बेबाक लिखने की सज़ा !

मंटो साहब को गुज़रे आज करीब चैअन साल हो चुके हैं।कितने टोबाटेक सिंह, ‘काली सलवार, ‘खोल दो, ‘बूसरीखी कहानियों के इस लेखक पर आज बड़े-बड़े लेखक, आलोचक, इतिहासकार, समाजवैज्ञानिक कभी रस्क, कभी फख्र तो कभी तारीफ़ करते हैं। लेकिन आज जब मैं मंटो की शख्सियत को समझने की कोशिश कर रहा हूँ तो मुझे लगता है कि मंटो महज़ एक लेखक या एक शख्सियत ही नहीं बल्कि एक मानसिकता है। एक ऐसी मानसिकता जो नाफा-नुकसान की चिंता किए बगैर जो मन की बात बड़ी बेबाकी से लिखने की कूव्वत रखता है। किसी से डरता नहीं, अपने हालात से भी नहीं, चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो। अपने दौर की बड़ी से बड़ी शख्सियतों की गिरेबां पकड़ने में भी उसे कोई झिझक नहीं होती। इसीलिए ऐसे लेखक के खिलाफ सब एकजुट हो जाते हैं। कोई इसे 'बेवकूफ़' कहता है तो कोई 'बदतमीज़', 'बददिमाग' या 'बदमिजाज'। 'पागल' कहने वाली भी कम नहीं होते हैं। वे सचमुच इसे पागल कर देना चाहते हैं ताकि न रहे बांस न बजे बांसुरी।
मंटो के साथ भी ज़माने वालों ने कुछ ऐसा ही बर्ताव किया थासन् 1955 में जब मंटो साहब का इंतकाल हुआ तो उनकी मौत की ख़बर पाकिस्तान ही नहीं पूरे भारतीय उप-महाद्वीप की लेखकीय बिरादरी के लिए एक बड़ा सदमा था। इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी लेखकीय महानता तो थी ही, कम उम्र में इस जहान से उनका रुख़सत होना भी था। उनके इंतकाल के बाद उस चर्चित नृत्यांगना सितारा देवी को किसी ने मंटो साहब के इंतकाल की ख़बर दी। पता है, उस ख़बर पर उनकी क्या प्रतिक्रिया थी? सितारा देवी ने अपना मुंह बिगाड़कर कहा, ‘‘बड़ा ही बदतमीज़ और बेवकूफ़ आदमी था। मेरा चैन हराम कर दिया था उसने।’’ जी हां, उर्दू के बहुचर्चित कथाकार सआदत हसन मंटो साहब की मौत पर सितारा देवी की श्रद्धांजलि के थे ये शब्द।

अब लगे हाथों यह भी जान लीजिये कि मंटो साहब से आखि़र क्यों इतनी नाराज़ थीं सितारा देवी। मंटो साहब ने उनका क्या बिगाड़ा था। सितारा देवी उनसे क्यों इतनी खफ़ा थीं कि मंटो साहब की मौत की ख़बर सुनकर भी उनका गुस्सा ठंडा नहीं पड़ा। दरअसल, उनकी लेखनी के मुरीद पाठक जानते हैं कि उन्होंने नर्गिस दत्त, नसीम बानो, अशोक कुमार, कुलदीप कौर, इस्मत चुगताई जैसी हस्तियों पर कई संस्मरण लिखे हैं जो राजकमल पेपरबैक्स से प्रकाशित उनकीमीनाबाज़ारकिताब में संकलित हैं। लेकिन सितारा देवी के बारे में मंटो साहब को जब भी लिखने का मौक़ा मिलता तो वे चटखारे लेकर लिखते थे। उस पर उन्होंने कई संस्मरण लिखे हैं।
ऐसे ही एक संस्मरण में सितारा देवी के बारे में उन्होंने लिखा है, ‘‘सितारा देवी अकेली थी, यानी वह किसी एक की होकर नहीं रहती थी। ... सितारा वास्तव में है ही एक अज़ीब औरत। ऐसी औरतें लाख में दो-तीन ही होती हैं। .... वह नारी नहीं, कई नारियां हैं। उसने इतने अधिक प्रेम और शारीरिक संबंध किये हैं कि मैं इस संक्षिप्त लेख में उन सबका उल्लेख नहीं कर सकता। सितारा देवी की जब मैं कल्पना करता हूं तो वह मुझे बंबई की एक ऐसी पांचमंजिला इमारत लगती हैं जिसमें कई फ्लोर और कमरे हैं। और यह एक हकीकत है कि वह एक वक्त में कई-कई मर्द अपने दिल में बसाए रखती हैं।’’

मंटो साहब को पता था कि सितारा देवी उनसे बेहद खफ़ा हैं लेकिन मंटो साहब को इसकी परवाह नहीं थी, उन्होंने खुद ऐसा लिखा है. यह मसला अपवाद नहीं था. दरअसल मंटो साहब की बेबाकबयानी की वजह से लोग उनसे नारज रहते थे, यहाँ तक कि उनके दोस्त-यार लेखक भी मालूम हो, अली सरदार जाफ़री, फैज़ अहमद फैज़, अहमद नसीम कासमी, कृश्नचंदर, ख्वाजा अहमद अब्बास, मजाज़, शाहिद लतीफ, राजेंदर सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, अशोक कुमार सरीखी शख्सियतें उन्हें अपना दोस्त कहते हुए फख्र करती थीं। इन सबका साथ-साथ उठना-बैठना होता था। वैसे तो कहते हैं कि ये सब मंटो साहब का बड़ा ख़याल रखती थीं। फिर ऐसा क्यों हुआ कि उनके ये सारे दोस्त खु़द तो बंबई में मौज करते रहे लेकिन किसी ने भी मंटो साहब की वापस हिंदुस्तान बुला लेने की दिली आरजू पर कभी गौर नहीं किया, जबकि पार्टीशन के बाद पाकिस्तान शिफ्ट करने से पहले मंटो साहब बंबई की फ़िल्मी दुनिया में अच्छा-ख़ासा काम कर चुके थे?

