शनिवार, 27 अगस्त 2011

ब्रह्मपुत्र की उदारमना बेटी इंदिरा गोस्वामी


इंदिरा गोस्वामी 
मित्रो,
२१ अगस्त २०११ को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकशित मामोनी रायसम उर्फ़ इंदिरा गोस्वामी पर प्रकाशित मेरा यह लेख पढ़ सकते हैं.
शुक्रिया.

-शशिकांत 



‘‘इस लड़की के सितारे इतने ख़राब हैं। इसे दो टुकडे़ करके ब्रह्मपुत्र में फेंक दो’ - यह भविष्यवाणी की थी असम के नवग्रह मंदिर के ज्यातिषी ने मामोनी रायसम गोस्वामी उर्फ इंदिरा गोस्वामी की मां से। तब मामोनी एक नवयुवती थीं। 

उस ज्यातिषी की भविष्यवाणी को झुठलाकर इंदिरा गोस्वामी आज 68 साल की हैं और भारतीय साहित्य का गौरवशाली व्यक्तित्व बन चुकी हैं। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित असम राज्य के सबसे प्रतिष्ठित साहित्य सभा पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। तमाम भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुका है उनका साहित्य। 

हालांकि यह भी सच है कि इस खूबसूरत लेखिका की निजी जिंदगी तकलीफ और संघर्षों से भरी रही, बावजूद इसके कि उनका जन्म एक रईस खानदान में हुआ और उनके इर्द-गिर्द ऐशो-आराम की कोई कमी नहीं थी। ‘‘मेरे फोर फादर लैंडलॉर्ड थे और रिलीजियस हेड भी थे।

उस वक्त हमारे पास लम्बी इम्पोर्टेड कार होती थी और घोड़े-हाथी भी थे। लेकिन हमारे घर का परिवेश बहुत साधारण था क्योंकि फादर ‘सिम्पल लीविंग एंड हाय थिंकिंग’ में विश्वास रखते थे। हालांकि वे एजुकेशन के स्टेट डायरेक्टर थे। उनकी इस थिंकिंग की वजह से हमें बहुत कष्ट झेलना पड़ता था। सिलांग के जिस पाइन माउंट इंग्लिश स्कूल में मैं पढ़ती थी वह हाई क्लास ब्रिटिश स्कूल था, लेकिन हमारे पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े होते थे। फादर ज्यादा कपड़े नहीं देते थे।’’ इंदिरा जी कहती हैं।

बालपन की स्मृतियां आज भी मामोनी के जेहन के किसी कोने में सुरक्षित हैं। रायसम ने बतायाः ‘‘उन दिनों मेरी उम्र पांच-छह साल रही होगी। हमें गांव में गरीब और छोटी जातियों - जो हमारी प्रजा होती थी- के साथ खेलने-कूदने की छूट नहीं मिलती थी। घरवालों की इस मनाही के बावजूद मेरा मन उन्हीं लोगों के साथ खेलने में लगता। लेकिन बुआ खींचकर तुरंत कुएं पर ले जातीं और नहला कर घर ले आतीं।

उसके बाद मेरी लाइफ में एक-एक कर कई प्रॉब्लम आए। मैं काफी दिनों तक डिप्रेशन में रही, खासकर फादर की मौत के बाद। मुझे फादर से बहुत लगाव था। एक तो उनके गुजर जाने का शॉक और फिर एग्जाम में अच्छे मार्क्स भी नहीं आए। सिलेबस की किताबें बोरिंग लगती थीं और अलग-अलग तरह की किताबें पढ़ना अच्छा लगता था। लोगों से मिलती-जुलती भी नहीं थी। मैं अपनी हवेली के पीछे ब्रह्मपुत्र नदी में डूबकर मर जाना चाहती थी। हालांकि उन दिनों मैं काटन कॉलेज, असम में पढ़ती थी। वहां मेरे बहुत सारे ‘एडमायरर’ (चाहनेवाले) थे। बहुत से लड़के मेरे लिए ‘कोटेशन’ लिखते थे। एक तो सच में पागल ही हो गया था। वह मेरे घर के सामने आता और कपड़े उतारकर जमीन पर बैठ जाता। तब मैं अठारह-उन्नीस साल की थी।’’

उसके बाद मामोनी की जिंदगी में एक-एक कर कई तरह के तूफान आए। उन्हीं के शब्दों में, ‘‘असम में उन दिनों लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती थी। फादर की मौत के बाद रईस खानदान से होने के बावजूद लोग मुझसे शादी करने से हिचकते थे। हालांकि मेरी खूबसूरती पर फिदा बहुत से लड़के मुझसे शादी करना चाहते थे लेकिन मां को वे पसंद नहीं थे। मैं भी नहीं चाहती थी।

