सोमवार, 3 जनवरी 2011

के. जी. कन्नाबिरन : क्रांति जिसके लिए अपरिहार्य थी...

के. जी. कन्नाबिरन
श्रधांजलि  
मित्रो,  
पहली जनवरी को जब देश और दुनिया में नए साल का जश्न मनाया जा रहा था. सुबह-सुबह विमल जी ने फ़ोन कर एक दुखद ख़बर दी कि कन्नाबिरन नहीं रहे. मैंने वरिष्ठ वकील शांति भूषण को फ़ोन मिलाया. भरे हुए गले से दुःख प्रकट करते हुए वे बोले, "हाँ, कन्नाबिरन अब हमारे बीच नहीं हैं. जे.पी. ने जब  पी.यू.सी.एल. का गठन किया, कन्नाविरन तब से पी.यू.सी.एल. से जुड़े थे. वे पी.यू.सी.एल. के प्रेसिडेंट रहे थे. उन्होंने लाइफ़ लॉन्ग ह्यूमन राइट के लिए काम किया. वे एक बहुत बड़े एक्टिविस्ट लायर थे." मैंने जब उनसे उनके बारे में विस्तार से टिप्पणी करने कहा तो असमर्थता जताते हुए शांति भूषण बोले, "मैं उनके बारे में इतना ही जानता हूँ. आपको उनके बारे में ज़्यादा ख़बर राजिंदर सच्चर जी देंगे." भाई अभिषेक श्रीवास्तव से बात करके मैंने राजिंदर सच्चर को फ़ोन मिलाया. उनके साथ हुई बातचीत आज के दैनिक भास्कर में ऑप-एड पेज पर प्रकाशित हुई है. 

साथियो, बिनायक सेन को सज़ा सुनाये जाने के बाद आजकल दुनिया भर के मानवाधिकारवादी और बुद्धिजीवी जबकि परेशान हैं, कन्नाबिरन की मौत के बाद हिन्दुस्तान ने नागरिक अधिकारों की लड़ाई लडऩेवाला एक सामाजिक योद्धा खो दिया है. आप इस टिप्पणी को पढ़कर के. जी. कन्नाविरन और उनके योगदान को याद करे!   -शशिकांत

हिंदुस्तान के विख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता और आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के बहुचर्चित वकील के. जी. कन्नाबिरन का पिछले 30 दिसंबर को निधन हो गया। उन्होंने अपने घर में चुपचाप आखिरी सांस ली। मौत से पहले उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों से कहा था कि उनकी लाश को प्रचार सामग्री और नारेबाजी का वस्तु नहीं बनाया जाए। उनकी पैदाइश सन 1929 में हुई थी।

सन 1976 में जयप्रकाश नारायण ने पीपुल्स सिविल लिबर्टीज और डेमोक्रेटिक राइट्स (पी.यू.सी.एल.डी.आर.) की स्थापना की थी। पी.यू.सी.एल.डी.आर. के गठन के पीछे उनका उद्देश्य राजनीतिक विचारधाराओं से मुक्त एक ऐसा संगठन बनाना था जो विभिन्न राजनीतिक दलों से संबंधित लोगों  को एक साथ सिविल लिबर्टीज और मानव अधिकारों की रक्षा के लिए एक मंच पर लाया जा सके।

शंकर गुहा नियोगी
के. जी. कन्नाबिरन, जस्टिस वी. एम. तारकुंडे, असगर अली इंजीनियर, एम. एम. थॉमस, गिरीश कर्नाड, पी. जी. मावलंकर, ननी पालकीवाला, निखिल चक्रवर्ती, अरुण शौरी, सुरेन्द्र मोहन, रामजेठ मलानी, मधु लिमये वगैरह के साथ पी.यू.सी.एल. की नेशनल एक्जक्यूटिव के सदस्यों से एक थे।

के. जी. कन्नाबिरन करीब दस-पंद्रह साल तक पी.यू.सी.एल. के प्रेसीडेंट रहे थे. उन्होंने गरीब वर्कर्स के हित में बहुत काम किया। दरअसल वे एक वकील के साथ-साथ मानवाधिकार कार्यकर्ता भी थे। राज्य के उत्पीडऩ से पीडि़त लोगों के अधिकारों के लिए एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए उन्होंने निचली अदालतों और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबे समय तक मानवधिकारों के हक की लड़ाई लड़ी।

