गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

शतरंज की बिसात पर अमेरिका : टी. एस. आर. सुब्रमण्यम ने शशिकांत से कहा

टी. एस. आर. सुब्रमण्यम
मित्रो, उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस ऑफिसर 
और भारत सरकार के पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी
टी. एस. आर. सुब्रमण्यम  रिटायर होकर 
आजकल नोएडा में रह रहे हैं. 
रिटायरमेंट के बाद भी वे 3-4 चैरिटी आर्गनाइजेशन से जुड़कर 
सोसायटी के डेवलपमेंट के लिए काम कर रहे हैं। 
वे कैनेडियन एनजीओ "मैक्रो न्यूट्रीशन" के चेयरमैन भी हैं।       
सुब्रमण्यम  साहब 1983 में जेनेवा गए. 
उन्होंने गैट और डब्ल्यूटीओ में 5-6 साल काम किया. 
28 दिसंबर 2010 की शाम को जब मैंने 
उनको  फ़ोन किया तो वे मद्रास में थे.  
उन्होंने सुबह 8.30 बजे फ़ोन करने कहा.  
कल सुबह-सुबह 2010 में इंडो-यूएस रिलेशन पर उनसे बात हुई 
जो आज दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित हुई है. 
आप भी पढ़ें !   -शशिकांत  

सन 2010 में बराक ओबामा साहब मुंबई और नई दिल्ली आए। दरअसल, 2008 में फाइनेंसियल क्राइसिस के बाद वहां बहुत सारी नौकरियां चली गईं। इतना ही नहीं, पिछले सालों में चीन ने विश्व की अर्थव्यवस्था में अमेरिका को तगड़ी चुनौती देकर अपनी धाक जमाई है। विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा में चीन अमेरिका को लगातार पछाड़ रहा है। इसी तरह, पिछले दस सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का ग्राफ भी काफी तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका यह जानता है कि इसकी एक बड़ी वजह भारत और चीन में उपलब्ध विशाल मानव संसाधन और सस्ता श्रम है। 

अमेरिका को अब यह समझा में आ गया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को इस बड़ी चुनौती से निपटने में भारत उसके लिए काफी कारगर सिद्ध होगा। इसीलिए पहले बुश साहब भारत आए और फिर ओबामा साहब।  रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेट्स- दोनों भारत को अमेरिका का पार्टनर बनाना चाहते हैं। अमेरिका को पता है कि भारत के साथ यदि अमेरिका संबंध सुधरता है तो राजनीतिक और आर्थिक- दोनों फ्रंट पर अमेरिका को फायदा ही फायदा है। वह यह भी जानता है कि वैश्विक आर्थिक  मंदी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं के बराबर असर पड़ा है इसलिए अमेरिका में आर्थिक मंदी से उबरने में भारत उसकी मदद करेगा। 
 
अगले दस-बारह सालों में, यानि सन 2020-23 तक चीन की अर्थव्यवस्था दुनिया में नंबर एक पर हो जाएगी। अमेरिका को यह खतरा दिख रहा है। इसलिए भी वह भारत के साथ राजनीतिक और आर्थिक दोनों फ्रंट पर डायलॉग करना चाहता है और भारत के साथ संबंध सुधारना चाहता है। ऐसे माहौल  में अब भारत को समझना है कि चीन भारत और अमेरिका के संबंध को किस निगाह से देखता है। 

जब से भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ है उसके बाद, एक महीने के भीतर G-5 के सदस्य देशों के नेता एक-एक कर भारत की यात्रा पर आए हैं। हमें अपनी विदेश नीति बनाते हुए इस बात का खयाल रखना चाहिए कि भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते के बाद चीन, रूस, फ़्रांस, ब्रिटेन जैसे देश भारत के साथ राजनीतिक और आर्थिक संबंध सुधारने की दिशा में यदि रुचि ले रहे हैं तो इसकी वजह क्या है।

भारत की आबादी आज लगभग एक सौ बीस करोड़ है और चीन की डेढ़ अरब। हम दोनों आज विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। हमारे यहां बहुत बड़ा मानव संसाधन है और विकास की संभावनाएं भी। एशिया के हम दोनों पड़ोसी देश यदि मिल जाएंगे तो हम आधी दुनिया के बराबर होंगे। उसके बाद संयुत राष्ट्र, विश्व बैंक, डब्ल्यूटीओ और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और चीन का दबदबा होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के साथ संबंध सुधारने के पीछे अमेरिका की रुचि इसलिए है क्योंकि इसमें उसका व्यापार हित छिपा हुआ है। 

दिक्कत यह है कि अमेरिका जिस देश के साथ अपना रिश्ता सुधारता है तो उस रिश्ते में वह अपने राजनीतिक और आर्थिक  हित के साथ-साथ कूटनीतिक और सामरिक हित भी जोडऩा चाहता है।  पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, उत्तर कोरिया और जहां-जहां उसकी गर्दन फंसी हुई है, भारत को दोस्त बनाकर वह अपने पक्ष में खड़ा करना चाहता है। अफगानिस्तान में फेल हो गया है अमेरिका। अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान का रिश्ता जुड़ा हुआ है। इस बीच पाकिस्तान और चीन के बीच रिश्ते को लेकर भी वह संजीदा है। इसलिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका भारत के साथ संबंध सुधार के मामले में आर्थिक-राजनीतिक शतरंजी गेम खेल रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कई तरह के आर्थिक समझौते हुए हैं। इसी समझौते के तहत अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनी बोल्मार्ट भारत आएगी। वह अपनी पहले भारत के महानगरों में और उसके  बाद छोटे शहरों और गांवों में बड़ी-बड़ी दुकानें खोलेंगी। 

इन दुकानों में वह गांव के किसानों से खरीदी ताजी सब्जी, दूध, फल, अंडे जैसी रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान बेचेगी। इस समझौते के पीछे एक तरफ यह दिया जा रहा है कि इससे गांव के लोगों को आर्थिक विकास का फायदा मिलेगा। लेकिन मेरा मानना है सिर्फ मुट्ठी भर बड़े किसानों को इसका फायदा मिलेगा। जबकि इससे देश मे छोटे किसानों की हालत बदतर होगी और बेरोजगारी भी बढ़ेगी।

बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान जिन अमेरिकी कंपनियों के साथ परमाणु करार हुए हैं उसका फायदा हमें तो बीस-तीस साल बाद नजर आएगा लेकिन इस करार के बाद अगले दो-तीन सालों में ही वहां हजारों की संख्या में नई नौकरियां सृजित होंगी और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, जो आर्थिक मंदी से निपटने में अमेरिका की मदद करेगा। 

जहां तक सुयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल है तो मरा मानना है कि यह सिर पर सजे कांच के मुकुट की तरह तरह है, जो कभी भी जमीन पर गिरकर बिखर सकता है। हम पांच देशों के एक ऐसे क्लब का सदस्य बनना चाह रहे हैं जो खुद अब पतनशील है। बदलते वैश्विक समीकरण में उसकी कोई खास सार्थकता भी नहीं रह गई है।

लेकिन, हमें अमेरिका या चीन उतना खतरा नहीं है जितना हमारी अपनी अंदरूनी समस्याओं से है। आज हमारा देश भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, क्षेत्रीयतावाद, सांप्रदायिकता जैसी आंतरिक समस्याओं से ग्रस्त है। हम यदि इन अंदरूनी समस्याओं से जितनी जल्दी निजात पा लें, हमारे देश और यहां की जनता का उतना भला होगा।  
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में 30 दिसंबर 2010 को प्रकाशित)

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

हम गुनहगार औरते हैं, न सर झुकाएं, न हाथ जोड़ें : किश्वर नाहीद

कीश्वर नाहीद
"हमारे यहां लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज़ नहीं है, अगर तुम लड़कियों को पढ़ाओगी तो मेरे घर मत आना।" यह बात कही थी उर्दू की बहुचर्चित रायटर किश्वर नाहीद के अब्बू ने उनकी अम्मी से, क्योंकि वो अपनी बेटी किश्वर नाहीद को तालीम दिलाने की ख़्वाहिश रखती थीं। 

बड़ी तकलीफ़ के साथ उन लम्हों को याद करती हुई वो कहती हैं, "मैंने उस ज़माने में तालीम हासिल की जब लड़कियों की पढ़ाई को अहमियत नहीं दी जाती थी। मेरे नाना उस वक्त बुलंदशहर के मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने अम्मा से कहा, "हमारे यहां लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज़ नहीं है, अगर तुम लड़कियों को पढ़ाओगी तो मेरे घर मत आना।" 
अम्मा ने कहा, "ठीक है मैं नहीं आऊंगी, लेकिन लड़कियों को पढ़ाऊंगी ज़रूर।" 
अब्बा ने कहा, "जितने पैसे घर ख़र्च के देता हूं, उससे एक पैसा ज़्यादा नहीं दूंगा।" 
अम्मा ने कहा, "आधी रोटी ख़ाऊंगी लेकिन लड़कियों को पढ़ाऊंगी।" 
अम्मा ने सोचा कि लड़कियां मैट्रिक पास करके अपना घर बसाएंगी। लेकिन मैट्रिक पास करने के बाद मैंने शोर मचाया कि मुझे कॉलेज जाना है। फिर मैंने बी.ए. किया, एम.ए. किया और नौकरी की।"

किश्वर नाहीद की पैदाइश सन 1940 में बुलंदशहर में हुई थी। पार्टीशन के बाद वो पाकिस्तान चली गईं। अपने बचपन और हिंदुस्तान के प्रति अपनी फीलिंग को याद करती हुई किश्वर कहती हैं, "उस वक्त मैं बहुत छोटी थी। भाइयों के साथ खेलती थी। गुल्ली-डंडा, पतंग उड़ाना। बँटवारे के बाद क़त्ल-ओ-ग़ारत हुई, लड़कियों का बलात्कार किया गया, लड़कियां अगवा की गईं। आज भी उन सब चीज़ों का अक्स नज़र आता है। लेकिन हिंदुस्तान से मेरा रिश्ता घर-आंगन जैसा है।" 

