आज के समय का यथार्थ बड़ा कड़वा है : प्रो. निर्मला जैन ने शशिकांत से कहा

लोग यह मानते हैं कि लेखक सामान्य नागरिक से अलग होता है। यह एक तरह का भ्रम है, आदर्श है। प्रेमचंद के समय में कहा जाता था कि लेखक समाज को रास्ता दिखानेवाला होता है। भक्ति आंदोलन समाज में पहले आया साहित्य में बाद में, दरबारी संस्कृति समाज में पहले आई रीति साहित्य बाद में और नवजागरण भी समाज में पहले आया और साहित्य में बाद में। यह सच है कि साहित्य पहले एक वैकल्पिक सुझाव देता था और एक वैकल्पिक व्यवस्था सुझाता था। आज हर तरफ कितना भ्रष्टाचार है। डॉक्टर, वकील या अन्य दूसरे पेशे से जुड़े लोग अपना उतरदायित्व क्या निभा रहे हैं। चारि़त्रिक गिरावट यदि आज हर पेशे में हो रही है तो लेखक और शिक्षक इससे कैसे अप्रभावित रहेंगे।

स्वप्न देखना बुरी बात नहीं है, लेकिन आज का यथार्थ बड़ा कुत्सित है। हम इसका पुनर्सृजन नहीं कर रहे हैं। यह आज के समय की एक बड़ी मुश्किल है। हम देख रहे हैं कि लेखक भी आज बाजारवाद के शिकार हो रहे हैं। एथिक्स की दृष्टि से इतना पतन होना ठीक नहीं है। बाजार ने विकल्प मुहैया कराया है। युवाओं को रोजगार दे रहा है। लेकिन इससे एक गड़बड़ हुई है कि इसने लोगों की इच्छाएं बढ़ा दी हैं। बाजार में नैतिक बोध और मूल्यबोध भी नहीं है। सामान्य आदमी इसके चक्कर में फंसकर गलत रास्ते पर आ जाता है। आज पेटी क्राइम बढ़ गए हैं। खाने-पीने की चीजों में बहुत गड़बड़ियां हैं. खराब से खराब चीज को भी बाजार आकर्षक पैक में बेच रहा है।

असल में दिक्कत यह है कि हमने अमेरिका को अपना मॉडल बना लिया है। भारतीय इकानमी मुख्यतः कृषि पर आधारित है। लेकिन देश में कृषि की लगातार उपेक्षा हो रही है, किसानों की हालत खराब है। मनुष्य यदि जमीन की उपेक्षा करेगा तो दिक्कत हो जाएगी। पिछले दिनों गृहमंत्री ने बयान दिया कि देश के 33 जिलों में नक्सलवाद की समस्या बेहद गंभीर है और अन्य 80 जिलों में यह सिर उठा रही है। इस तरह की समस्या तब उभरती है जब समाज में अत्याचार और बराबरी को लेकर के एक तबके में विद्रोह पैदा होता है। दिक्कत तब तब होती है जब यह गलत दिशा ले लेती है।

सवाल यह है कि नक्सलियों को साधन कहां से आ रहे है। इसका फायदा पड़ोसी दुश्मन देशों को मिल रहा है। अगर यह असंतोष अपनी जमीन तक सीमित रहे और इनसे बातचीत होनी चाहिए। लेकिन उन इलाकों में उन्हीं का कानून चलता है। एक प्रजातंत्र में यह कैसे चल सकता है। जनता सचेत हो रही है। समाज में सजगता आ रही है, लेकिन दूसरी तरफ आज समाज के ज्यादातर लोग पीड़ित हैं, परेशान हैं। पूंजी और और सत्ता आज काफी ताकतवर हो गई है। आज कोई भी नेता ऐसा नहीं जो करोड़पति न हो।

माक्र्सवादी विचारधारा को लेकर मेरे मन में कोई शिकायत नहीं है लेकिन जेनुइन माक्र्सवादी मुझे कम मिले हैं। मैंने उनमें अवसरवादिता और मौकापरस्ती देखी है। विचारधारा और प्रतिबद्धता की बातें करनेवाले मौका मिलने पर ढुलक जाते हैं। ज्योति बसु को देख लीजिए। पूंजीपतियों के बीच इतना स्वीकृत, समादृत लेफ्ट का कोई दूसरा लीडर नहीं था। उनके बेटे ने अथाह धन कमाया। बुद्धदेव भट्टाचार्य आदर्शवादी हैं। गांधीवाद सबसे पहले त्याग की बात करता है। आज के समय में नेताओं में जब तक यह प्रवृत्ति नहीं पनपेगी तबतक लोग उसे कैसे स्वीकार करेंगे।

