पाठालोचन की नई प्रविधि है ‘कामायनी-लोचन’


काव्य और उसकी टीका-व्याख्या-आलोचना एक दूसरे के पूरक रहे हैं और अपरिहार्य भी। भारतीय साहित्य में लोकप्रिय साहित्यिक कृतियों की टीका-व्याख्या-आलोचना की परंपरा फूलती-फलती रही है।

आधुनिक छायावादी कविता के चार स्तंभों में से एक जयशंकर प्रसाद रचित ‘कामायनी’ आधुनिक काव्य का ‘‘ऐसा गौरवग्रंथ है जिस पर सबसे अधिक आलोचनात्मक पुस्तकें तथा लेख लिखे गए हैं, सबसे अधिक टीकाएं लिखी गई हैं, सबसे अधिक शोधपरक निबंध एवं प्रबंध प्रणीत हुए हैं, और सर्वाधिक विवाद भी हुआ है।’’

दिल्ली विश्वविद्यालय हिदी विभाग के पर्व अध्यक्ष स्व0 डॉ उदयभानु सिंह की ‘कामायनी-लोचन’ शीर्षक से दो खंडों में प्रकाशित ‘कामायनी’ की टीका-व्याख्या इसी परंपरा की एक कड़ी है।

प्रविधि के लिहाज से एक नए कलेवर में, लेकिन भाषा की दृष्टि से निहायत तत्समनिष्ठ, बोझिल और अकादमिक। मानो बीसवीं सदी की चौथी दहाई में लिखी गई कृति की टीका-व्याख्या उसी काल की भाषा में की जा रही हो- बिल्कुज अध्यापकीय आलोचना की भाषा की तरह।

बतौर बानगी व्याख्याकार द्वारा किताब के ‘प्राक्कथन’ में लिखी ये पंक्तियां पढ़ी जा सकती हैं, ‘‘कवि के मन का, उसकी संकल्पात्मक अनुभूति का, रहस्य बहुत गहन है-विशेषतया प्रसाद-सरीखे अधीती, दार्शनिक, संवेदनशील और छायावादी कवि के मन का। ऐसी स्थिति में कोई विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि उसने कवि के हदय में सम्यक प्रवेश कर लिया है और उसके मानस-बिंब का इदमिथ्यं निरूपण करने में सर्वथा समर्थ हुआ है। यथार्थ यह है कि व्याख्याकार का समीक्षक अपनी मति के अनुसार समीक्ष्य कृति के मर्मोद्घाटन का यथाशक्ति प्रयत्न करता है। ‘कामायनी-लोचन’ भी इसी प्रकार का प्रयास है।’’

विडंबना यह है कि ज्यादातर विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग के प्राध्यापक इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी हिंदी को छायावादी भाषा की जकड़न से आज़ाद करने को राज़ी नहीं हैं, जबकि विश्वविद्यालय से इतर हिंदी पत्रकारिता की दुनिया की हिंदी भाषा समय के साथ क़दम-ताल कर रही है। 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर इमेरिटस और हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने भी अभी हाल में यह माना। उन्होंने बीते 28 फरवरी को राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित एक गोष्ठी में सार्वजनिक तौर पर कहा, ‘‘सच्चाई यह है कि हिंदी का वर्तमान रूप जो हासिल हुआ है उसमें हमारी हिंदी पत्रकारिता ने बड़ा काम किया है। खड़ी बोली हिंदी का जो गद्य है वह पत्रकारों का बनाया हुआ है, यह अध्यापकों और रिसर्च करनेवालों का बनाया हुआ नहीं है। हिंदी बनी है हिंदी पत्रकारिता से।’’
 