उर्दू अदब में आज किश्वर नाहीद की एक ख़ास मुकाम है लेकिन एक औरत होने की वजह से उन्हें  कितनी ज़द्दोज़हद करनी पड़ी, ख़ुद उन्हीं की ज़ुबान से सुन लीजिए, "मैंने कॉलेज के जमाने से ही शेरो-शायरी शुरू कर दी थी। एक रोज़ अब्बा ने कहा, "तुम्हें जितना मशहूर होना था हो चुकी, अब जिससे ग़ज़ल ली है उसे वापस करो और एक शरीफ़ लडक़ी की तरह ज़िन्दगी गुज़ारो।" उन्होंने माना ही नहीं कि यह शायरी मैंने की थी। शुरू में पाबंदियां लगाई गई थीं कि आप इश्क का ज़िक्र नहीं करेंगी, आप औरतों की आज़ादी की बात नहीं करेंगी। लेकिन मैंने शुरू ही यहां से किया- घर के धंधे तो निबटते ही नहीं नाहीद / मैं निकलना भी अगर शाम को घर से चाहूं।" धीरे-धीरे शायरात आती गईं काफ़िला बढ़ता गया। फेहमिदा रियाज़ आईं, सारा शगुफ़्ता आईं। और भी बहुत अच्छे नाम हैं जिन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराई। लेकिन आलोचकों ने कभी इस पर गौर नहीं किया कि एक  औरत किस तरह अपनी सोच से समाज को बदल रही है, क्या नई चीज़ पेश कर रही है।"

पाकिस्तान में रहते हुए भी किश्वर नाहीद ने अपनी शेरो-शायरी में औरत की नई तस्वीर पेश की है। औरत को वह मर्द के  सामने दोयम दर्ज़े में नहीं देखना चाहतीं। यहां तक कि वो इश्क करने के मामले में भी। वो कहती हैं, आज के वक्त में मेरा मानना है कि अगर मर्द को इश्क  करने का हक़ है तो वह औरत को भी है। लेकिन उसके इजहार के अंदाज़ हो सकते हैं। जैसे मीरा ने कहा है, "मैं तो प्रेम दीवानी" लेकिन मैं यह नहीं कहूंगी, मैं तो कहूंगी, "मैं नजर आऊं हर सिम्त से, जिधर से जाऊं / मैं गवाही हरेक आइनागर से चाहूं।" 

आलोचकों ने कभी इस पर गौर नहीं किया कि एक औरत किस तरह अपनी सोच से समाज को बदल रही है, क्या नई चीज़ पेश कर रही है। मतलब यह कि मेरी मौजूदगी को, मेरे वजूद को मानना चाहिए। बाद में, मैंने जो कुछ कहा वह सभी औरतों ने कहा। इसकी जरूरत भी थी ताकि औरत का लहज़ा सामने आए।"

किश्वर नाहीद आज उर्दू अदब में ही नहीं पाकिस्तान की सरजमीन पर भी औरतों को हक़ दिलाने की लड़ाई लड़ रही हैं।  "औरतों के हक को लेकर मैं शुरू से फ़िक्रमंद रही हूँ। शहर की ज़िन्दगी में औरत की लाइफ में थोड़ा बहुत बदलाव ज़रूर नज़र आया है लेकिन गांव की ज़िन्दगी भी उससे अछूती है। आज भी गांव की औरत मटर तोड़ती, आलू तोड़ती नज़र आती है। हमें उन्हें पढ़ाना है, बहुत कुछ सिखाना है। ह्यूमन राइट ऑर्गनाइजेशन्स के साथ काम करते समय मैंने पाया कि कामकाज़ करने वाली औरतों का कितना शोषण किया जा रहा है। उनका सारा मुनाफ़ा तो दलाल खा जाते है। मैंने अपने फंड के पैसे से "हौवा" नामक संस्था बनाई। मेरी संस्था औरतों से हस्तशिल्प का सामान खरीदती है। हर महीने की पहली तारीख से लेकर सात तारीख़ तक  उनके पैसे पहुंचा दिए जाते हैं। इसके अलावा कानूनी और आर्थिक मदद भी दी जाती है।" यह कहना है पाकिस्तान की बहुचर्चित रायटर किश्वर नाहीद का।

अदब और इंसानियत की कोई सीमा नहीं होती। हिंदुस्तान में पैदा हुई पाकिस्तान की यह मशहूर लेखिका हिंद-पाक रिश्तों में अक्सर आनेवाले उतार-चढ़ाव को लेकर खुद को असहज महसूस करती हैं, "मेरे अंदर शुरू से यह एहसास था कि चाहे वह घर हो या मुल्क, जंग से कुछ हासिल नहीं होता। हमें जंग नहीं सुलह की बात करनी चाहिए और यही लोग चाहते हैं क्योंकि  एटम बम रोटी नहीं खिला देता, ग़रीबी नहीं दूर करता। लोगों को तालीम देने के लिए एटम बम की नहीं ऐसे समाज की जरूरत है जो इंसान को इंसान बनना सिखाए।" 

शायद यही वजह है कि किश्वर नाहीद को जब भी मौक़ा मिलता है तो वो मुशायरों में शरीक़ होने हिंदुस्तान आना पसंद करती हैं। हिंदुस्तान में लोग अक्सर मेरी चर्चित नज़्म "हम गुनाहगार औरतें हैं" सुनना पसंद करते हैं-

"ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहले-जुब्बा की तमकनत से
न रोआब खोएं
न बेचें
न सर झुकाएं
न हाथ जोड़ें


ये हम गुनहगार औरते हैं
के : जिनके जिस्मों की फ़सल बेचें जो लोग
वो सरफ़राज़ ठहरें
नियाबते-इम्तियाज़ ठहरें


ये हम गुनहगार औरते हैं
के : सच का परचम उठा के निकलीं
तो झूठ से शहराहें अटी मिली हैं
हरएक दहलीज़ पे
सज़ाओं की दास्तानें रखी मिली हैं
जो बोल सकती थीं, वो ज़बानें कटी मिली हैं


के : अब ताअकुब रात भी आए
तो ये आंखें नहीं बुझेंगी
के : अब जो दीवार गिर चुकी है
उसे उठाने की ज़िद न करना


ये हम गुनहगार औरते हैं
जो अहले जुब्बा की तमकनत से
न रोआब खोएं
न बेचें
न सर झुकाएं, न हाथ जोड़ें."

शब्दार्थ :
(अहले जुब्बा : मज़हब के ठेकेदार, सरफ़राज़ : सम्मनित, नियाबते इम्तियाज़ : सही-ग़लत में फ़र्क करनेवाला, ताअकुब : तलाश में, तमकनत : प्रतिष्ठा)

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

2001-2010 साहित्य : कलम का कमाल

साथियो, 
 यह टिप्पणी 26 दिसम्बर 2010 को राजस्थान  पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। भाई हेतप्रकाश व्यास के आग्रह पर जल्दबाजी में लिखी गई यह टिप्पणी आपके हवाले कर रहा हूं।  - शशिकांत 

  • भारतीय मूल के लेखकों का दुनिया में दबदबा।
  • 88 साल बाद भारतीय मूल के लेखक को मिला नोबेल।
  • अंग्रेजी साहित्यिक लेखन में यूरोप और अमरीका के लेखकों का आधिपत्य टूटा है। 
अरुंधति रॉय 

अक्टूबर 2001 भारतीय साहित्य जगत में घटित वह यादगार तारीख थी जब स्वीडिश अकेडमी ने भारतीय मूल के लेखक वी एस नायपाल को साहित्य का नोबेल प्राइज देने की घोषणा की। भारतीय या भारतीय मूल के किसी लेखक को साहित्य का यह नोबेल पुरस्कार अठ्ठासी साल बाद
मिला था।    

उसके बाद सन् 2006 का बुकर पुरस्कार भारतीय मूल की लेखिका किरण देसाई को उनकी किताब ‘दि इन्हेरिटेंस ऑफ  लॉस’ को दिया गया।  


उदय प्रका
उसके बाद सन 2008 का बुकर पुरस्कार एक बार फि र भारतीय मूल के लेखक अरविन्द अडिगा को उनके उपन्यास ‘दि ह्वाइट टाइगर’ पर मिला। उस साल बुकर पुरस्कार के लिए आखिरी दौर में जिन छह लेखकों की किताबें पहुंचीं उनमें भारतीय मूल के लेखक अमिताव घोष की किताब ‘सी ऑफ  पोपीज’ भी थी।

बीते दशक में मुख्यधारा के साहित्य के साथ-साथ पोपुलर साहित्य ने भी भारत और भारत से बाहर अपना जलवा बिखेरा है। बॉलीवुड में सक्रिय बहुचर्चित गीतकार गुलजार को 2009 में ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ फिल्म के गाने ‘जय हो...’ गाने लिखने के लिए के लिए ऑस्कर और ग्रेमी पुरस्कार से स्मानित किया गया।
अमिताव कुमार

 पिछले दशक में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भारत और भारतीय मूल के बहुत सारे लेखक सक्रिय रूप से सामने आए हैं। वी एस नायपॉल, विक्रम सेठ, सलमान रश्दी, कुर्तुल एन हैदर, निर्मल वर्मा, कुंवरनारायण, अरुंधति रॉय, उदय प्रकाश, चेतन भगत, अरविन्द अडिगा, झुम्पा लाहिरी, अमितावा कुमार सरीखे  भारतीय या  भारतीय मूल के लेखकों की अंतरराष्ट्रीय ख्याति इस बात का प्रमाण है। 

 भारतीय साहित्य के लिए यह गर्व की बात है। खास बात यह है कि अंग्रेजी साहित्यिक लेखन पर से यूरोप और अमरीका के लेखकों का एकछत्र 

झुम्पा लाहिरी
आधिपत्य टूटा है और भारतीय मूल के लेखकों ने उन्हें तगड़ी चुनौती दी है।

इस दशक में एक खास बात यह देखी कि इस दौरान भारत में अरुंधति रॉय, उदय प्रकाश, प्रसून जोशी, चेतन भगत, बेबी हालदार जैसे युवा लेखकों की एक ऐसी जमात सामने आई जिसने लेखन को काफी लोकप्रिय बनाया।
किरण देसाई

पिछले दशक में अंग्रेजी के कई बड़े लेखकों की बहुचर्चित किताबें हिंदी और  अन्य भारतीय भाषाओं में छपकर आई हैं। इसी तरह हिंदी और अन्य भारतीय भाषा के लेखकों की लोकप्रिय कृतियां अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, पोलिस, जापानी, स्पैनिश, इटैलियन और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुई हैं। अनुवाद ने इसमें महती भूमिका निभायी है।
विक्रम सेठ

इस दशक में विक्रम सेठ, वी एस नायपॉल, सलमान रश्दी, अरुंधति रॉय, उदय प्रकाश, चेतन भगत, प्रसून जोशी, बेबी हालदार, अशोक वाजपेयी, गुलजार, जावेद अख्तर, कुंवर नारायण, अशोक वाजपेयी, विजयदान देथा, विष्णु खरे जैसे सेलिब्रेटी बनकर उभरे लेखकों की किताबें अनूदित होकर भाषाई दीवारों के दायरे से बाहर के पाठकों के हाथों में पहुंची हैं।  

यह इस दशक की एक बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

बड़े गपोड़ होते हैं ये हिंदीवाले !

