गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

साहित्य की स्वायत्तता पर पहरेदारी / राजेंद्र यादव

आज हमें इस बात का बेहद अफसोस है कि हमारे यहां साहित्य और संस्कृति की कोई भी संस्था स्वायत नहीं है। वह या तो सरकारी लोगों से संचालित होती है या वहां पर कोई न कोई ऐसा तथाकथित साहित्यकार बैठा दिया जाता है जिसका एकमात्र उद्देश्य सत्ता का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करना होता है। मैं खुद दो साल प्रसार भारती बोर्ड का मेंबर था। हमें आष्वासन दिया गया था कि प्रसार भारती को, जिसके अंतर्गत आकाशवाणी और दूरदर्शन- दोनों आते हैं, को स्वायत्तता दी जाएगी लेकिन वे कभी स्वायत नहीं हुए।

सीईओ के नाम पर वहां हमेशा ऐसा सेक्रेटरी बैठा दिया जाता रहा था, जो एक तरफ मानव संसाधन मंत्रालय में सेक्रेटरी या ज्वाइंट सेक्रेटरी होता था और दूसरी तरफ प्रसार भारती का सीईओ यानी मुख्य कार्यकारी अधिकारी। मेरी और रोमिला थापर की हमेशा यही आवाज होती थी कि हमें अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए और हमारे पास फाइनेंस या गलत कदम उठानेवालों के खिलाफ कार्रवाई करने की शक्ति भी होनी चाहिए। इसके बिना स्वायतता का कोई मतलब ही नहीं था। जब सारा पैसा सरकार देगी तो किसकी नियुक्ति कहां करनी है, यह सरकारी प्रतिनिधि ही तय करेगा। ऐसी स्वायत्तता का क्या अर्थ रह जाता है ?

लगभग यही स्थिति साहित्य अकादमी की भी है। वहां हिंदी के नाम पर जिन बासी प्राध्यापकों को नियुक्त किया गया है उनका झुकाव दक्षिणपंथी राजनीति की तरफ है। जैसे इस बार दिया जानेवाला साहित्य अकादेमी पुरस्कार कैलाष वाजपेयी को मिला है। निष्चय ही कैलाश वाजपेयी बहुत सक्षम कवि हैं और मैं उनका बीसियों साल से सम्मान करता रहा हूं, लेकिन इधर वे जिस तरह आध्यात्मिक और रहस्यवादी हो गए हैं। वे निश्चय ही अकादमी के हिंदी प्रभारी के काफी निकट जान पड़ते हैं। इसी लाइन में अभी रामदरश मिश्र और कमल किषोर गोयनका भी बैठे हुए हैं। ईश्वर ने चाहा तो वे भी कृतार्थ किए जाएंगे।

मुझे साहित्य अकादमी जैसे बड़े संस्थानों के इन पुरस्कारों के मुकाबले मुझे छोटे-छोटे स्तर पर दिए जानेवाले पुरस्कार सार्थक लगते हैं। हालांकि हिंदी में आज ऐसे पुरस्कारों की संख्या सैकड़ों में है। खुशी की बात यह है कि ये सब के सब लगभग निर्विवाद रूप से कवियों को दिए जाते हैं। कविता की और कोई सार्थकता तो रह नहीं गई है। चलिए इस बहाने ही एकाध जगह तस्वीर निकल जाती है। यह उनकी जिंदगी संवारने के लिए काफी है। देखना यह है कि इस तरह से बांस लगाकर कविता के बिजूके को कितने दिनों तक और खड़ा रखा जा सकता है।

मुझे तकलीफ है कि आज नक्सलवाद को दूसरी आतंकवादी गतिविधियों के साथ रखकर कानून और व्यवस्था के कठघरे में डाल दिया गया है। अरुंधती राय ने इस कार्रवाई के बारे में ठीक ही कहा था कि दुनिया की लगभग सबसे बड़ी फौजी ताकत को नंगे-भूखे किसानों और आदिवासियों के खिलाफ कर दिया गया है। कोई विश्वास करेगा कि अपने ही देश में जरूरतमंद किसानों और आदिवासियों को सिर्फ इसलिए फौजों और हेलिकाप्टरों से भूना जा रहा है क्योंकि वे अपने जल, जंगल और जीमन की लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार उनकी जगह बड़ी-बड़ी कारपोरेट घरानों को दे रही है और करोड़ों के घूस और घपले खुलेआम संपन्न किए जा रहे हैं। मुझे किसी भी भाषा का कोई भी चिंतक, विचारक या साहित्यकार नहीं मिला जो इन सरकारी धांधलियों का पक्ष लेता हो। सबकी सहानुभूति नक्सलियों के साथ है मगर सत्ता की अंधी सरकारें उन्हें सिर्फ यही जुमला पकड़ा सकती हैं कि यदि उन्हें रोटी नहीं मिलती तो ब्रेड क्यों नहीं खाते?

इक्कीसवीं शताब्दी भारत के लिए भविष्य रहित और स्वप्नहीनता की शताब्दी है। आज ऐसा कोई सपना हमारे युवावर्ग के पास नहीं है जिसके लिए वह लड़ सके। सिर्फ छोटे-छोटे संस्थानों में नौकरियां पाने, विदेश यात्राएं करने या झटके से धन कमा लेने के सपने ही उनका भविष्य बनाते हैं। यह एक ऐसा मानसिक दबाव है जिसके कारण लोग ज्योतिषियों, नजूमियों, मौलवियों, भगवानों और अपराधी सरगनाओं की शरण में जा रहे हैं। आज का अखबार खेलिए! उसमें बैंक और दूसरों को लूटने की कम से कम दस घटनाएं आपके सामन होंगी। यहां आजकल दस-बीस लाख रुपये एक झटके में या एकआध हत्या करके लूट लिए जाते हैं।

रोजमर्रा की जरूरत के सामान के दाम मध्यवर्ग की पहुंच से बाहर हो गए हैं। सौ रुपये की एक किलो दाल और पचास रुपए का आटा खरीदकर कोई कितने दिन तक अपना घर चला सकता है। इन स्थितियों में लूटमार नहीं होगा तो क्या होगा। सरकारी आंकड़े और आष्वासन बाजीगरों के चमत्कार जैसे लगते हैं। अगर उदाहरण ही देना हो तो मैं ‘स्लमडाग मिलेनियर’ फिल्म का नाम देना चाहूंगा, जिसमें झोपड़पट्टी के अनगिनत भूखे-नंगे, दौड़ते-भागते बच्चों के साथ करोड़पति बनाने का खेल खेला गया है और झूठे-सच्चे जवाबों पर करोड़ों रुपये का इनाम दे दिया गया है। यह अपराध और सपने- दोनों को बेचने की कवायद है। यही हमारे आज के युवावर्ग का वर्तमान है।

