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30 जनवरी 1948 : बापू के आख़िरी क्षण...!

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आज है, 30 जनवरी, बापू की पुण्यतिथि...!

64  साल पहले
यानि 30 जनवरी सन 1948.
नव-स्वाधीन भारत का वह काला दिन
उग्र हिन्दुत्ववादी 
दक्षिणपंथी 
विचारधारा से
ताल्लुक रखने वाले
एक दिग्भ्रमित युवक  ने
(मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता)

बापू को
हमसे छीन लिया था.

आज तक बापू को,
बापू के बारे में
(खिलाफ़ और पक्ष में)
बहुत कुछ पढ़ा, सुना
और कुछ फ़िल्में भी देखीं

पिछले दिनों
फेसबुक पर विचरते हुए
बापू के आख़िरी क्षण का
फोटो मिला -

(उनके हत्यारे के हाथ में है पिस्तौल
उंगली घोड़े पर
बहस कर रहा है बापू से
फिर गोलियां चलाएगा!)
......................
हे राम !

इतने कार्पोरेटिया गए कि पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए?

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भ्रष्टाचार, महंगाई और अन्य दुश्वारियों से जूझ रहे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए 28 जनवरी की तारीख़ ख़ास थी, इस लिहाज से कि एक सौ पच्चीस करोड़ की आबादी वाले दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क़ में लोकतंत्र आज भी महफूज़ है. भले मज़बूरी में ही सही!  

लेकिन तकलीफ़ इस बात की है कि कार्पोरेट मीडिया घराने की चाकरी करते-करते हिन्दुतान के हमारे कुछ पत्रकार भाई/बहन इतने कार्पोरेटिया गए हैं कि वे पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए हैं!

"सरकार केरोसिन की कालाबाज़ारी रोकने के लिए क्यों इसका मूल्य निर्धारण बाज़ार पर छोड़ नहीं देती?" (मतलब यह कि सरकार ग़रीब लोगों को केरोसिन पर दे रही सब्सिडी ख़त्म क्यों नहीं कर देती?) यह सवाल आज हिंदुस्तान के पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी से प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया। 

यह सवाल पेट्रोलियम के धंधे कर रही इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेटोलियम, रिलायंस जैसी किसी तेल कंपनी के नुमाइंदे ने उनसे नहीं पूछा, पूछा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के नुमाइंदों ने, और वो भी दिनदहाड़े प्रेस कॉन्फ्रेंस में।  

ऐसे सवाल पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने वा…

आम जन को मिले संविधान की सत्ता : उदय प्रकाश

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साथियो, मौक़ा आज गणतंत्र दिवस की 62 वीं सालगिरह का है. हमारे गणतंत्र के समक्ष कई गंभीर चुनौतियाँ हैं. सत्ता और व्यवस्था कार्पोरेट लोकतंत्र की राह पर चल रही है. संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए अधिकार छीने जा रहे हैं. चौतरफ़ा मची लूट, अन्याय, भ्रष्टाचार, हिंसा वगैरह से मुल्क़ का आम नागरिक परेशान है, और सत्ता व्यवस्था बेखबर. संविधान की सत्ता वापस हिंदुस्तान की जनता को लौटाई जाए. पेश है हाल ही में साहित्य अकादेमी पुरस्कार के लिए चुने गए हमारे दौर के बेहद लोकप्रिय लेखकउदय प्रकाशकी इन्हीं मसलों पर बेबाक टिप्पणी, जो आज दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित हुई है.- शशिकांत
आज सबसेपहले हम यह देखें कि पिछले साठ सालों में लोकतंत्र की स्थापना के बाद आजाद भारत में वो क्या है जो बचा रह गया है, और वो किस रूप में आज हमारे सामने है। संविधान कहता है कि लोकतंत्र में सर्वोच्च सत्ता जनता के हाथ में होती है और संसद तथा कार्यपालिका में लोग या तो उसके द्वारा प्रदत्त किए गए अधिकारों के तहत काम करते हैं या जनता के सेवक होते हैं। यानि जनप्रतिनिधियों के पास जो भी संवैधानिक सत्ता है वह उन्हें देश के नागरिकों  …