एक दिन मैंने अपने गहरे दोस्त अब्दुल हन्नन से कहा कि मुझे नींद नहीं आती। मुझे नींद की गोली ला करके दो। वह मुझे बेहद चाहता था और कहता था कि तुम स्टार भी मांगोगी तो लाकर दूंगा। ‘गार्डीनल’ नींद की गोली बहुत नुकसान करती है। मैंने पूरी बोतल खा ली। उसके बाद सात दिन तक अस्पताल में भर्ती रही। पूरे असम में सनसनी फैल गई। डॉक्टर ने मां से कहा था- अब यह नहीं बचेगी। लेकिन मैं फिर भी बच गई। हालांकि उस घटना को लेकर मुझे बहुत दिनों तक परेशानी झेलनी पड़ी। लोगों में नींद की गोली खाने को लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलीं। इस कारण मुझे घर से बाहर निकलने में दिक्कत होती थी।’’

उस घटना से उबरने में मामोनी को वक्त लगा। उन्हीं की मुंहजबानी सुनिये: ‘‘फिर बहुत दिन बाद दक्षिण भारत का एक नौजवान इंजीनियर मेरे घर के पड़ोस में रहने आया। कई महीने की खामोशी के बाद उसकी मोहब्बत ने मुझे कुछ बोलने की शक्ति दी। ब्रह्मपुत्र के किनारे शाम को हमलोग साथ-साथ घूमते। उसने मेरी मां के सामने मेरे साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। लेकिन मां मेरी शादी किसी असमी लड़के के साथ ही करना चाहती थीं। 

आखिरकार वह राजी हो गईं और माधू के साथ मेरा विवाह हो गया। लेकिन कुदरत को मेरी यह खुशहाल जिंदगी अच्छी नहीं लगी। शादी के दो साल बाद ही एक जीप हादसे में मेरी दुनिया उजड़ गई। पति के साथ जीवन का छोटा सा अरसा गुजरा और फिर उनकी मौत के बाद घोर हताशा के वे क्षण, जब बार-बार खुदकुशी कर लेने का विचार मन में आता था।’’

जिस वक्त मामोनी की जिंदगी में यह तूफान आया उस वक्त वह तेईस साल की थीं। ‘‘उसके बाद मैं वृंदावन आ गई। आफ्टर डेथ माई हस्बेंड मैं लिखने-पढ़ने में समय बिताने लगी। एक साल तो मैंने ग्वालपाड़ा सैनिक स्कूल में काम किया। उसके बाद गवर्नर ऑफ असम के स्कॉलरशिप पर वृंदावन में माधव कंदली के ‘असमिया रामायण’ और ‘गोस्वामी तुलसीदास’ के रामचरित मानस का तुलनात्मक अध्ययन किया। दोनों का मेटाफर इतना पसंद आया कि मैंने सोच लिया कि इसी पर काम करूंगी। लेकिन जब मैं वृंदावन आई तो वहां कृष्णदासियों और पंडे-पुजारियों की जीवन झांकियां मन में क्षोभ और वितृष्णा पैदा करते थे।’’

सन 1971 में मामोनी दिल्ली आ गईं और दिल्ली विवि में मॉडर्न इंडियन लैंग्वेजेज डिपार्टमंेट में अध्यापन करने लगीं। दिल्ली में रहते हुए मामोनी को दुनिया ने इंदिरा गोस्वामी के नाम से जाना लेकिन उनके करीबी आज भी उन्हें मामानी कहकर ही संबोधित करते हैं।

मार्च 2003 में दिल्ली युनिवर्सिटी के प्रोफेसर कालोनी के फ्लैट में दिल्ली पढ़ने आई असमी बालाओं से घिरी मामोनी ने एक मुलाकात में बताया, ‘‘सन 71 से  दिल्ली में अकेली रह रही हूं। एक मकान मे अकेले रहना३पहले शक्ति ननगर में रहती थी फिर यहां प्रोफेसर कालोनी आ गई। लेकिन ब्रह्मपुत्र को लेकर आज भी मेरे अंदर ग्रेट फीलिंग है।’’

सन 2008 में वह रिटायर हो गईं लेकिन पढ़ने-लिखने का जुनून कम न हुआ। लेकिन खबर है कि पछले दिनों जब वह अचानक कॉमा में चली गई तो उन्हें गुवाहाटी शिफ्ट कराया गया। ब्रह्मपुत्र  के किनारे ही एक अस्पताल में आज उनका इलाज चल रहा है।

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