गुरुवार, 17 मार्च 2011

भारत में 20 साल बाद लड़कियों की भारी कमी : बीबीसी

भारत में अगले दो दशकों में 20 फ़ीसदी युवकों को अपने लिए उपयुक्त जीवन साथी नहीं मिल पाएगा. 

कनाडा के मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार बढ़ते लिंग निर्धारण के कारण भारत और चीन जैसे देशों में युवकों की संख्या में अगले 20 वर्षों के दौरान 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी और इस असंतुलन का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा.

शोध के अनुसार बेटे की चाहत और लिंग के आधार पर गर्भपात के कारण इन देशों में पुरुषों और महिलाओं की संख्या में असंतुलन पैदा हो गया है. जन्म के समय लिंग अनुपात (एसआरबी) मतलब 100 लड़कियों के मुक़ाबले पैदा होने वाले लड़कों की संख्या लंबे समय से 105 बनी हुई है.

लिंग का निर्धारण करने वाली तकनीक अल्ट्रासाउंड के विकसित होने के बाद दक्षिण कोरिया के कुछ शहरों में लिंग अनुपात बढ़कर 125 हो गया है और चीन के कुछ प्रांतों में तो ये 130 तक पहुंच गया है.

भारत के पंजाब, दिल्ली और गुजरात में लिंग अनुपात 125 तक पहुंच चुका है जबकि केरल और आंध्र प्रदेश में ये अनुपात 105 है. इसका मतलब है कि पंजाब, दिल्ली और गुजरात में यदि 100 लड़कियों पैदा होती हैं तो 125 लड़के पैदा होते हैं. 

भारत में हाल में हुए एक अध्ययन ने ये पता चला है कि यदि पहले ही दो लड़कियों का जन्म हो चुका है तो तीसरे जन्म की स्थिति में लिंग अनुपात 139 है लेकिन यदि पहले शिशु के रूप में लड़का जन्म लेता है तो लिंग अनुपात सामान्य रहता है.

अध्ययन में पाया गया है कि अगर पहला या दूसरा बच्चा भी लड़की ही है तो इन देशों में लोग अक्सर लिंग निर्धारण करते हैं ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि दूसरा या तीसरा बच्चा लड़का ही हो.

(बीबीसीहिन्दीडाटकॉम से साभार)  
 

बुधवार, 16 मार्च 2011

ब्रिटेन का 'कामसूत्र' है 'फैनी हिल'... : सुज़ेन

फ्रेंक हुज़ूर सुज़ेन के साथ
फ्रेंक हुज़ूर ने लन्दन के रेडलाईट एरिया सोहो की गलियों में घुसकर यूरोप की पोर्न इंडस्‍ट्री के  अंदरूनी सच को जानने क़ा जोखिम उठाया है. वहां से वे एक से एक दिलचस्प रपट हम तक पहुंचा रहे हैं. पेश है उनकी लंदन डायरी की अगली किस्त :

मिशेल के सबसे खौफ़नाक मंज़र की फिल्मिंग में एनल सेक्स की ग़मज़दा सेटिंग थी. मुझे  ताज्ज़ुब बिलकुल नहीं हुआ, जब उसने कहा कि उसने करीब  30 दिनों  तक कोई पोर्न विडियो शूट नहीं किया. उसे सिर्फ़ ग़मज़दा माहौल से कोफ़्त थी, एनल सेक्स से कोई शिकवा नहीं. ''वह सीन जिसमें मुझे एक कब्रिस्तान में ताबूत के ऊपर फूलों के गुलदस्तों को रखने के लिए झुकना था और मेरा को-स्टार मेरे ग़मगीन काले लिबास को मेरे बुट्टोक के ऊपर फ़ना कर देता है और अपने हथियार को खंजर की तरह मेरे दोनों हिप्स के हवाले कर देता है...

बहुत सारे लोगों को एनल सेक्स से कोफ़्त हो सकती है मगर पोर्न फिल्मों की फिज़ा में एनल सेक्स का अपना ही नशा है. मुझे इसमें एक ख़ास क़िस्म का मज़ा आता है. सबसे क्लीन सेक्स भी लगता है. संभ्रांतों के समाज को इसमें हिंसा नज़र आती रही है मगर पोर्न फिल्मों की इंडस्ट्री में किसी भी अदाकारा को एनल के लिए स्पेशल स्क्रीनिंग देने को तैयार रहना पड़ता है. हमारी इंडस्ट्री में एनल पोर्न स्टार सबसे ज़्यादा रुतबा रखते हैं. उनकी पेमेंट भी जबरदस्त होती है. वो वक़्त के पाबंद होते हैं. आज के दौर में 70 फीसद पोर्न एनल सेक्स के मुख्तलिफ आयामों से सराबोर होता है. मगर यह ज़रूर है कि मुझे हार्डकोर एनल सेक्स के लिए अफीम की बड़ी अहमियत होती  है, या फिर हर्षोन्माद की नशीली गोली की,  जिसके बिना मैं भी एन्जॉय नहीं कर सकती किसी भी एनल स्क्रिप्ट को.''

जब मैंने मिशेल से पूछा कि क्या उसे ऐसा नहीं लगता कि एनल सेक्स एक ‘हार्ड फकिंग’ एक्ट है जिसमें  क्रुएल्टी है, और इस उल्फ़त में वही लोग पड़ते हैं जो औब्सेसिव कम्पल्सिव डिसओर्डर के विक्टिम होते हैं. तब उसने थोड़ी वक़्त के लिए ख़ामोशी अख्तियार कर ली. पर जल्दी ही अपनी खामोशी काटते हुए  कहा, ”फकिंग इज़ फकिंग, डियर! क्या हार्ड और क्या सोफ्ट! जैसे मज़हब है दुनिया में वैसे ही ये है. हार्ड और सोफ्ट क्या होता है! 

एनल सेक्स लड़के और लड़कियों की नैसर्गिक उत्सुकता है. और वो उत्सुकता उस होल के लिए है जो दोनों के पास अब्राहम के ज़माने से सौगात में मिला हुआ है. तुमने वो ग्रीक मुहावरा नहीं सुना है क्या! सिल्ली बॉय! ''यौर डिक इज नोट फॉर वेज़ाइनल सेक्स, और  इट वुड हैव फोर्म्ड इन दी इमेज़ ऑफ़ एन एक्स’ और फिर एनल सेक्स सिर्फ़ हेट्रोसेक्सुअल प्रेमियों के लिए उतना ही नॉर्मल एक्ट है जितना होमोसेक्सुअल पार्टनर्स के लिए. मज़हबी सिरफिरे बहुत बार एनल सेक्स को लेकर हमारी बहुत सी फिल्मों के खिलाफ़ मुजाहिरा करते आए हैं, मगर हमने उनकी इस दलील को कोई तवज्जों नहीं बख्शी कि गॉड ने एनल सेक्स को एक डर्टी एक्ट करार दिया है... 

आप बाइबल जेनेसिस 16:1 में पढ़ सकते हैं कि अब्राहम किस तरह हगार के चेहरे और बालों पर एजाकुलेट करते हैं और फिर अपने बुट्टोक को उसकी छाती पर रखकर मसल रहे होते हैं. एनल सेक्स का क्लियर ज़िक्र है यहाँ. मैं इसे विवादस्पद सेक्स भी नहीं मानती. हमने सेक्स के खिलौने और कंडोम का इज़ाद कर लिया, प्लास्टिक डिक और लुब्रिकेटर बना लिए. ये विवादास्पद हो सकते हैं, मगर एनल सेक्स नहीं. आजकल तो कुछ सिरफिरे पोर्न निर्देशक फुल बॉडी कंडोम का ऑर्डर देकर सेक्सुअल एक्ट्स को शूट कर रहे हैं. मेरी नज़र में ये नेचुरल नहीं हैं. मैं एनल सेक्स की कलात्मक प्रस्तुति में यकीन रखती हूँ,” यह कहते हुए मिशेल दिल से हंसी के खूब फव्‍वारे छोड़ती हैं.

