सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

प्रेम एक या़त्रा है, लम्बी यात्रा, पड़ाव नहीं....!!!

खुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वा की धार, 
जो उबरा सो डूब गया जो डूबा सो पार
-अमीर खुसरो
हिंदी के वरिष्ठ कवि विमल कुमार आजकल सहज, सहल और संवेदनशील प्रेम कविताएं लिख रहे हैं, जो ‘वसुधा’, ‘तहलका’, ‘विपाशा’, ‘पाखी’, ‘समावर्तन’, ‘पब्लिक एजेंडा’ में छपी हैं। अभी हाल में उनका प्रयोगशील उपन्यास ‘चांद का आसमान डॉट कॉम’ प्रकाशित हुआ है। वेलेंटाइन डे के मौके पर पेश है प्रेम के वास्तविक स्वरूप को परिभाषित करता विमल कुमार का विचारोत्तेजक लेख:

आज जब बाज़ार ने प्रेम को वेलेंटाइन डे में और अभिव्यक्ति के एक उत्पाद के रूप में बदल दिया है, प्रेम के बारे में गहन रूप से सोचने-विचारने तथा विश्लेषित करने की जरूरत पहले से अधिक बढ़ गई है। प्रेम क्या है? यह एक दार्शनिक सवाल की तरह हमेशा सभ्यता के इतिहास में उपस्थित रहा है।
प्रेम जितना लौकिक है, उतना पारलौकिक भी है। पर प्रेम की परिभाषा को कभी भोगवाद तो कभी अध्यात्मवाद से कैद करने की कोशिश की गई।  

लेकिन मेरे लिए प्रेम हमेशा जीवन की एक पुकार रही है। यह प्रेम एक तरह की सृजनात्मकता है, किसी भी तरह की हिंसा और विध्वंस के खिलाफ़। पर यह भी सच है कि हिंसक और क्रूर लोग भी प्रेम करते रहे हैं। आख़िर हिटलर भी एक लड़की से प्रेम करता था।

प्रेम हमेशा से समाज में जटिल रहा हैं भारतीय समाज में सत्री-पुरुष के संबंध सहज नहीं रहे हैं, इसलिए वह जटिल रूप में है। यहां प्रेम कई तरह की नैतिकताओं, कानूनों, पूर्वाग्रहों, मान्यताओं तथा अहम में भी कैद रहा है। जबकि प्रेम मनुष्य को मुक्त करने की एक प्रक्रिया है, जब राज्य और समाज उसे मुक्त नहीं कर पाता हो। तब प्रेम एक शरणस्थली है।
 
प्रेम वृक्ष की छांह है। पानी की बूंद है। चिराग की रोशनी है। एक सहारा है एक विश्वास हैएक उम्मीद हैपर भौतिकता की तेज आंधी में यह लगातार ध्वस्त हो रहा है। प्रेम आज सत्ता विमर्श का एक हिस्सा बन गया है। प्रेम पर बंदिशें लगती रही हैं। यह जितना मुक्ति की खोज में है, उतना ही जकउ़ता गया है। यथार्थ और कल्पना के द्वन्द्व में फंसता रहा है।

सोचता हूं, क्या मनुष्य कहीं ख़ुद को ही तो प्रेम नहीं करता है? वह अपनी तस्वीर जब किसी दूसरे में ढूंढता है तो वह तादात्म्य स्थापित करता है। प्रेम एक मायने में खुद को प्रकाशित करना और आइने में अपना चेहरा देखना ही तो नहीं है? क्या वह अपनी ही समीक्षा है? अपनी निर्मम आलोचना स्वयं को उदघाटित करता हुआ?