आज पैसे की अहमियत बढ़ गई है : नासिरा शर्मा

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मेरी पैदाइश सन अड़तालीस में इलाहाबाद में हुई। शुरुआती पड़ाई-लिखाई भी वही हुई, बीए तक। हमारे घर का माहौल ही कुछ ऐसा था जहां सभी लिखते-पढ़ते थे। लेकिन कौन लेखक बन जाएगा ऐसा कुछ नहीं का जा सकता। 
जहां तक लिखने की बात है, तब मैं बहुत छोटी थी। अपने स्कूल के एक कॉम्पीटिशन में मैंने एक कहानी लिखी थी। फिर कॉलेज क मैगज़ीन में भी मेरी कहानियां प्रकाशित हुईं। लेकिन बड़े होकर मैंने 'बुतख़ाना' कहानी लिखी जिसे कमलेश्वर जी ने 'सारिका' के नवलेखन अंक में छापा।

अठारह साल की उम्र में मैंने मैरेज़ की और लंदन चली गई क़रीब तीन साल बाद वहां से वापस जेएनयू लौट आई। लेकिन  एक लेखिका के तौर पर इलाहाबाद से कभी मरा कोई गुमान नहीं रहा। वहां उन दिनों बहुत बड़े-बड़े लेखक रहते थे लेकिन मैं कभी किसी से नहीं मिली। 
मेरा पहला कहानी संग्रह ‘‘सामी काग़ज़’’1980 में स्रीपत राय जी ने छापा। उसके बाद ईरान पर मैंने बहुत लिखा। यह सच है कि वहां जाने से मेरी रायटिंग खिली। ज़ोरदार तरीक़े से लिखने की शुरुआत हुई जिसकी ख़ूब चर्चा भी हुई।
इधर जो हमारा काम हुआ है वो सब लगभग इलाहाबाद पर ही केंद्रित है। ‘‘अक्षयवट’’ उपन्यास में इलाहाब…

जयपुर साहित्य उत्सव में किस किस की जय हो !

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मित्रो, आजजयपुर साहित्य उत्सवऔर कपिल सिब्बल के काव्य संग्रह 'किस किस की जय हो' के  लोकार्पण के मसले को लेकर फेसबुक पर ख़ूब बहस हुई. आपके हवाले कर रहा हूँ. शुक्रिया. -शशिकांत
भाई सुयश सुप्रभने फेसबुक पर बहस शुरू करते हुए लिखा,"जयपुर में साहित्य का जो उत्सव 

मनाया जा रहा है उसकी सार्थकता को लेकर मन में 

कई शंकाएँ उठ रही हैं। इस उत्सव के प्रायोजकों में 

ऐसी कई कंपनियाँ शामिल हैं जो राष्ट्रमंडल खेलों के 

घोटाले में शामिल थीं। अगर लेखकों का उद्देश्य 

समाज को वैकल्पिक सोच देना और सत्ता के आगे 

घुटने टेक देने की मानसिकता को बदलने की कोशिश 

करना है तो ऐसे आयोजनों में शामिल होकर वे मेरे जैसे पाठकों को निराश ही करेंगे।"
शशिकांत, "भाई सुयश जी आज हम एक ऐसे समय में जी-मर रहे हैं जिसमें हमारे दौर के बहुत सारे लेखक अलग-अलग गिरोह बनाकर सत्ता, पूंजी, बाज़ार, माफ़िया तत्वों और भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर मलाई खा रहे हैं और लूटतंत्र के हिस्से बन गए हैं. ऐसे लेखकों, लेखक संगठनों और गिरोहों से समाज को वैकल्पिक सोच देने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है."
Anjule Elujna , " क्या…

हिन्दुस्तानी मीडिया में युद्धोन्माद और वर्चस्ववाद !

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मित्रो,हिन्दू कॉलेज के सखा और मीडिया में सहकर्मी-दोस्त मनोज, जो अब वैधानिक रूप से फ्रैंक हुज़ूर बन गए हैं, ने हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रौनिक मीडिया के युद्धोन्मादी, साम्प्रदायिक और गैर ज़रूरी पाक विरोधी प्रसारणों पर बेबाक टिप्पणी करती हुई अपनीयह पोस्ट साथियों के हवाले करने का हुक्म फरमाया है.यह लेख मीडिया, बाज़ार और लोकतंत्र पर केंद्रित 'समयांतर' के फरवरी 2011 अंक में प्रकाशित हुआ है.फ्रैंकअंग्रेजी के पत्रकार और लेखक हैं.उनकी लिखी क्रिकेटर इमरान खान की जीवनी, ‘इमरान वर्सेस इमरान : दअनटोल्ड स्टोरी’ जल्द ही आने वाली है. हुज़ूर की रिहाइश आजकल लन्दन है. फ्रैंक सेfrankhuzur@rediffmail.comऔरfrankhuzur@live.co.ukपर संपर्क करसकते हैं. - शशिकांत 
हिन्दुस्तानी मीडिया में युद्धोन्माद और वर्चस्ववाद !फ्रैंक हुज़ूर 

