क्रिकेट, नेता, एक्टर - हर महफिल की शान.../ निदा फाजली


"क्रिकेट, नेता, एक्टर - हर महफिल की शान, स्कूलों में कैद है गालिब तेरा दीवान" - हमारे देश की मौजूदा हालत कुछ ऐसी ही है। क्रिकेट का खेल आज करोड़ों में घूम रहा है। दूसरी कलाएं भी बाजार का दामन थामकर फल-फूल रही है लेकिन शब्द और उसकी संस्कृति की कद्र दिन-ब-दिन कम होती जा रही है।


ऐसे माहौल में साहित्य और उसके सरोकारों की गंभीर बातें पढ़ने-सुनने में न किसी की रुचि है न किसी के पास फुरसत। जब साहित्य का ही महत्व नहीं रह जाएगा तो फिर साहित्यकारों की क्या जिम्मेदारी बनेगी। साहित्य की सबसे बड़ी खासियत कहें या दिक्कत यह है कि वह हमेशा जेनुइन सवाल पूछता है और राजनीति के सामने खतरा पैदा करता है।

आजादी के बाद भारत ने काफी तरक्की की है- यह एक सच है लेकिन यह तरक्की महानगरों और शहरों के मध्य और उच्च वर्ग तक सीमित है। इंडिया शाइनिंग का दूसरा सच यह है कि देश की तीन-चैथाई आबादी आज भी गरीबी और भूख से बेहाल है। हाल के दिनों में बेतहाशा बढ़ी महंगाई ने यहां के गरीब और आम आदमी का जीना दुश्वार कर दिया है।


तरक्की का झुनझुना बजानेवाले ज्यादा दूर न जाएं, अपने महानगर या शहर की झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवाल, मेहनत करनेवाले गरीब मजदूरों की हालत देखें कि आज के समय में वे किस मुश्किल हालात में जी रहे हैं। कामन मैन की हालत भी बहुत खराब है। यह अफसोस की बात है कि आजादी के इतने साल हो गए लेकिन यह आजादी भारत के चंद घरों तक ही सीमित है। इस तीन-चैथाई आबादी को यदि आजादी दिलाना चाहते हैं तो इसका एकमा़त्र उपाय है कि हम बहुत सारे अंबेडकर, गांधी, जेपी, विनोबा, ज्योति बसु सरीखे नेता पैदा करें।


नक्सलवाद के विरोध को मैं बेवकूफी मानता हूं। देश में शताब्दियों से आम आदमी का शोषण न हो रहा है। यदि वे आवाज उठा रहे हैं तो इसमें क्या गलती है। सरकार और दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को इस मसले पर सोचना चाहिए। 

नक्सलवाद का मसला सिर्फ सरकार और नक्सलवादियों के बीच का मसला नहीं है, जिस तरह इराक का मसला सिर्फ अमेरिका और सद्दाम हुसैन के बीच का मसला नहीं था और न है। अमेरिका के हमले के बाद वहां अब तक तीन लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।


भारत में भी नक्सलवाद सरकार और देश के आम आदमी के बीच का मसला है। दिक्कत यह है कि आज सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी अपनी दुकान चला रही हैं चाहे वह कांगेस पार्टी हो या मुलायम सिंह की पार्टी या कोई और पार्टी, हिंदुस्तान की आम जनता के दुख-दर्द और उसकी परेशानियों से किसी भी दल का कोई लेना-देना नहीं।


वामपंथियों से उम्मीद थी लेकिन सीपीआई और सीपीएम के विभाजन के बाद देश में लेफ्ट मूवमेंट पर असर पड़ा। यह विभाजन देश के लिए गलत था। ऐसे मुश्किल हालात में कामरेड ज्योति बसु लेफ्ट मूवमेंट के साथ ठीक उसी तरह खड़े रहे जिस तरह सज्जाद जहीर और मुल्कराज आनंद प्रोग्रेसिव मूवमेंट के साथ खड़े थे। 

आज कामरेड ज्योति बसु की मौत के साथ वामपंथी आंदोलन का वो गोल्डन कालखंड भी खत्म हो गया है। उनकी मौत के बाद लेफ्ट अब वो लेफ्ट नहीं रह गया है। कामरेड ज्योति बसु की मौत से एक पूरा युग खत्म हो गया है। वे भारत के एक ऐसे नेता थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आम आदमी की राजनीति करते हुए गुजार दी। 1996 में उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला था लेकिन उनकी पार्टी ने उन्हें बनने नहीं दिया। यदि उस वक्त उन्हें प्रधानमंत्री बनने दिया जाता तो मुल्क में आज लेफ्ट मूवमेंट का दूसरा रूप होता।


