शनिवार, 20 नवंबर 2010

नए और पुराने मूल्यों के बीच सैंडविच की तरह है नई पीढ़ी : कथाकार संजीव

कहानीकार संजीव का जन्म कई जगहों पर हुआ है। लेकिन बचपन की स्मृतियों के संबंध में जहां सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में मेरा जन्म हुआ, उसका अपना एक विशेष प्रकार का आकर्षण रहा है। 

इसे आप नॉस्टेल्जिया कहिए या कुछ और। वहां बचपन में जब बड़ी उम्र के लोग मुझे गोद में खिलाते थे, सियार, नील गाय दिखाते, बहलाते थे तो मुझे  उस समय तक की स्मृतियां हैं। सुल्तानपुर में मां रहती थीं इसलिए मेरे लिए यह ओकर्षणीय है।

मैं पश्चिम बंगाल में पढ़ता था तब भी सुल्तानपुर से जुड़ा था। मैं अपने गांव से जुदा हो ही नहीं सकता। मुझे कभी-कभी प बंगाल से भी अधिक सुल्तानपुर अपील करता है। हालांकि उसने मुझे ऐसा कुछ दिया नहीं सिवाय जन्म, मां, पत्नी , रिश्तों और मित्रों को छोड़कर। 

वहां से कुल्टी, पश्चिम बंगाल मेरे काका ले गए थे। उन्हें लगा कि लड़का दो अक्षर पढ़ लेगा वहां। कहते थे कि गांव में रहेगा तो गाय चराएगा, वहां जाएगा तो पढ़ लेगा। उस समय मैं तीन साल का था। गाड़ी मैंने पहली बार देखी थी। उस समय मुझे पेटोल की गंध बहुत अच्छी लगती थी।

मेरे एक मि़त्र हैं सूर्य नारायण शर्मा। हम दोनों में बचपन से ही दुनिया बदल डालने की प्रवृत्ति रही। हम दोनों बचपन में अच्छे-अच्छे कागज लाकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखते थे कि यहां ये हो रहा है, वहां वो हो रहा है। हमारे पास बहुत कम पैसे होते थे। किसी भी तरह उन चिट्ठियों को भेजते थे कि शायद कुछ बदल जाएगा। लेकिन कभी उनका जवाब नहीं आया। 

सूर्य नारायण शर्मा ने बाद में नक्सलबाड़ी मूवमेंट की ओर रुख कर लिया और मैं बहुत बाद में इसमें आया उस मूवमेंट के सिम्पेथाइजर के रूप में। 

पश्चिम बंगाल में मेरे कई लोगों से मित्रता हुई और उन सबसे गहरी आत्मीयता के साथ जुड़ा। ओझा जी, देवनाथ सिंह, मनोज कुमार शुक्ल, दिनेश लाल, मिलिंद कश्यप, सृंजय, भेलानाथ सिंह, नरेन, शिव कुमार यादव, गौतम सान्याल बहुत सारे मित्र थे।

मेरी बहुत सारी कहानियां हमारे घर से निकलीं। वह ऐसे कि सभी मि़त्र मेरे घर पर बैठते। जो भी साधारण खाना खिचड़ी, दाल, चावल, आलू,-चोख बनता वह सभी खाते और कहानी, कविता, उपन्यास, अंश का पाठ करतें सभी निद्वद्व होकर अपनी राय देते थे, जो यहां संभव नहीं है। 

उन दिनों सभी हमारे घर पर आते थे। उनमें क्रांतिकारी भी थे। बाबा नागार्जुन, अरुण प्रकाश, नरेन, बी. के. शर्मा, मनमोहन पाठक, नारायण सिंह, समीर, रविभूषण सभी आते थे। जो आत्मीयता मुझे इन सभी मित्रों से मिली वह मुझे यहां दिल्ली में नहीं मिलती। हां, सुल्तानपुर के मित्र अलग हैं। राम शिरोमणि पांडे और लालू सिंह गाय चराते थे।

आज की नई पीढ़ी हमारी पीढ़ी से जयादा जानकार है। सूचना प्रौद्योगिकी की नई-नई तकनीकों से लबरेज है। करियर की तलाश में वह अपनी जमीन और अपने सामाजिक सरोकारों पूरी तरह कट चुकी है।

नए और पुराने मूल्यों के बीच सैंडविच की तरह है नई पीढ़ी। लेकिन यह विकास एक जैसा सब जगह नहीं हुआ है और लोग भी अलग-अलग वर्गों और पृष्ठभूमि से आते हैं। अब सवाल यह है कि जो नई दुनिया पुरानी दुनिया को विस्थापित कर रही है, उसे हम किस निगाह से देखें।

हर नई पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से आगे की सोच रखती है। इस मायने में अगर हमारी नई पीढ़ी हमसे आगे है या हमसे ज्यादा सफल है तो यह हमारी ही जीत है। लेकिन अफसोस यह है कि कुछ लोगों को मैंने कुछ ज्यादा ही आत्ममुग्ध पाया है।

आज जो लोग सुदूर गांवों में रहते हैं, जिनके पास तकनीक नहीं है, जो पिछड़े हैं, कभी-कभी ऐसा लगता है कि उन्हें जिंदा रहने का अधिकार ही नहीं है।

नई पीढ़ी चौंधियाती हुई भाषा का इस्तेमाल करती है। हर बड़ा लेखक अपने कंटेंट और प्रयोग के लिए उपयुक्त भाषा गढ़ लेता है। 

एक रचनाकार के रूप में मैंने यथार्थ को विभ्न्नि कोनों से पकड़ने की कोशिश की है। ऐसा लगता है कि सच को जानने की एक जिद है। नई पीढ़ी हमसे ज्यादा उर्जावान है और उम्मीद है कि वह इस चीज को बचाए रखेगी।  

(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित. 17 नवंबर 2010 के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में प्रकाशित)

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