बदलाव के साथ बुजुर्गियत / रमण दत्ता

उम्र के छियासठवें साल में जी रहे इंसान के पास अपनी बीती ज़िन्दगी को याद कर उन्हें दोबारा जीने का वक्त ही वक्त होता है। सुबह या शाम को घर के पिछवाड़े के पार्क में घंटे भर की सैर, कुछ सोशल वर्क, फेंगसुई पर अंगेजी के एक अख़बार में साप्ताहिक कॉलम और घर के कुछ छोटे-मोटे काम - सर्विस से रिटायरमेंट के बाद का मेरा वक्तकुछ यूं ही कट रहा है। ज़िंदगी के इस मुकाम पर आज जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूं और आज के ज़माने की अपने जमाने से तुलना करता हूं तो लगता है जैसे मैं किसी और दुनिया में आ गया हूं। हमारी आज की नई जेनरेशन में इतनी जागरूकता आ गई है कि उन्हें देखकर कभी-कभी हैरानी होती है।

आज आम लोग भी जागरूक हो गए हैं, हमारे वक्त के अच्छे पढ़े-लिखे लागों से कहीं ज्यादा। एक चीज मुझे ख़ास दिखती है कि ज़िंदगी और करियर के प्रति आज के बच्चों का नज़रिया काफी बदल चुका है। शायद इसकी वजह आज का बदला हुआ माहौल है। पैसे में बड़ी ताकत होती है और टेक्नोलॉजी में भी। टेलिविजन, फिल्में, सीरियल्स, कम्प्यूटर आदि की इस बदलाव में बड़ी भूमिका रही है। एक पिता के नाते इस बदलाव को मैं अपने घर-परिवार में भी महसूस करता हूं। लेकिन मेरी खुशकिस्मती है कि मेरी दोनों बेटियां मेरा खूब ख़याल रखती हैं। इसकी बड़ी वजह शायद यह है कि मैं उनके साथ परंपरागत पिता की तरह नहीं बल्कि एक अच्छे दोस्त के रूप में पेष आता हूं। छोटी बेटी को बाइस-तेइस साल की उम्र में ही पढ़ाई के बाद एक अच्छी जॉब मिल गई। बड़ी बेटी भी मुंबई में जॉब करती है।


एक रोचक वाक़या है- जब मेरी दूसरी बेटी हुई तो मेरी एक रिश्तेदार ने अस्पताल में ही नाक-भौं सिकोड़ना शुरू कर दिया। उस वक्त मुझे उन पर बहुत गुस्सा आया। आज जब सीरियलों में और आस-पास सास-बहू के झगड़े देखता-सुनता हूं तो खुशी होती है कि चलो न रहा बांस न बजी बांसुरी। वैसे भी आज के डेट में मां-बाप की देखभाल के लिहाज से बेटियां बेटों से बेहतर हैं। हां, इसके लिए ज़रूरी है मां-बाप को न्यू जेनरेशन के हिसाब से ख़ुद को बदलना। अगर आप नहीं बदलेंगे तो ऑटो एक्सपो में लगे विंटेज कार की तरह महज शो पीस बनकर रह जाएंगे और फ्रस्टेशन होगा सो अलग।


हमारी उम्र के कुछ लोग आज नई जेनरेशन के बारे में नेगेटिव ख़याल रखते हैं। मेरा मानना है कि आज के बच्चे प्रतिस्पर्धा के इस माहौल में भी अपनी इन्नोसेसी को बचाए हुए हैं। दरअसल ज़माना कोई भी हो इंसान बुरा नहीं होता, हालात बना देता है। किसी ख़ास परिस्थिति में बच्चे बदल जाते हैं, बहक जाते हैं।


जहां तक नेचर ऑफ़ जॉब का सवाल है तो उसमें हमारे ज़माने से आज के जमाने में भारी तब्दिली आई है। हमारे टाइम में दस से पांच का वक्त दफ्तर के लिए होता था, बाकी वक्त लोग अपने परिवार के साथ गुज़ारते थे। आज मोबाइल, लैपटॉप, इंटरनेट और 24 आवर सर्विस ने जॉब आवर के परंपरागत ढांचे को ही तोड़ दिया है। आज हमारे बच्चे घर पर रहकर भी परिवार के साथ तसल्ली से नहीं रहते, क्योंकि दफ्तर से बराबर उन्हें कॉल्स आती रहती हैं। लेकिन इसका एक फायदा भी हुआ है कि अब परिवार में झगड़े कम हो गए हैं। भारी कॉल्स कौम्पिटीशन के इस दौर में आज के बच्चे अक्सर देर रात को दफ्तर से लौटते हैं। दिमागी और शारीरिक स्तर पर इतने थक जाते हैं कि उनके पास लड़ने-झगड़ने की न तो क्षमता होती है न वक्त।


कुल मिलाकर, देखा जाय तो साहब बदलाव तो प्रकृति का नियम है - हम-आप चाहें या न चाहें। हर नई जेनरेशन अपने जमाने के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेती है। दिक्क़त पुराने ख़याल के उन लोगों को होती है जो इस बदलाव से मुंह मोड़ते हैं।

(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पाठालोचन की नई प्रविधि है ‘कामायनी-लोचन’

अटल बिहारी वाजपेयी - सेक्स और राजनीति का रिश्ता

लैंगिक विकलांगता और भारतीय समाज