मिशेल के अफसानों का सिलसिला बदस्तूर हमला बोलता रहा. मैं अँधेरी रात के लम्हों  को तमाम होता देखता रहा. उसकी हर नज़र से भीगी-भीगी सी ये रात सुलगती जा रही थी. वीकेंड की महफिलें लन्दन के मिडनाइट आवर पर जवानी की राह के सारे नुकीले काँटों को रोज़ गार्डेन में तब्दील करने को बेक़रार होने लगती हैं. अगर आप पब के कोर्ट के बाहरी कोने पर मस्ती का बाज़ार सजा रहे हैं तो फिर आपकी निगाहों में ‘ज़िप्लेस फक’ का सुरूर चढ़ रहा होगा. 

इस बाज़ार में नज़र की कीमत पर कम ही दिल कुर्बान होते हैं. ज़िप्लेस फक बेहद ही पाक़ फक है. जिस्म के इस जश्न में कोई नापाक इरादे या मंसूबे जनम भी नहीं ले पाते या मिशेल की ज़ुबान में ये उस गोल्डेन येलो  फूल के  सफ़ेद हेयरी बीज की माफिक फिज़ा में बिखर जातें हैं. ज़िप्लेस फक वो सेक्सुअल एन्‍काउंटर है जिसमें मर्द और औरत दोनों एक दूसरे के लिए अनजान होते हैं और एक बार मिलने के बाद भी गुमनामी की गलियों में समा जाते हैं. 

ये सब कुछ ऐसे ही नशीली राहों में मुमकिन होता है. जब तक साथ होता है तब तक करार होता है और उम्मीदों का काफिला हमेशा के लिए गुज़र जाता है. मिसेल ने हार्प के बाहर आते ही अपनी नज़रों से सड़क के चारों  तरफ़ गुफ़्तगू में मशगूल जवां दिलों की तरफ़ इशारा किया. ‘लुक एट दिज़ लवर्स ! दे आर नॉट लायर्स!’

मेरी नज़र ठीक सामने खड़ी एक जोड़े पर पड़ी जिनके होठ की हथकड़ी  पर और भी जवान दिलों के नज़रों की बारिस हो रही थी. मिशेल कहती है, ''ये जोड़े यहाँ लन्दन की बर्फीली गलियों में ज़िप्लेस फक के नुमाइन्‍दे हैं. ये इस पल के कबल कभी साथ नहीं हुए होंगे. दोनों गुमनाम हैं एक दूसरे के लिए. अनोनिमस स्‍ट्रेंजर्स टर्न्‍ड लवर्स!!!'' देखते ही देखते दोनों जवान दिल क़रीब खड़ी सिल्वर मर्सिडीज़ के ब्लैक सोफे पर गिर पड़े. फिज़ा के रंग में जो बहार बाक़ी थी वो चिराग लेकर उनके तेज़ी से अन्‍ड्रेस हो रहे न्‍यूड बदन पर गिरने लगी. ये जोड़े अकेले नहीं थे, हर तरफ़ एक ही समां था. कुछ काले तो कुछ गोरे, सिर्फ ब्रिटिश ही नहीं, बल्कि  यूरोप के मुख्तलिफ मुल्कों की गोरियां और गोरे जिस्म की गर्मी में बहकने लगे थे.

ज़िप्लेस फक का अल्टिमेट तभी होता है जब आप पहले से एक दूसरे से वाकिफ़ नहीं हों. रोमानिया की राजधानी बुडापेस्ट में यह बेहद आम है और यह रोमानिया की गलियों से होकर लन्दन की चमकीली रातों में आबाद हो चला है. मिशेल इशारों ही इशारों में खिलखिलाई, ''दिस इज़ डोग्गिंग, ओह डियर.'' जब आप किसी पब्लिक प्लेस में सेक्सुअल एक्ट में दिल और जांनिसार करने को बेताब हो जाते हैं तब आपको ब्रिटिश जबान में डोग्गिंग का बादशाह कहा जाता है. सेक्सुअल एक्ट के प्रोटेगोनिस्ट के साथ जो तमाशाई इस महफ़िल का दृश्‍यरतिक की तरह दीदार कर रहे होते हैं उसे भी डोग्गिंग करते हुए कहा जाता है. 

डोग्गिंग के दायरे में ग्रुप सेक्स, गैंग बैंग और कामांग प्रदर्शन भी शुमार होता है. ब्रिटिश फिल्म इंडस्‍ट्री ने इस दिलकश नज़ारे को एक फिल्म बनाकर पेश किया और उसका टाइटल रखा– ''डोग्गिंग : लव स्टोरी.'' माइकल ग्रूम की लिखी और साइमन एल्लिस की डिरेक्ट की हुई यह फिल्म 2009 में आई थी और इसे अमेरिकन मार्केट में 'पब्लिक सेक्स ' के टाइटल के साथ रिलीज़ किया गया था.

मिशेल और मेरे कदम चलते-चलते चार्रिंग क्रॉस ट्यूब स्टेशन के ठीक सामने थम से गए. जहाँ भी नज़र जा के गिरती, लड़के और लड़कियों के होठों को हम एक दूसरे में समाए हुए पाते, उनके दोनों हाथ बुट्टोक के ऊपर सैर करते नज़र आते. फिमेल सेक्सुअलिटी और मेल सेक्सुअलिटी का ये अजीब सा अफ़साना है जहाँ लड़कियां मल्टिपल ओर्गज्‍म हासिल करने में उस्‍ताद हैं और लड़के उनके जी स्पोट की खोज में ठीक उसी तरह मशगूल, जिस तरह शायद कोलम्‍बस अपने मंजिल की आस में ब्लू वॉटर के ऊपर पंख लगाये सफ़र कर रहा था. 

मिशेल की निगाहों में ये मंज़र एक हायपर सेंसिटिव लड़की की सेक्सुअल आज़ादी और अपने मंज़िल और मक़सद की खोज है. ‘एक पोर्न स्टार और इन मनचले लड़के-लड़कियों में सिर्फ़ थोड़ा सा फ़र्क़ है. ये अपने अरमानों की महफ़िल सजाने यूँ ही रहगुज़र होते हैं जब कि हम पेशेवर हैं इसी खेल में.’

मिशेल ने अपने ख़यालों को और दिलकश अंदाज़ से पेश किया जब उसने मशहूर अमेरिकन अदीब एरिका जोंग की एक नोवेल का जिक्र कर डाला. ‘'एक पोर्न विडियो शूट के सिलसिले में मैं वैली में थी. लॉस एंजेलिस के ठीक नॉर्थ में बसा हुआ सैन फरनान्डो वैली हॉलीवुड का पोर्न सिटी है जहाँ पोर्न स्टारों के आलीशान हवेलियों के अलावा बेहतरीन स्टूडियो हैं. वो 2005 की गर्मियां थी जब हमें एक ख़ास स्क्रिप्ट के सीन को शूट करना था और उसके केंद्र में ‘ज़िप्लेस फक’ का अफसाना था. मेरे डायरेक्टर बॉब मूर ने वैली में लैंड करते ही फूलों के गुलदस्ते के साथ 'फियर ऑफ़ फ्लाइंग ' की एक कॉपी मुस्कराहट के साथ मेरी गोद में गिरा दिया.''

 मेरी नज़रें मिशेल की नज़रों से फ़ियर ऑफ़ फ्लाइंग के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए बेजार होती गयी. फीयर ऑफ़ फ्लाइंग एक फेमिनिस्ट क्लासिक है, इसका एहसास मुझे एक ही रात में हो गया. एरिका जोंग ने जिप्लेस फ़क का अफसाना अपने अदाकारा इज़ाडोरा की सेक्सुअल आज़ादी के मंसूबों से पिरोया है. 