साहित्य में भी आप देखेंगे कि भविष्य के सपने लगभग गायब हो गए हैं। कहानियां और उपन्यास सिर्फ तात्कालिक जातिवादी संघर्षों, जिंदगी से जूझते, घुटते हुए लोगों की तस्वीरों से भरी है। मुझे यह सारा परिदृष्य एक खौलते हुए तालाब की याद दिलाता है। हमेषा लगता है कि जैसे अभी कोई विस्फोट होगा और सारी चीजें बदल जाएंगी, मगर होगा कुछ भी नहीं। हम इसी तरह सरकार और माफियाओं के सत्ताचारों के बीच पिसते रहेंगे।

बहरहाल, कहा तो जाता है कि जो समाज के लिए सबसे बडे़ संकट के दिन होते हैं वह साहित्य के लिए सबसे उर्वर सामग्री पेश करते हैं। जब सारा समाज स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था तब एक से एक जबरदस्त रचनाएं सामने आई थीं। आज जब सबके सब जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं तब निश्चय ही ऐसा कुछ सामने आएगा जो इन सबको भविष्य के लिए एक दस्तावेजी चित्रावली नई पीढ़ी के हाथ में सौंपेगा। हो सकता है मेरा यह सोचना एक झूठी आशा हो, मगर इनमें कम से कम एक आशा तो है।
(२६ दिसंबर, 2009, दैनिक भास्कर, नई दिल्ली अंक में प्रकाशित)

सबसे बड़ी समस्या असमानता है / नवारुण भट्टाचार्य

आजकल मैं इस बात को लेकर बहुत परेशान हूँ कि आज हमारे पार्लियामेंट में पांच सौ पैंतालीस सांसदों में करीब तीन सौ करोड़पति हैं। हमारे देश की राजनीति में यह एक खतरनाक ट्रेंड है। ये जनता के बारे में क्या सोचेंगे? आम आदमी की आवाज सुननेवाला अब कहां है। मैं समझता हूं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या असमानता है। दिन ब दिन यह असमानता बढ़ती जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों में बढ़ती हिंसा की वजह भी यही है। लालगढ़ में क्या हुआ? आजादी के इतने साल बाद भी वहां विकास नहीं हुआ। न शिक्षा, न स्वास्थ्य। सरकार को इसके बारे में सोचना होगा। सिर्फ पुलिस या सेना भेजकर वह हालात पर काबू नहीं पा सकती। बल्कि इससे जनता में और प्रतिरोध बढ़ेगा। सरकार जनता को कसूरवार ठहराना बंद करे। पष्चिम बंगाल में सीपीएम की आज जो दशा हुई है वह उसकी एंटी पीपुल नीतियों की वजह से ही हुई है। उसने इंडस्ट्रीयलाइजेशन को जबरन जनता पर थोपा है। आगे तो सीपीएम को और भी सेटबैक लगनेवाला है, यदि कोई मिरैक्कल ;चमत्कारद्ध नहीं हुआ तो।

नक्सलवाद की समस्या को ही देखिये! यह सच है कि नक्सलियों में बहुत से ग्रुप हैं। सभी ग्रुप माआवादी नहीं हैं। मेरा खयाल है कि सरकार का नक्सलियों के साथ डायलाग करना बहुत जरूरी है। माओवादियों से भी डायलाग करना चाहिए। पुलिस और सेना की दमन की कोशिशें बेकार साबित होंगी। सरकार बार-बार नक्सलियों को हथियार सरेंडर कऱने कह रही है। यह प्रस्ताव ठीक नहीं है। मगर सीसफायर हो सकता है। सीसफायर करके सरकार बातचीत कर सकती है। अभी माओवादियों के पास जितना हथियार है उससे दस गुणा हथियार पुलिस और सैनिक बलों के पास है। यह नक्सलवाद की समस्या का सोल्यूशन नहीं है, न यह निगोसियेषन की लैंग्वेज है। सरकार चाहे तो सीसफायर अभी हो सकता है। सरकार माओवादियों के साथ मीडिया के थ्रू नहीं बल्कि सीधे बातचीत करे। इस बातचीत में तीसरे पक्ष यानी सिविल सोसायटी की बात को भी सुनना होगा।

सरकार जिस तरह नक्सलवाद का दमन कर रही है उससे देश के वामपंथी बुद्धिजीवी आतंकित महसूस कर रहे हैं। यह माओवादियों ने नहीं बल्कि सरकार ने किया है। लेकिन इससे हमलोग नहीं डरेंगे। एक बहुत बड़ा तबका हमारे साथ है। महाश्वेता देवी, अरुंधति राय सरीखी शख्सियत हैं। आनेवाले समय में सरकार पर और प्रेशर बढ़ेगा क्योंकि यह रीयल आवाज है। सिविल सोसायटी की आवाज है। सरकार को इनकी आवाज सुनना चाहिए। उसको यह सोचना चाहिए कि जो लोग इस मसले को उठा रहे हैं वे सभी सोसायटी में सम्मानित हैं और उन्हें कोई लोभ नहीं है।

दरअसल असमानता अपर क्लास को इंस्टीट्यूशनालाइजेशन करती है, मिडिल क्लास को ग्लैमराइज करती है और गरीब को ब्रूटाइस करती है। इसलिए फ्यूचर मुझे बहुत डार्क दिख रहा है। ऐसे विकट समय में लेखक को जनता के साथ रहना चाहिए। उसे करोड़पतियों के साथ नहीं रहना चाहिए। साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों को सरकार प्राइवेटाइज कर रही है। यह बहुत निंदनीय है। सभी जगह प्राइवेटाइजेशन नहीं होता। प्रेम में प्राइवेताइजेशन नहीं होगा। सरकार की यह करतूत बहुत अफसोसनाक है और एक खतरनाक संकेत भी है। रेड सिग्नल है। हमारी सरकार यह सब करेगी, यह मैं सोच भी नहीं सकता। ऐसा पहले बंगलादेश में होता था। वहां लेखकों को फिलिप्स अवार्ड दिया जाता था। सैमसंग कंपनी रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर अवार्ड देगी तो इससे उनका इंसल्ट होगा। यह अधिकार उनको किसने दिया। सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर यह किया जा रहा है। सरकार सैन्य खर्च बढ़ा रही है। कामन वेल्थ गेम्स पर अंधाधुंध खर्च कर रही है। लेकिन वहां खेलेगा कौन? कितना मेडल हमें मिलेगा? यह बहुत शर्म की बात है। यह जो कुछ हो रहा है एक कल्चरल वर्कर होने के कारण मुझे बहुत शर्म और दुख हो रहा है।

लेखकों को इस मामले में अहम रोल निभाना होगा। उन्हें प्रोटेस्ट कभी नहीं छोड़ना चाहिए। लेखन और लेखन के बाहर दोनों जगह प्रतिरोध होना चाहिए। हमलोग कभी इसको स्वीकार नहीं करेंगे। यह सीधी बात है।

