शनिवार, 9 जनवरी 2010

समय और समाज का यथार्थ / उदय प्रकाश

अच्छा लिखना जीवन जीने की तरह है। हिंदी ही नहीं किसी भी भाषा में लिखी गई कहानियों की जड़ें यथार्थ में होती हैं। लेखक चाहे कितना ही बड़ा स्वप्नजीवी क्यों न हो, यथार्थ से जुड़कर ही श्रेष्ठ कहानियां लिख सकता है। किसी भी लेखक के लिए उसका पाठक वर्ग महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई लेखक अच्छा लिख रहा है तो इसका काफी हदतक श्रेय उसके पाठकों को दिया जाना चाहिए।

हिंदी भाषा की एक ख़ास तरह की सांस्कृतिक बनावट है। हमारे समाज और हमारी भाषा में भी जातिवाद और सांप्रदायिकता है। भाषा में जितना तीव्र संघर्ष होता है समाज में हमें दूसरे स्तर पर उन्हें झेलना पड़ता है। 'मोहनदास' कहानी मैंने बहुत डिप्रेशन की स्थिति में गांव में रहकर लिखा। पिछले साल उस पर फिल्म भी बनी। मोहनदास कोई कल्पित पात्र नहीं है। मेरे गांव से छह-सात किलोमीटर बगल में बसोर जाति के एक युवक की सच्ची दास्तान है यह कहानी।

आज का एक सच यह है कि जिसके पास ताकत नहीं है वह अपनी अस्मिता तक नहीं बचा सकता। इन्सान की बहुत सारी आकांक्षाएं होती हैं लेकिन जब उसके साथ घोर अन्याय होता है तो वह न्याय चाहता है। उसकी यह आकांक्षा कभी नहीं मरती। अच्छी कहानी कुछ इसी तरह की चिंताओं से उपजती हैं, उसके पात्र भी वहीं से आते हैं। मैं यह नहीं मानता कि 285 मिलियन इंडिया ही भारत है। बड़े षहरों से बाहर निकलकर देखिए! वहां भयानक अंधेरा है। गांववालों के दुख की बातें आज कौन कर रहा है। टीवी और अखबार वाले भी नहीं। हमारे यहां आज जोर-शोर से शहरीकरण हो रहा है, मॉल बनाए जा रहे हैं और इन सबके लिए धड़ल्ले से जंगल काटे जा रहे हैं। इस पर आज हम सबको मिलकर सोचना चाहिए। यह 'हिंद स्वराज' का 100 वां वर्ष है।

मेरा मानना है कि पाठक को ध्यान में रखकर कोई लेखक नहीं लिखता, अपने समय की संवेदना को ध्यान में रखकर लिखता है और वही पढ़ा जाता है। कृत्रिम लेखन को आप कुछ लोग आपस में मिलकर चाहे कितना ही ब्रह्म बना लें आपको पाठक नहीं मिलेगा। लेखन एक कला है और कलाएं युनिवर्सल होती हैं। वे अपने समय में सक्रिय तमाम तरह की सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं। विचार या कलाएं किसी व्यक्ति या जगह विषेष की नहीं होतीं। वे हर जगह और हर किसी के लिए होती हैं।

आज के समय में सिर्फ पूंजी का ही ग्लोबलाइजेशन नहीं हो रहा है बल्कि गरीबी, भूख, बीमारियों का भी हो रहा है। ईश्वर ने लेखक को एक ऐसा प्राणी बनाया है जो वहीं रहता है जहां वह दुख देखता है। लेकिन इसके बावजूद विडंबना यह है कि एक लेखक को अपनी जगह बचाए रखने के लिए इस दुनिया में काफी संघर्ष करना पड़ता है। मैंने अपनी कहानियों में आज के समय के जटिल यथार्थ को कहने की कोशिश की है। कभी कभार कहानियां तात्कालिक घटनाओं को आधार बनाकर भी लिखी जाती हैं। क्योंकि कुछ सच तत्काल कह देना चाहिए। लेखक नहीं कहेगा तो कोई नहीं कहेगा। शमशेर, मुक्तिबोध जैसे रचनाकार आज इसलिए हमारी स्मृति में जिंदा हैं क्योंकि वे बहुत संवेदनशील थे। इसीलिए मैंने ष्मोहनदासष् कहानी में शमशेर बहादुर सिंह को जज और गजानन माधव मुक्तिबोध को पुलिस अफसर बनाया है।

दरअसल यह सभ्यता एक ऐसे दौर में है जहां पावर ही सबकुछ है। सारा का सारा तंत्र उसी के इर्दगिर्द सिमटकर रह गया है। ऐसे समय में आम आदमी की जिंदगी बहुत कठिन हो गई है। इराक में एक भयानक झूठ के कारण करीब 15 लाख लोग मारे गए। इसका कौन जवाब देगा।

लेखक का सरोकार अपने समय और उस समय के आम मनुष्य के प्रति होता है। इन्हीं के प्रति वह प्रतिबद्ध होता है। राजनीति को भी होना चाहिए लेकिन सन 1980 के बाद हमारे यहां पावर लगातार करप्ट होता चला गया। दरअसल मनुष्य में कई तरह की कमजोरियां होती हैं। किसी विचारधारा में अब वह क्षमता रही नहीं। लगभग सारी की सारी विचारधाराएं पावर और सत्ता हथियाने का जरिया बन चुकी हैं। जबकि टेक्नोलॉजी एक ताकतवर माध्यम बनकर उभरा है। जो काम आज राजनीति नहीं कर सकती वह टेक्नोलॉजी कर रही है। आम आदमी तक पहुंच रही है।

हम तकनीक के एक नए दौर में पहुंच गए हैं। आज आपके भीतर यदि थोड़ी सी भी संवेदनशीलता है तो आप एक मामूली सी तितली की मौत पर विनाश का महाआख्यान लिख सकते हैं। लेकिन हम एक ऐसे वक्त में रह रहे हैं जहां मनुष्य के अंदर की मासूमियत खत्म होती जा रही है। ऐसे कठिन समय में लिखना कठिन हो गया है।

एक लेखक को अपने समय और समाज के यथार्थ को समझने के लिए यंत्रणाओं के भीतर से होकर गुजरना पड़ता है। जब आप अपने घर, परिवार से अलग बहुत तरह की सुरक्षाओं से वंचित होते हैं तभी आप अपने आसपास के समाज को सही झंग से जान पाते हैं। आप जहां रह रहे होते हैं, यह दुनिया आपको वहीं से दिखाई देती है। दुनिया के महान से महान लेखक ने अपने समय और अपनी जगह से ही दुनिया को देखकर लिखा है।
(9 जनवरी, 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित)

2 टिप्‍पणियां:

  1. "अच्छा लिखना जीने की तरह है"

    आपकी इस लाइन ने तो सब कुछ कह दिया। "जीना" शब्द कितना आसान लगता है मगर इसे किन्ही वाक्यों मे जोड़ना बेहद नाज़ुक मोड़ पर लाकर रख देता है। जीवन जीना और जीवन शब्दों की कुंजी से जीना, सांसे और धड़कन शब्दों को बाहर करके उनको अपनी कल्पनाओं से जोड़ना क्या नज़ारे खोल देता है उसको बयाँ कर पाना बेहद रोचक लगता है।

    लख्मी

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