इज़ाडोरा एक बेहद संगीन ख़यालों की पोएटेस हैं. वो अपने दूसरे शौहर के साथ विएना की गलियों में मोजार्ट के म्‍युजिक में खोती जा रही हैं. तभी उसके दिल में ख़याल आता है कि क्यों न वो एक अनजान शख्स के साथ एरोटिक फंतासी को मुमकिन ख्वाब में बदल डाले. एरिका इज़ाडोरा और उसके हमसफ़र जो विएना के एक म्युजिक कैफे में ड्रमर हैं, उनके नशीले लम्हों का करीब तीन घंटे का मल्‍टी ओर्गेज्‍म सेक्स को 'जिप्लेस फक' का नाम देती हैं. उस रात के उन जोशीले लम्हों के बाद इज़ाडोरा और ड्रमर फिर कभी नहीं मिलते.

1973 में पब्लिश हुई 'फियर ऑफ़ फ़्लाइंग' पोर्न स्‍टूडियोज़ के लिए एक  ख़ास लिटरेचर है. ''फैन्नी हिल के पन्नों में जो कसक जॉन क्लेअलेंड नें बयां की थी, एरिका की इज़ाडोरा ने उसे एक नया आयाम दे दिया,'' मिशेल ने ये कहते ही मुझे गले से लगाया और अपने सूर्ख होठों से फिज़ा में स्वीट किस लहराते हुए अपनी मंज़िल के लिए रवाना हो गयी. जैसे ही वो अंडरग्राउंड ट्यूब में ग़ायब होने लगी उसने मुड़कर देखा और मेरे खामोश आँखों से बिखर रहे सवाल का जवाब बहुत ही नाज़ुक अंदाज़ में दिया - 'यू समटाइम सून.'

मिशेल की रवानगी के बाद मेरे दिल-ओ-दिमाग में सवालों के सुनामी ने बवंडर मचा दिया. सोहो की गलियों में सैर के लिए मैंने 2 मार्च की शाम को पिकाडिली सर्कस ट्यूब के बाहर अपने को ठीक क्विन प्ले हाउस  के बाहर खड़ा पाया. इसी प्ले हाउस में 8 अक्टूबर 1985 से आज तक 'लेस मिज़रेबल्‍स' का शो बदस्तूर जारी है जो दुनिया का सबसे लम्बा चलने वाला म्‍युजिकल बन गया है. यह विक्टर ह्यूगो के 1962 में लिखे नोवेल पर आधारित है . अंग्रेजी में इसे ले मिज़ कहते हैं. यहाँ से लन्दन के वेस्ट एंड की गलियों की धड़कन तेज़ होने लगती है.

क्विन प्ले हाउस के साथ ही आगाज़ होता है सोहो की नशीली गलियों का, जिनके चप्पे-चप्पे पर अफीम जैसे नशे का असर साफ़ है. कहते हैं कि लन्दन के आकाश में कितने भी बादल आ जाए, सोहो के ऊपर ग्रे कलर का पेंट लगाने की हिमाकत लन्दन का ख़तरनाक फ्रोस्टी विंटर भी नहीं कर सकता. 

ब्रिटेन की पोर्न इंटस्‍ट्री के इन फलसफ़ों से टकराकर मैंने सोहो के अजीम पोर्न प्रोड्यूसर स्कॉट मार्केस को फ़ोन करके मुलाक़ात का वक़्त मुक़र्रर करने की गुज़ारिश कर डाली. मुलाक़ात के लिए स्कॉट को वक़्त के शिकंजे से आज़ादी की दरकार थी. क़रीब एक हफ्ता निकल जाने के बाद भी उन्होंने और इंतज़ार करने के लिए मजबूर कर दिया मगर मुझे सुज़ेन से मिलने के लिए प्रोत्‍साहन भी दिया. 

सोहो के मशहूर बार में 2 मार्च की शाम को मेरी मुलाकात सुजेन से हो जाती है. सुजेन स्विटज़रलैंड के कैपिटल बर्न से है और करीब दो सालों से सोहो के वार्दौर स्ट्रीट में बार के ठीक साउथ वाली गली में एरोटिक लिटरेचर की बुटीक चलाती है. लिटरोटिका (लिटरोटिका = लिटरेचर + इरोटिका) के इस सैलून में सुजेन बेहद शान से एरोटिक किताबों में खोई हुई है और उसके चारों तरफ़ मेरी नज़र में दुनिया भर के मुख्तलिफ भाषाओं में लिखे और पब्लिश हुए एरोटिक और पोर्न लिटरेचर का खज़ाना समाता जा रहा है. 

किसी भी नज़र में ये किताब की दुकान का एहसास नहीं कराती बल्कि ऐसा लग रहा है जैसे हम किसी मिनिएचर सेक्स लाइब्रेरी में दाखिल हो चले हैं.  क्लिओपेट्रा की तस्‍वीरों से सज़ी किताबों से होते-होते मेरी नज़र 'कामासूत्रा' पर पड़ती है जिसे यहाँ पब्लिश करके कोलिंस ब्रिटिश एरोटिका दीवानों का आशिक बना हुआ है.

सुजेन ने मेरा इस्तेकबाल लिया और ये जानकार बेहद खुशी का इज़हार किया कि मैं कलम के साथ खेलता हूँ और पेशेवर खिलाड़ी हूँ. थोड़े वक़्त के बाद उसने जॉन प्लयेर सिगरेट की  पेशकश कर दी और खुद भी एक सिगरेट सुलगा लिया. उसके आँचल में मैंने देखा उस किताब को जिसे पढ़कर ब्रिटेन एरोटिका के क्लासिकल पहलुओं से परिचित होता आया हूं. सभी जवान और बुजुर्ग इसे 'फैनी हिल'  के नाम से जानते हैं जिसका असली नाम 'मेमोरिज़ ऑफ़ वुमनेंस प्लेज़र'  है, और जिसे जॉन क्लेअलेंद ने 1748 में जेल में लिखा था, जब वो अपने क़र्ज़ से न उबार पाने के चलते सजायाफ्ता था.

सुजेन मुस्कुराते हुए पूछती है, ‘'आर यू हियर टू कम्पोज़ योर वर्ज़न ऑफ़ फैनी हिल?'' मुझे थोड़ी हैरत होती है उसकी बातों पर, क्योंकि मुझे 'फैनी हिल' के इतिहास से वो रूबरू करने ही वाली है. 1748 से 1963 तक इस एरोटिक लिटरेचर को अश्‍लील करार देकर अंडरग्राउंड सेल के लिए मज़बूर कर दिया गया था. जॉन क्लेअलेंद के उस सीन के ऊपर जिसमें उसने होमोसेक्सुअल एक्‍ट को बेहद खुले अंदाज़ में ग्लैमराइज़ किया है. तब ब्रिटिश हुकूमत ने इसे सोडोमी के चार्ज में बैन कर दिया था. और 1963 में 'फैनी हिल' खुलकर ब्रिटिश अवाम के ज़ुबान पर छाने लगा, जब डी एच लॉरेंस की मशहूर 'क्रेअसन लेडी चैटरलेज़' ने अश्‍लीलता का मशहूर केस जीत लिया. 'फैनी हिल' को आज ब्रिटेन का 'कामसूत्रा ' कहा जाता है.

सुजे़न से गुफ्तगू का आगाज़ हौले-हौले होने लगा था तभी मेरी नज़र ठीक उसके बुटीक के कोने पर पड़ी जहाँ से सीढियां बेसमेंट की तरफ़ जाती हैं जिसके पीले दरवाज़े पर प्लेबॉय का मस्कट गुलज़ार है और नीचे गहरे पर्पल कलर में खुदा है- 'मॉडल गो डाउन !'  शी इज़ ऑलवेज़ वेटिंग. इट इज़ हर फोर्ट !!!

