बड़े गपोड़ होते हैं ये हिंदीवाले !

मित्रो, यह टिप्पणी आज राष्ट्रीय सहारा के रविवारीय 'उमंग' में प्रकाशित हुई है. इसका मज़ा लें ! - शशिकांत 

‘‘गप्प-शप्प का अपना रस होता है। इस गप्प शप्प में हम सांस्कृतिक क्षेत्र में चलने वाले  कार्यकलाप, 
लेखक के आपसी रिश्ते, उन्हें परेशान करनेवाले तरह-तरह के मसले, उनके जीवनयापन की स्थिति, 
उनके आपसी झगड़े और मनमुटाव आदि आदि हमारी सांस्कृतिक गतिविधि से पर्दा उठाते है और
हम लेखक को हाड़ मांस के  पुतले के रूप में देख पाते है। लेखक अपनी इन कमजोरियों के रहते 
अपनी लीक पर चलता हुआ सृजन के क्षेत्र में कहीं सफल और कहीं असफल होता 
हुआ अपनी इस यात्रा को कैसे निभा पाता है, इसे हम उसके जीवन के 
परिप्रेक्ष्यमें देख पाते हैं।’’  
- भीष्म साहनी
गॉसिप यानि गप्प। यानि अफवाह, झूठ, छद्म वगैरह-वगैरह। सेलिब्रेटी लोग गॉसिप से खार खाते हैं। खासकर बॉलिवुड के स्टार्स। पता नहीं कौन पेपर, मैगजीन या इंटरटेनमेंट चैनल किसके बारे में कौन सी गॉसिप उड़ा दे, और वो भी नमक-मिर्च मिलाकर। कुछ सेलिब्रेटिज गॉसिप को अपनी पर्सनल लाइफ में मीडिया की घुसपैठ मानते हैं तो कुछ इसके खूब मजे लेते हैं। आखिर इससे उनकी पॉपुलरिटी जो बढ़ती है। आम लोगों के लिए तो सेलिब्रेटिज की पर्सनल लाइफ को जानने का एकमात्र जरिया है गॉसिप।
वैसे हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया में काफी पोपुलर है गॉसिप। कई मुल्कों के अखबारों में तो हर दिन गॉसिप के कॉलम छपते हैं। वहां हर फील्ड के सेलिब्रेटीज इसके दायरे में होते हैं। क्या नेता, क्या अभिनेता, उद्योगपति, यहाँ तक कि वैज्ञानिक, खिलाड़ी, और तो और बड़े लेखक भी। मीडिया एक्टिविज्म के दौर में अब अपने यहाँ भी अलग-अलग क्षेत्रों की बड़ी शख्सियतों से जुड़े गॉसिप सामने आने लगे हैं। भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य भी गॉसिप से अछूता नहीं है। आए दिनों यहां तरह-तरह के गॉसिप चलते रहते हैं। मसलन, साहित्यिक हलके में सन 2010 की कुछ बहुचर्चित गॉसिपों को ही देख लीजिये!
स्नोवा बार्नो
गॉसिप नंबर 1.
