बोलियों के साहित्य का सरोकार / मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

आज अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पर निर्भर देश के अंदर बढ़ रहे आक्रामक पूंजीवाद की पृष्ठभूमि में बाजार समर्थक लेखकों की उपस्थिति चिंताजनक है। इसी  आक्रामक पूंजीवाद के दौर में एक तरह का आक्रामक व्यक्तिवाद भी विकसित हो रहा है। हमारे यहां के मध्यवर्ग में उस विकृत चेतना का देखदेखी में विकास हो रहा है। यह वर्ग अपने लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएं जुटाना अब गुनाह नहीं मानता। निजी स्वार्थलिप्सा में डूबे हुए कुछ लेखक भी इस क्रम में दिखाई पड़ जाते हैं। ऐसे लेखक पद और पुरस्कारों के लिए सत्ता के गलियारे में चक्कर मारते हैं और विभिन्न अकादमियों के अध्यक्ष और सचिवों की चापलूसी करने में वे संकोच नहीं करते। ऐसे लेखकों के सामने रखकर अगर आज के साहित्यिक परिदृष्य को रखकर निष्कर्ष निकाला जाए तो वह एकांगी होगा।

दरअसल साहित्य का सृजन और साहित्य की जनता तक पहुँच एक व्यापक परिदृश्य में देखने के लिए आमंत्रित करती है। विभिन्न क्षेत्रों में खड़ी बोली हिंदी के हजारों की तादाद में ऐसे रचनाकार हैं जिनकी रचनाएं भले किताब के रूप में नहीं छपती हैं और न पत्र-पत्रिकाओं में आती हैं लेकिन ये विभिन्न अंचलों में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों में काव्य-पाठ, गीतों के गायन, कहानी-पाठ या नाटकीय ढंग से कोई वार्तालाप सुनाने की एक नई कला विधा के दारा अपनी रचनात्मकता और जन सरोकार प्रदर्षित करते हैं।

यहां एक-दूसरे प्रकार के साहित्य का उल्लेख भी जरूरी है। विभिन्न बोलियों के लेखक मैथिली, मगही, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, कन्नौजी, हरियाणवी आदि बोलियों में रचना कर रहे हैं। इनका साहित्य बहुत ज्यादा छपता नहीं लेकिन जनता के बीच में इन्हें लोकप्रिय रचनाकार का सम्मान हासिल है। ऐसे रचनाकारों में ग्रामीण जन-जीवन का हर पहलू अपनी तमाम तरह की धड़कनों के साथ मौजूद है। यहां तक की स्थानीय स्तर की राजनीति के नायक और खलनायक इनकी रचनाओं में बदलते रहे हैं और बोलियों के इन रचनाकारों से हिंदी-उर्दू क्षेत्र की राजनीति की गहमागहमी और जनता के रोष का पता भी इनकी रचनाओं से चलता है।

समकालीन हिंदी-उर्दू साहित्य की मुख्यधारा में अनेक प्रकार के रचनाकार हैं। चरण सिंह पथिक, विद्यासागर नौटियाल, दूधनाथ सिंह जैसे लेखक हिंदी-उर्दू क्षेत्र के आंचलिक परिदृश्य और ग्रामीण जीवन के मूलभूत विरोध को पूरी तीक्ष्णता और कलात्मकता के साथ प्रदर्शित कर रहे हैं। मध्यवर्ग के ऐसे भी रचनाकार हैं जो व्यक्तिगत दुख के माध्यम से समाज के दुख को देखते हैं और परिवर्तन की बेचैनी का इजहार करते हैं। इन रचनाकारों में जो लोग पूंजीवादी सांस्कृतिक बाजार में लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं उनकी रचनाषीलता के अनेक ध्रुव हैं। इनके सभी ध्रुवों पर व्यवस्था के प्रति असहमति और विषाद की छाया मौजूद है। तीसरे प्रकार के वे रचनाकार हैं जो सपाटबयानी के दारा या वाचालता के आरा जनता के हुंकार और दुख दर्द को प्रकट करते रहते है। चैथे प्रकार के रचनाकार हैं जो कहानियों में और उपन्यासों में खासतौर पर उन साममाजिक घटनाओं का दिग्दर्षन कराते हैं, जिनके गहरे अभिप्राय उन कृतियों के पाठ के बाद ही पकड़ में आ पाते हैं। इधर युवा रचनाकारों की बाढ़ आई है। अधिकतर युवा रचनाकार नए तरह की रचनाएं कर रहे हैं जिनमें समाज के प्रति गहरा सरोकार मौजूद है।

