हराम कर दिया था उसने।’’ सआदत हसन मंटो से आखिर क्यों इतनी नाराज थीं सितारा कि उनकी मौत की खबर सुनकर भी उनका गुस्सा ठंडा नहीं पड़ा।

दरअसल, सितारा देवी के बारे में मंटो साहब को जब भी लिखने का मौका मिलता तो वे चटखारे लेकर लिखते थे। उनकी लेखनी के मुरीद पाठक जानते हैं कि उन्होंने सितारा देवी पर कई शब्द-चित्र लिखे हैं। 

ऐसे ही एक शब्द-चित्र में उन्होंने लिखा है, ‘‘सितारा देवी की जब मैं कल्पना करता हूं तो वह मुझे बंबई की एक ऐसी पांच मंज़िला  इमारत लगती हैं जिसमें कई फ़्लोर और कमरे हैं। और यह एक हकीक़त है कि वह एक वक्त में कई-कई मर्द अपने दिल में बसाए रखती हैं।’’ 

कभी-कभी तो वे सितारा देवी के बारे में इतनी आपत्तिजनक टिप्पणियां कर जाते थे कि यदि वो चाहतीं तो उन पर मानहानि का मुक़दमा कर सकती थीं।

उस दौर की दो महान लेखक शख्सियतों अली सरदार जाफ़री, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अहमद नसीम क़ासमी, कृश्नचंदर, ख्वाज़ा  अहमद अब्बास, मजाज़, शाहिद लतीफ़, राजेंदर सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, अशोक कुमार सरीखी शख्सियतें उन्हें अपना दोस्त कहते हुए फ़ख्र करती थीं। इन सबका साथ-साथ उठना-बैठना होता था। 

कहते हैं कि वे सब मंटो साहब का बड़ा ख़याल रखते थे। लेकिन तब सवाल उठता है कि फिर ऐसा क्यों हुआ कि उनके ये सारे दोस्त बंबई में मौज़ करते रहे लेकिन उनमें से किसी ने भी मंटो साहब की वापस हिंदुस्तान बुला लेने की दिली आरज़ू पर कभी गौर नहीं फ़रमाया।

दरअसल सआदत हसन मंटो ने हिंद-पाक विभाजन के वक्त पाकिस्तान जाने का फ़ैसला तो कर लिया था लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान से उनका मोह भी भंग हो गया था, कुछ-कुछ कुर्रतुल ऐन हैदर की तरह। कुर्रतुल ऐन हैदर ने तो ख्वाज़ा अहमद अब्बास की मदद से पहले बीबीसी ज्वाइन किया और फिर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पंडित नेहरू से गुज़ारिश करके वापस हिंदुस्तान आने में क़ामयाब रहीं।

लेकिन मंटो के हाथ तो इतने लंबे थे नहीं। हां, मुबई के कई दोस्तों को उन्होंने ज़रूर लिखा, ‘‘यार, मुझे वापस हिंदुस्तान बुला लो। पाकिस्तान में मेरी कोई जगह नहीं है।’’ पर पर उनकी ‘बदतमीज़ी’, ‘बदमिज़ाजी’, ‘बदकलमी' बर्दास्त करने की  कूव्वत यहीं बंबई के उनके किसी दोस्त में नहीं थी।

ऐसी हालत में फटेहाली के साथ पाकिस्तान में ही रहना उनकी मज़बूरी बन गई थी। फिर तो हताशा और निराशा के साथ रहना और खुद को अकेला महसूस करने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था। 

उसी अकेलेपन में उन्होंने शराब को अपना खास दोस्त बना लिया, इतना खास कि दिन-रात उसी के साथ रहने लगे। 

इसका अंज़ाम तो बुरा ही होना था, सो हुआ। देखते ही देखते टीबी की लाइलाज बीमारी ने उन्हें अपने आग़ोश में ले लिया, और सन 1955 में महज़ 42-43 साल की उम्र में वे इस ज़हाँ को अलविदा कह गए। 

रविवार, 16 जनवरी 2011

ज्वाइन मी एवरीवन ऑन ट्विटर : माधुरी दीक्षित


"धक-धक करने लगा.....!"
आ गई न माधुरी दीक्षित की याद? 
घबराइए नहीं!
आपके लिए एक खुशख़बरी  है
धक-धक गर्ल (या अब कहें धक-धक लेडी) माधुरी दीक्षित अब आपके घर, दफ़्तर या सफ़र में आपके साथ होंगी!  
वो आपके साथ बातें भी करेंगी, बशर्ते आपके पास लैपटॉप या डेस्कटॉप हो और उसमें नेट कनेक्शन हो. 
और हां, इसके अलावा आपको ट्विटर सोशल नेटवर्किंग साइट का यूज़र बनना होगा. 
जी हाँ, माधुरी दीक्षित यानि MadhuriDixit1 पिछले पांच जनवरी 2011 को ट्विटर पर आ गई हैं. 
ट्विटर आईडी में उनका नाम है - माधुरी दीक्षित-नेने. 
लोकेशन : मुंबई एंड डेनवर 
अपने बायो में उन्होंने लिखा है- "फाइनली आई हैव क्रिएटेड अ ट्विटर आईडी एंड  जम्प्ड ऑन द वेब. दिस इज द रीयल माधुरी दीक्षित. सो ज्वाइन मी एवरीवन."
5 जनवरी 2011 को सुबह 1 बजकर 06 मिनट पर उन्होंने ट्विटर पर वाया वेब अपना पहला ट्विट अंग्रेजी में send किया, "For all of my fans, finally I have joined Twitter. Love, Madhuri"
और 1.06 से 1.08 am यानी महज़ दो मिनट में उन्होंने दे दनादन कुल इक्कीस ट्विट कर दिया. 
सुपरफास्ट इंग्लिश और सुपरफ़ास्ट यूजर ऑफ टेक्नोलाजी..!  
तभी तो जब तक बालीवुड़ में रहीं सुपरस्टार बनकर रहीं माधुरी दीक्षित.                 
ट्विटर पर आये उन्हें अभी महज़ पंद्रह दिन हुए हैं और उनके 53,718 फौलोअर्स हो गए हैं. 

आप में से जो कोई ट्विटर पर माधुरी दीक्षित के फौलोअर बनना चाहते हैं वे क्लिक करें < http://twitter.com/MadhuriDixit1