रविवार, 3 अप्रैल 2011

हिंदी की अकादेमिक आलोचना ने किया है हेर-फेर

मित्रो,  
इस बार का देवीशंकर अवस्थी सम्मान संजीव कुमार को उनकी किताब ‘'जैनेन्द्र और अज्ञेय : सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य'’ पर देने की घोषणा हो चुकी है। स्व0 देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में यह सम्मान समकालीन हिंदी आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है। आगामी  5 अप्रैल 2011 को नई दिल्ली में  एक समारोह में  उन्हें सम्मानित किया जाएगा।  
प्रस्तुत है युवा आलोचक संजीव कुमार से शशिकांत की बातचीत:

हिंदी की अकादमिक आलोचना ने किया है हेर-फेर : संजीव कुमार

संजीव जी, आपने अपनी किताब में जैनेन्द्र और अज्ञेय के बारे में हिंदी की अकादेमिक आलोचना में व्याप्त गलतफहमी का सप्रमाण प्रत्याख्यान किया है। आपकी निगाह में वह गलतफहमी क्या है?
असल में, मेरा ऐसा एक आलेख जैनेन्द्र और अज्ञेय के संदर्भ में हिंदी की अकादेमिक आलोचना के फ्रायड-मोह पर केंद्रित है। आप तो जानते हैं कि साहित्येतिहासों और उपन्यास विकास के आख्यानों में प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास के शुरुआती दौर को मार्क्स और फ्रायड से प्रभावित उपन्यास-धाराओं में बांट कर देखने का आग्रह रहा है। बाक़ायदा एक मनोविश्लेषणवादी स्कूल की बात की गई है जिसमें जैनेन्द्र और अज्ञेय को भी नामज़द किया गया है। 

इस नामज़दगी के लिए दो तरीके अपनाए गए। एक तरीका तो यह कि इस उपन्यास-धारा के आरंभिक परिचय में फ्रायड का विस्तार से उल्लेख कर दिया, पर जैनेन्द्र और अज्ञेय के उपन्यासों के विवेचन के मौके पर इस प्रभाव के ठोस उदाहरण दिखलाने की कोई ज़रूरत नहीं समझी, यह मानते हुए कि पात्रों के मनोव्यापार में प्रेमचंद से थोड़ी ज़्यादा और थोड़ी अलहदा किस्म/प्रकृति की दिलचस्पी अपने-आप में फ्रायडीय प्रभाव का सबूत है। 

कुछ और लोगों ने दूसरा तरीका अपनाया, जहां इस प्रभाव के सबूत ढूंढऩे की कोशिश की गई और इस प्रक्रिया में सिद्धांत और रचना, दोनों को दारुण कुपठन का शिकार होना पड़ा। मैंने कहा है कि यहां आलोचक की स्थिति उस पंडित के समान थी जो विवाह कराने के नेक इरादे से दोनों ओर की कुंडलियों के गुणों में हेर-फेर करता है। मेरी किताब के पहले अध्याय में ऐसी ही कोशिशों का उद्घाटन है।

अमूमन गैर अकादेमिक क्षेत्र के लेखक अकादेमिक आलोचना पर सवाल उठाते रहे हैं। आप खुद अकादेमिक क्षेत्र से आते हैं, फिर भी आपने अपनी इस किताब में अकादेमिक को कठघरे में खड़ा किया है। क्या आप मानते हैं कि अकादेमिक क्षेत्र में जैनेंद्र और अज्ञेय के साहित्य का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया गया है?

ये न भूलें कि खुद मेरा काम अकादमिक आलोचना है, फुटनोटादिसंपन्न। इसलिए सवाल एस्सेंशियली अकादमिक-ग़ैरअकादमिक का नहीं, अच्छी और बुरी का है। सन् 2000 के अपने एक लेख (‘स्वाधीनता’ के शारदेय विशेषांक में प्रकाशित) में मैंने बतलाया था कि समकालीन आलोचना में कैसे बहुत विराट सामान्यीकरण बेहद नाकाफी ठहरने वाले आधारों पर टिकाए गए हैं और मुझे याद आता है कि वहां ज़्यादातर उदाहरण ग़ैर-अकादमिक क्षेत्र से ही लिए गए थे। 

जहां तक जैनेन्द्र और अज्ञेय का सवाल है, पीछे जिस विशेष संदर्भ की मैंने चर्चा की, उससे बाहर जाकर संपूर्ण मूल्यांकन के बारे में कोई बात कहने की योग्यता मैं अपने अंदर महसूस नहीं करता। अगर उस पर टिप्पणी करूंगा तो वह वैसा ही ग़ैर जिम्मेदाराना बरताव होगा जैसा वह जिसकी मैं आलोचना कर रहा हूं।

क्या आप मानते हैं कि जैनेंद्र, अज्ञेय, निर्मल वर्मा जैसे लेखकों के साहित्य के मूल्यांकन में अकादेमिक और गैर अकादेमिक आलोचना बंटी हुई है?

