कब बंद होगी मादा भ्रूण और नवजात बच्चियों की हत्या?

मित्रो, भारत के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी की बीवी सलमा अंसारी ने कल 11 फ़रवरी 2011 को  कहा है 
"बेटी को पैदा ही नहीं होने देना चाहिए. और यदि वह
पैदा हो जाए तो माँ-बाप को चाहिए कि पैदा होते ही 
उसे मार दें...!!!"
 

सत्ता के शीर्ष पर बैठे एक पढ़े-लिखे परिवार की संभ्रांत औरत की तरफ़ से आया यह बयान काफ़ी अफ़सोसनाक है. बेशक, सलमा अंसारी साहिबा ने आहत होकर यह बयान दिया है लेकिन आज ज़रूरत है औरतों पर हो रहे ज़ुल्मों के खिलाफ़ लड़ने की, न कि शुतुरमुर्गी बयान देने की. आज से कोई १२-१३ साल पहले दैनिक भास्कर, इंदौर में "कब बंद होगी मादा भ्रूण और नवजात बच्चियों की हत्या?" शीर्षक से मैंने यह लेख लिखा था. मोहतरमा सलमा अंसारी के विवादास्पद बयान के बाद यह लेख आज प्रासंगिक हो गया है. - शशिकांत 

पिछले दिनों फ़रीदाबाद (हरियाणा) के एक अस्पताल में एक औरत ने लगातार तीसरी बार एक बेटी को जन्म दिया। प्रसव के बाद होश में आने के बाद  डॉक्टर ने उसे बेटी होने की जानकारी दी. कुछ ही देर बाद उसने गला घोंटकर अपनी नवजात बेटी की हत्या कर दी। पुलिस ने उस औरत के खिलाफ़ अपनी नवजात बेटी की हत्या का मामला दर्ज किया है। 

यहां यह सवाल उठता है कि उक्त बच्ची की हत्या के लिए सिर्फ उसकी मां दोषी है या उसका परिवार भी अथवा पूरा पुरुषप्रधान भारतीय समाज? यह सोचने की बात है।
 
दरअसल, लिगभेद पर आधारित पुरुषप्रधान समाज में स्त्रियों पर अत्याचार और यातना की दर्द भरी दास्तान पैदाइश के बाद किशोरावस्था या युवावस्था में नहीं बलिक गर्भ से ही शुरू हो जाती है। शायद यही वजह है कि युनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक एशिया में गर्भावस्था में बाल शिशुओं के बनिस्बत मादा शिशुओं का जीवन दुनिया के मानदंडों के अनुसार बहुत ही कम है। सर्वेक्षण में पाया गया है कि भ्रूण हत्या और गर्भपात की सबसे ज्यादा शिकार मादा शिशु होती हैं.
 
राष्ट्रीय महिला आयोग के सहयोग से दिल्ली की चार झुग्गी बस्तियों- जवाहर कैंप, आज़ाद कैम्प, जफ़राबाद एवं टिगरी कालोनी में किए गए सर्वेक्षण में यह बात उभरकर सामने आई है कि अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा हे। इतना ही नहीं, अल्ट्रासाउंड जांच के बाद गर्भस्थ मादा भ्रूण की या तो हत्या कर दी जाती है या फिर गर्भवती सित्रयों की देखभाल में भेदभाव किया जाता है. 

इस तरह भ्रूण हत्या या गर्भपात की शिकार होने से जो मादा शिशु बच जाती हैं वे कमजोर और कम वज़न की पैदा होती हैं तथा उनके कुपोषित होने का ख़तरा बना रहता हैं. आजादी के पांच दशक बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश में कानूनी तौर पर भ्रूण की जांच को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद ऐसा हो रहा है। 

परिवार कल्याण निदेशालय द्वारा प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 के लागू होने के लगभग चार साल बाद देश भर के कस्बों, शहरों ओर महानगरों के निजी क्लिनिकों में गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में धड़ल्ले से भ्रूण परीक्षण हो रहे हैं और गर्भवती सित्रयों, उनके परिजनों और डॉक्टरों की मिलीभगत से मादा भ्रूणों की हत्याएँ की जा रही हैं। 

गर्भ के अंदर ही नहीं बल्कि जन्म के तत्काल बाद देश के कई हिस्सों में आज नवजात बच्चियों की ह्त्या कर दी जाती है। यह  कुकृत्य अधिकांश मामले में दाइयां, घर की बुजुर्ग औरतें या शिशु की मां घर के पुरुषों के दबाव में करती हैं। नवजात बच्चियों की इन हत्याओं के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं. 

पिछले दिनों राजस्थान के एक गांव में एक सौ पंद्रह साल बाद आई बारात की ख़बर सुनकर लोगों के रोगते खड़े हो गए थे. परंपरागत राजपूतों के उस गांव में लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता है. आज भी उस गांव में गिनी-चुनी लड़कियाँ ही हैं। 

इस संबंध में प्राप्त एक रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर, तमिलनाडु के सेलम, बिहार के सीतामढी,  पूर्णिया, भागलपुर और कटिहार तथा हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में मादा शिशु हत्या की घटनाएं ज्यादा हो रही हैं।
 
मादा भ्रूण एवं नवजात बच्चियों धड़ल्ले से की जा रही हत्या की वजह से देश में स्त्री-पुरुष अनुपात में लगातार कमी आ रही हैं. कुछ राज्यों में तो यह अनुपात काफ़ी चिंताजनक हालत तक पहुंच गया है। हरियाणा में प्रति 1000 पुरुषों के मुक़ाबले महज़ 874 औरतें हैं। जबकि पंजाब में यह संख्या प्रति 1000 पुरुषों में महज़ 880 है। 

संयुक्त राष्ट्र बाल कोश युनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक पंजाबी घर में शून्य से पांच साल की उम्र की लड़कियों की मौत की संभावना लड़कों की तुलना में दस फ़ीसद ज़्यादा है।
 
उल्लेखनीय है कि प्रसव पूर्व निदान तकनीक विनिमय एवं दुरुपयोग निवारण अधिनियम 1994 के अनुसार 1 जनवरी 1996 से गर्भस्थ शिशु भ्रूण की लिंग जांच के लिए अल्टासोनोग्राफ़ी एमिनोसेंटेसिस आदि जैसी प्रसव पूर्व निदान तकनीक का इस्तेमाल करने आदि जैसी प्रसव पूर्व निदान तकनीक का प्रयोंग करने और भ्रूण के लिंग संबंधी जानकारी देने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और इसका उल्लंघन करनेवालों के लिए दंड का प्रावधान किया गया है. 
 
20 वीं सदी के आखिरी दौर में भारत में ल्रिभेद को  ख़त्म करने, महिलाओं को अधिकार देने, राजनीति एवं व्यवस्था में उनकी भागीदारी बढ़ाने आदि को लेकर चल रहे विमर्श के बीच देश भर की महिला, बाल एवं स्वयंसेवी संगठनों तथा बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी है कि वे लिंगभेद पर आधारित इन हत्याओं को रोकने के लिए आगे आएँ। 

देश में लगातार कम हो रहे स्त्री-पुरुष अनुपात को संतुलित करना बेहद ज़रूरी है। इस दिशा में सरकार, न्यायपालिका एवं मीडिया को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। 


(22 दिसंबर, 1998, दैनिक भास्कर, इंदौर में सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित)
 

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