राजकमल चैधरी को मैं बहुत बड़ा लेखक मानता हूं लेकिन उनको वो सम्मान नहीं मिला। वे बहुत पावरफुल रायटर हैं। उन पर अश्लीलता का आरोप लगाया गया। अश्लीलता सोसायटी पैदा करती है। यदि सोसायटी अश्लील होगा तो लेखक क्या करेगा? अष्लीलता एक सोशल प्रोड्यूस है। लेखक जब उसको देखता है तभी तो उसके बारे में लिखता है।
आज मुझे इस बात का डर है कि हमारी सोसायटी का अमेरिकीकरण हो रहा है। सिर्फ मलेटरी पावर, बिजनेस या ट्रेड का टर्नओवर बढ़ने से कोई कंट्री सुपर पावर नहीं हो सकता। कल्चरल पावर भी होना चाहिए क्योंकि यह महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस का भी दश है। जो कुछ बाहर चल रहा है उसका प्रभाव सोसायटी पर पड़ेगा ही लेकिन इसका विरोध करना लेखक का धर्म है। अफसोस इस बात का है कि आज मध्यवर्ग के कुछ लेखक भी बाजारवादी हो गए है। आनेवाले समय में यह और भी बढ़ेगा क्योंकि लेखन एक कमोडिटी बनता जा रहा है। जब कोई चीज कमोडिटी बन जाती है तो उसे अच्छा पैकेजिंग चाहिए। लेखक का एक अलग तरह का जीवन दर्षन होता है। सच्चे लेखक का जीवन, उसका दर्शन और उसका विचार समाज से बंधा हुआ है। यह कमोडिटी सेल नहीं है।

ऐसे हालात में जेनुइन रायटर की सांस बंद हो जाएगी। दिल्ली में पावर है, मनी है। यहां रहते हुए भी उदयप्रकाश यदि खुद को विक्टिम महसूस कर रहे हैं वे ट्रू लेखक हैं। यह आज के समय की असलीयत है। ऐसे समय में कुछ लोगों को विक्टिमाइज किसा जाएगा क्योंकि यहां लेखकों का एक तबका प्रो स्टेबलिशमेंट, प्रो सत्ता-प्रतिष्ठान है। लेकिन सच्चे लेखक का सबसे बड़ा प्रोटेक्षन होता है उसका रीडर और जनता को ऐसे लेखकों का सम्मान करना चाहिए। थर्ड वर्ल्ड में लेखक का व्यक्तिगत जीवन भी थर्ड वर्ल्ड की तरह होना चाहिए क्योंकि यह अमेरिका नहीं है, यूरोप नहीं है।

बोलियों के साहित्य का सरोकार / मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

आज अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पर निर्भर देश के अंदर बढ़ रहे आक्रामक पूंजीवाद की पृष्ठभूमि में बाजार समर्थक लेखकों की उपस्थिति चिंताजनक है। इसी  आक्रामक पूंजीवाद के दौर में एक तरह का आक्रामक व्यक्तिवाद भी विकसित हो रहा है। हमारे यहां के मध्यवर्ग में उस विकृत चेतना का देखदेखी में विकास हो रहा है। यह वर्ग अपने लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएं जुटाना अब गुनाह नहीं मानता। निजी स्वार्थलिप्सा में डूबे हुए कुछ लेखक भी इस क्रम में दिखाई पड़ जाते हैं। ऐसे लेखक पद और पुरस्कारों के लिए सत्ता के गलियारे में चक्कर मारते हैं और विभिन्न अकादमियों के अध्यक्ष और सचिवों की चापलूसी करने में वे संकोच नहीं करते। ऐसे लेखकों के सामने रखकर अगर आज के साहित्यिक परिदृष्य को रखकर निष्कर्ष निकाला जाए तो वह एकांगी होगा।

दरअसल साहित्य का सृजन और साहित्य की जनता तक पहुँच एक व्यापक परिदृश्य में देखने के लिए आमंत्रित करती है। विभिन्न क्षेत्रों में खड़ी बोली हिंदी के हजारों की तादाद में ऐसे रचनाकार हैं जिनकी रचनाएं भले किताब के रूप में नहीं छपती हैं और न पत्र-पत्रिकाओं में आती हैं लेकिन ये विभिन्न अंचलों में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों में काव्य-पाठ, गीतों के गायन, कहानी-पाठ या नाटकीय ढंग से कोई वार्तालाप सुनाने की एक नई कला विधा के दारा अपनी रचनात्मकता और जन सरोकार प्रदर्षित करते हैं।

यहां एक-दूसरे प्रकार के साहित्य का उल्लेख भी जरूरी है। विभिन्न बोलियों के लेखक मैथिली, मगही, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, कन्नौजी, हरियाणवी आदि बोलियों में रचना कर रहे हैं। इनका साहित्य बहुत ज्यादा छपता नहीं लेकिन जनता के बीच में इन्हें लोकप्रिय रचनाकार का सम्मान हासिल है। ऐसे रचनाकारों में ग्रामीण जन-जीवन का हर पहलू अपनी तमाम तरह की धड़कनों के साथ मौजूद है। यहां तक की स्थानीय स्तर की राजनीति के नायक और खलनायक इनकी रचनाओं में बदलते रहे हैं और बोलियों के इन रचनाकारों से हिंदी-उर्दू क्षेत्र की राजनीति की गहमागहमी और जनता के रोष का पता भी इनकी रचनाओं से चलता है।

समकालीन हिंदी-उर्दू साहित्य की मुख्यधारा में अनेक प्रकार के रचनाकार हैं। चरण सिंह पथिक, विद्यासागर नौटियाल, दूधनाथ सिंह जैसे लेखक हिंदी-उर्दू क्षेत्र के आंचलिक परिदृश्य और ग्रामीण जीवन के मूलभूत विरोध को पूरी तीक्ष्णता और कलात्मकता के साथ प्रदर्शित कर रहे हैं। मध्यवर्ग के ऐसे भी रचनाकार हैं जो व्यक्तिगत दुख के माध्यम से समाज के दुख को देखते हैं और परिवर्तन की बेचैनी का इजहार करते हैं। इन रचनाकारों में जो लोग पूंजीवादी सांस्कृतिक बाजार में लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं उनकी रचनाषीलता के अनेक ध्रुव हैं। इनके सभी ध्रुवों पर व्यवस्था के प्रति असहमति और विषाद की छाया मौजूद है। तीसरे प्रकार के वे रचनाकार हैं जो सपाटबयानी के दारा या वाचालता के आरा जनता के हुंकार और दुख दर्द को प्रकट करते रहते है। चैथे प्रकार के रचनाकार हैं जो कहानियों में और उपन्यासों में खासतौर पर उन साममाजिक घटनाओं का दिग्दर्षन कराते हैं, जिनके गहरे अभिप्राय उन कृतियों के पाठ के बाद ही पकड़ में आ पाते हैं। इधर युवा रचनाकारों की बाढ़ आई है। अधिकतर युवा रचनाकार नए तरह की रचनाएं कर रहे हैं जिनमें समाज के प्रति गहरा सरोकार मौजूद है।