(फ्रैंक हुज़ूर अंग्रेजी के लेखक और स्वंत्रत पत्रकार हैं. क्रिकेटर इमरान खान पर उनकी लिखी  जीवनी, ‘इमरान वर्सेस इमरान : द अनटोल्ड स्टोरी’ जल्द ही आनेवाली है. उनसे frankhuzur@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)

 

मंगलवार, 15 मार्च 2011

पाठालोचन की नई प्रविधि है ‘कामायनी-लोचन’


काव्य और उसकी टीका-व्याख्या-आलोचना एक दूसरे के पूरक रहे हैं और अपरिहार्य भी। भारतीय साहित्य में लोकप्रिय साहित्यिक कृतियों की टीका-व्याख्या-आलोचना की परंपरा फूलती-फलती रही है।

आधुनिक छायावादी कविता के चार स्तंभों में से एक जयशंकर प्रसाद रचित ‘कामायनी’ आधुनिक काव्य का ‘‘ऐसा गौरवग्रंथ है जिस पर सबसे अधिक आलोचनात्मक पुस्तकें तथा लेख लिखे गए हैं, सबसे अधिक टीकाएं लिखी गई हैं, सबसे अधिक शोधपरक निबंध एवं प्रबंध प्रणीत हुए हैं, और सर्वाधिक विवाद भी हुआ है।’’

दिल्ली विश्वविद्यालय हिदी विभाग के पर्व अध्यक्ष स्व0 डॉ उदयभानु सिंह की ‘कामायनी-लोचन’ शीर्षक से दो खंडों में प्रकाशित ‘कामायनी’ की टीका-व्याख्या इसी परंपरा की एक कड़ी है।

प्रविधि के लिहाज से एक नए कलेवर में, लेकिन भाषा की दृष्टि से निहायत तत्समनिष्ठ, बोझिल और अकादमिक। मानो बीसवीं सदी की चौथी दहाई में लिखी गई कृति की टीका-व्याख्या उसी काल की भाषा में की जा रही हो- बिल्कुज अध्यापकीय आलोचना की भाषा की तरह।

बतौर बानगी व्याख्याकार द्वारा किताब के ‘प्राक्कथन’ में लिखी ये पंक्तियां पढ़ी जा सकती हैं, ‘‘कवि के मन का, उसकी संकल्पात्मक अनुभूति का, रहस्य बहुत गहन है-विशेषतया प्रसाद-सरीखे अधीती, दार्शनिक, संवेदनशील और छायावादी कवि के मन का। ऐसी स्थिति में कोई विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि उसने कवि के हदय में सम्यक प्रवेश कर लिया है और उसके मानस-बिंब का इदमिथ्यं निरूपण करने में सर्वथा समर्थ हुआ है। यथार्थ यह है कि व्याख्याकार का समीक्षक अपनी मति के अनुसार समीक्ष्य कृति के मर्मोद्घाटन का यथाशक्ति प्रयत्न करता है। ‘कामायनी-लोचन’ भी इसी प्रकार का प्रयास है।’’

विडंबना यह है कि ज्यादातर विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग के प्राध्यापक इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी हिंदी को छायावादी भाषा की जकड़न से आज़ाद करने को राज़ी नहीं हैं, जबकि विश्वविद्यालय से इतर हिंदी पत्रकारिता की दुनिया की हिंदी भाषा समय के साथ क़दम-ताल कर रही है। 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर इमेरिटस और हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने भी अभी हाल में यह माना। उन्होंने बीते 28 फरवरी को राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित एक गोष्ठी में सार्वजनिक तौर पर कहा, ‘‘सच्चाई यह है कि हिंदी का वर्तमान रूप जो हासिल हुआ है उसमें हमारी हिंदी पत्रकारिता ने बड़ा काम किया है। खड़ी बोली हिंदी का जो गद्य है वह पत्रकारों का बनाया हुआ है, यह अध्यापकों और रिसर्च करनेवालों का बनाया हुआ नहीं है। हिंदी बनी है हिंदी पत्रकारिता से।’’
 
बहरहाल, दो खंडों में प्रकाशित ‘कामायनी-लोचन’ के पहले खंड में ‘चिंता’, ‘आशा’, ‘श्रद्धा’, ‘काम’, ‘वासना’, ‘लज्जा’, ‘कर्म’ और ‘इर्ष्या सर्ग’ की टीका-व्याख्या है और दूसरे खंड में ‘इड़ा’, ‘स्वप्न’, ‘संघर्ष’, ‘निर्वेद’, ‘दर्शन’, ‘रहस्य’ और ‘आनंद सर्ग’ की। टीकाकार-व्याख्याकार ने सबसे पहले हर सर्ग का कथा सूत्र यानि कहानी का सार पेश किया है।  उसके बाद संक्षिप्त व्याख्या-समीक्षा। फिर शब्दार्थ यानि कठिन शब्दों के अर्थ और आखिर में विस्तृत टिप्पणियों के माध्यम से पाठ की व्याख्या।  

इस बहुचर्चित और बहुपठित छायावादी कृति की टीका-व्याख्या करते हुए व्याख्याकार दारा अपनाई गई कुछ नई प्रविधियां जरूर काबिलेगौर हैं, मसलन पांडुलिपि के ‘पाठ’ और किताब छपते वक्त कवि द्वारा ‘पाठ’ में की गई तब्दिलियों से पाठक को अवगत कराना। पाठालोचक ने जगह-जगह यह व्याख्यायित किया है कि कैसे एक ही पंक्ति में पदावली-विशेष के बदलने भर से पाठ के अर्थ का अनर्थ हो जाता है या उसका अर्थ बदल जाता है। 

मसलन, इड़ा सर्ग की दो पंक्तियों- ‘संघर्ष कर रहा सा सबसे, सबसे विराग सब पर ममता / अस्तित्व चिरंतन धनु से कब यह छूट पड़ा है विषम तीर / किस लक्ष्य-भेद को शून्य चीर’ की टिप्पणी उल्लेखनीय है- ‘‘कामायनी’ के प्रथम संस्करण, भारती भंडार से प्रकाशित उसके अन्य संस्करणों (उनमें संशोधित एकादश संस्करण भी शामिल है), और रत्नशंकर प्रसाद द्वारा संपादित ‘प्रसाद ग्रंथावली’ (खंड-1, पृष्ठ 567) में सातवीं पंक्ति के पूर्वार्ध का पाठ है: ‘संघर्ष कर रहा था जब से’। यहां ‘जब से’ के प्रयोग का कोई तुक नहीं है। पांडुलिपि (पृष्ठ 61) में  ‘सब से’ मिलता है, वही समीचीन और ग्राह्य है। उससे पूरी पंक्ति के अर्थ और बिंब की स्पष्ट प्रतीति हो जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रूफ-शोधन के समय तथा शुद्धिपत्र तैयार करते समय भूलवश प्रसाद का ध्यान उस अशुद्धि की ओर नहीं गया। उसका प्रयोग लाक्षणिक है।’’

कुल मिलाकर, हर सर्ग की दो-दो पंक्तियों के ‘पाठ’ को व्याख्यायित कर पाठक-सुलभ बनाने का पाठालोचक का यह उप-कर्म ऐसा लगता है, मानो बिल्कुल अकादमिक अनुशासन की तर्ज पर कोई अध्यापक विश्वविद्यालय की कक्षा में विद्यार्थियों को ‘कामायनी’ के पाठ की व्याख्या समझा रहा हो।

इस लिहाज से ‘कामायनी-लोचन’ भारतीय दर्शन, व्याकरण और काव्य-शास्त्र के विद्वान-अध्यापक द्वारा ‘कामायनी’ की छात्रोपयोगी अर्थ-मीमांसा है और ‘कामायनी’ का शब्द-कोश भी। किताब की भूमिका दिल्ली विवि हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर निर्मला जैन ने लिखी है.   

