हम गुनहगार औरते हैं, न सर झुकाएं, न हाथ जोड़ें : किश्वर नाहीद

कीश्वर नाहीद
"हमारे यहां लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज़ नहीं है, अगर तुम लड़कियों को पढ़ाओगी तो मेरे घर मत आना।" यह बात कही थी उर्दू की बहुचर्चित रायटर किश्वर नाहीद के अब्बू ने उनकी अम्मी से, क्योंकि वो अपनी बेटी किश्वर नाहीद को तालीम दिलाने की ख़्वाहिश रखती थीं। 

बड़ी तकलीफ़ के साथ उन लम्हों को याद करती हुई वो कहती हैं, "मैंने उस ज़माने में तालीम हासिल की जब लड़कियों की पढ़ाई को अहमियत नहीं दी जाती थी। मेरे नाना उस वक्त बुलंदशहर के मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने अम्मा से कहा, "हमारे यहां लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज़ नहीं है, अगर तुम लड़कियों को पढ़ाओगी तो मेरे घर मत आना।" 
अम्मा ने कहा, "ठीक है मैं नहीं आऊंगी, लेकिन लड़कियों को पढ़ाऊंगी ज़रूर।" 
अब्बा ने कहा, "जितने पैसे घर ख़र्च के देता हूं, उससे एक पैसा ज़्यादा नहीं दूंगा।" 
अम्मा ने कहा, "आधी रोटी ख़ाऊंगी लेकिन लड़कियों को पढ़ाऊंगी।" 
अम्मा ने सोचा कि लड़कियां मैट्रिक पास करके अपना घर बसाएंगी। लेकिन मैट्रिक पास करने के बाद मैंने शोर मचाया कि मुझे कॉलेज जाना है। फिर मैंने बी.ए. किया, एम.ए. किया और नौकरी की।"

किश्वर नाहीद की पैदाइश सन 1940 में बुलंदशहर में हुई थी। पार्टीशन के बाद वो पाकिस्तान चली गईं। अपने बचपन और हिंदुस्तान के प्रति अपनी फीलिंग को याद करती हुई किश्वर कहती हैं, "उस वक्त मैं बहुत छोटी थी। भाइयों के साथ खेलती थी। गुल्ली-डंडा, पतंग उड़ाना। बँटवारे के बाद क़त्ल-ओ-ग़ारत हुई, लड़कियों का बलात्कार किया गया, लड़कियां अगवा की गईं। आज भी उन सब चीज़ों का अक्स नज़र आता है। लेकिन हिंदुस्तान से मेरा रिश्ता घर-आंगन जैसा है।" 

उर्दू अदब में आज किश्वर नाहीद की एक ख़ास मुकाम है लेकिन एक औरत होने की वजह से उन्हें  कितनी ज़द्दोज़हद करनी पड़ी, ख़ुद उन्हीं की ज़ुबान से सुन लीजिए, "मैंने कॉलेज के जमाने से ही शेरो-शायरी शुरू कर दी थी। एक रोज़ अब्बा ने कहा, "तुम्हें जितना मशहूर होना था हो चुकी, अब जिससे ग़ज़ल ली है उसे वापस करो और एक शरीफ़ लडक़ी की तरह ज़िन्दगी गुज़ारो।" उन्होंने माना ही नहीं कि यह शायरी मैंने की थी। शुरू में पाबंदियां लगाई गई थीं कि आप इश्क का ज़िक्र नहीं करेंगी, आप औरतों की आज़ादी की बात नहीं करेंगी। लेकिन मैंने शुरू ही यहां से किया- घर के धंधे तो निबटते ही नहीं नाहीद / मैं निकलना भी अगर शाम को घर से चाहूं।" धीरे-धीरे शायरात आती गईं काफ़िला बढ़ता गया। फेहमिदा रियाज़ आईं, सारा शगुफ़्ता आईं। और भी बहुत अच्छे नाम हैं जिन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराई। लेकिन आलोचकों ने कभी इस पर गौर नहीं किया कि एक  औरत किस तरह अपनी सोच से समाज को बदल रही है, क्या नई चीज़ पेश कर रही है।"

पाकिस्तान में रहते हुए भी किश्वर नाहीद ने अपनी शेरो-शायरी में औरत की नई तस्वीर पेश की है। औरत को वह मर्द के  सामने दोयम दर्ज़े में नहीं देखना चाहतीं। यहां तक कि वो इश्क करने के मामले में भी। वो कहती हैं, आज के वक्त में मेरा मानना है कि अगर मर्द को इश्क  करने का हक़ है तो वह औरत को भी है। लेकिन उसके इजहार के अंदाज़ हो सकते हैं। जैसे मीरा ने कहा है, "मैं तो प्रेम दीवानी" लेकिन मैं यह नहीं कहूंगी, मैं तो कहूंगी, "मैं नजर आऊं हर सिम्त से, जिधर से जाऊं / मैं गवाही हरेक आइनागर से चाहूं।" 