ये स्नोवा बार्नो कौन है? साल 2009-10 में हिंदी साहित्य जगत में एक गॉसिप छाया रहा एक छद्म लेखिका को लेकर।  स्नोवा बार्नो उसका नाम है। विदेशी चेहरे-मोहरे और नामवाली इस अज्ञात युवा कथा लेखिका ने ‘हंस’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘पाखी’, ‘पहल’, वागर्थ’, ‘वसुधा’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘इंडिया टुडे’, ‘आउटलुक’, ‘सरिता’ जैसी हिंदी की बड़ी और चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं में लीक से हटकर दे दनादन कई कहानियाँ लिखीं और वो भी हिंदी में. इस लेखिका को लेकर समूची साहित्यिक बिरादरी काफी दिनों तक उद्वेलित रही।

‘हंस’ के दफ्तर में डाक से आई रचना के लिफाफे पर लिखे मनाली के पते पर उसको तलाशा गया। उसके बाद कलकत्ते में। सबसे पहले इसका जन्म मनाली (हिमाचल प्रदेश) में एवं शिक्षा-दीक्षा हेलसिंकी (फिनलैंड), वार्सा (पोलैंड) बनारस, लखनऊ और लेह में बताया गया, जो फिलहाल मनाली में रहकर सजृन कर रही हैं।
भूमिगत होकर लिख रही और बड़ी तेजी से उभरी इस गुप्त लेखिका की खोज में मनाली के कुछ साहित्यकारों को भिड़ाया गया। लेकिन चूंकि इस मायावी युवा लेखिका का सम्पर्क-पता मनाली (हिमाचल प्रदेश) स्थित किसी पोस्ट ऑफिस का एक पोस्ट बॉक्स नम्बर था इसलिए उनकी तलाश करनेवाले को हाथ ही मलना पड़ा। 
यह भी खबर आई कि वहां ऐसी कोई लेखिका तो है ही नहीं और न ही वहां (मनाली में) कभी किसी ने उसे देखा है। यानि अब यह माना जाने लगा कि स्नोवा बार्नो के छद्म नाम से कोई और शख्स लेखन कर रहा है या कर रही है। लेकिन फिर भी इस सहस्यमय लेखिका के ठिकाने की खोजबीन जारी रही, जो भूमिगत रहते हुए बोल्ड किस्म का लेखन कर रही थी। 
दरियागंज स्थित ‘हंस’ दफ्तर में राजेंद्र यादव की बैठकी में शामिल लेखकों के बीच इस लेखिका के बारे में तरह-तरह के गप्प चलते रहे। खूब ब्लॉगबाजियां भी हुईं। फिर एक सूचना आई कि स्नोवा बार्नो को ओशो आश्रम में देखा गया है। एक साहब ने तो इसे किसी विदेशी सैलानी दल के साथ किसी पर्यटन स्थल पर देखा जाना भी बताया जिसके साथ कैमरा बदलकर उन्होंने एक दूसरे के फोटो भी खीचे।
राजेन्द्र यादव
एक संभावना यह भी जताई गई कि किसी विदेशी सैलानी की फोटो का उपयोग कर यह मायाजाल रचा गया है। आगे चलकर राजेंद्र जी के खुफिया साहित्यकारों ने यह भी खबर जुटाई कि फ्रीलांसिंग करनेवाली इस तथाकथित प्रतिभाशाली बाला नें कुछ अँग्रेजी कहानियाँ, कविताएँ, यात्रा वृतांतों के साथ ‘द वंडर जर्नी’ शीर्षक से एक उपन्यास भी लिखा है।
‘हंस’ में स्नोवा बार्नो की कई कहानियां छपीं, मसलन ‘बारदो’, ‘मुझे घर तक छोड़  आइए’, ‘मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है।’ लेखन में निरालापन और ताजगी, कथाशिल्प और शैली के अनोखेपन, बेबाकी और बेहतरीन कसावट से प्रभावित होकर कई दिलफेंक हिंदी पाठक, लेखक और संपादक इस खूबसूरत युवा लेखिका को बधाई देने के मौके तलाशते रहे।
कुछ उसे निरंतर लिखते रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते थे तो कई खतो-किताबत कर उससे टांका भिड़ाने का बहाना ढूँढ रहे थे। कुछ तो इस कदर बेताब हो गए कि मनाली की फ्लाइट का समय पूछते नजर आए।
मार्च 2009 के ‘हंस’ में स्नोवा के एक पत्र के साथ उसकी तथाकथित अंतिम कहानी छपी- ‘लो आ गई मैं तुम्हारे पास।’ बेहतर शिल्प, परिपक्व किस्म का लेखन, उन्मुक्ततावादी बुद्धिजीविता जनित दर्शन, स्त्री-पुरुष के नितान्त अंतरंग संबंधों की शुद्ध जैविक यौन अनुभूति, अविवेकपूर्ण कामशास्त्रीय अभिव्यक्ति और अप्रासंगिक रूप से गुजरात दंगों एवं साम्प्रदायिक शक्तियों के प्रति भोंडी और अ-कलात्मक प्रतिक्रिया।
