शनिवार, 7 अगस्त 2010

50 करोड़ स्त्रियों की मुक्ति बरास्ते देह विमर्श?

मित्रो,
पिछले दिनों 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित विभूति नारायण राय के विवादास्पद इंटरव्यू के मसले पर आज के 'दैनिक भास्कर' ने पूरा ऑप-एड पेज़ दिया है. प्रो निर्मला जैन ने इंटरव्यू में प्रकाशित आपत्तिजनक शब्दों पर जांच की मांग की है, लेकिन कुल मिलाकर उनके इंटरव्यू को स्त्रियों के पक्ष में बताया है.

दरअसल यह मामला अब देह विमर्श के समर्थन और विरोध - दो खेमों में बंटता दिख रहा है.

हिंदी के सीनियर लेखकों का एक तबका इस तरह के आस्मितामूलक विमर्शों का लगातार विरोध या कहें अनदेखी करता रहा है. अख़बारों के लिए बातचीत करते हुए मैने पाया है कि नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, निर्मला जैन, असग़र वजाहत, उदय प्रकाश सरीखे लेखकों ने हिन्दी साहित्य के अस्मितामूलक विमर्शों के साथ-साथ स्त्री विमर्श के राजेंद्र यादव माडल (देह विमर्श) को कभी भी ज़्यादा तवज्जो नहीं दिया.

इनमें से कई आज चुप हैं तो इसकी एक वजह यह भी है, और जो विरोध कर रहे हैं उन्हें इंटरव्यू में कहे गये आपत्तिजनक शब्द या शब्दों से है. (कृष्णा सोबती और निर्मला जैन से मैंने इस मसले पर बात की. मन्नू जी ने बिना पढ़े इस मसले पर कुछ भी बोलने से साफ़  इनकार कर दिया.) बाकी लोगों की अपनी-अपनी समझदारी और राजनीति हो सकती है.

इधर, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका, रमणिका गुप्ता सरीखी लेखिकाओं का मानना है कि देह विमर्श से ही स्त्री विमर्श शुरू होता है या कि देह विमर्श ही स्त्री विमर्श है या कि देह विमर्श स्त्री विमर्श का एक अहम हिस्सा है. मैंने इन्हें पढ़ते हुए अबतक यही समझा है.

अब जबकि विनारा ने माफ़ी मांग ली है तो मेरी रुचि विवि या संस्थान या शख्स/शख्सों के खिलाफ या पक्ष में चलाई जा रही राजनीतिक मुहिम से ज़्यादा इसमें है कि क्या देह विमर्श ही स्त्री विमर्श है? क्या हिन्दुस्तान की 50 करोड़ स्त्रियों को पुरुष सत्ता से मुक्ति दिलाने का यह सबसे बड़ा ज़रिया है? अस्मितामूलक विमर्श और साहित्य का आख़िर क्या रिश्ता है? हमारे दौर के वरिष्ठ लेखक और आलोचक (स्त्री और पुरुष दोनों) इसे तवज्जो नहीं देते हैं तो उसकी क्या वजह है? वगैरह-वगैरह.

खैर, इस मसले पर आज के 'दैनिक भास्कर' में  कृष्णा सोबती, मैनेजर पांडे, पंकज बिष्ट, विमल थोरात की प्रतिक्रिया और खुद विभूति नारायण राय की सफाई  पढ़ सकते हैं.

उम्मीद करता हूँ कि हिंदी के विश्वविद्यालयों, संस्थानों, पुरुस्कारों आदि से परहेज़ करने वाले साथी इस मसले को गाली-गलौच से बाहर निकालकर स्वस्थ बहस का रूप देंगे. ...आख़िर यह हिन्दुस्तान की 50 करोड़ स्त्रियों से जुड़ा एक गंभीर मसला है.

--  शशिकांत

2 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही लिखा आपने .... । स्वस्थ बहस हो तब तो ठीक है वरना चुप ही रहें तो बेहतर .... । देह -विमर्श से ही स्त्री विमर्श
    नही शुरू होता है ....।

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  2. bahas swasth ho tab hi theek hai warna faltu bahas ka koi labh nahi...

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