आज का बाजार और लेखक समाज / प्रो0 असगर वजाहत

लेखक को अपने समय में समाज की समस्याओं पर पैनी निगाह रखना चाहिए और आम आदमी के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। यदि लेखक और समाज के बीच ऐसा कोई रिश्ता या तारतम्य आज बनता है तो वह निश्चित रूप से हमारे देश के लिए लाभदायक होगा। इस लिहाज से जब मैं आज के हिंदी-उर्दू लेखन और देश की सबसे बड़ी साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी की तरफ देखता हूं तो मायूसी होती है। हमारा आज का साहित्य मध्य वर्ग तक सीमित होकर रह गया है। ऐसा साहित्य नहीं लिखा जा रहा है जो मध्य वर्ग को कोई नई या सार्थक सोच दे सके। आज के हालात के समानांतर प्रतिरोधी दृष्टि विकसित करने में चुक गए हैं हम। अपनी आस-पास की दुनिया में हो रहे टूट-फूट पर ही हमारी कलम चल रही है। नई दुनिया रचने का काम हम नहीं कर रहे हैं।

आज के वक्त के बहुत बड़े सवालों से हमारा समकालीन हिंदी लेखन जूझ रहा है- ऐसा मुझे नहीं लगता। चाहे दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श का मुद्दा। हमारे साहित्य में भी इसे एक राजनीतिक मुद्दे की तरह उठाया जा रहा है, एक सामाजिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दे की तरह नहीं। स्त्री विमर्श एक हमारे पुरुषप्रधान भारतीय समाज के लिए एक ज्वलंत मुद्दा था, उसकी परिणति क्या हुई। स्त्री विमर्श के नाम पर कुछ भड़काउ, कुछ स्त्री देह और भोग की कहानियां ही लिखी गईं। इसका सबसे बुरा असर नई पीढ़ी के लेखकों पर पड़ा। उन्हें लगा कि इसी तरह की कहानी लिखेंगे तभी वह छपेगी। इस तरह हमारे मध्यवर्गीय संपादकों ने स्त्री विमर्श को एक गंभीर मुद्दा बनाकर छोड़ दिया। दरअसल, मैं स्त्रियों और दलितों के मुद्दे को राजनीतिक नहीं, एक सामाजिक-आर्थिक समस्या के रूप में देखता हूं। इन पर राजनीति करने की जरूरत नहीं। इससे खतरा पैदा हो जाएगा। ये मुद्दे यदि हमारे समाज के लिए कंसर्न बनते हैं तो यह काबिलेतरीफ होगा। आज हमारे कुछ मध्यवर्गीय लेखक भी बाज़ार समर्थक हो गए हैं। यह एक अलग तरह का चिंताजनक मसला है। मथुरा या अलीगढ़ के जिस बाज़ार को देखते हुए हम बड़े हुए आज का बाज़ार वो बाज़ार नहीं है। आज का बाज़ार अपनी शर्तों पर सामान बेच रहा है। यह बायर्स मार्केट नहीं है सिर्फ सेलर्स मार्केट है। अपने माल बेचने के लिए वह हिंदी प्रदेश में हिंदी भाषा और साहित्य का प्रचार कर रहा है। प्रकाशक भी यदि कोई किताब छाप रहा है तो इसलिए कि उसे मुनाफा हो रहा है। पूरी दुनिया में आज जो बाज़ार फैला हुआ है वह साम्राज्यवादी बाजार है। ख़रीदार के साथ इस बाज़ार का बराबरी का कोई रिश्ता नहीं है। यह इतना आक्रामक है कि यह हमारे देश की नीतियां बदलवाने की क्षमता रखता है। आज हमारे यहाँ सरकारी नीतियां बाजार और बिचैलियों के पक्ष में ही बन रही हैं, आम आदमी के पक्ष में नहीं। यह बाज़ार आम इंसान का सबकुछ छीनकर उसे सड़क पर खड़ा कर देता है। यदि यह बाज़ार आम आदमी के पक्ष में होता तो ग़रीब लोग आज ठंड से मर नहीं रहे होते।