आलोचकों ने कभी इस पर गौर नहीं किया कि एक औरत किस तरह अपनी सोच से समाज को बदल रही है, क्या नई चीज़ पेश कर रही है। मतलब यह कि मेरी मौजूदगी को, मेरे वजूद को मानना चाहिए। बाद में, मैंने जो कुछ कहा वह सभी औरतों ने कहा। इसकी जरूरत भी थी ताकि औरत का लहज़ा सामने आए।"

किश्वर नाहीद आज उर्दू अदब में ही नहीं पाकिस्तान की सरजमीन पर भी औरतों को हक़ दिलाने की लड़ाई लड़ रही हैं।  "औरतों के हक को लेकर मैं शुरू से फ़िक्रमंद रही हूँ। शहर की ज़िन्दगी में औरत की लाइफ में थोड़ा बहुत बदलाव ज़रूर नज़र आया है लेकिन गांव की ज़िन्दगी भी उससे अछूती है। आज भी गांव की औरत मटर तोड़ती, आलू तोड़ती नज़र आती है। हमें उन्हें पढ़ाना है, बहुत कुछ सिखाना है। ह्यूमन राइट ऑर्गनाइजेशन्स के साथ काम करते समय मैंने पाया कि कामकाज़ करने वाली औरतों का कितना शोषण किया जा रहा है। उनका सारा मुनाफ़ा तो दलाल खा जाते है। मैंने अपने फंड के पैसे से "हौवा" नामक संस्था बनाई। मेरी संस्था औरतों से हस्तशिल्प का सामान खरीदती है। हर महीने की पहली तारीख से लेकर सात तारीख़ तक  उनके पैसे पहुंचा दिए जाते हैं। इसके अलावा कानूनी और आर्थिक मदद भी दी जाती है।" यह कहना है पाकिस्तान की बहुचर्चित रायटर किश्वर नाहीद का।

अदब और इंसानियत की कोई सीमा नहीं होती। हिंदुस्तान में पैदा हुई पाकिस्तान की यह मशहूर लेखिका हिंद-पाक रिश्तों में अक्सर आनेवाले उतार-चढ़ाव को लेकर खुद को असहज महसूस करती हैं, "मेरे अंदर शुरू से यह एहसास था कि चाहे वह घर हो या मुल्क, जंग से कुछ हासिल नहीं होता। हमें जंग नहीं सुलह की बात करनी चाहिए और यही लोग चाहते हैं क्योंकि  एटम बम रोटी नहीं खिला देता, ग़रीबी नहीं दूर करता। लोगों को तालीम देने के लिए एटम बम की नहीं ऐसे समाज की जरूरत है जो इंसान को इंसान बनना सिखाए।" 

शायद यही वजह है कि किश्वर नाहीद को जब भी मौक़ा मिलता है तो वो मुशायरों में शरीक़ होने हिंदुस्तान आना पसंद करती हैं। हिंदुस्तान में लोग अक्सर मेरी चर्चित नज़्म "हम गुनाहगार औरतें हैं" सुनना पसंद करते हैं-

"ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहले-जुब्बा की तमकनत से
न रोआब खोएं
न बेचें
न सर झुकाएं
न हाथ जोड़ें


ये हम गुनहगार औरते हैं
के : जिनके जिस्मों की फ़सल बेचें जो लोग
वो सरफ़राज़ ठहरें
नियाबते-इम्तियाज़ ठहरें


ये हम गुनहगार औरते हैं
के : सच का परचम उठा के निकलीं
तो झूठ से शहराहें अटी मिली हैं
हरएक दहलीज़ पे
सज़ाओं की दास्तानें रखी मिली हैं
जो बोल सकती थीं, वो ज़बानें कटी मिली हैं


के : अब ताअकुब रात भी आए
तो ये आंखें नहीं बुझेंगी
के : अब जो दीवार गिर चुकी है
उसे उठाने की ज़िद न करना


ये हम गुनहगार औरते हैं
जो अहले जुब्बा की तमकनत से
न रोआब खोएं
न बेचें
न सर झुकाएं, न हाथ जोड़ें."

शब्दार्थ :
(अहले जुब्बा : मज़हब के ठेकेदार, सरफ़राज़ : सम्मनित, नियाबते इम्तियाज़ : सही-ग़लत में फ़र्क करनेवाला, ताअकुब : तलाश में, तमकनत : प्रतिष्ठा)

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