आज का हिंदी लेखन बहुआयामी है और उसकी अनेक अंतर्धाराएं हैं। इन रचनाओं का सारतत्व कोई एक दृष्टि से समाहारमूलक नहीं बताया जा सकता। बोलियों के साहित्य को साहित्य न मानकर जो भी आलोचनात्मक चर्चा होती है वह वह कुलीन मनोविरोध मात्र है। यह इसलिए हुआ कि मुद्रण यंत्र के आने के बाद पिछले दो सौ सालों में खड़ी बोली का जो साहित्य आया उससं भिन्न वाचिक साहित्य परंपरा की मानो हम कल्पना ही नहीं करते। हालांकि वाचिक परंपरा के लोग हर अंचल में अपनी रचना अपने ढंग से करते हैं और छोटी-छोटी गोष्ठियों, पारिवारिक आयोजनों, त्योहार-उत्सवों, किसी के स्मृति दिवस, 15 अगस्त या 26 जनवरी के मौके पर ये अपनी रचनाएं सुनाते हैं।

इन बोलियों में जो परंपरा शामिल है उसमें जनजीवन की उष्मा के कारण उसमें जिस सृजनशील लेखक का संबंध है उसकी सृजनात्मकता में कई नई रचनाओं का उत्कर्ष दिखाई देता है और जिन लोगों का संबंध बोलियों से दूर हो गया है, जो शहरी हो गए हैं, मध्यवर्गीय कुलीन बनना चाहते हैं उनकी रचना बाजार भाषा में लिखी जा रही है। बेशक ऐसी रचनाओं का संबंध जनता से टूट चुका है। जहां तक कवि सम्मेलनों, मुशायरों के व्यापक स्तर पर आयोजनों की बात है उसमें निष्चय ही फूहड़ और विदूषक किस्म की रचनाओं का बाहुल्य है। इस दिशा में वैकल्पिक कवि गोष्ठियों के आयोजन के प्रयास भी जगह-जगह हो रहे हैं।

इन आयोजनों में एक सुसंबद्ध रूप नहीं धारण किया, लेकिन कभी स्वाधीनता आंदोलन की याद में या क्षेत्रीय स्तर के किसी बड़े रचनाकार की याद में स्थानीय स्तर के आयोजनों में भी जनता की बड़ी उपस्थिति यह बताती है कि आम जनता का साहित्य से संबंध नहीं कटा है। उदाहरण के लिए दिनकर के गांव में जो आयोजन होते हैं, निराला के इलाके में जो अयोजन होते हैं, माखनलाल चतर्वेदी की स्मृति में, मजरूह सुल्तानपुरी, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, साहिर लुधियानवी आदि से जुड़े आयोजन में जनता की भागीदारी देखी जा सकती है और इन आयोजनों के कार्यक्रमों में जिस तरह का व्याख्यान होता है उसका स्तर उन्नत किस्म का होता है।

अभी दिनकर जी के गांव सिमरिया गया था, उनकी सौवीं वर्षगाँठ के अवसर पर। पूरे दिन के कार्यक्रम में बारह-तेरह सौ लोग शरीक हुए थे जिनमें युवा और ग्रामीणों की समान भागीदारी थी। वहां स्थानीय स्तर के अनेक रचनाकारों ने अपनी कविताओं के पाठ किए। उन रचनाओं का स्तर मुख्यधारा के रचनाकारों से कमतर नहीं कहा जा सकता। ऐसे ही र्काएक्रम 1857 के कार्यक्रमों में झांसी में हुए थे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिंदी पट्टी की बोलियों में रचा जा रहा साहित्य आज भी आम जनता के सरोकारों से जुड़ा हुआ है, उसमें मिट्टी की महक भी है और प्रतिरोध की धार भी।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009


दोस्तो, बशीरबद्र साहब ने कभी फरमाया था -

"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिजाज़ का शहर है ज़रा फासले से मिला करो।"

इधर हमारे बड़े भाई निदा फाजली साहब फरमा रहे हैं -

"बात कम कीजे जहानत को छुपाते रहिये

ये नया शहर है कुछ दोस्त बनाते रहिये।"

"
दुश्मन लाख सही ख़त्म कीजे रिश्ता
दिल मिले या मिले हाथ मिलाते रहिये।"

"
कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन
बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है।"

"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना।"

"घर को खोजे रात-दिन घर से निकला पाँव
वह रास्ता ही खो दिया जिस रस्ते था गाँव।"


सोमवार, 14 दिसंबर 2009

सोमवार, 30 नवंबर 2009

फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले में उदय प्रकाश

जर्मनी के सुप्रसिद्ध शहर फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले की वही खासियत है जो फ़िल्म के क्षेत्र में कान फ़िल्म महोत्सव का है। यूरोप में हर साल आयोजित होने वाले इस विश्व पुस्तक मेले के आयोजक पिछले कुछ सालों से एशियाई मुल्कों के लेखन और साहित्य को तवज्जो देने लगे हैं। इसके पीछे की वजह क्या वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में एशिया के दो सबसे बड़े मुल्कों- भारत और चीन के विश्व की प्रमुख आर्थिक ताकतों और बड़े बाज़ार के रूप में उभरना है या सचमुच एशियाई मुल्कों के साहित्यिक लेखन ने गुणवत्ता की वजह से पिछले वर्षों में दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित करने में सफल रहा है।

मालूम हो सन २००७ के फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले में भारत को गेस्ट आफ आनर बनाकर यहाँ के लेखन को ख़ास तवज्जो दी गई थी। इस साल १४ से १८ अक्टूबर तक आयोजित फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले में गेस्ट आफ आनर या कहें प्रमुख अतिथि भारत के पड़ोसी देश चीन को बनाया गया. चीन ने पिछली वर्षों में आर्थिक और तकनीकी क्षत्र में जो प्रगति की है उसकी झलक उनके पुस्तक प्रकाशन, मेले में लगे उनके बुक स्टाल और उनके सांस्कृतिक रंगारंग कार्यक्रमों में साफ़ तौर पर दिखी।

पुस्तक मेले में बहुत बड़ी संख्या में चीन से आए प्रकाशक मौजूद थे। लेकिन बकौल उदय प्रकाश "इस बार यह आयोजन विवादों के घेरे में आ गया। चीन में मानव अधिकारों के उल्लंघन तथा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर चीन में लगे प्रतिबंधों के चलते चीन से बाहर रह रहे प्रमुख चीनी लेखकों ने इस समारोह को चीन का सरकारी समारोह कहा। यूरोप के तमाम अखबार कई दिनों तक इसी विवाद से भरे रहे। खबर यह आई की अन्तरराष्ट्रीय पुस्तक मेले के नियोजकों द्वारा जो सूची चीन सरकार को भेजी गई थी उसे रद्द करते हुए चीन ने अपनी पसंद के लेखकों का प्रतिनिधिमंडल इस मेले में भागीदारी के लिए भेजा।