मित्रो, यह टिप्पणी आज राष्ट्रीय सहारा के रविवारीय 'उमंग' में प्रकाशित हुई है. इसका मज़ा लें ! - शशिकांत 

‘‘गप्प-शप्प का अपना रस होता है। इस गप्प शप्प में हम सांस्कृतिक क्षेत्र में चलने वाले  कार्यकलाप, 
लेखक के आपसी रिश्ते, उन्हें परेशान करनेवाले तरह-तरह के मसले, उनके जीवनयापन की स्थिति, 
उनके आपसी झगड़े और मनमुटाव आदि आदि हमारी सांस्कृतिक गतिविधि से पर्दा उठाते है और
हम लेखक को हाड़ मांस के  पुतले के रूप में देख पाते है। लेखक अपनी इन कमजोरियों के रहते 
अपनी लीक पर चलता हुआ सृजन के क्षेत्र में कहीं सफल और कहीं असफल होता 
हुआ अपनी इस यात्रा को कैसे निभा पाता है, इसे हम उसके जीवन के 
परिप्रेक्ष्यमें देख पाते हैं।’’  
- भीष्म साहनी
गॉसिप यानि गप्प। यानि अफवाह, झूठ, छद्म वगैरह-वगैरह। सेलिब्रेटी लोग गॉसिप से खार खाते हैं। खासकर बॉलिवुड के स्टार्स। पता नहीं कौन पेपर, मैगजीन या इंटरटेनमेंट चैनल किसके बारे में कौन सी गॉसिप उड़ा दे, और वो भी नमक-मिर्च मिलाकर। कुछ सेलिब्रेटिज गॉसिप को अपनी पर्सनल लाइफ में मीडिया की घुसपैठ मानते हैं तो कुछ इसके खूब मजे लेते हैं। आखिर इससे उनकी पॉपुलरिटी जो बढ़ती है। आम लोगों के लिए तो सेलिब्रेटिज की पर्सनल लाइफ को जानने का एकमात्र जरिया है गॉसिप।
वैसे हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया में काफी पोपुलर है गॉसिप। कई मुल्कों के अखबारों में तो हर दिन गॉसिप के कॉलम छपते हैं। वहां हर फील्ड के सेलिब्रेटीज इसके दायरे में होते हैं। क्या नेता, क्या अभिनेता, उद्योगपति, यहाँ तक कि वैज्ञानिक, खिलाड़ी, और तो और बड़े लेखक भी। मीडिया एक्टिविज्म के दौर में अब अपने यहाँ भी अलग-अलग क्षेत्रों की बड़ी शख्सियतों से जुड़े गॉसिप सामने आने लगे हैं। भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य भी गॉसिप से अछूता नहीं है। आए दिनों यहां तरह-तरह के गॉसिप चलते रहते हैं। मसलन, साहित्यिक हलके में सन 2010 की कुछ बहुचर्चित गॉसिपों को ही देख लीजिये!
स्नोवा बार्नो
गॉसिप नंबर 1.
ये स्नोवा बार्नो कौन है? साल 2009-10 में हिंदी साहित्य जगत में एक गॉसिप छाया रहा एक छद्म लेखिका को लेकर।  स्नोवा बार्नो उसका नाम है। विदेशी चेहरे-मोहरे और नामवाली इस अज्ञात युवा कथा लेखिका ने ‘हंस’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘पाखी’, ‘पहल’, वागर्थ’, ‘वसुधा’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘इंडिया टुडे’, ‘आउटलुक’, ‘सरिता’ जैसी हिंदी की बड़ी और चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं में लीक से हटकर दे दनादन कई कहानियाँ लिखीं और वो भी हिंदी में. इस लेखिका को लेकर समूची साहित्यिक बिरादरी काफी दिनों तक उद्वेलित रही।

‘हंस’ के दफ्तर में डाक से आई रचना के लिफाफे पर लिखे मनाली के पते पर उसको तलाशा गया। उसके बाद कलकत्ते में। सबसे पहले इसका जन्म मनाली (हिमाचल प्रदेश) में एवं शिक्षा-दीक्षा हेलसिंकी (फिनलैंड), वार्सा (पोलैंड) बनारस, लखनऊ और लेह में बताया गया, जो फिलहाल मनाली में रहकर सजृन कर रही हैं।
भूमिगत होकर लिख रही और बड़ी तेजी से उभरी इस गुप्त लेखिका की खोज में मनाली के कुछ साहित्यकारों को भिड़ाया गया। लेकिन चूंकि इस मायावी युवा लेखिका का सम्पर्क-पता मनाली (हिमाचल प्रदेश) स्थित किसी पोस्ट ऑफिस का एक पोस्ट बॉक्स नम्बर था इसलिए उनकी तलाश करनेवाले को हाथ ही मलना पड़ा। 
यह भी खबर आई कि वहां ऐसी कोई लेखिका तो है ही नहीं और न ही वहां (मनाली में) कभी किसी ने उसे देखा है। यानि अब यह माना जाने लगा कि स्नोवा बार्नो के छद्म नाम से कोई और शख्स लेखन कर रहा है या कर रही है। लेकिन फिर भी इस सहस्यमय लेखिका के ठिकाने की खोजबीन जारी रही, जो भूमिगत रहते हुए बोल्ड किस्म का लेखन कर रही थी। 
दरियागंज स्थित ‘हंस’ दफ्तर में राजेंद्र यादव की बैठकी में शामिल लेखकों के बीच इस लेखिका के बारे में तरह-तरह के गप्प चलते रहे। खूब ब्लॉगबाजियां भी हुईं। फिर एक सूचना आई कि स्नोवा बार्नो को ओशो आश्रम में देखा गया है। एक साहब ने तो इसे किसी विदेशी सैलानी दल के साथ किसी पर्यटन स्थल पर देखा जाना भी बताया जिसके साथ कैमरा बदलकर उन्होंने एक दूसरे के फोटो भी खीचे।
राजेन्द्र यादव
एक संभावना यह भी जताई गई कि किसी विदेशी सैलानी की फोटो का उपयोग कर यह मायाजाल रचा गया है। आगे चलकर राजेंद्र जी के खुफिया साहित्यकारों ने यह भी खबर जुटाई कि फ्रीलांसिंग करनेवाली इस तथाकथित प्रतिभाशाली बाला नें कुछ अँग्रेजी कहानियाँ, कविताएँ, यात्रा वृतांतों के साथ ‘द वंडर जर्नी’ शीर्षक से एक उपन्यास भी लिखा है।
‘हंस’ में स्नोवा बार्नो की कई कहानियां छपीं, मसलन ‘बारदो’, ‘मुझे घर तक छोड़  आइए’, ‘मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है।’ लेखन में निरालापन और ताजगी, कथाशिल्प और शैली के अनोखेपन, बेबाकी और बेहतरीन कसावट से प्रभावित होकर कई दिलफेंक हिंदी पाठक, लेखक और संपादक इस खूबसूरत युवा लेखिका को बधाई देने के मौके तलाशते रहे।
कुछ उसे निरंतर लिखते रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते थे तो कई खतो-किताबत कर उससे टांका भिड़ाने का बहाना ढूँढ रहे थे। कुछ तो इस कदर बेताब हो गए कि मनाली की फ्लाइट का समय पूछते नजर आए।
मार्च 2009 के ‘हंस’ में स्नोवा के एक पत्र के साथ उसकी तथाकथित अंतिम कहानी छपी- ‘लो आ गई मैं तुम्हारे पास।’ बेहतर शिल्प, परिपक्व किस्म का लेखन, उन्मुक्ततावादी बुद्धिजीविता जनित दर्शन, स्त्री-पुरुष के नितान्त अंतरंग संबंधों की शुद्ध जैविक यौन अनुभूति, अविवेकपूर्ण कामशास्त्रीय अभिव्यक्ति और अप्रासंगिक रूप से गुजरात दंगों एवं साम्प्रदायिक शक्तियों के प्रति भोंडी और अ-कलात्मक प्रतिक्रिया।
पत्र में अपने अस्तित्व को लेकर उठ रहे प्रश्न की पृष्ठभूमि में स्नोवा ने खुद को एक साल के लिए किसी आकल्ट स्कूल द्वारा सौंपे गए कार्य के तहत स्त्री-पुरुषों के नैसर्गिक और चेतनापूर्ण प्रेम संबंधों पर नई तरह की रचनाएँ रचने और पाठकों तक पहुँचाने के एक तरह से मिशननुमा कार्य में लगे होने की अनोखी सूचना देते हुए और भी कई सारे बौद्धिक स्पष्टीकरण दिये हैं।
जया जादवानी
कई बड़े संपादकों, साहित्यकारों, और समीक्षकों से मिले समर्थन को, नारी सुलभ आकर्षण विकसित करने में प्राप्त सफलता के रूप में देखते हुए स्नोवा ने उन (इस आकर्षण में सफलता से फँसे) तमाम बुद्धिजीवियों के नामों का उल्लेख किया है जिन्होंने स्नोवा की कहानियाँ, कविताएँ पढकर उसे प्रोत्साहित किया और शाबाशियाँ दीं। कुछ ने फोन करके लेखिका का हौसला बढाया। स्नोवा ने सभी को नतमस्तक भाव से ग्रहण किया। इधर कुछ सिरफिरे पाठकों और लेखक-लेखिकाओं ने इस पूरे मामले को मिथ्या बताया।
राजेन्द्र यादव ने बताया, ‘‘पिछले साल ‘हंस’ में मैंने स्नोवा बार्नो की कई कहानियां प्रकाशित कीं और इस साल उसको लेकर तरह-तरह के गॉसिप सामने आए। कई लोग मनाली में उसके डाक के पते पर उसे खोजने गए लेकिन वह नहीं मिली। फिर खबर मिली कि वो कलकत्ते में रह रही है। कुछ लोगों ने वहां भी उसे खोजा लेकिन वह नहीं मिली। लेकिन अब पता चला है कि जया जादवानी ही स्नोवा बार्नो के नाम से वो कहानियां लिख रही थीं। वैसे एक खबर यह भी है कि जया जादवानी और स्नोवा बार्नो मिलकर लिख रही थीं और स्नोवा अब पोलैंड, फिनलैंड या स्वीटजरलैंड लौट गई हैं।" राजेंद्र जी से बात करने के बाद मैंने गूगल इमेज में jayajaadvanee  कंपोज कर एंटर दबाया तो पेज नंबर दो पर स्नोवा बार्नो का हिंदी लोक में अवतरित फोटो ही खुला। आप लोग भी देख सकते हैं।
गॉसिप नंबर 2.
जब अशोक वाजपेयी को सफाई देनी पड़ी: रवींद्र कालिया के संपादन में भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ में प्रकाषित विभूति नारायण राय के विवादास्पद इंटरव्यू के और प्रसंग में हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक अशोक वाजपेयी के खिलाफ ऐसी अफवाह उड़ी कि उन्हें हिंदी के एक अखबार में सफाई देनी पड़ी।
अशोक वाजपेयी
अपने उस साप्ताहिक कॉलम में अशोक वाजपेयी ने लिखा, ‘‘इस बीच एक और अफवाह फैलाई गई। कुंवर नारायण और मैं इस प्रसंग में ज्ञानपीठ की अध्यक्ष इंदु जैन से मिले हैं। अव्वल तो इस प्रसंग को लेकर कुंवर जी से मेरी बात तक नहीं हुई। दूसरे इंदू जैन से कोई बीस बरस पहले नाश्ते पर एक सौजन्य भेंट हुई थी, जब मुझे ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक का पद ऑफर किया गया था। उसके बाद उनसे कभी नहीं मिला। तीसरे, जो कुछ मैं इस विवाद में चाहता हूं, उसे खुलकर बता चुका हूं, गुप्त कोई काम करना मेरी आदत में शामिल नहीं है। पर इस झूठ को सरासर फैलाने का काम शुरू किया गया।’’
गॉसिप नंबर 3. 
जब बीबीसी ने भारत की एक इंटरनेशनल हिंदी यूनिवर्सिटी को इंटरनेशनल कॉलेज बना दियाः 16 अगस्त 2010 को बीबीसीहिंदीडॉटकॉम ने अपने साईट पर एक खबर पोस्ट की। उस पोस्ट में उसने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय महाविद्यालय लिख दिया. हिंदी के कई बलॉगरों ने जब बीबीसीहिंदीडॉटकॉम की इस हरकत को नोटिस लिया और ध्यान दिलाया कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय है न कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय महाविद्यालय। तब कहीं जाकर इसे दुरुस्त किया गया। लेकिन तब तक कई ब्लॉगर कॉपी करके इस खबर को अपने ब्लॉग पर चढ़ा चुके थे. बड़े गपोड़ होते हैं ये हिंदीवाले!