स्त्री और दलित विमर्श से सिद्धांततः मैं सहमत हूं क्योंकि ये हाशिए की आवाजें हैं। इन विषयों पर लिखनेवाले को अनुभव और शिल्प के स्तर पर प्रभावित करना चाहिए। लेकिन मैं यह नहीं मानती कि स्त्री ही सत्री पर लिखे और दलित दलित पर, दूसरे लोग भी लिख सकते हैं। लेखक जब लिखता है तो वह खुद का अतिक्रमण करता है, अपने दिल पर हाथ रखकर लिखता है।

आज समय को लेकर मेरे मन में कई तरह की बातें आती हैं। यह एक अजीब समय है। आज की नई पीढ़ी की कोई निष्चित दिशा ही नहीं है। पता नहीं यह कहां जाना चाहती है। अंधाधुंध दौड़े चले जा रहे हैं सभी। ऐसा परिदृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था। आज किसी को फुरसत नहीं। मित्रता और संबंधों के मानदंड बदल गए हैं। इस माहौल से बचे रहनेवाले लोग आज अपवाद में ही मिलेंगे। जीवन का छंद ही बदल गया है।

आशा की एक किरण इस रूप में दिखती है कि कहीं कोई बड़ी घटना होती है तो लोग आज एकजुट होते हैं। मोहल्ले में या पार्क में यदि गंदगी है तो लोग इकट्ठा होकर साफ-सुथरा करवाने का जिम्मा लोग उठाते हैं। जनता की भागीदारी जब जरूरी दिखती है तो लोगों के भीतर की मानवीयता आज सामने आ जाती है। दूसरी तरफ देखती हूं कि गरीब मजदूर, रिक्सा चलानेवाले भी अब अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

छोटे कस्बे के लोग भी एजुकेशन में लड़के-लड़कियों को बराबर निगाह से देखते हैं। लोगों की सोच में एक खुलापन आया है। एक अच्छी बात और है आज के पूरे परिदृश्य में। आज की पीढ़ी ने यह सोचना छोड़ दिया है कि लोग क्या कहेंगे। गुड़गांव में घर से निकलती हूं तो रिक्षा चलानेवाले, ठेला लगानेवाले को अखबार पढ़ते देखती हूं। मुझे लगता है कि यह सर्वशिक्षा अभियान का असर है। ये छोटे-छोटे द्वीपों की तरह दिखाई देती हैं मुझे। ये सब देखकर नहीं लगता कि हमने सबकुछ खो दिया है।

इसके बावजूद आज के लोगों में हमें व्यापक चेतना दिखाई नहीं देती, गोया कि इतनी ऊर्जा है नई पीढ़ी में। इसमें गंभीर सोच नहीं है। एक बेसब्री है। इस पीढ़ी को तुरंत परिणाम चाहिए। आखिर इतना उतावलापन क्यों? इतनी महत्वाकांक्षाएं क्यों? आदमी यह क्यों सोचे कि वो जो काम करे उसका उसे हमेशा अच्छा ही फल मिले। आज के बच्चों में अपनी हार, अपनी असफलताओं को सहने की सहने की क्षमता कम होती जा रही है।

लोगों में असफलताओं को सहने की क्षमता होनी चाहिए, एक पॉजिटिव सोच होनी चाहिए। समाज और देश में मची आपाधापी के कारण व्यक्ति आत्मनिष्ठ होता चला जाता है। सवाल यह है कि आखिर आज की पीढ़ी किधर जाना चाहती है। क्या सिर्फ पैसे कमाना चाहती है। खुद के लिए जीना चाहती है। क्या हम सिर्फ अपने उपर के लोगों को देखें। नई पीढ़ी को खुद सोचना चाहिए कि आखिर उसके जीवन का क्या लक्ष्य है। ये सारी बातें एक निश्चित परिवर्तन का संकेत देती हैं। 
(प्रो. जैन हिंदी की सुप्रसिद्ध आलोचक हैं. दिल्ली वि.वि.,हिन्दी विभाग की हेड रह चुकी हैं)
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में 13 फरवरी, 2010 को प्रकाशित)

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