जहां तक साहित्य अकादमी का सवाल है तो पहले से ही वह देश के लेखकों और बुद्धिजीवियों की आकांक्षाएं पूरी नहीं कर रही थी, अब तो इसे बाज़ार में खड़ा किया जा रहा है। भारतीय साहित्य को सामने लाना इस संस्था का उद्येश्य था। उसमें वह पूरी तरह विफल रही। वहां से साल में दस-पंद्रह किताबें मुश्किल से छपती हैं। उनका भी सही ढंग से वितरण नहीं होता। दिक्कत यह है कि वहां सारे निर्णय बिकाउ संस्कृति के आधार पर लिए जा रहे हैं। मुझे लगता है साहित्य अकादमी चापलूस अफसरशाहों के गिरोह का अड्डा बनकर रह गयी है। धोखाधड़ी की राजनीति जाननेवाले लेखकों के कुछ दलाल लोग आज अकादमी में सक्रिय हैं, जो वहां की जोड़-तोड़ में माहिर हैं। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि यह संस्था साहित्य, कला और लेखक विरोधी काम कर रही है। यह बहुत दुखद है और इसका विरोध होना चाहिए। पूरे देश के लेखक मिलकर इस पर विचार करें कि जो साहित्य अकादमी लेखकों और बुद्धिजीवियों के सरोकारों के लिए बनाई गई थी उसका यह हश्र क्यों हुआ, कौन लोग ऐसा कर रहे हैं और इसे कैसे रोका जाना चाहिए। लेकिन अफसोस की बात है कि हमारे देश के लेखक बड़े दुर्बल, निष्क्रिय और संतोषी हैं। वे हस्तक्षेप ही नहीं करते। हमारे यहां के लेखकों की बिरादरी ऐसी है कि वह तटस्थ भाव से अन्याय देखती और सहती रहती है। आज के चिंताजनक माहौल में अजीब बात है कि लेखक संगठनों और अकादमियों में लेखकों की सक्रियता लगभग शून्य हो गई है। पिछले दिनों नक्सलवाद बनाम सरकार विषय पर खूब बहस हुई। इस मसले पर मेरा मानना है कि हमारे यहां की सत्ताधारी शक्तियां अंधी और बहरी हो गई हैं। ये देश का और भारतीय जनता का सबसे ज्यादा अहित कर रही हैं। गौर से देखने पर पता चलेगा कि जितना देशद्रोही सत्ता है उतना कोई नहीं। अभी ठिठुरती ठंड में एमसीडी ने दिल्ली में कई रैनबसेरों को तोड़ दिया। जब इसका विरोध हुआ तो फिर बनाया। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि देश की सबसे बड़ी दुश्मन सत्ता है। जो लोग इसको चुनौती दे रहे हैं उन्हें देशद्रोही कह दिया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे अंग्रजी साम्राज्यवाद के दौर में होता था। इस हिसाब से अंग्रेजों के शासन से अलग हमारी सत्ता नहीं है। आज देश में आम आदमी की जो दशा है उसे देखते हुए कौन देशद्रोही है और कौन देशभक्त - यह समझना जरूरी है। दरअसल, लंबे समय तक बना हुआ असंतोष विरोध के रूप में सामने आता है। और जब इस विरोध को दबाया जाता है तो वह और आक्रामक हो जाता है। आज हमारे देश की सरकार नक्सलवाद को खत्म करना चाह रही है। वह नक्सल प्रभावित इलाकों में सेना भेजेगी। 50-60 हजार लोग मारे जाएंगे। देश की आम जनता से आज की सत्ता और राजनीति से जुड़ी किसी भी ताकत का कोई लेना-देना नहीं है। यह अफसोसनाक बात है। ऐसे समय में लेखकों और बुद्धिजीवियों की भूमिका अहम हो जाती है। हमें आगे आना होगा। (लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली में प्रोफेसर हैं। यह लेख शशिकांत के साथ बातचीत के आधार पर लिखा गया है.)
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली,16.01.2010 प्रकाशित)

टिप्पणियाँ

  1. प्रो. असगर वजाहत ने सही लिखा है कि लेखक को अपने समय में समाज की समस्याओं पर पैनी नज़र रखनी चाहिए. इस समय जब पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी बाजार का बोलबाला है, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याएँ सर उठा रही हैं. ऐसे समय में समाज के प्रति लेखकों और बुद्धिजीवियों की भूमिका अहम् हो जाती है. प्रो वजाहत के साथ वैचारिक बातचीत के लिए डा. शशिकांत को बहुत-बहुत शुक्रिया.

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