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

उदय प्रकाश को साहित्य अकादेमी पुरस्कार

साथियो,
हमारे दौर के हिंदी के बहुचर्चित कवि, कथाकार पत्रकार और फिल्मकार उदय प्रकाश को सन 2008 का हिंदी का साहित्य अकादेमी पुरस्कार देने की घोषणा कर दी गई है.

उदय प्रकाश की कुछ कृतियों के अंग्रेज़ी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद भी उपलब्ध हैं।
लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित हैं।
इनकी कई कहानियों के नाट्यरूपंतर और सफल मंचन हुए हैं।

'उपरांत' और 'मोहन दास' के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।

उदय प्रकाश स्वयं भी कई टी.वी.धारावाहिकों के निर्देशक-पटकथाकार रहे हैं।

सुप्रसिद्ध राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा की कहानियों पर बहु चर्चित लघु फिल्में प्रसार भारती के लिए निर्देशित-निर्मित की हैं।

भारतीय कृषि का इतिहास पर महत्वपूर्ण पंद्रह कड़ियों का सीरियल 'कृषि-कथा' राष्ट्रीय चैनल के लिए निर्देशित कर चुके हैं।


'सुनो कारीगर', 'अबूतर कबूतर', 'रात में हारमोनियम', 'एक भाषा हुआ करती है', 'कवि ने कहा' उदय प्रकाश के कविता संग्रह  हैं.

और 'दरियायी घोड़ा', 'तिरिछ', 'दत्तात्रेय के दुख', 'और अंत में प्रार्थना', 'पॉलगोमरा का स्कूटर', 'अरेबा-परेबा', 'मोहन दास', 'मैंगोसिल', 'पीली छतरीवाली लड़की' कथात्मक कृतियाँ.

उदय प्रकाश के दो निबंध और आलोचना संग्रह भी हैं- 'ईश्वर की आंख' और 'नयी सदी का पंचतंत्र'. इनके अलावा उनके कई अनुवाद भी प्रकाशित हैं.

साहित्य अकादेमी पुरस्कार से पहले उदय प्रकाश को 'भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार', 'ओम प्रकाश सम्मान', 'श्रीकांत वर्मा पुरस्कार', 'मुक्तिबोध सम्मान', 'साहित्यकार सम्मान', 'द्विजदेव सम्मान', 'वनमाली सम्मान', 'पहल सम्मान', 'सार्क राइटर्स अवार्ड', 'पेन ग्रांट फॉर दि ट्रांसलेशन ऑफ दि गर्ल विद दि गोल्डन परासोल, अनुवाद : जैसन ग्रुनेबौम', 'कृष्णबलदेव वैद सम्मान', 'महाराष्ट्र फाउंडेशन पुरस्कार' और 'तिरिछ अणि इतर कथा' अनु. जयप्रकाश सावंत पुरस्कार/सम्मान मिल चुके हैं.
आइये आज हम सब अपने प्रिय लेखक उदय प्रकाश को मुबारकबाद दें.
- शशिकांत 

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

जज बोलें तो न्याय, लेखक बोलें तो गाली. वाह योर ऑनर वाह!

न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू
पुरुष सत्तात्मक भारतीय समाज में स्त्री को हर पल, हर घण्टे और हर दिन स्त्री होने की सजा भुगतनी पड़ती है. कन्या भ्रून हत्या, बेटियों के साथ भेदभाव, दहेज़ उत्पीडन, राह चलते छेडछाड, बलात्कार और फिर उसकी हत्या...और न जाने किस-किस रूप  में. 

भारतीय संविधान में हर भारतीय नागरिक को समानता का अधिकार दिया गया है. अनुच्छेद चौदह से अठारह तक में इसका जिक्र है. इन अनुच्छेदों में कहाँ गया है कि धर्म, वंश, जाति, लिंग और जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा।  बावजूद इसके पिछ्ले साठ सालों में अनगिनत भारतवासियों से उनका ये अधिकार छीना  गया है और आज भी छीना जा रहा है. 


लिंगभेद की वजह से स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार का मामला हो या कोई और, आम औरत या आदमी अदालत की शरण में जाता है और न्याय की गुहार लागाता है, यह जानते और झेलते हुए कि अदालातों में तारीख दर तारीख खिंचती हैं कार्रवाइयाँ, नीचे से ऊपर तक  व्याप्त है भ्रष्टाचार, पुलिस, गुन्डों और माफिया तत्वों के बीच होती है मिलीभगत. 

इन भयानक हालातों के बीच कोई औरत फिर भी यदि दुस्साहस करके न्याय की गुहार लगाती है तो साक्ष्य और गवाह की गुलाम न्यायपालिका उसे कितना न्याय दिला पाती है, यह तो बाद की बात है, लेकिन अदालत में सरेआम पूरी स्त्री बिरादरी को अपमानित और बेईज्जत ज़रूर किया जाता है.

विडम्बना तो यह है कि यह हादसा किसी लोअर कोर्ट, सेशन कोर्ट या हाइ कोर्ट में नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट में हो जाता है. यानी छोटे मिया तो छोटे मिया बडे मिया सुभान अल्ला!

पिछ्ले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के कई न्यायाधीशों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाले और उनके खिलाफ सख्त टिप्पणी करनेवाले सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू अब खुद अपने फैसले में अपशब्द टिप्पणियाँ करने के आरोप से घिर चुके हैं.