बहरहाल, दो खंडों में प्रकाशित ‘कामायनी-लोचन’ के पहले खंड में ‘चिंता’, ‘आशा’, ‘श्रद्धा’, ‘काम’, ‘वासना’, ‘लज्जा’, ‘कर्म’ और ‘इर्ष्या सर्ग’ की टीका-व्याख्या है और दूसरे खंड में ‘इड़ा’, ‘स्वप्न’, ‘संघर्ष’, ‘निर्वेद’, ‘दर्शन’, ‘रहस्य’ और ‘आनंद सर्ग’ की। टीकाकार-व्याख्याकार ने सबसे पहले हर सर्ग का कथा सूत्र यानि कहानी का सार पेश किया है।  उसके बाद संक्षिप्त व्याख्या-समीक्षा। फिर शब्दार्थ यानि कठिन शब्दों के अर्थ और आखिर में विस्तृत टिप्पणियों के माध्यम से पाठ की व्याख्या।  

इस बहुचर्चित और बहुपठित छायावादी कृति की टीका-व्याख्या करते हुए व्याख्याकार दारा अपनाई गई कुछ नई प्रविधियां जरूर काबिलेगौर हैं, मसलन पांडुलिपि के ‘पाठ’ और किताब छपते वक्त कवि द्वारा ‘पाठ’ में की गई तब्दिलियों से पाठक को अवगत कराना। पाठालोचक ने जगह-जगह यह व्याख्यायित किया है कि कैसे एक ही पंक्ति में पदावली-विशेष के बदलने भर से पाठ के अर्थ का अनर्थ हो जाता है या उसका अर्थ बदल जाता है। 

मसलन, इड़ा सर्ग की दो पंक्तियों- ‘संघर्ष कर रहा सा सबसे, सबसे विराग सब पर ममता / अस्तित्व चिरंतन धनु से कब यह छूट पड़ा है विषम तीर / किस लक्ष्य-भेद को शून्य चीर’ की टिप्पणी उल्लेखनीय है- ‘‘कामायनी’ के प्रथम संस्करण, भारती भंडार से प्रकाशित उसके अन्य संस्करणों (उनमें संशोधित एकादश संस्करण भी शामिल है), और रत्नशंकर प्रसाद द्वारा संपादित ‘प्रसाद ग्रंथावली’ (खंड-1, पृष्ठ 567) में सातवीं पंक्ति के पूर्वार्ध का पाठ है: ‘संघर्ष कर रहा था जब से’। यहां ‘जब से’ के प्रयोग का कोई तुक नहीं है। पांडुलिपि (पृष्ठ 61) में  ‘सब से’ मिलता है, वही समीचीन और ग्राह्य है। उससे पूरी पंक्ति के अर्थ और बिंब की स्पष्ट प्रतीति हो जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रूफ-शोधन के समय तथा शुद्धिपत्र तैयार करते समय भूलवश प्रसाद का ध्यान उस अशुद्धि की ओर नहीं गया। उसका प्रयोग लाक्षणिक है।’’

कुल मिलाकर, हर सर्ग की दो-दो पंक्तियों के ‘पाठ’ को व्याख्यायित कर पाठक-सुलभ बनाने का पाठालोचक का यह उप-कर्म ऐसा लगता है, मानो बिल्कुल अकादमिक अनुशासन की तर्ज पर कोई अध्यापक विश्वविद्यालय की कक्षा में विद्यार्थियों को ‘कामायनी’ के पाठ की व्याख्या समझा रहा हो।

इस लिहाज से ‘कामायनी-लोचन’ भारतीय दर्शन, व्याकरण और काव्य-शास्त्र के विद्वान-अध्यापक द्वारा ‘कामायनी’ की छात्रोपयोगी अर्थ-मीमांसा है और ‘कामायनी’ का शब्द-कोश भी। किताब की भूमिका दिल्ली विवि हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर निर्मला जैन ने लिखी है.   

किताब : कामायनी-लोचन (दो खंडों में)                                                    लेखक : डॉ उदयभानु सिंह
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली                                                     मूल्य : (दोनों खण्डों) : 1200 रुपये

समीक्षक : शशिकांत 
  
(13 मार्च 2011 के राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली में प्रकाशित) 
 

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