किताब : कामायनी-लोचन (दो खंडों में)                                                    लेखक : डॉ उदयभानु सिंह
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली                                                     मूल्य : (दोनों खण्डों) : 1200 रुपये

समीक्षक : शशिकांत 
  
(13 मार्च 2011 के राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली में प्रकाशित) 
 

मंगलवार, 8 मार्च 2011

बंद हो कोख में क़त्ल

साथियो, आज 8 मार्च है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस. हिन्दुस्तान जैसे पुरुष प्रधान समाज में  कन्या भ्रूण ह्त्या आज भी एक गंभीर समस्या है. आइये, आज हम सब बेटियों को बचाने का संकल्प लें. 14 मार्च 1999 (राष्ट्रीय सहारा) और 21 सितम्बर  2006 (जनसत्ता) में कन्या भ्रूण ह्त्या के खिलाफ़ प्रकाशित अपने ये लेख आपके हवाले कर रहा हूँ. शुक्रिया. - शशिकांत 


पिछले दिनों सुप्रसिद्ध अमेरिकी पत्रिका 'फ़ोर्ब्स' ने दुनिया की सौ सशक्त महिलाओं की सूची में इंदिरा नूयी, सोनिया गांधी, ललिता गुप्ते, कल्पना मोरापिया और विद्या छाबड़िया को शामिल किया है. लेकिन इस खबर पर जब पूरा हिन्दुस्तान फ़ख्र  महसूस कर रहा था, ठीक उसी दिन एक न्यूज़ चैनल  ने राजस्थान के उदयपुर की एक झील में खून से लथपथ कन्या भ्रूणों को पानी में तैरते हुए दिखाकर हम हिन्दुस्तानियों को पूरी दुनिया के सामने शर्मसार कर दिया. 

दिल दहला देनेवाली उस खबर से क्या यह साबित नहीं होता की परम्परागत पित्रिसत्तातामक समाज में पैदा होकर अपनी म्हणत और लगन से औरतों ने कामयाबी की सीढ़ियां तय कीं, लेकिन इस कामयाबी पर जश्न मना रहे हिन्दुक्स्तानी समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी खोखला है. वह उन्हीं गिसे-पिटे क्रूर सामंती संस्कारों  की गिरफ़्त में है, जिनमें बेटियों के लिए या तो कोई जगह नहीं है याही तो हाशिए पर.

दरअसल, लिंग-भेद पर आधारित समाज में औरतों पर अत्याचार और यातना की कहानी पैदाइश के बाद, किशोरावाथा, या युवावस्था में नहीं, बल्कि गर्भ से ही शुरू हो जाती है. यूनिसेफ की एक रपट के मुताबिक़, एशिया में गर्भावस्था में बच्चियों और कन्या भ्रूणों की ज़िन्दगी की गुंजाइश बाक़ी दुनिया के मानदंडों के मुकाबले बहुत  ही कम है. 

हाल में एक अन्य न्यूज़ चैनल ने मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई शहरों में स्टिंग ऑपरेशन किया  जिसमें उसने वहां के सरकारी अस्पतालों और प्राइवेट क्लीनिकों में पैसे लेकर धड़ल्ले से  गैर कानूनी तौर पर हो रहे अल्ट्रासाउंड और कन्या भ्रूणों के गर्भपात की खबर का पर्दाफ़ाश किया. इसी तरह राजधानी दिल्ली के कई पॉश कॉलोनियों में प्रति हज़ार लड़कों के बनिस्बत लड़कियों की लगातार कम होती तादाद की खबर भी आई.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ ख़ास हालातों को छोड़ क़ानूनी तौर पर भ्रूण की लिंग जांच को  अविध ठहराए जाने के बावजूद यदि ऐसे हादसे लगातार हो रहे हैं तो यह बेशक गंभीर मसला है, समाज और सरकार दोनों के लिए. 

क़रीब दशक-भर पहले परिवार कल्याण निदेशालय ने प्रसव पूर्व लिंग जांच निरोधक अधिनियम लागू किया था. लेकिन यह सच्चाई है की आज भी बड़े पैमाने पर देश भर के महानगरों, छोटे-बड़े शहरों, यहाँ तक की क़स्बों के सरकारी और निजी अस्पतालों और  क्लीनिकों में धड़ल्ले से भ्रूण परीक्षण हो रहे हैं और गर्भवती औरतों, उनके रिश्तेदारों और डॉक्टरों की मिलीभगत से कन्या भ्रूणों की बड़े पैमाने पर ह्त्या की जा रही है.

कुछ बरस पहले राजस्थान के एक गाँव में एक सौ पंद्रह साल बाद आई एक बरात की खबर ने लोगों को इस समस्या पर सोचने के लिए बाध्य किया था. परम्परागत सामंती और पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त राजपूतों के उस गाँव में लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था. 

आज भी उस गाँव में गिनी-चुनी लडकियां ही हैं. कन्या भ्रूण और नवजात बच्चियों की सरेआम के जा रही ह्त्या की वजह से देश में औरत-मर्द अनुपात में असुंतलन आ गया है. पंजाब और हरियाणा सहित कुछ अन्य राज्यों में तो यह अनुपात काफ़ी चिंताजनक हालत तक पहुँच गया है. 

हाल में एक ऐसी अमरीकी वेबसाईट के माध्यम से जानकारी जुटा रहे हैं. इस वेबसाईट के माध्यम से जानकारी जुटाकर कोई भी बिना किसी डॉक्टर की मदद के खुद ही भ्रूण के लिंग का पता लगा सकता है, क्योंकि इसके लिए जिन उपकरणों की ज़रुरत होती है वे आसानी से मेडिकल स्टोर में मिल जाते हैं. कहने की ज़रुरत नहीं की हिन्दुस्तान जैसे पुरुषसत्तात्मक मुल्क के लिए यह उन्नत और सहज तकनीक कितनी  खतरनाक साबित हो सकती है. खासतौर पर तब जबकि पहले से ही उपलब्ध भ्रूण-ह्त्या की विभिन्न तकनीकों की वजह से केरल और प. बंगाल को छोड़कर कमोबेश पूरे मुल्क में औरत-मर्द अनुपात की खाई बढ़ती जा रही है. 

राजस्थान के जैसलमेर जिले में तो प्रति हज़ार मर्दों के मुक़ाबलेऔरतों की तादाद महज़ आठ सौ दस है. जबकि वहीं भाती समुदाय में औरतों का अनुपात महज़ छह सौ से कुछ ही ज़्यादा है. इसी तरह बिहार के सीतामढी जिले के डुमरा प्रखंड में कम उम्र की लड़कियों की तादाद में भारी कमी आई है. प्रखंड के पांच गाँवों में किए गए एक सर्वे के मुताबिक़ वहां छह बरस की उम्र के पार्टी हज़ार लड़कों के मुक़ाबले महज़ छह सौ अट्ठावन लड़कियां हैं. 

इतना ही नहीं, पंजाब और हरियाणा जैसे संपन्न राज्यों में भी औरत-मर्द अनुपात काफ़ी अफ़सोसनाक है. संयुक्त राष्ट्र बालकोष (यूनिसेफ) की एक रपट के मुताबिक़ एक पंजाबी घर में गर्भ से पांच साल तक की लड़कियों के मौत की आशंका लड़कों की तुलना में दस फ़ीसद ज़्यादा है. दिल्ली पुलिस की एक रपट के मुताबिक़ राजधानी दिल्ली की झुग्गी-झोपडी बस्तियों में भी कन्या -भ्रूणों की ह्त्या की दर ज़्यादा है.

उल्लेखनीय है, प्रसव पूर्व लिंग जांच निरोधक अधिनियम - १९९४ के तहत भ्रूण की लिंग जांच के लिई 'अल्ट्रासोनोग्राफी एमिनोसेंटेसिस' जैसी तकनीक का इस्तेमाल और लिंग संबंधी कोई भी जानकारी देने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है. इस बीच राष्ट्रीय महिला आयोग ने भ्रूण जांच के तौर-तरीक़े  बतानेवाली अमेरिकी वेबसाईट पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की है. 