वैवाहिक विवाद संबंधी एक याचिका का निपटारा करते हुए पीठ ने २१ अक्टूबर को कहा था कि अगर महिला ‘रखैल’ है, शारीरिक संबंधों के उद्देश्य के लिए रखी गई एक ‘नौकरानी’ है या उस महिला और पुरूष के बीच सिर्फ ‘एक रात का संबंध’ बना है तो आपराधिक दंड संहिता की धारा 125 और घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत उस महिला को गुजारा भत्ता नहीं मिल सकता। 

इंदिरा जयसिंह
फैसले के बाद देश की एकमात्र महिला अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने 22 अक्तूबर को न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर की खंडपीठ से कहा था कि उन्हें अपने फैसले से ये अपशब्द हटाने ही होंगे। इंदिरा जयसिंह की इस टिप्पणी के बाद महिलाओं के लिए काम करने वाले संगठन ‘महिला दक्षता समिति’ ने सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका दायर कर उच्चतम न्यायालय से मांग की है कि वह अपने एक फैसले से ‘रखैल’, ‘नौकरानी’ और ‘एक रात का संबंध’ जैसी टिप्पणियां हटाएं क्योंकि यह महिलाओं का अपमान करने वाली टिप्पणी हैं। 

साथियो, 
अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं, एक कुलपति-लेखक ने कुछ लेखिकाओं को 'छिनाल' कहा था. उनकी उस टिप्पणी पर मीडिया और सडक पर काफी बवाल मचा था. अब माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सरेआम अदालत में ‘रखैल’, ‘एक रात का संबंध’, एक ‘नौकरानी’  जैसे शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं. क्या यह  हिन्दुस्तान की पचास करोड औरतों का अपमान नहीं है?

  • यदि पुरुषवादी मानसिकता वाले हिन्दी लेखक की स्त्री विरोधी टिप्पणी पर हाय-तौबा मच सकती है तो जज साब की टिप्पणी पर क्यों नहीं?
  • क्या घर से लेकर सड़क तक और दफ्तर से लेकर अदालत तक में बार-बार अपमानित, बेईज्ज़त और ज़लील करने के लिए ही होती है स्त्री?

रविवार, 12 दिसंबर 2010

शक्ति-पूजा और स्त्री की मुक्ति : उदय प्रकाश/अनामिका

5 अक्टूबर 2010. दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू हो चुका था. कॉमनवेल्थ खेल गाँव के ठीक सामने नोएडा मोड़ के पास की जिस दिल्ली पुलिस सोसायटी में आजकल मेरा बसेरा है, उसके इर्द-गिर्द पुलिस चाक-चौबंद  थी.  रेहड़ी-पटरी और तरकारी बेचनेवालों पर तो शामत आ गई थी. सबको खदेड़ दिया गया था. कहीं जाना-आना भी गोआम. दुर्गापूजा नज़दीक था. 10-15 सालों से बिहार का  दशहरा नहीं देखा था. झट से गाँव जाने का प्लान बन गया. माँ की तबीयत भी ठीक नहीं थी. उन्हें दिल्ली लाना था. शाम की ट्रेन. दोपहर को अल्ट्रा स्त्रीवादी लेखिका और 'राष्ट्रीय सहारा' की वरिष्ठ पत्रकार मनीषा जी का आदेश हुआ, "दुर्गापूजा के अवसर पर भारत में शक्ति-पूजा की परम्परा और भारतीय समाज में स्त्री की दशा के सन्दर्भ में उदय प्रकाश और अनामिका जी से बातचीत कर लो 'आधी दुनिया' के लिए." फ़टाफ़ट मोबाइल उठाया. दोनों से बातचीत की और कम्पोज़ करके अनामिका जी का लेख मनीषा जी को और उदय जी का लेख उदय जी को प्रकाशन से पूर्व एक नज़र डाल लेने के लिए भेजकर नदिरे रवाना हुआ...अपने गाँव बड़हिया में उदय प्रकाश और अनामिका जी के विचारों को पढ़ना सुखद था. आप सब भी पढ़ सकते हैं. देर से पोस्ट करने के लिए खेद के साथ.  - शशिकांत  

समाज की मुक्ति से जुड़ी है स्त्री की मुक्ति : उदय प्रकाश
मेरा मानना है कि यथार्थ को झुठलाने के लिए सबसे ज्यादा धर्म और आध्यात्म का इस्तेमाल किया जाता है, मामला चाहे स्त्री का हो या दलित का या हाशिए पर की अन्य अस्मिताओं का। हमारे यहां कहा जाता है कि काशी का राजा डोम था। उत्तर प्रदेश में ही विंध्यवासिनी देवी की पूजा की जाती है।

दरअसल जब से स्त्री की सत्ता छीनी गई तब से उसकी पूजा की जाने लगी। दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में आज भी कई जगहों पर मातृसत्तात्मक समाज है। लेकिन पूरे उत्तर भारत का समाज मातृसत्तात्मक है। 

यहां आज भी कन्या भ्रूण हत्या, दहेज और खाप पंचायतों द्वारा प्रेम करने पर स्त्रियों की जान ले ली जाती है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि यही समाज दूर्गा की भी पूजा करता है।

यथार्थ यह है कि स्त्रियों की स्थिति यहां अच्छी नहीं है। मुझे लगता है कि स्त्री सशक्तीकरण पर विचार करते हुए हमें पितृसत्तात्मक समाज की स्थापना पर गौर करना चाहिए। यूनानी सभ्यता में इडीपस की जीत पितृसत्तात्मक समाज की जीत मानी जाती है।

इस समय स्त्री पर ज्यादा जोर इसलिए दिया जा रहा है कि पुरुषसत्तात्मक समाज व्यवस्था के समने कई तरह की अस्मिताएं आ खड़ी हुई हैं। अस्मिताओं में बंटे समाज में जातियों, धर्मों आदि के टुकड़े करने पड़ेंगे। 

भारतीय समाज की संरचना यूरोप से भिन्न है, इसलिए यहां यूरोप की तरह सिर्फ स्त्री और पुरुष के बीच समाज को बांट कर नहीं देखा जा सकता। दलित कहां जाएंगे? आदिवासी कहां जाएंगे? हाशिए पर की कई और अस्मिताएं कहां जाएंगी? जेंडर भारत का अकेला मसला नहीं है। इसके साथ और भी कई गंभीर मुद्दे हैं।

यह सच है कि भारत की स्त्रियां आज घर से बाहर निकल रही हैं, लेकिन वह शिकार भी हो रही हैं। रॉबर्ट जेनसेन की बहुचर्चित किताब ‘‘गेटिंग ऑफ: पोर्नोग्राफी एंड दि एंड ऑफ मेस्कुलिनिटी’’ में उन्होंने माना है कि भूमंडलीकरण के बाद विज्ञापन, बाजार और नव साम्राज्यवादी आचरण के पीछे सबसे पहला मुखौटा स्त्री का है।

रॉबर्ट जेनसेन बाजारवादी नारीवाद को ग्लोबल पोर्न इंडस्ट्री का ही विस्तार मानते हैं। स्त्री मुकित आंदोलन के इस रूप को बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों तक चलनेवाले उस स्त्री स्वाधीनता संग्राम के साथ जोड़ पाने में कई बार मुझे भी मुश्किल होती है जिसमें स्त्री ने समाज के दलित और वंचित तबकों की मुक्ति का सपना देखा था।

इस संदर्भ में देखें तो हमारे सामने क्लारा जेटकिन, क्रुप्स काया, लेनिन की बीवी, एरन गुल, सीमोन द बोउवार, केट मिलेट और भारत में कस्तूरबा से लेकर बहुत सारी महिलाएं थीं, और आज भी मेधा पाटकर, वंदना शिवा, अरुंधति रॉय, सुनीता नारायण, आंग सान सूकी, इरोम शर्मिला आदि ऐसी महिलाएं हैं जो आज की सत्ता के विरुद्ध समूचे मानवीय समाज की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन्होंने कभी जेंडर का नारा नहीं दिया। इनका कोई गॉड फादर नहीं है।

दरअसल भारत में स्त्री मुक्ति का सवाल हाशिए पर के कई अन्य समूहों की मुक्ति से जुड़ा हुआ है। स्त्री को मुक्त करते हुए हमें पूरे समाज को मुक्त करना होगा। यह सच है कि यह शताब्दियों से सबसे उत्पीड़ित अस्मिता रही है और जब तक यह ऐसी अन्य अस्मिताओं को साथ नहीं लेती तब तक वह बाजार और अन्य पितृसत्तात्मक सत्ता का लाभ लेकर भले लाभ उठाए, यह एक खास वर्ग का ही सत्तारोहण होगा, स्त्री की मुक्ति का नहीं। मुझे लगता है इस बात को जनता समझ चुकी है।

यह मत भूलें कि विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर इंदिरा गांधी, मार्गेट थैचर और सोनिया गांधी तक, जयललिता से लेकर मायावती तक और भंडारनायके से लेकर शेख हसीना वाजिद तक सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाली महिलाएं स्त्री नहीं बलिक पुरुष सत्ता की ही प्रतीक रही हैं, और यही बात संसकृति ओर साहित्य में भी लागू होती है। ये गॉड फादर्स की सत्ताएँ थीं और हैं, मां की सत्ता की प्रतिष्ठा कहीं नहीं हुई।

फासीवाद के बाद सबसे ज्यादा दमन फॉकलैंड वार में मार्गेट थैचर ने किया। इंदिरा गांधी ने भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार इमरजेंसी लागू किया और लागों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी। बेगम खलिदा जिया बांग्लादेश में फौजी शासन लागू किया। जेंडर की निगाह से सत्ता को देखना मेरे लिए कभी सुकूनदेह नहीं रहा, क्योंकि मेरे लिए मान्यताओं का मूल्यांकन मायने रखता है।

स्त्री मुक्ति की राह में देह सबसे बड़ी बाधा : अनामिका
भारतीय परंपरा में शिव का संबंध शक्ति से है। शक्ति का सीधा संबंध स्त्री से है, स्त्री का प्रकृति से और प्रकृति का संबंध शक्ति से। शक्ति का ताल्लुक दुर्गा से है और दुर्गा को आद्य शक्ति कहा गया है। शक्ति के बिना मनुष्य शव के समान है। शक्ति का संचार होते ही वह सजीव, सचेतन और सक्रिय हो जाता है। शक्ति के बिना शिव भी शव के समान माने जाते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी पदार्थ में शिवत्व की शक्ति मंगल भाव से आती है। जब हम किसी देवता के आगे सिर झुकाते हैं तो तो हम उसकी शक्ति के आगे सिर झुकाते हैं और हमें लगता है कि वहां से एक तरह की एनर्जी हमारे भीतर आ रही है। 

