यह है अतुल...रियल...'राइजिंग इंडिया'....!


यह है अतुल...रियल...'राइजिंग इंडिया'....!

"यार सब चढ़ गए, मैं ही रह गया. अब मैं कहा लटकूँ?" फ़ोटो में पटरी पर खड़ा एक आदमी सोच रहा है. 
आज दिन में मैंने फेसबुक पर ट्रेन पर सवार बेहिसाब सवारियों की यह फ़ोटो लगाईं थी. शाम को ख़बर आई कि उत्तर प्रदेश में बरेली में ITBP के 400 पदों के लिए आये 7 लाख अभ्यर्थियों के लौटने के लिए भारतीय रेल ने कोई व्यवस्था नहीं की थी. अभ्यर्थी हिमगिरी एक्सप्रेस और उसकी छत पर सवार हुए. शाहजहाँपुर में ट्रेन की छत पर सवार नवयुवक करंट की चपेट में आ गए. अबतक 24 नवयुवकों की मौत की ख़बर है.
बिहार में ऐसी बसें पहले बहुत दिखती थी. अब भी दिखती है जिसमें लटके आदमी तो दिखाई देते हैं बस छुप जाती है. पता नही कैसे सफर करते हैं. फटफटिया ऑटो में भी ऐसा ही कुछ नज़ारा होता है. इसका चालक आड़े - तिरछे , बड़े मजेदार ढंग से बैठता है. क्योंकि ड्राइवर की सीट पर भी दो-तीन लोग तो बैठे ही रहते हैं. कई बार मुजफ्फरपुर में हमारी हालत ऐसी ही हो जाती थी जैसा कि इस तस्वीर में पटरी पर खड़े आदमी की हो गयी है...
कोर्ट ने सीएनजीकरण न करने पर जब बस चलाने पर रोक लगा दिया था तब और ब्लूलाइन या ऑटो हड़ताल के वक्त दिल्ली में भी मैंने ऐसा ही नज़ारा देखा है. सुविधाएं जब छीन जातीं हैं तो सभी औक़ात में आ जाते हैं वो बिहार हो या दिल्ली. मुंबई में लोकल ट्रेन की भी तो कुछ ऐसी ही गत होती है.
ऐसी होनी चाहिए फ़ोटो पत्रकारिता और मीडिया की भाषा, जो हाशिए पर खड़े आख़िरी इंसान की तकलीफ़ों को बयाँ करे.
लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यही है. हाशिए पर खड़े इंसान . मुद्दों पर मीडिया और मीडिया के धुरंधर, कभी बात नहीं करते. बात तब होती है जब खुद को चमकाना होता है. मुद्दे तब उठाये जाते हैं जब आपको अपनी पहचान बनानी होती है. ओपन पत्रिका इसका उदहारण है. 
अभी यह ...नयी पत्रिका है तो लगातार (राडिया मामला, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल) मुद्दे उठा रहीहै. लेकिन क्या कुछ वर्षों बाद यह भी इंडिया टुडे और आउटलुक की तरह सेक्स सर्वेक्षण नहीं छापने लगेगा. तहलका भी इसका एक उद्धरण है. हम-आप जानते हैं कि अब यह नाम का ही तहलका है. तो ईमानदार छवि अपने को चमकाना है तो हाशिए पर खड़े आदमी की बात कीजिये नहीं तो सेक्स सर्वेक्षण कीजिये.
400 पदों के लिए 2-4 लाख अभ्यर्थी! मुल्क़ में बेरोजगारी का ये हाल है. महंगाई और भ्रष्टाचार ने आम इंसान का जीना दुश्वार कर रखा है. इन्हीं वजहों से मिस्र की जनता सड़क पर उतर चुकी है. क्या हम हिन्दुस्तानी सत्ता-व्यवस्था के ज़ुल्म-ओ-सितम सहने के आदी हो गए हैं?
शासकों को इस मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए कि जनता उन्हें चुनने के लिए मज़बूर है....बस, दिमाग़ फिरने की ज़रुरत है...भूखा और सताया हुआ आम आदमी कुछ भी कर सकता है. 
(उदय  प्रकाश, पुष्कर पुष्प  और संजय सिंह के साथ) 

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