दरअसल मंटो साहब ने पार्टीशन के बाद पाकिस्तान जाने का फ़ैसला तो कर लिया था लेकिन जल्दी ही पाकिस्तान से उनका मोह भी भंग हो गया था, कुछ-कुछ कुर्रतुल ऐन हैदर की तरह। कुर्रतुल ऐन हैदर ने तो ख्वाजा अहमद अब्बास की मदद से पहले बीबीसी ज्वाइन किया और फिर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पंडित नेहरू से गुजारिश करके वापस हिंदुस्तान आने में क़ामयाब रहीं लेकिन मंटो साहब के हाथ तो इतने लंबे थे नहीं, हां मुबई के कई दोस्तों को उन्होंने ज़रूर लिखा, "यार, मुझे वापस हिंदुस्तान बुला लो। पाकिस्तान में मेरी कोई जगह नहीं है।" पर पर उनकीबदतमीज़ी, ‘बदमिजाज़ी, ‘बदकलमीबर्दास्त करने की कूव्वत यहीं बंबई के उनके किसी दोस्त में नहीं थी।
उसके बाद फटेहाली के साथ पाकिस्तान में रहना उनकी मज़बूरी बन गई थी। ऐसी हालत में हताशा और निराशा के साथ रहना और खु़द को अकेला महसूस करने के सिवा उनके पास और कोई चारा नहीं था। उसी अकेलेपन में उन्होंने शराब को अपना ख़ास दोस्त बनाया, इतना ख़ास कि दिन-रात उसी के साथ रहने लगे। इसका अंजाम यह हुआ कि उन्होंने टीबी की लाइलाज बीमारी को अपने बदन में जगह दे दी, ऐंटन चेखव की तरह, और 18 जनवरी सन् 1955 में महज 42 साल की उम्र में वे इस जहां को अलविदा कह गए।

लेकिन मंटो अकेले नहीं थे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फिराक गोरखपुरी, शैलेश मटियानी और न मालूम और कितनी लेखक प्रतिभाओं के नाम इस फेहरिस्त को लंबा करते हैं। इन लेखकों के साथ भी कुछ ऐसा ही बर्ताव किया गया था। इन्हें भी 'पागल' कहा करते थे लोग। आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा कि इन सबका सबसे बड़ा गुनाहगार खुद लेखक समाज रहा है।
हालात अभी भी बदले नहीं हैं। क्या आज के दौर के सबसे बड़े कथाकार उदय प्रकाश के साथ भी पिछले तीस-पैंतीस सालों से कुछ ऐसा ही बर्ताव नहीं किया जा रहा है? जुगाड़ भिड़ाकर, चमचागीरी और चापलूसी करके, विचारधारा की गिरोहबंदी करके या जातीय समीकरण बिठाकर बहुत सारे मीडियाकर लोग विश्वविद्यालयों, अकादमियों, हिन्दी की संस्थाओं के निदेशक, पत्र-पत्रिकाओं के संपादक, टेलीविजनों के चैनल प्रमुख बनकर छाली काट रहे हैं और इसी शहर में पिछले पैंतीस बरस से आज के दौर का सबसे लोकप्रिय हिंदी लेखक तमाम तरह की हुनर और प्रतिभा के बावजूद दिहाड़ी करने को मजबूर है

क्या उदय प्रकाश को इसलिए यह सज़ा दी जा रही है कि उन्होंने देश के बड़े विश्वविद्यालयों के हिन्दी के कद्दावर प्रोफेसरों और आलोचकों की चरित्रहीनता की पोल क्यों खोली और उनके द्वारा नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, बेटी-दामादवाद, जातिवाद, ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने के ख़िलाफ़ नाम ले-लेकर क्यों लिखा?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी या महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलरों या प्रोफेसरों में आज कितने लोग बतौर लेखक या बतौर अध्यापक उदय प्रकाश की लोकप्रियता को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं? सच तो यह है कि उदय प्रकाश आज एक अंतरराष्ट्रीय हस्ती हैंयूरोप और अमेरिका के विश्वविद्यालयों, पुस्तक मेलों में उन्हें बड़े आदर से बुलाया जाता है। उनकी लेखनी के मुरीद हिन्दी की नई पीढ़ी के पाठक आज उन पर गर्व करते हैं।

लब्बोलुआब यह है कि मंटो साहब को पढ़ते हुए और उनकी शक्सियत को समझते हुए आज बड़ी तकलीफ के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आज भी हमारा हिन्दी समाज इतना लोकतान्त्रिक नहीं हुआ है कि वह बेबाक और बिना किसी लाग-लपेट के खरी-खरी लिखने वाले लेखक को बर्दाश्त कर सके। मंटो की मानसिकता वाले लेखक का हश्र आज भी मंटो जैसा ही होता है। आखिर क्यों? (अप्रकाशित)

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