देवी की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि उन्हें शक्ति स्वरूपा माना जाता है। उनके अंदर ममता, क्षमा, न्याय की शक्ति होती है। ममता और क्षमा से जब बात नहीं बनती तब न्याय की बात की जाती है। सांस्कृतिक रूप से इसे समझा जा सकता है।

आज की स्त्री जितनी थकी और हारी हुई है और सशक्तीकरण के लिए संघर्ष कर रही है उसे आधुनिकता के संदर्भ में समझने की जरूरत है। दरअसल स्त्री सशक्तीकरण की प्रक्रिया एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। मध्यकालीन भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्रियों की दशा अनुकूल नहीं थी।

उन्नीसवीं सदी में भारत में जब नवजागरण की शुरुआत हुई और स्वाधीनता आंदोलन में भारतमाता की जो छवि गढ़ी गई उसमें शक्ति का वही स्वरूप देखी गई। उस दौरान राजाराम मोहन राय एवं अन्य नवजागरणवादियों ने सती प्रथा, बाल विवाह का विरोध किया और विधवा विवाह की हिमायत की। लेकिन मुझे लगता है कि उस वक्त स्त्रियों के राजनीतिक चेतना की बात नहीं उठाई गई।

महात्मा गांधी जब आए तो उन्होंने कहा कि अगर मानसिक और नैतिक बल की बात की जाए तो स्त्रियां ज्यादा नैतिक और सशक्त हैं। मुझे लगता है कि महात्मा गांधी ने पहली बार इस बात को समझा कि भारतीय स्त्रियां जब पढ़-लिख कर अपनी राजनीतिक चेतना के साथ सड़क पर आएंगी तो वे दहेज एवं अन्य सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ ताकतवर रूप से खड़ी होंगी, और तभी भारतीय स्त्री समाज में सच्चे नवजागरण की शुरुआत होगी। उसके बाद हमने देखा कि भारतीय स्त्रियां पढ़-लिकर चेतना संपन्न होने लगी और बहुत सारी स्त्रियों ने आजादी की लडाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

आजादी के बाद भारतीय स्त्रियों पर एक बड़ी जिम्मेदारी आई। पहले की स्त्री तन और मन से अपने परिवार की सेवा करती थी लेकिन आजादी के बाद वह तन, मन और धन से अपने परिवार की सेवा करने लगी, जिसके दायरे में रक्त और यौन संबंध के अलावा घर से बाहर, समाज, राजनीति और कार्यस्थलों पर बनाए गए उसके कई संबंध भी शामिल हुए। यानि कहा जा सकता है कि आधुनिक स्त्री ने अपने दिल का दायरा बढ़ाया।

जहां तक स्त्री शक्ति का सवाल है तो हर पुरुष की जिंदगी का सबसे यादगार संबंध किसी न किसी स्त्री से जुड़ा होता है, चाहे वह मां के साथ जुड़ा हो या बहन के साथ अथवा प्रेमिका, पत्नी और बेटी के साथ। जब कभी काई पुरुष बाहर की दुनिया से थक-हार कर घर आता है तो उसे सबसे ज्यादा नैतिक और भावनात्मक सुरक्षा और समर्थन उसे स्त्री की तरफ से ही मिलती है। 

लेकिन आज भी स्त्री के सामने पुरुष का चेहरा उसे कमतर ही आंकते हुए, उसे आंखें दिखाते हुए और मारते-पीटते हुए ही आता है। पुरुषों ने अपना चित्त विस्तार नहीं किया। पुरानी मानसिकता के पुरुषों में आज भी पूर्वग्रह बचे हुए हैं। उनको मांज-मांज कर ठीक करना है, जिस तरह गंदे बर्तन को मांज-मांज कर चमकाया जाता है उस तरह।

स्त्री आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि स्त्रियां मनोवैज्ञानिक तरीके से आंदोलन करती हैं। स्त्री के हक की लड़ाई लड़ रही स्त्रियों ने कभी शस्त्र नहीं उठाया है। स्त्री सशक्तीकरण आंदोलन हमेशा निःशस्त्रीकरण को प्रश्रय देता रहा है। इस पर गौर करने की जरूरत है।

पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जूझ रही हैं स्त्रियां। स्त्रियां हमेशा अपने समय के जो वृहत्तर संदर्भ रहे हैं उन्हें साथ लेकर चलती रही हैं। पश्चिम में रेडिकल फेमिनिज्म अश्वेतों के अधिकार दिलाने की लड़ाई में उनके साथ खड़ा था।

आज यह देखकर खुशी होती है कि भारत में गांव-गांव की स्त्रियों में भी यह चेतना आ रही है। वे अपने और अन्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। स्त्री के अंदर की दुर्गा शक्ति अब जाग चुकी है। 

गांव-देहात से लेकर चौपाल तक वह अपने और वृहत्तर मानवीय सरोकारों के लिए उठ रही है। हालांकि देह अभी भी स्त्री मुक्ति की राह में एक बड़ी बाधा है। दुर्गा को भी इसीलिए शस्त्र उठाना पड़ क्योंकि महिषासुर उनके साथ विवाह करना चाहता था।
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित. राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित.)

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

मुल्क़ में भ्रष्टाचार पर चिंतित हैं ये लेखक

मित्रो, 
आज हम एक ऐसे वक्त में रह रहे हैं जब पूरे मुल्क़ में घपले, घोटाले और भ्रष्टाचार के नए-नए मामले रोज़-ब-रोज़ हमारे सामने आ रहे हैं. इनमें नेता भी हैं पूंजीपति भी, ब्यूरोक्रेट्स भी हैं जज भी, और पत्रकार भी.  और अब भ्रष्टाचार की तोहमत सिर्फ मर्दों पर भी नहीं लगाईं जा सकती. हर दिन, हर पल मीडिया की सुर्खियाँ बन रही भ्रष्टाचार की इन अनगिनत दस्तानों पर हमारा लेखक तबका क्या सोच रखता है, इसको लेकर 10 दिसंबर 2010 को चार लेखकों (अशोक वाजपेयी, असगर वजाहत, आलोक राय और अनामिका ) से बातचीत हुई, जो 11 दिसंबर के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली संस्करण में साहित्य के पन्ने पर प्रकाशित हुई है. इन्हें आपके हवाले कर रहा हूँ. 
शुक्रिया.  
- शशिकांत  

लालची हो गया है हमारा मध्य वर्ग : अशोक वाजपेयी
देश में चौतरफा फैले भ्रष्टाचार के मामले में दो-तीन मुख्य बातें हैं।  पहली, संविधान की धारा तीन सौ गयारह है। इस धारा में देश के सिविल सेवकों को सुरक्षा मिली हुई है!

पहला सवाल यह उठता है कि सिविल सेवकों को इस तरह की सुरक्षा क्यों मिली हुई है। आज जब रोज-रोज घपले और घेटाले के मामले सामने आ रहे हें तो धारा तीन सौ गयारह, जो उन्हें सुरक्षा देती है, उस पर पुनर्विचार होना चाहिए। क्योंकि या तो देश के सिविल सेवकों द्वारा इसका दुरूपयोग हो रहा है, या इसके कारण भ्रष्टाचार में संलिप्त सिविल सेवकों पर ठोस कार्रवाई विलंबित हो रही है।

दूसरी बात ये है कि भारत सरकार यदि सचमुच देश में फैले भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहती है या इस तरह के मामलों को लेकर गंभीर है तो वह तत्काल प्रभाव से कम से कम पांच सौ प्रथम स्रेणी के वैसे अधिकारियों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करके उन्हें बर्खास्त करने की पहल करे जिनकी भ्रष्टाचार के गंभीर मामले में संलिप्तता रही है और जिनकी अक्षमता जगजाहिर है। सरकार यह कदम सख्ती से उठाए ताकि सबको सबक मिल सके और लोग भ्रष्टाचार के मामलों में संलिप्त होने से परहेज कर सकें। 

तीन, देश में फैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध और उसको पोसनेवाली राजनीति के विरुद्ध एक देशव्यापी सामाजिक अभियान चलाना चाहिए ताकि नागरिक निगरानी और चौकसी बढ़ाई जा सके । दरअसल राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना भी उतना ही जररूरी है।

आज के समय में हम जिन घपलों और घेटालों को लेकर चितित हैं। यह अब जगजाहिर है कि देश के मध्य वर्ग में बड़ी तेजी से बढ़ती दौलत और इसी मध्य वर्ग में बढ़ते लालच की वजह से ये सब हो रहे हैं।

मेरा कहना है कि हमारे देश के विराट मध्य वर्ग को थोड़ा ठिठकर, थोड़ा ठहरकर  अपने अंत:करण को टटोलना चाहिए और अचने लालच पर लगाम लगाना चाहिए।यदि हमारा मध्य वर्ग ऐसा करता है तो मुझे उम्मीद है कि भ्रष्टाचार की वर्तमान स्थिति में सार्थक बदलाव होगा। ये काम सरकारें और अदालतें नहीं कर सकतीं बल्कि हमारे समाज को ही करना होगा, जो इसका भुक्तभोगी है।

चूंकि भ्रष्टाचार अब मीडिया तक फैल गया है, ऐसे में हमें देश के भीतर व्यापक स्तर पर ऐसे मंच बनाने होंगे और ऐसे मंचों को लगातार पोसना पड़ेगा जहां से भ्रष्टाचार के विरुद्ध जोरदार ढंग से आवाज उठाई जा सके।