जाहिर है, पुरुषसत्तात्मक मुल्क़ों में औरत-मर्द अनुपात को संतुलित करने के लिए यह ज़रूरी है. इसमें सरकार और क़ानून की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. साथ ही, जनजागरूकता के लिए मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाओं  को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी.  

शनिवार, 5 मार्च 2011

एक पोर्न स्टार के दिल में मदर टेरेसा... : फ्रेंक हुज़ूर

सोहो में एक बार के सामने फ्रेंक हुज़ूर  
साथियो, मिशेल के साथ मुलाक़ात की फ़ीचर-रपट की दूसरी किश्त पेश कर रहे हैं फ्रेंक हुज़ूर अपनी 'लन्दन डायरी' में. - शशिकांत

मिशेल की हर एक बात में करिश्मा का एहसास हो रहा था, "पोर्नोग्राफी को मैंने कभी भी एक प्रॉब्लम की तरह नहीं देखा है." पोर्नलैंड की इस हसीना से जब मैंने पूछा, "क्या उसे ऐसा नहीं लगता कि पोर्न ने सेक्सुअलिटी को हाईजैक कर लिया है?" तब उसकी आँखों में थोड़ी हरकत हुई. मिशेल ने नज़रों को तेज़ किया और कहा, "पोर्नोग्राफी को पब्लिक सिर्फ़ कामुकता  की माफिक क्यों लेती है?  पोर्नोग्राफी मेरी नज़र में तालीम है. हाँ, अगर आप ऐसा सोचते हैं कि टीनेज बच्चों पर क्रूर, हिंसक पोर्न का बुरा असर होता है तो फिर जिस तरह आप उन्हें सिगरेट पीने से रोकते आए हैं, उसी तरह पोर्न से भी बेपर्दा कर दीजिये. भला ये भी कोई मसला है क्या?"

मिशेल ने हैरानगी की इन्तहाँ जारी रखी, जब उसने यह कहा, ^मासूम बच्चे जब बिन लादेन के वीडियो देखे और विडियो गेम खेले तब उनका दिमाग़ ख़राब नहीं होता है और जब उनकी आँखों के समंदर में हमारी सेक्सुअल एक्ट आ जाए तो जलजला आने लगता हैं? मैं भी तो एक टीनेजर ही थी जब मैंने सेक्स के सीक्रेट गार्डेन में वॉक किया था. हाँ यह ज़रूर है कि तब पोर्न मोबाइल फ़ोन, वीडियोगेम और लैपटॉप पर आना शुरू ही हुआ था. सभी उसी उम्र में ज़िन्दगी की इस बेहद हसीन सौगात से रू-ब-रू होते हैं."

"पोर्न इज़ हार्मलेस दैन लादेन", मिशेल ने चुलबुलाहट भरे अंदाज़ में कहा और मेरे मार्लबोरो लाइट सिगरेट के पैकेट की तरफ़ अपने मिडल फिंगर से इशारा किया. मैंने थोड़ी भी बेवफाई मिशेल के इस शौक़ से नहीं की और बेहद जल्दबाजी में सिगरेट का स्टिक उसके सुर्ख होठों के बीच टांग दिया. मैंने अपने लायटर जिसका नाम 'केंट' था, से चिंगारी निकाल मिशेल के होठों के बीच झूल रहे मार्लबोरो सिगेरेट को आग के हवाले कर दिया. मिशेल ने सिगेरेट के जलते ही एक लम्बा कश खीचा और लायटर को मेरे राइट हैण्ड से अपने राइट हैण्ड में ले लिया. उसकी आँखों ने लायटर के सिलिंड्रिकल छाती पर लिखे मैसेज को ग़ौर से पढ़कर सुनाया- "अ वार्निंग–कीप अवे फ्रॉम चिल्ड्रेन!" जैसे ही यह लफ्ज़ उसके होठों को चुमते हैं, गरम फिजा में दाखिल मेरे चेहरे पर थोड़ी हंसी आ जाती है.

"मैं सो रहा था मुक़द्दर के सख्त राहों में, उठा ले गए जादू तेरी नज़र के."  नासिर काज़मी का यह तरन्नुम नज़्म हौले-हौले असर करने लगा था. क़रीब एक दशक के दिलकश सफ़र में क्या कोई गिला शिकवा है भी या नहीं? मैंने मिशेल की आँखों में झाँका और अपने जवाब का इंतज़ार करने लगा. रूबी के रंग की माफिक उसकी आँखों में चमक आती और फिर गायब हो जाती. मैंने इटलियन वाइन 'वल्पोलिसल्ला' से अपने मन को बहलाने का इंतज़ाम कर लिया था.

मिशेल की बातों में वाइल्ड बेर्रिज़ जैसे नशे का सुरूर था. "गिला-शिकवा तो ज़िन्दगी के दिन रात की तरह है", मिशेल ने कहा. "वक़्त के साथ-साथ पोर्न इन्डस्ट्री भी बहकने लगी है. जब मैंने आगाज़ किया था तब क्लासिक पोर्न का दौर था. हॉलीवुड की फिल्मों की तरह पोर्न की भी अपनी पटकथा थी. कॉस्‍ट्यूम सुंदर होते थे. लोकैलिटी, महलों से लेकर झीलों के किनारे तक अजीब समा होता था. रोमांस हर सेक्सुअल अदा में झलकती थी. म्यूजिक और साउन्ड का अलग ही इफे़क्ट था. हर एक सीन पर हमें एक फीचर फिल्म के अदाकार की तरह रिहर्सल करना होता था. बदले हुए ज़माने ने आज पोर्न इन्डस्ट्री को फास्टफूड जैसा बना दिया है. उसी ने इसमें क्रुएल्टी और हिंसा परोसने का जुर्म किया हैं."

मिशेल ने अपनी फिल्मों के हवाले से ये कहकर मुझे उत्साहित कर दिया कि उसने तक़रीबन हर चरित्र को निभाया है चाहे वो एक प्रिंसेस हो या किचन में डिश वाश करने वाली मेड और हर उस अदां में सेक्सुअल एक्ट को जीया है. तो फिर उसे किस एक्ट में ज्यादा सुकून का एहसास हुआ और कौन सा एक्ट उसके लिए परेशानी का सबब साबित हुई? मिशेल मुस्कुराने लगी. बोली- "क्या करोगे हर उस अदा के पैमाने को जानकर?" 

मैंने कहा, "मेरी इसमें गहरी दिलचस्पी है और फिर तुम्हारे पास छुपाने के लिए है ही क्या?" गिनीज बीअर के ग्लास को किनारे करने के बाद उसने बार टेंडर को रेड वाइन पेश करने का फ़रमान दे दिया. अब तक हम दोनों ने फायर प्लेस के ठीक सामने खाली हुए दो स्टूल को झटक लिया था. आग की सुहानी लपटें मिशेल के गालों पर झिलमिल रौशनी की तरह जगमगा रही थी.

रेड वाइन के एक शिप के बाद उसके गुलाबी होंठ पके हुए रेड चिली की तरह और सुर्ख हो गए. वह बोली, "पोर्न फिल्मों की शूटिंग एक पार्लर की तरह है. एक अदाकारा के जिस्म के हर हिस्से को सजाया जाता हैं. हमारी फिल्मों में न्यूड बॉडी का जबरदस्त जश्न है. मुझे सबसे ज्यादा सुकून मेरी पहली फिल्म में आया था, जब मुझे एक प्रिंसेस का रोल करना था, जिसे उसका अंगरक्षक दीवानगी की आग में धकेल देता हैं. 

