मातृभाषा की कीमत पर अंग्रेजी स्वीकार्य नही:अशोक वाजपेयी

आज का हमारा समय बेहद तेज, आक्रामक, हिंसक और बाजारू समय है। दुर्भाग्य से हमारा हिंदी समाज इसका हिस्सा बनता जा रहा है, खासकर मध्य वर्ग। हमारे हिंदी समाज में मध्य वर्ग के भीतर एक ऐसा तबका उभरकर सामने आया है जो इस समय ज्ञान-शून्यता, लूटपाट, अवसरवाद, उपभोक्तावाद और बाजारवादी सफलता की चपेट में आ गया है। 

ऐसे कठिन समय में जो लोग आज समतामूलक, न्यायपरक समाज बनाना चाहते हैं, वे ऐसा तभी कर सकते हैं जब समाज में सकिय शक्तियों का इन्हें समर्थन मिले। फिलहाल हिंदी समाज में ऐसी क्तियां कम दिखाई दे रही हैं।
हमारे हिंदी समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह पुस्तकों से मुंह फेरे हुए है। अव्वल तो यह है कि समाज में पुस्तक के प्रति रुझान हो, सम्मान हो और पढ़ने-लिखने में लोगों की रुचि हो, जैसा कि मलयालम और दूसरी अन्य भारतीय भाषाओं में है। 
इस मामले में हमारे दिल्ली महानगर की हालत कुछ ज्यादा ही निराशाजनक है। हां, पटना, रायपुर, भोपाल जैसे मझोले हरों की स्थिति थोड़ी-बहुत अच्छी जरूर है, बजाय दिल्ली के। 
एक ऐसे समय में जब सभी लोग तेजी से भाग रहे हैं, परेशानी की बात यह है कि हमारे हिंदी क्षेत्र का मध्यवर्ग इसका सबसे अधिक शिकार हो रहा है। यदि इस वर्ग के लोगों की रुचि साहित्य और पुस्तकों में होती तो हालात कम से कम इतने दुखद नहीं होते।
साहित्य की एक खासियत है कि यह हमें मानसिक स्वाद देता है, ज्ञान देता है और यह ज्ञान पुस्तकों से ही संभव है। हमारे हिंदी समाज में पिछले सालों में सूचना को लेकर भूख जरूर बढ़ी है लेकिन ज्ञान को लेकर नहीं। शिक्षा के लिए सूचना से ज्यादा जरूरी है ज्ञान, और ज्ञान किताबों से ही हासिल की जा सकती है।
हिंदी क्षेत्र में अखबारों, किताबों की बिक्री जरूर बढ़ी है लेकिन जिस अनुपात से यहां साक्षरता बढ़ी है उस उस अनुपात में नहीं। दुर्भाग्यव हमारे हिंदी क्षेत्र में शिक्षा की दुर्दशा को तो हम देख ही रहे हैं। शिक्षा का सबसे बड़ा दारोमदार हमारे हिदी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों पर है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों समेत हिंदी प्रदेश में राज्यों में आज एक भी उच्च कोटि का का कोई संस्थान नहीं है।
जहां तक बाजार का सवाल है तो आज के समय में बाजार की चुनौती को ज्यादा आलोचनात्मक ढंग से समझने की जरूरत है। बाजार ने बेशक हमारे सामने आज बहुत बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं लेकिन कुछ सकारात्मक बातें भी हुई हैं। 
एक तरह से बाजार ने हर खासोआम लोगों में समानता की भूख को बढ़ाया है। न्याय-बुद्धि भी सक्रिय हुई है। रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल में आनेवाली कुछ उंसी चीजें हैं जिन्हें बाजार ने सबको मुहैया कराया है। 


ये बाजार के पक्ष की कुछ बातें हैं लेकिन जहां तक साहित्य अकादेमी के सैमसंग बहुराष्ट्रीय कंपनी दारा प्रायोजित पुरस्कार शुरू करने का मामला है तो एक लेखक के रूप में मैं इसको मान्यता नहीं दे सकता। 
बाजार में सक्रिय कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी चाहे तो अनुवाद के किसी प्रोजेक्ट को फंड दे सकते हैं। साहित्य अकादेमी का पुरस्कार एक दूसरी बात है। यह साहित्य और लेखन को जांचने का मसला है। अब तक साहित्य अकादेमी यह जांच करती रही है लेकिन सैमसंग जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी यह जांच कैसे कर सकती है।
जहां तक मैं समझता हूं यदि अकादमी को पुरस्कारों के लिए फंड चाहिए तो वह सरकार से इसकी मांग करे। तमाम विवादों के बावजूद साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कारों की लेखक-पाठक समाज में प्रतिष्ठा है। साहित्य में इतने सारे प्रतिष्ठित पुरस्कार हैं, ऐसे में किसी कंपनी से वितीय अनुदान लेकर नए पुरस्कार शुरू करने की मुझे कोई जरूरत महसूस नहीं होती।
आज कुछ लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के उत्कर्ष की बात करते है। मैं ऐसा कोई उत्कर्ष नहीं देखता। हिंदी के एक लेखक के नाते मुझे अपने हिंदी क्षेत्र में हिंदी के उत्कर्ष की चिंता है। 50 करोड़ हिंदी बोलनेवाले हिंदी क्षेत्र में जबतक हिंदी की प्रतिष्ठा नहीं होगी तब तक हिंदी का उत्कर्ष संभव नहीं। 
बुनियादी बात यह है कि हम अपने घर में क्या कर रहे हैं। सवाल यह है कि अपनी मातृभाषाओं, अपनी रास्ट्रभाषा के प्रति हमारा क्या रवैया है। दुर्भाग्यवश राष्ट्रभाषा हो या मातृभाषा- हिंदी के मध्यवर्ग की भूमिका निंदनीय ही कही जा सकती है।
मातृभाषा से वंचित लोग ज्ञान आधारित समाज का निर्माण नहीं कर सकते। इसीलिए हम चाहते हैं कि हमारे हिंदी क्षेत्र की आगे की आनेवाली पीढ़ियां अपनी मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई पढ़े और फिर अंगे्रजी और दूसरी भाषाएं सीखे। 
सारी दुनिया के शिक्षा मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चों की शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए- तभी बच्चों की ज्ञान की क्षमता, भाषिक क्षमता में वृद्धि होगी और उनका भलीभांति बौद्धिक विकास भी होगा।
आज हमारे हिंदी क्षेत्र के अभिभावकों में बच्चों को अंगेजीदां पब्लिक स्कूल में पढ़ाने की होड़ मची हुई है। मेरा पोता रिभु हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ रहा है। अभी वो छोटा है लेकिन मैं उसकी  उसकी ज्ञान की क्षमता भाषिक क्षमता और बौद्धिक क्षमता से सुतुष्ट हूं। अंग्रेजी मेरे लिए वर्जित नहीं है लेकिन मातृभाषा की कीमत पर मैं अंग्रेजी को स्वीकार नहीं कर सकता।
(6 फरवरी 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

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