यह विवाद इतना बढ़ गया कि मेले में हिस्सा लेने आए चीनी लेखकों को रचना-पाठ कार्यक्रमों में भी विरोध और शोरशराबे का सामना करना पड़ा। इस मसले पर चीन से बाहर काम कर रहे चीनी प्रकाशकों ने भी अपना विरोध जताया। आखिरकार इस पूरे विवाद की गाज पुस्तक मेले के अफ्रीकी, एशियाई और लातीन अमेरिकी खंड के प्रभारी पीटर रिप्किन पर गिरी. उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पडा, जबकि उनका कहना था कि इस आयोजन में चीन से आए लेखकों का प्रतिनिधिमंडल उनके द्वारा भेजी गई सूची से भिन्न था।

खैर, भारत और पूरी दुनिया में फैले करोड़ों हिन्दी भाषाभाषियों के लिए गौरव की बात यह थी कि इस बार के फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले के आयोजकों ने प्रसिद्ध और लोकप्रिय लेखक उदय प्रकाश को ख़ासतौर पर इस मेले में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया था। पिछले साल यह सम्मान "आलो आंधारि" की सुप्रसिद्ध लेखिका बेबी हालदार को मिला था. मेले में जर्मन में अनूदित उनकी दो बहुचर्चित कहानियों "और अंत में प्रार्थना" और "पीली छतरी वाली लडकी" की किताबों के लोकार्पण हुए. उनके कुछ प्रमुख हिस्से के पाठ किए गए और उन पर संगोष्ठियाँ आयोजित की गईं. जर्मनी की प्रसिद्ध प्रकाशन संस्था द्रोपदी वरलाग प्रकाशन ने इन किताबों को छापा है.

सबसे अहम् घटना रही "डाक्टर वाकणकर : एक सच्चे हिन्दू की दास्तान" किताब को दुनिया की प्रमुख भाषाओं के विद्वानों वाले अंतरराष्ट्रीय निर्णायक मंडल द्वारा अफ्रीकी, एशियाई और लातीन अमेरिकी खंड का सन २००९ का सर्वश्रेठ और सर्वाधिक लोकप्रिय किताब का तीसरा पुरस्कार मिलना. मालूम हो की पहला पुरस्कार चीनी लेखक यू हुआ को आर दूसरा पुरस्कार अल्जीरियाई लेखक वाउवालेम संसाल को दिया गया. "दि व्हाइट टाइगर" के रचनाकार और बुकर पुरस्कार प्राप्त भारतीय मूल के प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक अरविन्द अडिगा की किताब को भे पुरस्कृत किया गया. उन्हें छठा पुरस्कार मिला. इस तरह फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले में अफ्रीकी, एशियाई और लातीन अमेरिकी खंड के कुल पुरस्कृत सात लेखकों में तीन चीनी, दो भारतीय, एक अल्जीरियाई और एक अर्जेंटाइन थे.

फ्रेंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले में हिन्दी लेखक उदय प्रकाश और उनकी जर्मन में अनूदित कृत्यों पर कुल तीन कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसमें एनी यूरोपीय देशों के अलावा भारतीय, बंगलादेशी, श्रीलंकाई और पाकिस्तानी मूल के श्रोताओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया. पहला कार्यक्रम था - "भूमंडलीकरण की प्रक्रिया तथा हिन्दी और भारतीय भाषाओं की समस्याएँ." इस कार्यक्रम में हाइडलबर्ग दक्षिण एशियाई संस्थान के निदेशक प्रोफ़ेसर हार्टा तथा सुप्रसिद्ध भारतविद प्रोफ़ेसर रोदरमंड दिएडमार ने उदय प्रकाश के साथ संवाद और विमर्श किया.

दूसरे कार्यक्रम में जर्मनी के एक सुप्रसिद्ध रंगकर्मी तथा वहां के मशहूर टीवी स्टार ने करीब एक घंटे तक जर्मन में अनूदित उदय प्रकाश की किताब "डाक्टर वाकणकर : एक सच्चे हिन्दू की दास्तान" के चुने हुए हिस्सों का नाटकीय पाठ किया. इस कार्यक्रम अ संचालन सुप्रसिद्ध जर्मन लेखिका कोरेलिया ज़ेत्ज्स्च ने किया. यह कार्यक्रम ने पुस्तक मेले में आए लोगों को खूब आकर्षित किया.

मेले के आख़िरी दिन १८ अक्टूबर को आयोजित तीसरा और आख़िरी कार्यक्रम था - "उदय प्रकाश से एक बहस." इसमें वैश्वीकरण के दौर में भारत जैसे देश की प्राथमिकताओं, आर्थिक सुधार की दिशाओं और शर्तों के बारे में खुलकर बातचीत हुई. इस कार्यक्रम में उदय प्रकाश ने स्पष्ट किया की अमेरिका की दो बड़ी कंपनियां और वहां की विट्टी संस्थाएं जिस तरह भारत को दुनिया की उभरती हुई आर्थिक ताकत के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं वह भारत सिर्फ पंद्रह से बीस प्रतिशत (२८५ मिलियन) मध्यवर्गीय और संपन्न भारतीयों का हिस्सा है, जो अज के दौर में उपभोक्ताओं का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार है. शेष लगभग ७५ से ८० प्रतिशत भारतीय की ज़िन्दगी आज भी जद्दोजहद के बीच गुजर रही है. सच यह है कि मलेरिया से मरनेवाला दुनिया का हर तीसरा आदमी भारतीय है. दुनिया में सबसे ज्यादा कोढियों की तादाद भारत में है. यहाँ का एक बड़ा तबका भर पेट भोजन, घर, दवाइयों, पीने के पानी, शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों से महरूम है.

बुधवार, 25 नवंबर 2009

जब सरकार हाथ खड़े कर दे!

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहे मुल्क की सरकार एक बेहद नाज़ुक, मानवीय और लोककल्याणकारी मसले पर भरी अदालत के सामने अपनी हाथ खड़ी कर दे। अभी हाल ही में केन्द्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने राजधानी दिल्ली में मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों की देखभाल करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। सरकार के नुमाइंदे ने अदालत में कहा कि सरकार ने मनोरोगियों की भलाई के लिए नीति ज़रूर बनाई है लेकिन वह उनकी देखभाल नहीं कर सकती, जबकि कोर्ट चाहता था कि सरकार राजधानी की सड़कों और गलियों में भटकते और बेइन्तहा जुर्मों के शिकार बनते ऐसे मनोरोगी पुरषों और महिलाओं के अभिभावक के रूप में काम करे।

मालूम हो कि दिल्ली की गलियों में मानसिक रूप से विक्षिप्त हालत में भटकती पूर्व मॉडल गीतांजलि की पीड़ा को मीडिया द्वारा उजागर करने के बाद कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए इस राष्ट्रीय समस्या के बारे में सरकार से जवाब तलब किया था. चीफ जस्टिस एपी शाह तथा एस मुरलीधर की बेंच द्वारा गठित समिति ने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी में मानसिक रूप से विक्षिप्त करीब तेरह सौ गरीब महिलाएं हैं।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली सरकार ने राजधानी के करीब दस हज़ार भिखारियों को दिल्ली छोड़कर अपने-अपने राज्य चले जाने का तुगलकी फरमान सुनाया है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनतांत्रिक तरीके से चुनकर आई सरकारों की ये हरकतें वाकई अचंभित करने वाली हैं।

