गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

शतरंज की बिसात पर अमेरिका : टी. एस. आर. सुब्रमण्यम ने शशिकांत से कहा

टी. एस. आर. सुब्रमण्यम
मित्रो, उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस ऑफिसर 
और भारत सरकार के पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी
टी. एस. आर. सुब्रमण्यम  रिटायर होकर 
आजकल नोएडा में रह रहे हैं. 
रिटायरमेंट के बाद भी वे 3-4 चैरिटी आर्गनाइजेशन से जुड़कर 
सोसायटी के डेवलपमेंट के लिए काम कर रहे हैं। 
वे कैनेडियन एनजीओ "मैक्रो न्यूट्रीशन" के चेयरमैन भी हैं।       
सुब्रमण्यम  साहब 1983 में जेनेवा गए. 
उन्होंने गैट और डब्ल्यूटीओ में 5-6 साल काम किया. 
28 दिसंबर 2010 की शाम को जब मैंने 
उनको  फ़ोन किया तो वे मद्रास में थे.  
उन्होंने सुबह 8.30 बजे फ़ोन करने कहा.  
कल सुबह-सुबह 2010 में इंडो-यूएस रिलेशन पर उनसे बात हुई 
जो आज दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित हुई है. 
आप भी पढ़ें !   -शशिकांत  

सन 2010 में बराक ओबामा साहब मुंबई और नई दिल्ली आए। दरअसल, 2008 में फाइनेंसियल क्राइसिस के बाद वहां बहुत सारी नौकरियां चली गईं। इतना ही नहीं, पिछले सालों में चीन ने विश्व की अर्थव्यवस्था में अमेरिका को तगड़ी चुनौती देकर अपनी धाक जमाई है। विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा में चीन अमेरिका को लगातार पछाड़ रहा है। इसी तरह, पिछले दस सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का ग्राफ भी काफी तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका यह जानता है कि इसकी एक बड़ी वजह भारत और चीन में उपलब्ध विशाल मानव संसाधन और सस्ता श्रम है। 

अमेरिका को अब यह समझा में आ गया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को इस बड़ी चुनौती से निपटने में भारत उसके लिए काफी कारगर सिद्ध होगा। इसीलिए पहले बुश साहब भारत आए और फिर ओबामा साहब।  रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेट्स- दोनों भारत को अमेरिका का पार्टनर बनाना चाहते हैं। अमेरिका को पता है कि भारत के साथ यदि अमेरिका संबंध सुधरता है तो राजनीतिक और आर्थिक- दोनों फ्रंट पर अमेरिका को फायदा ही फायदा है। वह यह भी जानता है कि वैश्विक आर्थिक  मंदी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं के बराबर असर पड़ा है इसलिए अमेरिका में आर्थिक मंदी से उबरने में भारत उसकी मदद करेगा। 
 
अगले दस-बारह सालों में, यानि सन 2020-23 तक चीन की अर्थव्यवस्था दुनिया में नंबर एक पर हो जाएगी। अमेरिका को यह खतरा दिख रहा है। इसलिए भी वह भारत के साथ राजनीतिक और आर्थिक दोनों फ्रंट पर डायलॉग करना चाहता है और भारत के साथ संबंध सुधारना चाहता है। ऐसे माहौल  में अब भारत को समझना है कि चीन भारत और अमेरिका के संबंध को किस निगाह से देखता है। 

जब से भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ है उसके बाद, एक महीने के भीतर G-5 के सदस्य देशों के नेता एक-एक कर भारत की यात्रा पर आए हैं। हमें अपनी विदेश नीति बनाते हुए इस बात का खयाल रखना चाहिए कि भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते के बाद चीन, रूस, फ़्रांस, ब्रिटेन जैसे देश भारत के साथ राजनीतिक और आर्थिक संबंध सुधारने की दिशा में यदि रुचि ले रहे हैं तो इसकी वजह क्या है।

भारत की आबादी आज लगभग एक सौ बीस करोड़ है और चीन की डेढ़ अरब। हम दोनों आज विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। हमारे यहां बहुत बड़ा मानव संसाधन है और विकास की संभावनाएं भी। एशिया के हम दोनों पड़ोसी देश यदि मिल जाएंगे तो हम आधी दुनिया के बराबर होंगे। उसके बाद संयुत राष्ट्र, विश्व बैंक, डब्ल्यूटीओ और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और चीन का दबदबा होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के साथ संबंध सुधारने के पीछे अमेरिका की रुचि इसलिए है क्योंकि इसमें उसका व्यापार हित छिपा हुआ है। 

दिक्कत यह है कि अमेरिका जिस देश के साथ अपना रिश्ता सुधारता है तो उस रिश्ते में वह अपने राजनीतिक और आर्थिक  हित के साथ-साथ कूटनीतिक और सामरिक हित भी जोडऩा चाहता है।  पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, उत्तर कोरिया और जहां-जहां उसकी गर्दन फंसी हुई है, भारत को दोस्त बनाकर वह अपने पक्ष में खड़ा करना चाहता है। अफगानिस्तान में फेल हो गया है अमेरिका। अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान का रिश्ता जुड़ा हुआ है। इस बीच पाकिस्तान और चीन के बीच रिश्ते को लेकर भी वह संजीदा है। इसलिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका भारत के साथ संबंध सुधार के मामले में आर्थिक-राजनीतिक शतरंजी गेम खेल रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कई तरह के आर्थिक समझौते हुए हैं। इसी समझौते के तहत अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनी बोल्मार्ट भारत आएगी। वह अपनी पहले भारत के महानगरों में और उसके  बाद छोटे शहरों और गांवों में बड़ी-बड़ी दुकानें खोलेंगी। 

इन दुकानों में वह गांव के किसानों से खरीदी ताजी सब्जी, दूध, फल, अंडे जैसी रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान बेचेगी। इस समझौते के पीछे एक तरफ यह दिया जा रहा है कि इससे गांव के लोगों को आर्थिक विकास का फायदा मिलेगा। लेकिन मेरा मानना है सिर्फ मुट्ठी भर बड़े किसानों को इसका फायदा मिलेगा। जबकि इससे देश मे छोटे किसानों की हालत बदतर होगी और बेरोजगारी भी बढ़ेगी।

बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान जिन अमेरिकी कंपनियों के साथ परमाणु करार हुए हैं उसका फायदा हमें तो बीस-तीस साल बाद नजर आएगा लेकिन इस करार के बाद अगले दो-तीन सालों में ही वहां हजारों की संख्या में नई नौकरियां सृजित होंगी और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, जो आर्थिक मंदी से निपटने में अमेरिका की मदद करेगा। 

जहां तक सुयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल है तो मरा मानना है कि यह सिर पर सजे कांच के मुकुट की तरह तरह है, जो कभी भी जमीन पर गिरकर बिखर सकता है। हम पांच देशों के एक ऐसे क्लब का सदस्य बनना चाह रहे हैं जो खुद अब पतनशील है। बदलते वैश्विक समीकरण में उसकी कोई खास सार्थकता भी नहीं रह गई है।

लेकिन, हमें अमेरिका या चीन उतना खतरा नहीं है जितना हमारी अपनी अंदरूनी समस्याओं से है। आज हमारा देश भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, क्षेत्रीयतावाद, सांप्रदायिकता जैसी आंतरिक समस्याओं से ग्रस्त है। हम यदि इन अंदरूनी समस्याओं से जितनी जल्दी निजात पा लें, हमारे देश और यहां की जनता का उतना भला होगा।  
(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में 30 दिसंबर 2010 को प्रकाशित)

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