आज का हिंदी लेखन बहुआयामी है और उसकी अनेक अंतर्धाराएं हैं। इन रचनाओं का सारतत्व कोई एक दृष्टि से समाहारमूलक नहीं बताया जा सकता। बोलियों के साहित्य को साहित्य न मानकर जो भी आलोचनात्मक चर्चा होती है वह वह कुलीन मनोविरोध मात्र है। यह इसलिए हुआ कि मुद्रण यंत्र के आने के बाद पिछले दो सौ सालों में खड़ी बोली का जो साहित्य आया उससं भिन्न वाचिक साहित्य परंपरा की मानो हम कल्पना ही नहीं करते। हालांकि वाचिक परंपरा के लोग हर अंचल में अपनी रचना अपने ढंग से करते हैं और छोटी-छोटी गोष्ठियों, पारिवारिक आयोजनों, त्योहार-उत्सवों, किसी के स्मृति दिवस, 15 अगस्त या 26 जनवरी के मौके पर ये अपनी रचनाएं सुनाते हैं।

इन बोलियों में जो परंपरा शामिल है उसमें जनजीवन की उष्मा के कारण उसमें जिस सृजनशील लेखक का संबंध है उसकी सृजनात्मकता में कई नई रचनाओं का उत्कर्ष दिखाई देता है और जिन लोगों का संबंध बोलियों से दूर हो गया है, जो शहरी हो गए हैं, मध्यवर्गीय कुलीन बनना चाहते हैं उनकी रचना बाजार भाषा में लिखी जा रही है। बेशक ऐसी रचनाओं का संबंध जनता से टूट चुका है। जहां तक कवि सम्मेलनों, मुशायरों के व्यापक स्तर पर आयोजनों की बात है उसमें निष्चय ही फूहड़ और विदूषक किस्म की रचनाओं का बाहुल्य है। इस दिशा में वैकल्पिक कवि गोष्ठियों के आयोजन के प्रयास भी जगह-जगह हो रहे हैं।

इन आयोजनों में एक सुसंबद्ध रूप नहीं धारण किया, लेकिन कभी स्वाधीनता आंदोलन की याद में या क्षेत्रीय स्तर के किसी बड़े रचनाकार की याद में स्थानीय स्तर के आयोजनों में भी जनता की बड़ी उपस्थिति यह बताती है कि आम जनता का साहित्य से संबंध नहीं कटा है। उदाहरण के लिए दिनकर के गांव में जो आयोजन होते हैं, निराला के इलाके में जो अयोजन होते हैं, माखनलाल चतर्वेदी की स्मृति में, मजरूह सुल्तानपुरी, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, साहिर लुधियानवी आदि से जुड़े आयोजन में जनता की भागीदारी देखी जा सकती है और इन आयोजनों के कार्यक्रमों में जिस तरह का व्याख्यान होता है उसका स्तर उन्नत किस्म का होता है।

अभी दिनकर जी के गांव सिमरिया गया था, उनकी सौवीं वर्षगाँठ के अवसर पर। पूरे दिन के कार्यक्रम में बारह-तेरह सौ लोग शरीक हुए थे जिनमें युवा और ग्रामीणों की समान भागीदारी थी। वहां स्थानीय स्तर के अनेक रचनाकारों ने अपनी कविताओं के पाठ किए। उन रचनाओं का स्तर मुख्यधारा के रचनाकारों से कमतर नहीं कहा जा सकता। ऐसे ही र्काएक्रम 1857 के कार्यक्रमों में झांसी में हुए थे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिंदी पट्टी की बोलियों में रचा जा रहा साहित्य आज भी आम जनता के सरोकारों से जुड़ा हुआ है, उसमें मिट्टी की महक भी है और प्रतिरोध की धार भी।

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