वो 26 नवम्बर 2008 की ही शाम थी. दिल्ली और मुंबई के बाज़ारों में गहमागहमी अपने उफ़ान पर थी. लोगबाग अपनी-अपनी ज़िंदगी में मशगूल थे. मैं भी दिल्ली के पहाड़गंज में आवारागर्दी कर रहा था. एक दुकान पर गोल्डफ्लेक सिगरेट को जैसे ही मैने चिंगारी के हवाले किया, मेरी नज़र सामने लगे एक मशहूर न्य…

पुण्यतिथि के बहाने मंटो को याद करते हुए !

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मित्रो, बीते 18 जनवरी को मंटो की पुण्यतिथि थी। संयोग से इसी साल 11 मई को उनका जन्म शताब्दी साल भी शुरू हो रहा है। पुण्यतिथि के बहाने मंटो को याद करते हुए यह टिप्पणी साथियों के हवाले कर रहा हूँ. इसके कुछ शुरुआती अंश 15 जनवरी 2011 को दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित हो चुके हैं. - शशिकांत

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि कुछ महान शख्सियतें काग़ज़ के पन्नों पर इन्सानी ज़िन्दगी, समाज और इतिहास की विडंबनाओं की परतों को उघाड़ने में जितनी माहिर होती हैं उनकी ख़ुद की ज़िन्दगी उन्हें इतना मौक़ा  नहीं देती कि वे बहुत ज़्यादा वक्त तक लिखते रहें। शख्सियतों की इसी फेहरिस्त में एक नाम है- सआदत हसन मंटो।

हिंद-पाक विभाजन की त्रासदी और मनवीय संबंधों की बारीक़ी को उकेरने वाली ‘कितने टोबाटेक सिंह’, ‘काली सलवार’, ‘खोल दो’, ‘टेटवाल का कुत्ता’, ‘बू’ सरीखी कहानियां लिखनेवाले भारतीय उपमहाद्वीप के इस लेखक और उसके सृजन पर आज पूरी अदबी दुनिया को फख्र है। 
लेकिन मंटो की शख्सियत की ख़ुद की ज़िन्दगी के दीगर पहलुओं, उनकी ज़द्दोज़हद, उनकी तकलीफ़ों और बेसमय हुई उनकी मौत से जब वाकिफ़ होते हैं तो मन अचानक मायूस हो जाता…

ज्वाइन मी एवरीवन ऑन ट्विटर : माधुरी दीक्षित

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"धक-धक करने लगा.....!"
आ गई नमाधुरी दीक्षित की याद? 
घबराइए नहीं!
आपके लिए एक खुशख़बरी  है ! धक-धक गर्ल (या अब कहें धक-धक लेडी) माधुरी दीक्षित अब आपके घर, दफ़्तर या सफ़र में आपके साथ होंगी!   वो आपके साथ बातें भी करेंगी, बशर्ते आपके पास लैपटॉप या डेस्कटॉप हो और उसमें नेट कनेक्शन हो.  और हां, इसके अलावा आपको ट्विटर सोशल नेटवर्किंग साइट का यूज़र बनना होगा.  जी हाँ, माधुरी दीक्षित यानि MadhuriDixit1 पिछले पांच जनवरी 2011 को ट्विटर पर आ गई हैं.  ट्विटर आईडी में उनका नाम है - माधुरी दीक्षित-नेने.  लोकेशन : मुंबई एंड डेनवर  अपने बायो में उन्होंने लिखा है- "फाइनली आई हैव क्रिएटेड अ ट्विटर आईडी एंड  जम्प्ड ऑन द वेब. दिस इज द रीयल माधुरी दीक्षित. सो ज्वाइन मी एवरीवन." 5 जनवरी 2011 को सुबह 1 बजकर 06 मिनट परउन्होंने ट्विटर पर वाया वेब अपना पहला ट्विट अंग्रेजीमें send किया, "For all of my fans, finally I have joined Twitter. Love, Madhuri" और 1.06 से 1.08 am यानी महज़ दो मिनट में उन्होंने दे दनादन कुल इक्कीस ट्विट