जब भी मेरा बॉडीगार्ड मुझे कहीं भी लेकर जाता, वो लोकेशन अक्सर किसी ब्लू लेक का किनारा होता या किसी शानदार किले का कोई आँगन या दीवारें. मुझे प्रिंसेस के गाउन को कुर्बान कर देना होता था और उसके दोनों जांघों के बीच अपने सर को दफ़न कर लेना होता था. अक्सर यह सिलसिला ऐसे ही चलता, मगर बॉडीगार्ड हीरो को मुझे ब्‍ल्यू लेक के कोल्ड वाटर में डुबाने का ज्यादा रोमांच होता था. और जब मेरे प्रिन्स को हमारे एक्ट के हवाले से खबर होती है तो वो बॉडीगार्ड के स्ट्रेट डिक को खून से नहला देता हैं."

यह कहते हुए मिशेल ने एक सवाल दाग़ा, "तुमने वो फिल्म देखी है, टिंटो ब्रास की निर्देशन वाली– "कालिगुला?" 1979 में पेंट हाउस प्रॉडक्‍शन के बॉब गुचिओं के साथ मिलकर ब्रास ने हॉलीवुड की सबसे विवादस्पद फिल्म "कालिगुला" बनायी थी, जिसमें ब्रिटिश एक्टर मैल्कम मैक्‍ड्वेल ने कालिगुला की सेक्सुअल पर्वर्जन वाली ज़िन्दगी को सिल्वर स्क्रीन पर अमर कर दिया था."
मैंने बहुत ही कॉन्फिडेंस के साथ मिशेल को जवाब दिया, "हाँ मैंने "कालिगुला" देखी है और मैंने उसको काफ़ी एन्जॉय किया है."

मिशेल ने फिर कहा, "‘कालिगुला" यूँ तो पोर्न फिल्म नहीं थी मगर पेंट हाउस के पोर्न फिल्मों का सबसे एरोटिक प्रयोग इसमें किया गया है और उसके शॉट्स हमारे लिए चार्ली चैपलिन के सिनेमा की तरह हैं. कालिगुला को अपनी तीनों बहनों- अग्रिपिना, दृस्सिला और जुलिया से भी मोहब्बत हो गयी थी और उस फिल्म में उन्हें न्‍युड और सेक्सुअल एक्ट में बेहद ही रोमांचक तरीके़ से फिल्माया गया था. इन्सेस्ट को परदे पर ग्लैमराइज़ करके ब्रास ने तहलका मचा दिया था. जब कालिगुला को निकाह की ज़रूरत पड़ी तो उसने रोम के सबसे मशहूर तवायफ़ से निकाह करके सबको भौंचक्‍का कर दिया था."

मिशेल को पोर्न फिल्मों में इन्सेस्ट सेक्स के फिल्मांकन से कोई दिक्कत नहीं है. उसकी नशीली निगाहों में मैंने थोड़ा सुहाने भरम को टूटते हुए पाया. "इन्सेस्ट एक सोशल मर्ज़ है. इसका इलाज सिनेमा नहीं है. हमारी पोर्न फ़िल्में सिर्फ़ इस मर्ज़ का परदे पर नक़ल करती हैं. ये चुराई हुईं भी स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि सीधा-सपाट अफसाना है. यह दुनिया का ऐसा दस्तूर है जिससे हम सब कभी भी आज़ाद नहीं हो पाए हैं."

फ्रेंक हुज़ूर
रात ढलने लगी थी और 'हार्प' पब के गरम फ्लोर पर रौशनी जगमगाने लगी थी. बूट और नुकीले संदल के शैडो ग़ायब हो रहे थे. मिशेल कभी अपने  बालों को हल्का-सा सहलाती और फिर रेड वाइन की ठंडी चुस्की लेती. करीब हर पंद्रह मिनट बाद वो अपनी उँगलियों के बीच सिगरेट भी दबा लेती. मैंने उससे ओर्गिज़ के हवाले से तफ़सील में जानने की ख्वाहिश को बेपर्दा कर दिया. उसने शरारत भरी मुस्कान के साथ मेरे सवाल का इस्तकबाल किया. 

मिशेल ने जब बोलना शुरू किया तो मैंने महसूस किया कि उसकी आँखों की महफ़िल में कोई समा नहीं था और न ही उसे किसी परवाने की दरकार थी. "मेरी पहली ओर्गिज़ क़रीब एक साल के बाद हुई थी. आंद्रे के पापा स्टॉकहोम के बाहर अपार्टमेन्ट बुक करते और क़रीब 12-15 अदाकारों की कास्ट होती. मुझे न्‍यूड होने के बाद वे मेरे ब्रेस्ट के साथ थोड़ा खेलते और फिर अपने हाथों से बुट्टोक पर हरक़त करते और फिर कैमरा और फ्लश के हवाले कर देते. मुझे एक पूल टेबल पर लेट जाना था और एक साथ तीन एक्टर को अपने माउथ के सलीवा से खेलना था और दो एक्टरों को अपने हाथों से बहलाना था और दो और एक्टर को अपने बूट पहने लेग्स के दरमयान जिस तरह घोस्ट ट्रेन सुरंग के अन्दर जाती है, उसी तरह सैर कराना था. यह सिलसिला क़रीब चार घंटे तक चलता रहा. जब कभी मुझे युरिनेशन का एहसास होता और मैं उठने की जदोजहद करती, मेरे पोर्न एक्टर मेरे से थोड़े खफा होने लगते.जब मेरे हमसफ़र अदाकार इजेकुलेशन के पिक पर होते तब उनके स्पर्म के धागे मेरे बदन पर गिरते, कुछ मेरे बालों पर साया हो जाते, कुछ मेरी जांघों में लिपट जाते और कुछ मेरे होठों से ऐसे चिपक जाते जैसे प्लास्टिक किसिंग का खेल हो रहा हो. क़रीब हर पोर्न स्टार मेरे चेहरे को स्पर्म के सैलाब में डूबा देने में नशीला मज़ा का एहसास करता. मुझे ये बेहद अज़ीब सा लगता मगर इस तूफान को कौन रोक सकता है? पूरे हॉल में मैं और लड़कियों को इसी तरह जिस्म के इस रस्म को वफ़ा के साथ निभाते हुए देखती. धीरे-धीरे मुझे कपड़ों में अपने को देख के अजीब सी परेशानी होती और ऐसा लगता जैसे ये खामोशी का कोई अफसाना है. जब भी मैं अपने बदन को रेशम के कपड़ों से आजाद कर लेती, मुझे अपने होने का एहसास होने लगता. पोर्न के पार्लर में किसी भी लड़की को कपड़ों में ख़ूबसूरत नहीं बल्कि बदसूरत कहा जाता है."

मिशेल के इस ख़याल से भी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर गहरा असर साया हुआ, जब उसने कहा, "पोर्न इन्डस्ट्री हर लड़की को बाय-सेक्सुअल बना देती है और बहुत सारे लड़कों को गे-सेक्स के लिए उत्साहित करती है. शायद ही कोई पोर्न स्टार होगी जो लेस्बियन टेंडेंसी ना रखती हों." वह पोप के कंडोम वाले कमेन्ट पर दिल खोल कर हँसी और वे‍टिकन सिटी के ‘कंडोम लव’ को ‘फेक लव’ का सुरूर करार दिया.

"कंडोम एंड सेक्स आर नोट नेचुरल पार्टनर. अ पोर्न स्टार यूजे़ज़ कंडोम ओनली टू प्रोमोट पापा पोप्स मेसेज ऑफ़ सेफ सेक्स." मिशेल ने यह कह कर मुझे भी हंसीं से लबरेज कर दिया कि जाने क्यों दुनिया में लोग ‘बलून सेक्स’ के दीवाने होते जा रहे हैं. जब कंडोम नहीं था तो एड्स कहां था? कंडोम और एड्स दोनों का इज़ाद एक ही वक़्त में शुमार हुआ लगता है!

