इतने कार्पोरेटिया गए कि पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए?

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी
भ्रष्टाचार, महंगाई और अन्य दुश्वारियों से जूझ रहे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए 28 जनवरी की तारीख़ ख़ास थी, इस लिहाज से कि एक सौ पच्चीस करोड़ की आबादी वाले दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क़ में लोकतंत्र आज भी महफूज़ है. भले मज़बूरी में ही सही!  

लेकिन तकलीफ़ इस बात की है कि कार्पोरेट मीडिया घराने की चाकरी करते-करते हिन्दुतान के हमारे कुछ पत्रकार भाई/बहन इतने कार्पोरेटिया गए हैं कि वे पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए हैं! 

"सरकार केरोसिन की कालाबाज़ारी रोकने के लिए क्यों इसका मूल्य निर्धारण बाज़ार पर छोड़ नहीं देती?" (मतलब यह कि सरकार ग़रीब लोगों को केरोसिन पर दे रही सब्सिडी ख़त्म क्यों नहीं कर देती?) यह सवाल आज हिंदुस्तान के पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी से प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया। 

यह सवाल पेट्रोलियम के धंधे कर रही इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेटोलियम, रिलायंस जैसी किसी तेल कंपनी के नुमाइंदे ने उनसे नहीं पूछा, पूछा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के नुमाइंदों ने, और वो भी दिनदहाड़े प्रेस कॉन्फ्रेंस में।  

ऐसे सवाल पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने वाले पत्रकार ही पूछ सकते हैं. और ऐसे माफिया पत्रकारों की एक अच्छी ज़मात तैयार हो गई है हिन्दुस्तान में आजकल. यह हिन्दुस्तानी मीडिया का भयानक रुझान है.

दरअसल, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने 28 जनवरी को एक प्रेस कॉन्फेंस किया। यह कॉन्फ्रेंस महाराष्ट्र के मालेगांव में यशवंत सोनावने की तेल माफियाओं द्वारा सरेआम तेल छिड़ककर ज़िंदा जला
देने की घटना को लेकर बुलाया गया था.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ पत्रकारों ने पेट्रोलियम मंत्री मुल्क़ में सक्रिय तेल माफिय़ा पर लगाम लगाने के लिए किरासन तेल पर से सरकारी सब्सिडी को ख़त्म करने और उसकी कीमतें बाज़ार के आधार पर निर्धारत करने का जनविरोधी सवाल उठाया।

पत्रकारों के इस सवाल पर जयपाल रेड्डी को मज़बूरन यह कहना पड़ा कि मैं सैद्धांतिक रुप से सहमत हूं कि अगर केरोसीन की क़ीमतें बाज़ार आधारित हों तो कालाबाज़ारी रुकेगी लेकिन इस तरह का फ़ैसला लेना राजनीतिक रूप से कठिन है. सरकार तेल माफिया पर नियंत्रण के लिए उपाय कर रही है ताकि इसकी कालाबाजारी रुके लेकिन सरकार केरोसीन पर सब्सिडी हटाने का राजनीतिक फ़ैसला नहीं कर सकती है.

उन्होंने कहा कि जब मैं 'राजनीतिक' कहता हूं तो इसका मतलब समग्रता में लिया जाना चाहिए. देश में बड़ी आबादी है जो बहुत गऱीब है जिन्हें कम क़ीमत पर केरोसीन मिलना चाहिए.

सैद्धांतिक रुप से सहमत होने के बावजूद पेट्रोलियम मंत्री का यह बयान काबिलेतारीफ़ तो है ही लोकतंत्र की भी जीत है. भले मज़बूरी में उन्हें यह बयान देना पड़ा हो. लेकिन यहाँ पर सवाल उन चाँद पत्रकारों से पूछा जाना चाहिए जिन्होंने पेट्रोलियम मंत्री से इस तरह का जनविरोधी सवाल क्यों पूछा. 


जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भ्रष्टाचार है इसलिए सरकार को पीडीएस ख़त्म कर देना चाहिए, पहले केरोसिन, फिर चीनी, चावल, गेहूं- सबकुछ बंद! वाह पत्रकार बंधु वाह! 

जानते हैं, तमाम करप्शन के बावजूद पीडीएस की कितनी बड़ी भूमिका है मुल्क के गरीबीरेखा के नीचे जी रहे लोगों के कुपोषण को दूर भगाने में? और मुल्क में गरीबी की पहचान के लिए गठित सरकारी कमिटियों के मुताबिक़ कितनी प्रतिशत जनता ग़रीब है? 35 से 85. जानते तो ऐसे बेवकूफ सवाल नहीं पूछते.

कार्पोरेट मीडिया घराने की चाकरी करते-करते इतने कार्पोरेटिया गए कि पत्रकारिता का A , B , C , D ही भूल गए? क्यों बदनाम कर रहे हैं मीडिया को? जाइये इस मुल्क में दलाली करने के बहुत सारे ठिकाने खुले हैं आप जैसों के लिए.

इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि लोकतंत्र  के चौथे स्तम्भ पर आजकल ऐसे ही कुछ दलाल पत्रकारों का दबदबा है जो लूटतंत्र के हिस्से और हिमायती हैं, और आम जनता के विरोधी. ये कुछ पत्रकार लोकतंत्र के खिलाफ़ सरकार को भडक़ाने का काम कर रहे हैं. यह दुखद और निंदनीय है और इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए.

मौजूदा दौर में जब मुल्क़ संक्रमण के दौर से गुजर रहा है तो पत्रकारों का यह फ़र्ज़ बनता है कि वे आम आदमी की दुश्वारियों को मद्देनजऱ रखते हुए अपने पेशे की गंभीरता को समझें और सत्ता-व्यवस्था को उचित सलाह दें. 


हिदुस्तान आज यदि दुनिया के नक्से पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क़ के तौर पर अपना ख़ास मुकाम बना पाया है तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी रही है कि यहाँ पत्रकारिता मिशन के तौर पर काम करती रही है. 

हमारे पत्रकार भाई-बहनों को यह समझना चाहिए कि पत्रकारिता करते हुए लोकहित का ख़याल रखना लाजिमी है. जिस दिन हिंदुस्तान या किसी भी लोकतंत्र के पत्रकार लोकहित को तजकर सत्ता, व्यवस्था, पूंजी, बाज़ार आदि के हित में कलम चलाने लगेगा फिर लोकतंत्र के मज़बूत से मज़बूत किले को कोई ढहने से रोक नहीं सकता. 

जिस लोकतंत्र पर हमें फ़ख्र है उसे बनाए रखने और मज़बूत करने के जि़म्मेदारी हम सबकी है. आज मुल्क़ में और हिन्दुस्तानी  समाज में कई ऐसी समस्याएँ और मुद्दे हैं जिन्हें बड़ी संजीदगी से सामने लाने की जि़म्मेदारी मीडिया की है.ताकि सरकार और व्यवस्था लोकतान्त्रिक विकास की राह पर मुल्क़ को आगे ले जाने का दबाव बनाया जा सके. एक सौ पच्चीस करोड़ हिन्दुस्तानियों का हित इसी में है.


इसलिए हम मांग करते हैं कि सरोकारों की पत्रकारिता में विश्वास रखनेवाली पत्रकार बिरादरी केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी से ऐसे जनविरोधी सवाल पूछनेवाले पत्रकार/पत्रकारों की भर्त्सना करे. 
 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पाठालोचन की नई प्रविधि है ‘कामायनी-लोचन’

अटल बिहारी वाजपेयी - सेक्स और राजनीति का रिश्ता

लैंगिक विकलांगता और भारतीय समाज