अव्वल तो यह है कि हमारे लेखकों की अब ऐसी स्थिति नहीं रहने दी गई है कि उसकी सामाजिक आवाज देश की आम जनता सुन सके और उसके आधार पर अपनी समस्याओं का हल ढूंढ सके। लेकिन इस विपरीत माहौल में ऐसा कोई कारण नहीं है कि लेखक तबका इन घपलों और घोटालों के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाए।

भ्रष्टाचारियों को गोली मार देनी चाहिए : असगर वजाहत
मेरा यह मानना है कि हमारी जो सत्ता है इसमें आते हैं राजनीतिज्ञ, ब्यूरोक्रेट्स और बड़े पूंजीपति। इन्हीं सब से बनती है सत्ता। सत्ता ने इस देश को बंधक बना लिया है। ये ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसा जमींदार बंधुआ मजदूरों के साथ करता है कि जब तक वह मर नहीं जाता तब तक उसका शोषण करता रहता है। हमारा यह देश बहुत बड़ा है। यह मरेगा तो नहीं लेकिन यहां जो लोग सत्ता में आ रहे हैं वे लगातार देश के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं।

हमारे यहां की गरीबी, बेरोजबारी की वजह यही है। हमारे देश के संसाधन देश की जनता पर खर्च नहीं किया जाता, सत्ता पर खर्च होता है। ये राजनीतिज्ञ लोग गरीबों के घर जाकर खाना खाते हैं, विकास को लेकर झूठ का ढिंढोरा पीटते रहते हैं।

असली मसला यह है कि संसद में भ्रष्टाचार पर आजतक कोई कानून नहीं बना। यही वजह है कि सारे भ्रष्टाचारी बच जाते हैं। यह आपत्तिजनक और निराशाजनक स्थिति है जिसमें लेखक समाज दिक्कत महसूस कर रहा है। इस माहौल को देखकर लेखक समुदाय में कटुता आ गई है। निर्मम और संवेदनहीन बनी हुई है सत्ता। लाखों-करोड़ों रुपये विदेशों में पड़े हैं। ये ऐसा काम कर रहे हैं कि अंततः डेमोक्रसी पर से देश के लोगों का विश्वास उठ जाएगा। ये भयानक काम कर रहे हैं।

जब तक पारदर्शिता, सहभागिता नहीं होगी तब तक हालात ऐसे ही रहेंगे। आप एमपी को पांच करोड़ रुपये देते हैं क्षेत्र में विकास करने के लिए। वो किसी से पूछता है कि कहां कौन काम करना है? काम करता है या नहीं यह भी उससे नहीं पूछा जाता। इसलिए पारदर्शिता और जनता की सहभागिता जरूरी है।

जनता को इन्होंने जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर बांट रखा है। अशिक्षित बनाकर रखा है पिछले साठ सालों से। जनता की जागरूकता जरूरी है। लेकिन सत्ता ने चालाकी से जनता को शिक्षित होने नहीं दिया। कितना खर्च है शिक्षा पर? बजट का सिर्फ दो प्रतिशत। जहां से विरोध की संभावना थी सत्ता ने उसे ही खत्म कर दिया।

उपाय यह है कि मीडिया आंदोलन चलाए। हालांकि मीडिया में भी करप्शन है लेकिन उतना नहीं जितना सत्ता में। हमारी सिविल सोसायटी, एनजीओ, मीडिया और सुप्रीम कोर्ट मिलकर एक माहौल बनाए। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून बनाने की जरूरत है। चीन में यदि भ्रष्टाचारी को गोली मारी जा सकती है तो हम क्यों नहीं मार सकते? लेकिन सत्ता में भ्रष्टाचारी लोग ही बैठे हैं और  संसद में भी, तो ऐसा शख्त कानून कौन बनाएगा?

भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कोई लेखक कैसे लिखे? : आलोक राय
भ्रष्टाचार के मामले आज देश में जिस तरह के मामले रोज-रोज सामने आ रहे हैं और इन मामलों में जो कुछ हो रहा है, मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि ये सब क्या हो रहा है। मुझे तो लगता है कि सभी भ्रष्टाचारी आपस में मिले हुए हैं। आपस में मिल-बांट कर खा रहे हैं।

ताज्जुब होता है कि आखिर इनके विरुद्ध कोई आवाज क्यों नहीं उठ रही है। और जब कभी इनके खिलाफ कोई आवाज उठती है तो ये सभी मिल जाते हैं। ऐसे में क्या कहूं, बड़ी विकट स्थिति है। कई बार तो मुझे लगता है कि इन भ्रष्टाचारियों को फांसी लगाना भी काफी नहीं है।  इससे भी बड़ा गुनाह कर रहे हैं ये।

यदि सचमुच हम भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते हैं तो हमें गंभीरतापूर्वक सोचना होगा। इसके लिए पर्याप्त कदम उठाना होगा। आज हम देख रहे हैं कि जिन-जिन लोगों का नाम भ्रष्टाचार के मामले में सामने आ रहा है उनमें हर कोई अपनी सफाई दे रहा है कि वो निर्दोष है। सभी में आपसी मिलीभगत है। एक जैसे हैं ये लोग।

मेरे जैसा व्यक्ति इस माहौल में बड़ा ही असहज महसूस कर रहा है। लेकिन देश के आम आदमी की दृष्टि से देखा जाए तो स्थिति की गंभीरता भयानक रूप लेती हुई दिखाई देती है। इन भ्रष्टाचारियों को मालूम होना चाहिए कि ये जो घोटाले कर रहे हैं वह सारा पैसा देश की आम जनता का पैसा है। 

इनको कल्पना भी नहीं होगी कि देश की आम जनता के मन में आज इन भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कितना आक्रोश, कितना गुस्सा और कितनी बौखलाहट है। इन्हें नहीं भूलना चाहिए कि आज हमारे देश में करोड़ों की तादाद में ऐसे गरीब और फटेहाल लोग हैं जिन्हें भर पेट खाना भी नहीं मिल रहा है। करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार के खुलासे की खबर सुनकर वह गरीब और फटेहाल जनता  क्या सोच रही होगी, इसका एहसास क्या इन्हें है, शायद नहीं।

ऐसे भयानक माहौल में लेखक तबके का एक ही काम है कि वह इन भ्रष्टाचारियों के खिलाफ लगातार लिखता रहे। लेकिन कोई लेखक जब इनके खिलाफ लिखता या बोलता है तो ये सब मिलकर उसे देशद्रोही साबित कर देते हैं।

दरअसल आम आदमी का स्वभाव कुछ ऐसा होता है कि वह रोज-रोज एक ही तरह की बातें सुनकर उसे अनसुना कर देता है या ऐसी बातें सुनना नहीं चाहता। लेखक भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार ऐसा धारदार लेखन करे कि ऐसी बातों की धार बनी रहे। आज के समय में लेखक का यही काम है।

ईमानदार बुजुर्गों और नवयुवकों का गठजोड़ बने :  अनामिका
धूल के साफ-सफाई की रोज जरूरत होती है। आदमी, उसके कामकाज, चरित्र और नैतिकता पर भी जब धूल जम जाती है तो उसकी सफाई होनी चाहिए। इसके लिए एक सजग नागरिक समूह की जरूरत पड़ती है। आज के समय में हमें लगातार नैतिकता की परीक्षा देनी  पड़ती है।
 
हम जो नव स्वतंत्र समूह हैं, स्त्रियों या गरीबी से जो लोग उपर उठे हैं उनसे मुझे काफी उम्मीद रहती है लेकिन जब दंगे फैलाने या भ्रष्टाचार में लिप्त सित्रयों का नाम सुनती हूं तो बहुत तकलीफ होती है। स्त्रियों को यदि स्वतंत्रता, सुरक्षा और अधिकार मिले हैं तो उनका दायित्व भी बढ़ गया है। ऐसी सजग और जागरूक स्त्रियों से मेरी अपेक्षा रहती है कि घर का कोई पुरुष यदि कहीं से काला धन ला रहा है तो वे पूछें कि ये पैसे वो कहां से ला रहा है?

हर आदमी के मन पर किसी न किसी स्त्री मन का दबाव रहता है चाहे वह पत्नी, बेटी, बहन, दोस्त, सहकर्मी या प्रेमिका कोई भी हो। पुरुष स्त्री का मन जीतना चाहता है। और यहीं पर औरत की भूमिका कारगर साबित हो सकती है। नैतिकता एक बड़ा मसला है जिसके निर्माण में सित्रयां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं लेकिन सित्रयां जब खुद इसमें फंस जाती हैं तो यह सुनकर मन बेचैन हो जाता है।

जहां तक सिस्टम का सवाल है तो इसमें बहुत सारी खामियां हैं। कहां से पैसा आया? किसने दिया? क्यों दिया? किस काम के लिए दिया? कहां खर्च हुआ? योग्य को दिया गया या चमचे-चालूसों, पिछलग्गुओं को? ये सारे सवाल पूछने के लिए हमारे नवयुवकों को सामने आना होगा। असली दायित्व उन्हीं की है। आज के समय में हर सिटीजन एक जर्नलिस्ट है। सजग और जागरूक सिटीजन। हर नागरिक एक पत्रकार है। ऐसे माहौल में औरतों और युवकों की भूमिका बढ़ जाती है।

मैं चाहती हूं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए हर मोहल्ले में युवकों की टोलियां बने। पुलिस और  सीबीआई जो काम नहीं कर सकी वो काम युवकों के हाथ में सौंपा जा सकता है। पढ़े-लिखे बेरोजगार  और ईमानदार युवको को यह काम सौंपा जा सकता है। इस मुहिम में ऐसे रिटायर्ड अफसरों की मदद ली जानी चाहिए जिन्होंने जिंदगी भर ईमानदारी से काम किया।

ऐसे बुजुर्गों की संख्या बहुत बड़ी है जो अलग-अलग क्षेत्र में काम करने का लबा अनुभव रखते हैं, जो अपनी ईमानदार छवि की वजह से खुद अपने ही बाल-बच्चों से ताने सुनते रहते हैं। अक्सर इनमें कई स्वभव से चिड़चिड़े और डिप्रेस्ड हो जाते हैं। अब समय आ गया है कि जिंदगी भर ईमानदारी से काम करनेवाले बुजुर्गों को पुरस्कृत किया जाए ताकि नई पीढ़ी उनसे प्ररण ले सके।    

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए ऐसे ईमानदार बुजुर्गों का एक संगठन बनाना होगा। बुजुर्गों का पज्ञाकोष और नवयुवकों का हौसला- इन्हें मिलाकर भ्रश्टाचार के खिलाफ बलपूर्वक लड़ा जा सकता है। युवकों की जनजागरण टोली घर, मोहलले और आस-पड़ोस के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ हल्ला बोले, उन्हें सुधार गृह भेजे, मनोचिकित्सकों से उनका इलाज कराए और फिर भी वे न सुधरें तो उनका अस्पतालों में उनका इलाज करवाए।

(सभी बातचीत शशिकांत के साथ.11 दिसंबर 2010 के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित.)