आज ज्योति बसु के इंतकाल के बाद जब मैं उनकी शख्सियत और उनके कामनमैन बेस्ड पालिटिकल कंसर्न पर गौर करता हूं तो मुझे लगता है कि वे आधुनिक भारत के इतिहास में महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के कद के नेता थे, बल्कि कई मायने में वे पंडित नेहरू से भी बड़े थे। वे महात्मा गांधी की तरह आम जनता के आदमी थे। पंडित नेहरू ने "डिस्कवरी आफ इंडिया" लिखी जिसका "भारत: एक खोज" नाम से अनुवाद हुआ। मैंने उस पर एक शेर लिखा था- "स्टेशन पर खत्म हुई भारत तेरी खोज, नेहरू ने लिखा नहीं कुली के सिर का बोझ।"


महात्मा गांधी कामन मैन के आदमी थे और पंडित नेहरू हिंदुस्तानी मिडिल क्लास के। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कामरेड ज्योति बसु लंदन में पढ़ाई करके हिंदुस्तान की राजनीति में आए और पूरी जिंदगी आम जनता को हक दिलाने की राजनीति करते रहे। मेरा एक शेर है- "कोई न हिंदू, न मुसलिम, न ईसाई है, सबने इन्सान बनने की कसम खाई है"- ये कसम महात्मा गांधी ने खाई थी और आखिरी दम तक उन्होंने इसे निभाया। उसके बाद इस राह पर कामरेड ज्योति बसु ही चले।


आज जब कामरेड ज्योति बसु हमारे बीच नहीं हैं तो मुझे मिर्जा गालिब का एक शेर याद आ रहा है। गालिब साहब का यह शेर बीसवीं सदी के इन्सान पर पुरजोर ढंग से लागू होता है, चाहे वो आम शख्स हो या खास। शेर है- "बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना।" मतलब यह कि हर कोई मां के पेट से आदमी के रूप में पैदा होता है लेकिन उनमें से कोई-कोई अपने जीवन संघर्ष से इन्सान बनता है। 

ज्योति बसु आदमी के रूप में पैदा हुए और इन्सान बनकर हमारे बीच से रुखसत हुए। पार्टी के सिद्धांत पर चलते हुए वे देश की आम जनता के दिलों की धड़कन बने रहे। जब भी भारत का इतिहास लिख जाएगा तो उनका नाम गोल्डन अक्षरों में लिखा जाएगा।
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित/23 जनवरी, 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

टिप्पणियाँ

  1. mai ap ke vichar or virodabhash se prabhavit hon
    ap ko padh to laga jaise , पनडुब्बी (padhobbi) ki tareh chalne vali aaj ki life ko koi upar lane ki koshihs kar raha hai.


    bahot achchha laga sir.
    rakesh

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छा लिखा है - मगर हूज़ूर हमारा दिमाग तो शुरू की चंद लाइनों मे ही अटक कर रह गया। पढ़ते हुए सोच रहा था की आखिर मे हमें कितना वक़्त मिलता है किसी चीज़ को अपनी तरफ आते हुए समझने में?

    क्रिकेट, के एक बेट्समेन की तरह सोचने की कोशिश की - एक बेट्समेन की निगाह सामने से आते बॉलर के हाथ पर होती है जिसमें वो बॉल को पकड़कता है। पूरा वक़्त वो उसे देखता रहता है - लेकिन जैसे ही वो हाथ बॉल को फैंक देता है अचानक उसका दिमाग हाथ पर नहीं बॉल को पकड़ लेता है। मगर कभी सोचा है की एक बेट्समेन को कितना वक़्त मिलता है बॉल को समझने मे और उसके साथ खुद को हलचल में लाने मे?

    हर शख़्स और जीवन उसके साथ इस वक़्त की बड़ी अहमियत है। क्षणिक पल, उसमे मूवमेंट, उसमे तिरछापन और उसी मे उछाल सभी कुछ समझना होता है। और साथ ही साथ अपने दिमाग को पकड़े रखना - कितना आसान है ये सब करने मे।

    आपका लेख उस प्रक्रिया को छूता है -

    धन्यवाद, सर

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