2001-2010 साहित्य : कलम का कमाल

साथियो, 
 यह टिप्पणी 26 दिसम्बर 2010 को राजस्थान  पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। भाई हेतप्रकाश व्यास के आग्रह पर जल्दबाजी में लिखी गई यह टिप्पणी आपके हवाले कर रहा हूं।  - शशिकांत 

  • भारतीय मूल के लेखकों का दुनिया में दबदबा।
  • 88 साल बाद भारतीय मूल के लेखक को मिला नोबेल।
  • अंग्रेजी साहित्यिक लेखन में यूरोप और अमरीका के लेखकों का आधिपत्य टूटा है। 
अरुंधति रॉय 

अक्टूबर 2001 भारतीय साहित्य जगत में घटित वह यादगार तारीख थी जब स्वीडिश अकेडमी ने भारतीय मूल के लेखक वी एस नायपाल को साहित्य का नोबेल प्राइज देने की घोषणा की। भारतीय या भारतीय मूल के किसी लेखक को साहित्य का यह नोबेल पुरस्कार अठ्ठासी साल बाद
मिला था।    

उसके बाद सन् 2006 का बुकर पुरस्कार भारतीय मूल की लेखिका किरण देसाई को उनकी किताब ‘दि इन्हेरिटेंस ऑफ  लॉस’ को दिया गया।  


उदय प्रका
उसके बाद सन 2008 का बुकर पुरस्कार एक बार फि र भारतीय मूल के लेखक अरविन्द अडिगा को उनके उपन्यास ‘दि ह्वाइट टाइगर’ पर मिला। उस साल बुकर पुरस्कार के लिए आखिरी दौर में जिन छह लेखकों की किताबें पहुंचीं उनमें भारतीय मूल के लेखक अमिताव घोष की किताब ‘सी ऑफ  पोपीज’ भी थी।

बीते दशक में मुख्यधारा के साहित्य के साथ-साथ पोपुलर साहित्य ने भी भारत और भारत से बाहर अपना जलवा बिखेरा है। बॉलीवुड में सक्रिय बहुचर्चित गीतकार गुलजार को 2009 में ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ फिल्म के गाने ‘जय हो...’ गाने लिखने के लिए के लिए ऑस्कर और ग्रेमी पुरस्कार से स्मानित किया गया।
अमिताव कुमार

 पिछले दशक में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भारत और भारतीय मूल के बहुत सारे लेखक सक्रिय रूप से सामने आए हैं। वी एस नायपॉल, विक्रम सेठ, सलमान रश्दी, कुर्तुल एन हैदर, निर्मल वर्मा, कुंवरनारायण, अरुंधति रॉय, उदय प्रकाश, चेतन भगत, अरविन्द अडिगा, झुम्पा लाहिरी, अमितावा कुमार सरीखे  भारतीय या  भारतीय मूल के लेखकों की अंतरराष्ट्रीय ख्याति इस बात का प्रमाण है। 

 भारतीय साहित्य के लिए यह गर्व की बात है। खास बात यह है कि अंग्रेजी साहित्यिक लेखन पर से यूरोप और अमरीका के लेखकों का एकछत्र 

झुम्पा लाहिरी
आधिपत्य टूटा है और भारतीय मूल के लेखकों ने उन्हें तगड़ी चुनौती दी है।

इस दशक में एक खास बात यह देखी कि इस दौरान भारत में अरुंधति रॉय, उदय प्रकाश, प्रसून जोशी, चेतन भगत, बेबी हालदार जैसे युवा लेखकों की एक ऐसी जमात सामने आई जिसने लेखन को काफी लोकप्रिय बनाया।
किरण देसाई

पिछले दशक में अंग्रेजी के कई बड़े लेखकों की बहुचर्चित किताबें हिंदी और  अन्य भारतीय भाषाओं में छपकर आई हैं। इसी तरह हिंदी और अन्य भारतीय भाषा के लेखकों की लोकप्रिय कृतियां अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, पोलिस, जापानी, स्पैनिश, इटैलियन और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुई हैं। अनुवाद ने इसमें महती भूमिका निभायी है।
विक्रम सेठ

इस दशक में विक्रम सेठ, वी एस नायपॉल, सलमान रश्दी, अरुंधति रॉय, उदय प्रकाश, चेतन भगत, प्रसून जोशी, बेबी हालदार, अशोक वाजपेयी, गुलजार, जावेद अख्तर, कुंवर नारायण, अशोक वाजपेयी, विजयदान देथा, विष्णु खरे जैसे सेलिब्रेटी बनकर उभरे लेखकों की किताबें अनूदित होकर भाषाई दीवारों के दायरे से बाहर के पाठकों के हाथों में पहुंची हैं।  

यह इस दशक की एक बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।

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