रविवार, 28 नवंबर 2010

बिहार विधानसभा चुनाव-2010 : कांग्रेस का रिपोर्ट कार्ड

बिहार विधानसभा चुनाव-2010 में अपने बलबूते चुनाव लड़नेवाली कांग्रेस को महज़ चार सीटें मिली हैं. इस परिणाम को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को ख़ुद मीडिया के सामने आकर सफाई देनी पड़ी. बिहार के प्रभारी मुकुल वासनिक की किरकिरी हुई उनसे राज्य में कांग्रेस की 'बुरी तरह' हुई हार की रिपोर्ट देने को कहा गया.

इस बीच बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महबूब अली कैसर को भी पार्टी हाइ कमान के सामने लाइन हाजिर होना पड़ा. यह सब इसलिए क्योंकि बिहार में कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी ने धुआंधार प्रचार किया था. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी वहां गई थीं. 

दरअसल कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार में पार्टी को मज़बूत करने को लेकर काफे गंभीर है, और इसकी कमान कमान पार्टी के युवराज राहुल गांधी ने ख़ुद अपने कंधे पर ली है. 

लेकिन ज़मीनी हकीकत के लिहाज से यदि बिहार के चुनाव परिणाम का विश्लेषण किया जाए तो आंकडे कांग्रेस को बहुत ज़्यादा मायूस नहीं करते. 243 सीटों के लिए हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में कुल साढ़े पांच करोड़ मतदाताओं में 52.71 प्रतिशत मतदाताओं ने साढ़े तीन हज़ार उम्मीदवारों के लिए अपना वोट डाला.

इनमें  नीतीश कुमार की अगुआई वाले जेडीयू को सबसे ज़्यादा 22.61 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया. दूसरे स्थान पर लालू प्रसाद का आरजेडी रहा जिसे 18.84 प्रतिशत वोट मिले. तीसरे नंबर पर रही भाजपा को 16.46  प्रतिशत वोट मिले. जबकि कई साल बाद अकेले चुनाव लड़ रही कांग्रेस चौथे नंबर पर रही. उसे चौबीस लाख तीस हज़ार छ: सौ तेईस (यानि 8.38 प्रतिशत) लोगों ने वोट दिया.

बिहार विधानसभा चुनाव-2010 में कांग्रेस के जिलावार प्रदर्शन पर गौर करें तो पूर्णिया, शेखपुरा और किशनगंज- बिहार के तीन ऐसे जिले हैं जहां उसे क्रमश: 23.7, 23.1 और 20.3 प्रतिशत वोट मिले हैं.

किशनगंज जिले में तो कांग्रेस को अन्य सभी पार्टियों से ज़्यादा वोट मिले हैं. अकेले इसी जिले में कांग्रेस को दो सीटें मिली हैं. मालूम हो किशनगंज पूर्वी बिहार का मुसलिम बहुल जिला है. सोनिया गांधी की वहां जनसभा हुई थी और अलीगढ़ मुसलिम युनिवर्सिटी का ब्रांच आफिस खोलने का मुद्दा वहां एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना था.

इसके बाद, कांग्रेस का बढ़िया प्रदर्शन (वोट प्रतिशत के हिसाब से) पूर्णिया और शेखपुरा जिले में रहा है. इन दोनों जिलों में कांग्रेस वोट प्रतिशत के हिसाब से दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. हालांकि पूर्णिया में पार्टी का सिर्फ एक उम्मीदवार जीता जबकि शेखपुरा में अच्छे-खासे वोट प्रतिशत के बावजूद उसका कोई उम्मीदवार जीत नहीं पाया.

मालूम होना चाहिए कि शेखपुरा कभी कांग्रेस के बेहद लोकप्रिय नेता स्व. राजो सिंह का इलाका है, जहां से उन्होंने स्व. राजीव गांधी की कांग्रेस पार्टी से बगावत करके बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा था और अपने काम एवं विकास की बदौलत जीतकर दुबारा कांग्रेस में शामिल हुए थे, और उसके बाद राजीव गाँधी ने शेखपुरा की यात्रा की थी.

कांग्रेस को चौथी सीट भागलपुर जिले में मिली है जहां अस्सी के दशक में भीषण दंगा हुआ था. किशनगंज के साथ-साथ अच्छी-खासी मुसलिम आबादी वाले भागलपुर जिले में कांग्रेस को मिले ठीकठाक वोट प्रतिशत के मद्देनज़र यह कहा जा सकता है कि बिहार के मुसलमान मतदाता अब लालू से अलग हो रहे हैं और कांग्रेस के साथ आ रहे हैं.

इसके अलावा बिहार के आठ जिलों में  कांग्रेस पार्टी को दस से बीस प्रतिशत वोट मिले हैं. यहाँ गौर करनेवाली बात यह है कि इनमें से छ: जिलों में वोट प्रतिशत के लिहाज से कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही है.

इन जिलों में कांग्रेस के प्रदर्शन का जायजा लें तो पार्टी को नवादा में 14.5 प्रतिशत, भागलपुर जिले में  14.4 प्रतिशत, बेगूसराय जिले में 13.0 प्रतिशत, सहरसा जिले में 12.6 प्रतिशत,  सीतामढी जिले में 11.5 प्रतिशत, मुंगेर जिले  में 10.4 प्रतिशत, कैमूर जिले में 10.5 प्रतिशत और पश्चिम चंपारण जिले में 10.3 प्रतिशत वोट मिले हैं. 

उन्नीस जिलों में कांग्रेस को पांच से दस प्रतिशत वोट मिले हैं. ये जिले हैं- मधेपुरा,सुपौल,मधुबनी,दरभंगा, पू चंपारण, अररिया, रोहतास, कटिहार, मुज्जफ्फरपुर, समस्तीपुर,  जमुई,  खगड़िया, जहानाबाद, लखीसराय, औरंगाबाद, बांका, सारण, गोपालगंज और गया.
कांग्रेस के लिए चिंता की सबसे बड़ी बात बिहार के ये आठ जिले (अरवल, बक्सर, भोजपुर, पटना, नालंदा, वैशाली, सिवान और शिवहर) हैं जहां पार्टी को पांच प्रतिशत से भी कम वोट मिले हैं.
पोस्ट पोल विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने बिहार विधानसभा के चुनाव में भले महज़ चार सीटें जीती हों लेकिन इस चुनाव में पार्टी ने अकेले चुनाव लड़कर राज्य में अपना जनाधार बढ़ाया है. जेडीयू (22.61 प्रतिशत), आरजेडी (18.84 प्रतिशत) और भाजपा (16.46 प्रतिशत) को जो वोट मिले हैं उसमें गठबंधन का लेन-देन है लेकिन कांग्रेस को सिर्फ और सिर्फ अपने बूते चौबीस लाख तीस हज़ार छ: सौ तेईस (यानि 8.38 प्रतिशत) लोगों का वोट मिला है. 

यानि पांच करोड़ मतदाताओं वाले बिहार में पच्चीस लाख लोगों को कांग्रेस की नीतियों में आज भी भरोसा है. यह आंकडा बहुत बुरा नहीं है. किशनगंज, पूर्णिया और शेखपुरा जिले में पार्टी को अपने प्रदर्शन पर फ़ख्र करना चाहिए जहां उसका प्रदर्शन अच्छा रहा है. नवादा, भागलपुर, बेगूसराय, सहरसा, सीतामढी, मुंगेर, कैमूर और पश्चिम चम्पारन जिले में भी पार्टी का प्रदर्शन संतोषप्रद है. कांग्रेस को सकारात्मक सोच के साथ बिहार के विकास के लिए काम करना चाहिए.

जिलावार कांग्रेस का प्रदर्शन 
अच्छा (20 प्रतिशत से ज्यादा वोट) : किशनगंज, पूर्णिया और शेखपुरा.
संतोषजनक (10 से 20 प्रतिशत वोट) : नवादा, भागलपुर, बेगूसराय, सहरसा, सीतामढी, मुंगेर, कैमूर और पश्चिम चम्पारन.
खराब (5 से 10 प्रतिशत वोट) : मधेपुरा (9.8 प्रतिशत), सुपौल (9.2 प्रतिशत), मधुबनी (9.1 प्रतिशत), दरभंगा (8.6 प्रतिशत), पू चंपारण (8.6 प्रतिशत), अररिया (8.5प्रतिशत), रोहतास (7.6 प्रतिशत), कटिहा(7.1 प्रतिशत), मुज्जफ्फरपुर (7.1 प्रतिशत), समस्तीपुर (7.1 प्रतिशत), जमुई (6.8 प्रतिशत), खगड़िया (6.7 प्रतिशत), जहानाबाद (6.4 प्रतिशत), लखीसराय (6.3 प्रतिशत), औरंगाबाद (6.2 प्रतिशत), गोपालगंज (5.9 प्रतिशत), बांका (5.7 प्रतिशत), सारण (5.7 प्रतिशत), और गया (5.0 प्रतिशत).
बहुत खराब (5 प्रतिशत से कम वोट) : पटना, अरवल, बक्सर, सिवान, वैशाली, नालंदा, भोजपुर और शिवहर.