पत्र में अपने अस्तित्व को लेकर उठ रहे प्रश्न की पृष्ठभूमि में स्नोवा ने खुद को एक साल के लिए किसी आकल्ट स्कूल द्वारा सौंपे गए कार्य के तहत स्त्री-पुरुषों के नैसर्गिक और चेतनापूर्ण प्रेम संबंधों पर नई तरह की रचनाएँ रचने और पाठकों तक पहुँचाने के एक तरह से मिशननुमा कार्य में लगे होने की अनोखी सूचना देते हुए और भी कई सारे बौद्धिक स्पष्टीकरण दिये हैं।
जया जादवानी
कई बड़े संपादकों, साहित्यकारों, और समीक्षकों से मिले समर्थन को, नारी सुलभ आकर्षण विकसित करने में प्राप्त सफलता के रूप में देखते हुए स्नोवा ने उन (इस आकर्षण में सफलता से फँसे) तमाम बुद्धिजीवियों के नामों का उल्लेख किया है जिन्होंने स्नोवा की कहानियाँ, कविताएँ पढकर उसे प्रोत्साहित किया और शाबाशियाँ दीं। कुछ ने फोन करके लेखिका का हौसला बढाया। स्नोवा ने सभी को नतमस्तक भाव से ग्रहण किया। इधर कुछ सिरफिरे पाठकों और लेखक-लेखिकाओं ने इस पूरे मामले को मिथ्या बताया।
राजेन्द्र यादव ने बताया, ‘‘पिछले साल ‘हंस’ में मैंने स्नोवा बार्नो की कई कहानियां प्रकाशित कीं और इस साल उसको लेकर तरह-तरह के गॉसिप सामने आए। कई लोग मनाली में उसके डाक के पते पर उसे खोजने गए लेकिन वह नहीं मिली। फिर खबर मिली कि वो कलकत्ते में रह रही है। कुछ लोगों ने वहां भी उसे खोजा लेकिन वह नहीं मिली। लेकिन अब पता चला है कि जया जादवानी ही स्नोवा बार्नो के नाम से वो कहानियां लिख रही थीं। वैसे एक खबर यह भी है कि जया जादवानी और स्नोवा बार्नो मिलकर लिख रही थीं और स्नोवा अब पोलैंड, फिनलैंड या स्वीटजरलैंड लौट गई हैं।" राजेंद्र जी से बात करने के बाद मैंने गूगल इमेज में jayajaadvanee  कंपोज कर एंटर दबाया तो पेज नंबर दो पर स्नोवा बार्नो का हिंदी लोक में अवतरित फोटो ही खुला। आप लोग भी देख सकते हैं।
गॉसिप नंबर 2.
जब अशोक वाजपेयी को सफाई देनी पड़ी: रवींद्र कालिया के संपादन में भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ में प्रकाषित विभूति नारायण राय के विवादास्पद इंटरव्यू के और प्रसंग में हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक अशोक वाजपेयी के खिलाफ ऐसी अफवाह उड़ी कि उन्हें हिंदी के एक अखबार में सफाई देनी पड़ी।
अशोक वाजपेयी
अपने उस साप्ताहिक कॉलम में अशोक वाजपेयी ने लिखा, ‘‘इस बीच एक और अफवाह फैलाई गई। कुंवर नारायण और मैं इस प्रसंग में ज्ञानपीठ की अध्यक्ष इंदु जैन से मिले हैं। अव्वल तो इस प्रसंग को लेकर कुंवर जी से मेरी बात तक नहीं हुई। दूसरे इंदू जैन से कोई बीस बरस पहले नाश्ते पर एक सौजन्य भेंट हुई थी, जब मुझे ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक का पद ऑफर किया गया था। उसके बाद उनसे कभी नहीं मिला। तीसरे, जो कुछ मैं इस विवाद में चाहता हूं, उसे खुलकर बता चुका हूं, गुप्त कोई काम करना मेरी आदत में शामिल नहीं है। पर इस झूठ को सरासर फैलाने का काम शुरू किया गया।’’
गॉसिप नंबर 3. 
जब बीबीसी ने भारत की एक इंटरनेशनल हिंदी यूनिवर्सिटी को इंटरनेशनल कॉलेज बना दियाः 16 अगस्त 2010 को बीबीसीहिंदीडॉटकॉम ने अपने साईट पर एक खबर पोस्ट की। उस पोस्ट में उसने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय महाविद्यालय लिख दिया. हिंदी के कई बलॉगरों ने जब बीबीसीहिंदीडॉटकॉम की इस हरकत को नोटिस लिया और ध्यान दिलाया कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय है न कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय महाविद्यालय। तब कहीं जाकर इसे दुरुस्त किया गया। लेकिन तब तक कई ब्लॉगर कॉपी करके इस खबर को अपने ब्लॉग पर चढ़ा चुके थे. बड़े गपोड़ होते हैं ये हिंदीवाले!

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