मालूम हो, जून२००२ में भी देश में मनोरोगियों की अफसोसनाक हालात से परेशान सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह हर राज्य में मानसिक उपचार केन्द्र स्थापित करे। अपना यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए न्यायालय की तीन सदस्य खंडपीठ ने उस वक्त मुल्क के सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को भी यह निर्देश दिया था कि वे अपने-अपने राज्य में राज्य में मानसिक रोगियों के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं पर अपनी रिपोर्ट डेढ़ महीने के अन्दर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को सौंपें।

हमें भूलना नहीं चाहिए कि वह न्यायिक सक्रियता का दौर था. उस वक्त सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्देश की काफी तारीफ़ हुई थी, सिर्फ इसलिए नईं कि उनके इस निर्देश में दया और करुना के पात्र समाज के हाशिए पर के सबसे नीचे के इंसानी समूह (मानसिक रोगियों) की सुध ली गई थी बल्कि उसके निर्देश का एक ऐतिहासिक और संवैधानिक महत्व था कि राज्य सरकार यदि नागरिक सेवाओं के मामले में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहे तो केंद्र की यह ज़िम्मेदारी है कि वह राज्य का मामला कहकर उसे छोड़ दे बल्कि आगे बढ़कर नागरिक सेवाओं में हाथ बंटाए

मालूम हो कि सन २००१ में अगस्त महीने में तमिलनाडु में इरावदी दरगाह के करीब बातूशा मनोआश्रम में आग लगने की वजह से जंजीर से बंधकर रखे करीब पच्चीस मनोरोगियों की दर्दनाक मौत के बाद मुल्क के सरकारी और मानसिक अस्पतालों, आश्रमों, उपचार केन्द्रों तथा इलाज से महरूम सड़कों पर भटक रहे मनोरोगियों की दुर्दशा और उनके समुचित इलाज को लेकर मीडिया और स्वयं सेवी संगठनों द्वारा व्यापक स्टार पर बहस और मुहिम चलाई गई थी

दरसल न्यायपालिका वक्त-वक्त पर मनोरोगियों की सुध लेती है और व्यापक जनहित को मद्देनज़र रखते हुए सरकार को उनके इलाज और उनकी देखभाल करने के लिए निर्देश देती हैलेकिन अफ़सोस कि नायालय की दखल के बाद भी कुछ दिनों के बाद मामला फिर वही ढाक के तीन पात बनकर रह जाता हैयानी सरकारें खुल्लमखुल्ला न्यायपालिका के आदेशों-निर्देशों की अवमानना करती रहती हैं

मुल्क में मोरोगियों की बद से बदतर हालाका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु में घटी भयावह घटना के दौरान मुल्क के करीब तीन हज़ार बिस्तरों की क्षमता वाले कुल सैंतीस मनोअस्पतालों में लगभग पंद्रह हज़ार मनरोगी भर्ती थेआज आठ साल बाद हालात उससे बदतर हैं। मानसिक अस्पताल की चौखट तक पहुँच पाने वाले हज़ारों मानसिक रोगियों का मामला इसके बाहर है

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकारी और निजी अस्पतालों में केंद्रीय मनोस्वास्थ्य अथारटी (सी.एम.एच.आर.) के दिशानिर्देशों का तो पालन होता है और केंद्र सरकार की तरफ से इन पर निगरानी करने की कोई व्यवस्था ही की गई है. केंद्र सरकार दिशानिर्देश भेजकर जहां अपनी ड्यूटी पूरी कर लेती है वहीं इन पर अमल करने की पूरी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल देती है। सरकारों की इस बेरुखी का खामियाजा बेचारे मनोरोगियों को भुगतना पड़ता है। मानसिक अस्पतालों, मनोआश्रमों, एवं उपचार केन्द्रों में उनके साथ गैर इंसानी सलूक किए जाते हैं। वहाँ कभी उनके हाथ-पैर बांधकर रखा जाता है तो कभी हथकड़ी लगाई जाती है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में की सरकार और उनके विभागीय मुलाजिमों से कोई पूछे कि सत्ता के केंद्र राजधानी में
फ्लायओवेरों के नीचे, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों के बाहर, मेट्रो के खम्भों के नीचे, सब वे में, सड़क किनारे की झाड़ियों में, टूटी-फूटी, सुनसान इमारतों के किसी कोने में या गली-मोहल्लों में अक्सर नंग-धड़ंग हालत में भटकते मनोरोगियों को अस्पताल पहुंचाने और इनके इलाज और देखभाल करने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है? एक सभ्य समाज का इससे बड़ा गुनाह और क्या होगा?

जिस समाज में गरीब बच्चों, लाचार बुजुर्गों, फटेहाल पागलों, भिखारियों और ऐसे ही समाज के हाशिये पर के लोगों के दुःख-दर्द को सुनने वाला जब कोई न हो तो वह समाज कैसे दुनिया का एक विकसित समाज और विकसित मुल्क बनने का ख़्वाब देख सकता है? 'विकसित मुल्क' चाँद पर रखा कोई तमगा नहीं जिसे चंद्रयान पर उड़कर ले आया जाए जब तक बुनियादी इंसानी ज़रूरतें
समाज के कमज़ोर से कमज़ोर तबके तक नहीं पहुंचेंगी और उनके चेहरे पर मुस्कराहट नहीं आएगी तब तक ऐसा कोई ख़्वाब देखना बेकार है।
(अप्रकाशित)

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

लेखक की सक्रियता और बेचैनी

पागल भिखारी और बिसलेरी की बोतल

हर पागल भिखारी के पास होती है एक गठरी
उसमें होते हैं -
कुछ गंदे, फटे-पुराने कपड़े
सूखे बासी बैंगन
आलू
माचिस की खाली डिब्बियां और
बिसलेरी, अक्वागार्ड या किनले की कुछ खाली बोतलें।

पानी पीकर फेंकी बोतलें
बीच सड़क पर पड़ी देख
लपक कर उठा लेता है पागल भिखारी
और लगा लेता है अपने सीने से
ताकि रौंद दे उसे पीछे से रही कोई कार
अपने पहियों के नीचे।

बीच सड़क पर पड़ी बोतलें पहले रोती हैं
अपने इस हाल पे जार-जार
फ़िर सोचती हैं - अपनी आंखों के आंसू पोछ
कितना है सुकून इस पागल भिखारी के पास
इतना नहीं देती थी हमें कार
बहुराष्ट्रीय पानी बेचनेवाली कंपनियों का सरदार।