"सबसे खौफ़नाक मंज़र तुम्हें किस तरह के फिल्मिंग में लगी?" मिशेल ने थोड़ा-सा अपने हाथी जैसे मेमोरी को हिलाया और कहा, "वो सीन जिसमें मुझे एक कब्रिस्तान में ताबूत के ऊपर फूलों के गुलदस्तों को रखने के लिए झुकना था और मेरा को-स्टार मेरे ग़मगीन काले लिबास को मेरे बुट्टक के ऊपर फ़ना कर देता है." शूटिंग के बाद जब मैंने फिल्म देखी तो मुझे अपने दिल और दिमाग़ पर जैसे ऐतबार ही ना रहा. क़रीब एक महीने तक मैंने कोई वीडियो शूट नहीं किया था. मेरे पूरे पोर्न करियर में ये वो ग़मज़दा लमहा था,  जब मुझे लगा मैंने अपने को ख़तरनाक वोयर्स के हवाले कर दिया है और सब के सब राजदार है यहां. उसके बाद मैंने दुबारा इस तरह के मातम के माहौल में नशीला पोर्न सेक्स शूट करने का ख़याल हमेशा के लिए कुर्बान कर दिया."

मिशेल ने पोर्न स्टार के पेमेंट को बेहद ही रोचक बताया, "जहाँ एक टॉप स्टार को एक फिल्म के लिए दस हज़ार पौंड से लेकर बीस हज़ार पौंड तक मिलते हैं वहीं ओर्गी के स्टार को पचास हज़ार पौंड तक का भुगतान किया जाता है, मगर इसका दूसरा पहलू यह है कि सीडी और डीवीडी सेल के ऊपर कोई रॉयल्टी इन्हें नहीं दी जाती. यह सिलसिला लन्दन, पेरिस और न्यूयार्क के ब्लू सलूनों पर बदस्तूर जरी है. मगर इतना बेहतरीन पेमेंट यूरोप के दूसरे मुल्कों के पोर्न इन्दुस्ट्री में नहीं होता." 
उम्र के ढलान पर मिशेल अब पांच हज़ार पौंड की भी अदाकारा नहीं रहीं, जैसा कि दस्तूर है यहाँ. हर रोज़ पोर्न स्टूडियो नए टीनेज हसीनाओं की तलाश में लगे रहते हैं और गुल्फरोश हसीनाओं की कोई कमी नहीं है यहाँ. मिशेल ने जो सफ़र एक हज़ार डॉलर से आगाज़ किया था उसका एख्तेताम आज उसी कीमत पर हो रहा है.

"क्या करोगी तुम, जब तुम्हारे लिए पोर्न फिल्मों के ऑफर बिलकुल ही बंद हो जाएंगे?" मिशेल की आवाज़ में थोड़ी सी लचक आई, "आई विल बीकॉम हेड मिस्ट्रेस ऑफ़ टीनेज पोर्न स्टार. मेरा काम उन्हें सेक्सुअल फंतासी के मुख्तलिफ अवामों से दीदार कराना होगा. एक खातून की कीमत पोर्न इन्डस्ट्री में सेब की तरह होती है. सेब जितना ताज़ा होगा उतना ही उसका जश्न-ए-दीदार होगा और जब वो पुराना पड़ने लगेगा, शेयर मार्केट के लुढ़कते हुए स्टॉक की तरह वो आवारा पैसों में नीलम होता रहेगा."

जिस्म के इस पार्लर में सुहानी कीमत का यह सौदा हमारे हिंदुस्तान और दूसरे एशियाई मुल्कों के पोर्न इन्डस्ट्री के मुकाबले काफी शानदार है. क्या बॉलीवुड, कॉलीवुड या फिर मॉलीवुड के पेट में सरपट दौड़ती पोर्न इन्डस्ट्री उन मासूम लड़कियों का इतना एहतराम करती है, जो बहला-फुसला के कैमरा के आगे या फिर चोरी-छिपे फिल्मों के बाज़ार में परोस दी जाती है? सवाल और जवाब से हम सब अच्छी तरह मुखातिब है. मिशेल के साथ के इस जुस्तजू भरी शाम के आखिरी मंज़र में मैंने उससे पूछ ही लिया, "तुम्हारा दिल यह सोच कर कभी उदास नहीं होता कि तेरा कोई एक हमसफ़र नहीं है?" मिसेल ने अपनी झील-सी गहराई वाली आँखों से अपना जवाबतलब कर दिया, "सिर्फ तेरे बदन की शमा जले और हम सब उसमें डूब जाने की आरजू लिए आते रहें." 

सोहो के वार्डोर स्ट्रीट में एक पीप शो का पार्लर है, जहाँ तमाशाइयों को पंद्रह पौंड देकर लाइव सेक्स एक्ट का लुत्फ़ उठाने का मौका मिलता है. जब हम सब पीपिंग टॉम के करेक्टर में गुल्फरोशी की शमा जलाते रहेंगे, मिशेल कुछ पल के लिए आबाद रहेगी, हर पल के सार-ए-बज़्म में वह सुकून के लिए तड़पती रहेगी!

मिशेल रवांडा और सोमालिया में तीन बच्चों को अडॉप्‍ट कर चुकी है. उनका सारा ख़र्च उठाती है, अगर वो रुपहले परदे की मडोना होती तो पूरी दुनिया उसका इस्तकबाल कर रही होती. चाइल्ड ट्रेफिकिंग के स्‍पाइडर वेब से वो लोलिता के उम्र में हम सबके सीक्रेट गार्डेन को गुलज़ार करने के लिए आई थी. मुझे यह जानकार फ़क्र हुआ कि मिशेल के दिल में मदर टेरेसा है ,और उसके बदन में लोलिता से लेकर, मर्लिन मुनरो और मैडोना भी है.

(फ्रैंक हुज़ूर अंग्रेजी के लेखक और स्वंत्रत पत्रकार हैं. क्रिकेटर इमरान खान पर उनकी लिखी  जीवनी, ‘इमरान वर्सेस इमरान : द अनटोल्ड स्टोरी’ जल्द ही आनेवाली है. उनसे frankhuzur@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)

बुधवार, 2 मार्च 2011

पाकिस्तान गए तो अपनी बहुमूल्य धरोहर समेट लाए ओम थानवी


मित्रो, 
जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी कई बार पाकिस्तान की यात्रा कर चुके हैं. यूं तो बहुत से लोग हर साल पाकिस्तान जाते हैं लेकिन पाकिस्तान गया हर भारतीय मुअनजोदड़ो कहाँ जाता है.वीजा भी नहीं मिलता  आसानी से, जिस शहर में काम है, उसे छोड़कर कहीं जाने नहीं देते वे. खैर, ओम थानवी  मुअनजोदड़ो  गए, और गए तो अपनी बहुमूल्य धरोहर समेट लाए ओम थानवी. मुअनजोदड़ो का उनका यात्रा-वृत्तान्त हम पढ़ चुके हैं जनसत्ता में. 
प्राचीन भारतीय सभ्यता की इस धरोहर-सामग्री को किताब की शक्ल में आना बेहद ज़रूरी समझा जा रहा था. अब आ गई है- 'मुअनजोदड़ो' शीर्षक से, वाणी प्रकाशन से. 
किताब का लोकार्पण शनिवार 5 मार्च, 2011 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्स के ऑडिटोरियम में कवि कुंवर नारायण  ने किया। अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश और पुरातत्त्ववेत्ता बृजमोहन पांडे  ने किताब पर विचार विमर्श किया ...और अपूर्वानंद ने किया कार्यक्रम का संचालन। 
बतौर बानगी पेश है बैक कवर पर प्रकाशित किताब के कुछ अंश:  - शशिकांत

"मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सड़कों और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं. यहाँ की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था, अब भी वहीं है. आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं, वह कोई खंडहर क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर अब भी कोई रहता हो. रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं. शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर उस बैलगाड़ी की रुन-झुन भी सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्व की तस्वीरों में मिट्टी के रंग में देखा है. यह सच है कि किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढियाँ अब आपको कहीं ले नहीं जातीं, वे आकाश की तरफ़ जाकर अधूरी ही रह जाती हैं. लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर खड़े हैं, वहां से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झाँक रहे हैं." 

ओम थानवी