मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

आज कुछ लोग सिर्फ अपने बारे में साचते हैं : अरुंधति घोष TOLD TO शशिकांत


आज मैं सत्तर साल की हूं। 1962 में मैंने विश्व भारती से अंग्रेजी में एम. ए. किया। 1962 में ही मैंने यूपीएससी का एग्जाम दिया और आईएफएस में सलेक्ट हो गई। मसूरी में शुरुआती ट्रेनिंग के बाद दिल्ली आई। यहां से मुझे आस्ट्रिया स्थित भारतीय एम्बैसी में भेजा गया। उस वक्त फारेन सर्विसेज वालों को फारेन लैंग्वेज में एग्जाम पास करना होता था। मैंने जर्मन लैंग्वेज का एग्जाम पास किया तब कहीं जाकर मेरी सर्विस कन्फर्म हुई। उसके बाद मैंने मिस्र, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देशों में राजदूत के रूप में काम किया।

आज हमारी नई पीढ़ी को यह यकीन नहीं होगा कि उस वक्त भारत से बाहर के देशों में भारत के राजदूत के रूप में काम करना कितना कठिन था। एक उदाहरण मैं देना चाहंगी। 1965 मे हालैंड में मरी पोस्टिंग हुई थी। जिस दिन मैंने वहां ज्वाइन किया उसी दिन मैंने देखा कि वहां के लोग चर्च में घंटी बजाकर भारत में पड़े अकाल के लिए चंदे इकट्ठे कर रहे थे। 

उन दिनों बिहार में भरी अकाल पड़ा था। जबकि उनके यहां एक जगह है बियाफ्रा, वहां खुद लड़ाई चल रही थी और गृहयुद्ध जैसा माहौल था। उसके बाद जब भी मैं वहां के लोगों से मिलती तो वे भारत के धर्म, यहां की गरीबी, भुखमरी, अकाल आदि की ही बातें करते। मैं अपने देश को डिफेंड करती थी।

उस वक्त हमारे भारत के बारे में लगभग पूरी दुनिया की सोच कुछ ऐसी ही थी, जैसी आज हमलोग हैती और अफ्रीकी देशों के बारे मे रखते हैं। उस वक्त मैं युवा थी। अपने देश के बारे में सोचती थी। जिन-जिन देशों में मेरी पोस्टिंग हुई मैंने वहां भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए दिन-रात काम किया। उसके बाद सुयुक्त राष्ट्र में राजदूत बनकर आई तो वहां भारत के लिए काम करना मेरे लिए काफी चुनौती पूर्ण था।  

उस वक्त संयुक्तराष्ट्र में भारत को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती थी जितनी आज दी जाती है। आज यह देखकर खुशी होती है कि हर मसले पर पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है कि इसके बारे में भारत क्या सोच रहा है। यह सब हमने महज 18-20 सालों में हासिल किया है। इसका सारा श्रेय मैं तत्कालीन फाइनेंस मिनिस्टर मनमोहन सिंह को देती हूं।

1991 में जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खेलने का निर्णय किया तो उस वक्त कोई सोच भी नहीं सकता था कि इतनी जल्दी हम कहां से कहां पहुंच जाएंगे। इंडियन फाॅरेन सर्विसेज में काम करते हुए हम दुनिया के कई विकसित देशों में उस वक्त के फाइनेंस मिनिस्टर मनमोहन सिंह और कामर्स मिनिस्टर पी. चिदंबरम के साथ अपने उद्योगपतियों को लेकर में मीटिंग करते थे और उन्हें भारत में निवेश करने के लिए राजी करते थे।

जहां पहुंचने में दूसरे विकसित देशों को 100-150 साल लग गए वहां हम मात्र दो दशकों में ही पहुंच गए हैं। आज हमारे यहां 300 मिलियन मध्य वर्ग हैं जिनके पास हर तरह की सुख-सुविधाएं हैं। यह पूरे यूरोप की आबादी के बराबर है। लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए हमने काफी मेहनत की है। 

आज इन 300 मीलियन लोगों का फर्ज  बनता है कि वे बाकी 700 मीलियन लोगों के बारे में भी सोचें। सिर्फ सरकार के भरोसे यह नहीं हो सकता। आज मुंबई, महाराष्ट्र, तेलंगाना, तमिलनाडु आदि में कुछ नेता अपने बारे में सोच रहे हैं। हमें पूरे देश के बारे में सोचना चाहिए न कि सिर्फ अपने बारे में।  

(अरुंधती घोष UN में भारत की राजदूत रह चुकी हैं, आजकल DLF,गुडगाँव में रह रही हैं.)
 (9 फरवरी 2010, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

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