मानवाधिकार समर्थक वकील के तौर पर उनका सबसे ऐतिहासिक योगदान शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड का मुकदमा था।  निचली अदालत में उस केस को लड़ते हुए कन्नाविरन ने उनके हत्यारों को हाइकोर्ट में सजा दिलवाई। आंध्र प्रदेश में भी मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में उनका उल्लेखनाय योगदान रहा है।  वहां माओवादियों और सरकार के बीच बातचीत में उन्होंने कई बार महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  उनका दूसरा बड़ा योगदान फर्जी एन्काउंटर से संबंधित था। उन्होंने कहा था कि जब भी कोई फर्जी एन्काउंटर होता है तो उस मामले में मुकदमा दायर होना चाहिए और मजिस्टेट से उस मामले की जांच होनी चाहिए।

के. जी. कन्नाबिरन इतिहास के अच्छे जानकार थे और नागरिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों के कानूनी विशेषज्ञ थे। उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। वामपंथी विचारधारा की राह पर चलते हुए उन्होंने लगातार लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई लड़ी और फर्जी एन्काउंटर पर गठित भार्गव आयोग के समक्ष नक्सलवादियों के पक्ष में दलील दी, और जब उनके पक्ष को नहीं सुना गया तो उन्होंने उस कमिटी से त्यागपत्र देना मुनासिब समझा।  उस कमिटी में वे सरकार की तरफ से वकील नियुक्त किए गए थे।

के. जी. कन्नाबिरन लंबे समय तक पीपुल्स वार ग्रुप के क्रांति करने के अधिकार के सैद्धांतिक समर्थक थे। कानूनी और सामाजिक परिप्रेक्ष्य एवं नागरिक अधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को लेकर मुल्क के बड़े-बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ उनका संपर्क बना। उसी दौरान मैं भी कन्नाबिरन के संपर्क में आया। उनके साथ मेरे  अनौपचारिक संबंध थे। वे मुझे राजिंदर कहते थे और मैं उन्हें कन्ना बुलाता था। वे जब भी कुछ लिखते थे तब छपने से पहले मुझे पढऩे देते थे।

कन्नाबिरन नागरिक अधिकारों में जाति का सवाल लाने के खिलाफ थे। दरअसल वे मानवीयता में विश्वास रखनेवाले बुद्धिजीवियों में से एक थे। वे लगातार मानव अधिकारों के पक्ष में लिखते रहे। उनके लिए नागरिक अधिकारों के संरक्षण का सवाल काफी अहम था। वे ऐसे हर मामले को सहानुभूति पूर्वक देखते थे।

वे एक ऐसे वकील थे जिन्होंने किसी मामले में कभी भी किसी पक्ष के लिए अपने मुख्य न्यायाधीश या किसी अन्य न्यायाधीश से मुलाकात नहीं की। कन्नाबिरन व्यक्तिगत और संस्थानों की क्षमता में विश्वास करते थे। उन्होंने आजीवन ख़ुद को ईमानदारी, वैचारिक प्रतिबधता और निष्पक्षता के आधार पर मामलों को निपटाने में कुशल थे।

एक अर्थ में कन्नाविरन लोकतांत्रिक आदर्शां को साथ लेकर चलते थे। वे माओवादी विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखते थे। उन्हें  धीरे-धीरे समझ में आ गया था कि जीवन के लिए क्रांति अपरिहार्य है।  हालांकि वे राज्य हिंसा और नक्सली हिंसा की प्रकृति का घनघोर विरोध भी करते थे।

कन्नाबिरन की विचारधारा को समझने के लिए यह जान लेना जरूरी है कि उन्होंने एक बार कहा था- मैं न तो हूँ एक गांधीवादी और न ही एक पाखंडी बेवकूफ। मौत से पहले 81 साल की उम्र में उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। कन्नाबिरन की मौत के बाद देश ने नागरिक अधिकारों की लड़ाई लडऩेवाला एक सामाजिक योद्धा खो दिया है।

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