प्रेम के पीछे
जब तक कोई मूल्य, आदर्श,  नैतिकता और पारदर्शिता नहीं है, यह एक तरह का छल है, पाखंड है, धोखा है, ख़ुद से भी और उससे भी, जिससे हम प्रेम करते हैं। इस अर्थ में शमशेर ने प्रेम की पवित्रता को अपनी कविताओं में व्यक्त किया है। उनके यहां प्रेम एक उदात्त भाव है। मनुष्य की अच्छाइयों और सद इच्छाओं का एक प्रतिफलन है। केदारनाथ अग्रवाल के यहां प्रेम एक गृहस्थ जीवन है। उसमें दायित्व और कर्तव्य बोध अधिक है।

अज्ञेय के यहां
प्रेम एक चिंतन और गहन दार्शनिक विश्लेषण के रूप में मौजूद है। अशोक वाजपेयी के यहां प्रेम  देह विमर्श तथा रीतिकालीन छौंक लिए हुए है। उसे ज्ञानेन्द्रपति की कविता ‘चेतना पारीक कैसी हो' आज भी होंट करती है।

होंट करती है, उदय प्रकाश के दूसरे काव्य संग्रह में 'एक बाहर को छोड़ते हुए' सात कविताएं भी। आलोक धन्वा की ‘भागी हुई लड़कियां’ प्रेम की खोज में ही घर से भागती है। गोरख पांडेय की कविता ‘तुम्हारी आंखों' में तकलीफ़ों के संमंदर के रूप में प्रेम व्यक्त हुआ है।

अरुण कमल की ‘वसुधा’ में छपी कविता भी गहरे प्रेम को दर्शाती है। प्रत्यक्षा की कुछ कविताओं में प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति है। सविता सिंह की ‘विपाशा’ में छपी कविता प्रेम की खोज में स्त्री के अस्तित्व की रक्षा की कविता है तो अनामिका की कुछ कविताओं में स्त्री के घाव के दर्द की अभिव्यक्ति है।
 
मंगलेश डबराल की कुछेक कविताओं में प्रेम बहुत ‘सूक्ष्म’ ओर गहन स्तर पर चित्रित हुआ है। इब्बार रब्बी की कुछ कविताओं में प्रेम का दैनंदिन रूप और गृहस्थ रूप है। गिरिधर राठी के यहां भी प्रेम में चिंतन का रूप है।
 
बद्रीनारायण तथा एकांत श्रीवास्तव के यहां लोक जीवन में, तो कुमार अंबुज में खाना बनाती स्त्रियों के दुख के रूप में व्यक्त हुआ है। दरअसल, हिंदी कविता ने प्रेम के वृहत आयाम को छूने और पकड़ने की कोशिश की।

धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ और ‘कनुप्रिया’ में प्रेम रूमानी और सौंदर्यपरक रूप में विधमान है। भगवती चरण वर्मा की ‘चित्रलेखा’ से वह दार्शनिक अंतर्द्वन्द्व के रूप में अभिव्यक्ति हुआ, तो रेणु के यहां ‘पंचलैट’ और ‘मैला आंचल’ के डॉक्टर ओर कमली के संबंधों से चित्रित हुआ।

राजेंद्र यादव की कहानी
जहां ‘लक्ष्मी कैद है’ में स्त्री को मुक्त करने की चिंता के रूप में व्यक्त हुआ है। एक लंबी सूची है रचनाओं की। प्रेम किन-किन रूपों से व्यक्त हुआ है। उस पर शोध होना चाहिए।

मेरे लिए प्रेम एक सृजनशील, सच्ची और  निश्छल अभिव्यक्ति है। वाकई दिल एक बच्चा है। वह अगर बूढ़ा हो गया, तो उसमें निश्चितता गायब है। प्रेम नदी के स्वच्छ पानी की तरह है, और आसमान की तरह विस्तृत तथा समंदर की तरह गहरा है।

जब तक आप अपने अहम का समर्पण नहीं करते, आप किसी से प्रेम नहीं कर सकते। प्रेम एक दूसरे के सम्मान की रक्षा करना भी है। लेकिन कई बार मनुष्य क्रोध का भी गुलाम हो जाता है। क्रोध एक स्वाभाविक गुण है। लेकिन जब किसी मनुष्य में अपने क्रोध का ग़लती का एहसास है तो वह प्रेम भोग्य है।

जो व्यक्ति किसी को माफ़ नहीं कर सकता, वह किसी को प्रेम नहीं कर सकता
इसलिए प्रेम में उदारता और उदात्तता ज़रूरी है। प्रेम तमाम संकीर्णतओं तथा कट्टरताओं के खिलाफ़ है। प्रेम दरअसल एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। प्रेम मेरे लिए एकाधिकारवाद नहीं है। 