ग़लत थीं हम
नहीं पहचान पाईं उन्हें
मतलबी थे वे
सिर्फ़ पानी से था उन्हें सरोकार
इसीलिए फेंक दिया जब उन्होंने हमें कार के पार
पीछे से रही थी एक कार
नहीं होता यदि यह यह तैयार
बीच सड़क पर पड़ी होती हमारी लाश
बार-बार रौंदी जातीं हम उन्हीं कारों के पहियों के नीचे
जिनमें बैठे लोगों की बुझाती हैं हम प्यास।

माफ़ करना हमारे दोस्त!
भले खाली हैं हम लेकिन हैं आज से तुम्हारे साथ
मिलकर हम खोलेंगे उनकी पोल
मतलबी कारवालों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बजाएंगे ढोल।
(अप्रकाशित)

सोमवार, 23 नवंबर 2009

दिल्ली से एक शाही सवारी की विदाई

"हाथों में चाबुक होठों पे गालियाँ बड़ी नाख्रेवालियाँ होती हैं तांगेवालियाँ। कोई तांगेवाली जब रूठ जाती है तो और भी हसीं हो जाती है....." - फर्राटे से ताँगे पर भागती उस दौर की बेहद खूबसूरत अभिनेत्री हेमा मालिनी और धर्मेन्द्र पर फिल्माया गया "शोले" फ़िल्म का ये गाना १९८०-९० के दशक में खूब हिट हुआ था।

कभी राजों-महराजों की शानो-शौकत का प्रतीक था तांगा। वक्त के साथ हर ख़ासोआम की पसंदीदा सवारी बन गया तांगा। इसी का एक रूप था बग्घी। तब तक कारें नहीं आई थीं हमारे देश में या आई भी थीं तो गिनी-चुनी तादाद में। गाँव की पगडंडियों से लेकर कस्बों, छोटे-बड़े शहरों यहाँ तक कि दिल्ली, कलकत्ता के रईस से रईस इलाकों में हर ख़ासोआम की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन गए थे ताँगे और बग्घी। बहुत दिनों तक इंसानों के एक जगह से दूसरी जगह जाने का के अहम् जरिया था तांगा। व्यापार, कारोबार और माल ढुलाई के लिए बैलगाड़ी तो थी ही, ताँगे और बग्घियों का भी खूब इस्तेमाल होता था।

और तो और अरावली की पहाड़ियों पर लुटियन क्षेत्र में भी घुमते थे ताँगे और बग्घियों के पहिये। दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र की शान के प्रतीक राष्ट्रपति भवन के लंबे-चौड़े आहाते में मेहमाननवाजी के काम भी आते थे ताँगे और बग्घी। विदेशी मेहमान इस शाही सवारी का लुत्फ़ उठाकर बड़ा फख्र महसूस करते थे।

यहाँ के टांगों, बग्घियों और बैलगाड़ियों पर बैठकर खिंचवाई न जाने कितनी तस्वीरें दुनिया की अनगिनत शख्सियतों के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ा रही होगी। लेकिन दिल्ली सरकार की एक इकाई एमसीडी यानी म्यूनिसिपल कारपोरेशन आफ डेल्ही के अभी हाल में जारी एक तुगलकी आदेश के बाद महज़ पुरानी दिल्ली तक सिमटकर रह गई यह रोमांचक सवारी अब ग़ायब हो जायेंगी।

(२४ नवंबर २००९ के दैनिक भास्कर, दिल्ली में प्रकाशित)


बेबाक लिखने की सज़ा !

मंटो साहब को गुज़रे आज करीब चैअन साल हो चुके हैं।कितने टोबाटेक सिंह, ‘काली सलवार, ‘खोल दो, ‘बूसरीखी कहानियों के इस लेखक पर आज बड़े-बड़े लेखक, आलोचक, इतिहासकार, समाजवैज्ञानिक कभी रस्क, कभी फख्र तो कभी तारीफ़ करते हैं। लेकिन आज जब मैं मंटो की शख्सियत को समझने की कोशिश कर रहा हूँ तो मुझे लगता है कि मंटो महज़ एक लेखक या एक शख्सियत ही नहीं बल्कि एक मानसिकता है। एक ऐसी मानसिकता जो नाफा-नुकसान की चिंता किए बगैर जो मन की बात बड़ी बेबाकी से लिखने की कूव्वत रखता है। किसी से डरता नहीं, अपने हालात से भी नहीं, चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो। अपने दौर की बड़ी से बड़ी शख्सियतों की गिरेबां पकड़ने में भी उसे कोई झिझक नहीं होती। इसीलिए ऐसे लेखक के खिलाफ सब एकजुट हो जाते हैं। कोई इसे 'बेवकूफ़' कहता है तो कोई 'बदतमीज़', 'बददिमाग' या 'बदमिजाज'। 'पागल' कहने वाली भी कम नहीं होते हैं। वे सचमुच इसे पागल कर देना चाहते हैं ताकि न रहे बांस न बजे बांसुरी।
मंटो के साथ भी ज़माने वालों ने कुछ ऐसा ही बर्ताव किया थासन् 1955 में जब मंटो साहब का इंतकाल हुआ तो उनकी मौत की ख़बर पाकिस्तान ही नहीं पूरे भारतीय उप-महाद्वीप की लेखकीय बिरादरी के लिए एक बड़ा सदमा था। इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी लेखकीय महानता तो थी ही, कम उम्र में इस जहान से उनका रुख़सत होना भी था। उनके इंतकाल के बाद उस चर्चित नृत्यांगना सितारा देवी को किसी ने मंटो साहब के इंतकाल की ख़बर दी। पता है, उस ख़बर पर उनकी क्या प्रतिक्रिया थी? सितारा देवी ने अपना मुंह बिगाड़कर कहा, ‘‘बड़ा ही बदतमीज़ और बेवकूफ़ आदमी था। मेरा चैन हराम कर दिया था उसने।’’ जी हां, उर्दू के बहुचर्चित कथाकार सआदत हसन मंटो साहब की मौत पर सितारा देवी की श्रद्धांजलि के थे ये शब्द।

अब लगे हाथों यह भी जान लीजिये कि मंटो साहब से आखि़र क्यों इतनी नाराज़ थीं सितारा देवी। मंटो साहब ने उनका क्या बिगाड़ा था। सितारा देवी उनसे क्यों इतनी खफ़ा थीं कि मंटो साहब की मौत की ख़बर सुनकर भी उनका गुस्सा ठंडा नहीं पड़ा। दरअसल, उनकी लेखनी के मुरीद पाठक जानते हैं कि उन्होंने नर्गिस दत्त, नसीम बानो, अशोक कुमार, कुलदीप कौर, इस्मत चुगताई जैसी हस्तियों पर कई संस्मरण लिखे हैं जो राजकमल पेपरबैक्स से प्रकाशित उनकीमीनाबाज़ारकिताब में संकलित हैं। लेकिन सितारा देवी के बारे में मंटो साहब को जब भी लिखने का मौक़ा मिलता तो वे चटखारे लेकर लिखते थे। उस पर उन्होंने कई संस्मरण लिखे हैं।
ऐसे ही एक संस्मरण में सितारा देवी के बारे में उन्होंने लिखा है, ‘‘सितारा देवी अकेली थी, यानी वह किसी एक की होकर नहीं रहती थी। ... सितारा वास्तव में है ही एक अज़ीब औरत। ऐसी औरतें लाख में दो-तीन ही होती हैं। .... वह नारी नहीं, कई नारियां हैं। उसने इतने अधिक प्रेम और शारीरिक संबंध किये हैं कि मैं इस संक्षिप्त लेख में उन सबका उल्लेख नहीं कर सकता। सितारा देवी की जब मैं कल्पना करता हूं तो वह मुझे बंबई की एक ऐसी पांचमंजिला इमारत लगती हैं जिसमें कई फ्लोर और कमरे हैं। और यह एक हकीकत है कि वह एक वक्त में कई-कई मर्द अपने दिल में बसाए रखती हैं।’’

