बुधवार, 2 मार्च 2011

पाकिस्तान गए तो अपनी बहुमूल्य धरोहर समेट लाए ओम थानवी


मित्रो, 
जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी कई बार पाकिस्तान की यात्रा कर चुके हैं. यूं तो बहुत से लोग हर साल पाकिस्तान जाते हैं लेकिन पाकिस्तान गया हर भारतीय मुअनजोदड़ो कहाँ जाता है.वीजा भी नहीं मिलता  आसानी से, जिस शहर में काम है, उसे छोड़कर कहीं जाने नहीं देते वे. खैर, ओम थानवी  मुअनजोदड़ो  गए, और गए तो अपनी बहुमूल्य धरोहर समेट लाए ओम थानवी. मुअनजोदड़ो का उनका यात्रा-वृत्तान्त हम पढ़ चुके हैं जनसत्ता में. 
प्राचीन भारतीय सभ्यता की इस धरोहर-सामग्री को किताब की शक्ल में आना बेहद ज़रूरी समझा जा रहा था. अब आ गई है- 'मुअनजोदड़ो' शीर्षक से, वाणी प्रकाशन से. 
किताब का लोकार्पण शनिवार 5 मार्च, 2011 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्स के ऑडिटोरियम में कवि कुंवर नारायण  ने किया। अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश और पुरातत्त्ववेत्ता बृजमोहन पांडे  ने किताब पर विचार विमर्श किया ...और अपूर्वानंद ने किया कार्यक्रम का संचालन। 
बतौर बानगी पेश है बैक कवर पर प्रकाशित किताब के कुछ अंश:  - शशिकांत

"मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सड़कों और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं. यहाँ की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था, अब भी वहीं है. आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं, वह कोई खंडहर क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर अब भी कोई रहता हो. रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं. शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर उस बैलगाड़ी की रुन-झुन भी सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्व की तस्वीरों में मिट्टी के रंग में देखा है. यह सच है कि किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढियाँ अब आपको कहीं ले नहीं जातीं, वे आकाश की तरफ़ जाकर अधूरी ही रह जाती हैं. लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर खड़े हैं, वहां से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झाँक रहे हैं." 

ओम थानवी

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं पाकिस्तान तो कई दफ़ा हो आया हूँ, पर संपादकों के दल में कभी वहां नहीं नहीं गया! बहरहाल, पुस्तक में रुचि ली है, उसके लिए आभार.
    -ओम थानवी

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