प्रेम अपने ऊपर हंसता भी है। मेरा मानना है कि मनुष्य केवल एक व्यक्ति से प्रेम नहीं करता, कईयों से एक साथ करता है, क्योंकि जीवन में इतनी विविधताएं हैं कि मनुष्य विविध अनुभव प्राप्त करना चाहता है, कई बार।

विविधता और संपूर्णता की ख़ोज प्रेम को संकट में डाल देती है। लेकिन जब हम एक नागरिक समाज में रहते हैं जहां रूल आफ लॉ का शासन है, तो हमें बंधन में सामंजस्य जरूरी है। 


प्रेम अराजक नहीं है। एक ऑर्डर है। लहर है, पर ऐसा तूफ़ान नहीं है जो जीवन को ही विध्वंस कर दे। इसलिए  प्रेम एक सच्ची दोस्ती है और 'शेयरिंग' है। प्रेम जितना व्यक्ति है उतना ही अव्यक्ति। प्रेम को कभी भी सफलता और असफलता के खांचे में नहीं देखा जाना चाहिए। प्रेम और विवाह दो अलग-अलग चीजें हैं।

विवाह एक मूर्त संस्था है जबकि प्रेम एक अपूर्ण संस्था है। प्रेम को किसी खित्ते में देखना ग़लत है। प्रेम मौन में  है और मौन से परे भी है। प्रेम अज्ञेय है। प्रेम गंध और रंग में है। प्रेम उल्लास और उमंग में है। प्रेम प्रसन्नता में है। प्रेम मृत्यु के खिलाफ़ है।
 

प्रेम तकलीफ़ों, दुखों के खिलाफ़ एक लड़ाई है। प्रेम एक तरह की समानता में है। प्रेम ही दुनिया की सच्ची क्रांति है। प्रेम जाति, धर्म, संप्रदाय, पद, प्रतिष्ठा, यश - इन सबसे परे है पर यह सच है कि प्रेम सत्ता विमर्श में फंस गया है। बाज़ार ने उसके स्वरूप को नष्ट कर दिया है।

प्रेम किसी का इस्तेमाल नहीं है, वह कोई ख़रीद-बिक्री की चीज़ नहीं है। प्रेम किसी को दुख देना नहीं है, किसी को चोट पहुंचाना नहीं है
लेकिन मनुष्य कई तरह की कमज़ोरियों तथा दुर्गुणों से संचालित होता है। मनुष्य देवता नहीं है। पर प्रेम में मनुष्य किसी को ‘देवत्व’ देना चाहता है। प्रेम एक दूसरे के व्यक्तित्व को ‘स्पेस’ देने की आज़ादी भी है प्रेम करनेवाले तर्क-वितर्क का भी स्वागत करें, आलोचना का भी, पर एक-दूसरे को प्रेम करें।

प्रेम में झगड़ा होना भी स्वाभाविक है। झगड़े होने चाहिए, पर अंत सुखद हो, दुखद नहीं। यह तभी संभव है जब आप अपने अहम पर विजय पाएं। केदारनाथ सिंह की इस छोटी सी कविता से बात ख़त्म करना चाहूंगा-

‘‘तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर मैंने सोचा
दुनिया को इसी तरह नर्म और सुंदर होना चाहिए।’’
इसलिए प्रेम में एक लक्ष्य होना चाहिए। यह लक्ष्य देह को प्रापत करना नहीं। देह भी निमित्त है, मंज़िल नहीं। कई बार देह प्राप्त कर भी हम उससे प्रेम नहीं कर पाते। इसलिए प्रेम एक या़त्रा है, लम्बी यात्रा, पड़ाव नहीं....!!!

5 टिप्‍पणियां:

  1. Very beautiful and powerful surgery of different emotions of Love by the writer. Kudos to him.
    I agree Love is a particle of faith and surrender to one's loveliest sentiments. That sentiment could be manifest in a woman, a man or a inanimate object.
    Happy Valentine's Day
    Frank

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  2. बढ़िया लगा शशिकांतजी। उम्दा।

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  3. मेरे लिए प्रेम एक सृजनशील, सच्ची और निश्छल अभिव्यक्ति है। प्रेम नदी के स्वच्छ पानी की तरह है, और आसमान की तरह विस्तृत तथा समंदर की तरह गहरा है।

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