मंटो साहब को पता था कि सितारा देवी उनसे बेहद खफ़ा हैं लेकिन मंटो साहब को इसकी परवाह नहीं थी, उन्होंने खुद ऐसा लिखा है. यह मसला अपवाद नहीं था. दरअसल मंटो साहब की बेबाकबयानी की वजह से लोग उनसे नारज रहते थे, यहाँ तक कि उनके दोस्त-यार लेखक भी मालूम हो, अली सरदार जाफ़री, फैज़ अहमद फैज़, अहमद नसीम कासमी, कृश्नचंदर, ख्वाजा अहमद अब्बास, मजाज़, शाहिद लतीफ, राजेंदर सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, अशोक कुमार सरीखी शख्सियतें उन्हें अपना दोस्त कहते हुए फख्र करती थीं। इन सबका साथ-साथ उठना-बैठना होता था। वैसे तो कहते हैं कि ये सब मंटो साहब का बड़ा ख़याल रखती थीं। फिर ऐसा क्यों हुआ कि उनके ये सारे दोस्त खु़द तो बंबई में मौज करते रहे लेकिन किसी ने भी मंटो साहब की वापस हिंदुस्तान बुला लेने की दिली आरजू पर कभी गौर नहीं किया, जबकि पार्टीशन के बाद पाकिस्तान शिफ्ट करने से पहले मंटो साहब बंबई की फ़िल्मी दुनिया में अच्छा-ख़ासा काम कर चुके थे?

दरअसल मंटो साहब ने पार्टीशन के बाद पाकिस्तान जाने का फ़ैसला तो कर लिया था लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान से उनका मोह भी भंग हो गया था, कुछ-कुछ कुर्रतुल ऐन हैदर की तरह। कुर्रतुल ऐन हैदर ने तो ख्वाजा अहमद अब्बास की मदद से पहले बीबीसी ज्वाइन किया और फिर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पंडित नेहरू से गुजारिश करके वापस हिंदुस्तान आने में क़ामयाब रहीं लेकिन मंटो साहब के हाथ तो इतने लंबे थे नहीं, हां मुबई के कई दोस्तों को उन्होंने ज़रूर लिखा, "यार, मुझे वापस हिंदुस्तान बुला लो। पाकिस्तान में मेरी कोई जगह नहीं है।" पर पर उनकीबदतमीज़ी, ‘बदमिजाज़ी, ‘बदकलमीबर्दास्त करने की कूव्वत यहीं बंबई के उनके किसी दोस्त में नहीं थी।
उसके बाद फटेहाली के साथ पाकिस्तान में रहना उनकी मज़बूरी बन गई थी। ऐसी हालत में हताशा और निराशा के साथ रहना और खु़द को अकेला महसूस करने के सिवा उनके पास और कोई चारा नहीं था। उसी अकेलेपन में उन्होंने शराब को अपना ख़ास दोस्त बनाया, इतना ख़ास कि दिन-रात उसी के साथ रहने लगे। इसका अंजाम यह हुआ कि उन्होंने टीबी की लाइलाज बीमारी को अपने बदन में जगह दे दी, ऐंटन चेखव की तरह, और 18 जनवरी सन् 1955 में महज 42 साल की उम्र में वे इस जहां को अलविदा कह गए।

लेकिन मंटो अकेले नहीं थे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फिराक गोरखपुरी, शैलेश मटियानी और न मालूम और कितनी लेखक प्रतिभाओं के नाम इस फेहरिस्त को लंबा करते हैं। इन लेखकों के साथ भी कुछ ऐसा ही बर्ताव किया गया था। इन्हें भी 'पागल' कहा करते थे लोग। आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा कि इन सबका सबसे बड़ा गुनाहगार खुद लेखक समाज रहा है।
हालात अभी भी बदले नहीं हैं। क्या आज के दौर के सबसे बड़े कथाकार उदय प्रकाश के साथ भी पिछले तीस-पैंतीस सालों से कुछ ऐसा ही बर्ताव नहीं किया जा रहा है? जुगाड़ भिड़ाकर, चमचागीरी और चापलूसी करके, विचारधारा की गिरोहबंदी करके या जातीय समीकरण बिठाकर बहुत सारे मीडियाकर लोग विश्वविद्यालयों, अकादमियों, हिन्दी की संस्थाओं के निदेशक, पत्र-पत्रिकाओं के संपादक, टेलीविजनों के चैनल प्रमुख बनकर छाली काट रहे हैं और इसी शहर में पिछले पैंतीस बरस से आज के दौर का सबसे लोकप्रिय हिंदी लेखक तमाम तरह की हुनर और प्रतिभा के बावजूद दिहाड़ी करने को मजबूर है

क्या उदय प्रकाश को इसलिए यह सज़ा दी जा रही है कि उन्होंने देश के बड़े विश्वविद्यालयों के हिन्दी के कद्दावर प्रोफेसरों और आलोचकों की चरित्रहीनता की पोल क्यों खोली और उनके द्वारा नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, बेटी-दामादवाद, जातिवाद, ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने के ख़िलाफ़ नाम ले-लेकर क्यों लिखा?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी या महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलरों या प्रोफेसरों में आज कितने लोग बतौर लेखक या बतौर अध्यापक उदय प्रकाश की लोकप्रियता को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं? सच तो यह है कि उदय प्रकाश आज एक अंतरराष्ट्रीय हस्ती हैंयूरोप और अमेरिका के विश्वविद्यालयों, पुस्तक मेलों में उन्हें बड़े आदर से बुलाया जाता है। उनकी लेखनी के मुरीद हिन्दी की नई पीढ़ी के पाठक आज उन पर गर्व करते हैं।

लब्बोलुआब यह है कि मंटो साहब को पढ़ते हुए और उनकी शक्सियत को समझते हुए आज बड़ी तकलीफ के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आज भी हमारा हिन्दी समाज इतना लोकतान्त्रिक नहीं हुआ है कि वह बेबाक और बिना किसी लाग-लपेट के खरी-खरी लिखने वाले लेखक को बर्दाश्त कर सके। मंटो की मानसिकता वाले लेखक का हश्र आज भी मंटो जैसा ही होता है। आखिर क्यों? (अप्रकाशित)