अकादमिक और ग़ैर-अकादमिक के मुहावरे में बंध कर कोई पैटर्न ढूंढऩा मुश्किल है।

क्या आप इस बात से सहमत हैं कि  मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होने की वजह से अकादेमिक आलोचना पूर्वाग्रह से ग्रस्त थी, और सोवियत संघ के पतन एवं नव पूंजीवादी दौर में उभरी नई विचारधाराओं, सैद्धांतिकियों के कारण साहित्य को देखने, समझने की एक नई दृष्टि दी और मार्क्सवादी आलोचना का तिलिस्म टूटा?

आपके सवाल में कई बातें हैं, पर उनसे एकमुश्त असहमत हूं। पहली बात, अकादमिक आलोचना में  मार्क्सवादियों से ज़्यादा बड़ी संख्या ग़ैर  मार्क्सवादियों या  मार्क्सवाद विरोधियों की रही है। यह अलग बात है कि उनमें से क़ायदे का काम अधिकतर  मार्क्सवादियों ने ही किया है। कौन-सा तिलिस्म था और वह कब टूटा, मैं नहीं जानता, पर इतना ज़रूर कह सकता हूं कि मार्क्सवाद कोई बंद विचारधारा नहीं, एक विकासमान विचारधारा है जो नए हालात में नए तरीके से सोचने और ज्ञान-क्षेत्र के नए उद्विकासों को अपने लिए उपयोगी बनाने पर बल देती है। 

 मार्क्सवाद के नाम पर जारी ग़ैर मार्क्सवादी संकीर्णताओं के अंत को अगर आप तिलिस्म का टूटना कहते हैं तो वह शायद सही है। ‘थियरी’ के सामान्य अभिधान के साथ प्रचलन में आए विचारों ने, निस्संदेह, पाठ के साथ एनगेजमेंट का और हर शै में मौजूद शक्ति-संरचना को समझने का व्यवस्थित तरीका सुझाया है। इससे तो, मेरे ख़याल में, उस आलोचना की नींव पर ज़्यादा गहरा प्रहार हुआ है जो साहित्य के ‘स्वराज’ का नारा लगाती थी और राजनीति द्वारा आलोचना के ‘औपनिवेशीकरण’ का विरोध करती थी। 

‘थियरी’ ने  मार्क्सवाद के इस बलाघात को ही आगे बढ़ाया है कि ऐसा ‘स्वराज’ एक ख़ामख़्याली है और जिसे आप ‘उपनिवेश’ कह रहे हैं, वह तो आपके जाने-अनजाने हमेशा से राजनीति के बेहद्दी ‘प्लेग्राउंड’ का हिस्सा रहा है।

विचारधारा और साहित्य के रिश्ते को आप किस रूप में देखते है? विचारधारा और सत्ता से अलग आज के समय की माइक्रो रियलिटी को अभिव्यक्त करनेवाली साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन के लिए आलोचना की कौन सी प्रविधि आपको मुफीद लगती है?

विचारधारा कहां नहीं है! विचारधारा से बाहर जाकर सोचने का दावा  भाषा से बाहर जाकर सोचने के दावे जैसा है। वही यह तय करती है कि आप दुनिया में चीज़ों के बीच के रिश्ते को किस तरह समझेंगे और कहां कितनी नजऱ टिकाएंगे। अगर आपका आशय ‘वाद’ के स्तर पर संगठित प्रचार पाने वाली, सचेत स्तर पर अपनायी गयी विचारधाराओं से है, तो यही कहूंगा कि जिस तरह भाषा का, उसी तरह विचारधारा का भी साहित्य में भांति-भांति का उपयोग मिलता है। कहीं वह बेहद सधा हुआ, रचनात्मक और नवोन्मेषी होता है, तो कहीं ठस्स, पिटा-पिटाया और अर्थापकारी।  

(3 अप्रैल 2011 राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली में प्रकाशित) 

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