आस्था संविधान और न्यायपालिका से ऊपर नहीं : राजेंद्र यादव ने शशिकांत से कहा



मुझे लगता नहीं है कि अयोध्या पर कोर्ट का फैसला आने से कोई विशेष गड़बड़ होने जा रही है, क्योंकि दोनों ही पक्ष इस बात के लिए तैयार हैं कि फैसला उनके पक्ष में होगा और नहीं होगा तो वे आगे के कोर्ट में जाएंगे. अभी तो रास्ते खुले हैं. 

हालांकि मुझे एक शंका यह भी है कि हिन्दू आसानी से आस्थाओं को तोड़ता नहीं है. मुसलमान तो बिल्कुल नहीं. मगर स्थिति यह बना दी गई है कि दोनों ही पक्ष सच्चाई नहीं जानना चाहते, सिर्फ अपनी आस्था का समर्पण चाहते हैं.

अगर केवल हिन्दू समाज की बात करूँ तो आस्था के नाम पर अंधविश्वासों ने पता नहीं कितनी कुरीतियों और अन्यायों का समर्थन किया है. याद कीजिये जब सटी प्रथा पर रोक लगी थी तो आस्था पर कितना गहरा आघात उस समय के धर्मप्रण  हिंदुओं ने किया होगा. शायद उस वक्त कुछ प्रदर्शन और उपद्रव भी हुए थे. 

नरबलि के ऊपर प्रतिबंध आसानी से स्वीकार नहीं किया गया, विधवा विवाह और बाल विवाह को लेकर तो अभी तक असंतोष और प्रतिरोध जारी है. इन्हें सामाजिक कुरीतियों की तरह नहीं  धार्मिक विश्वासों के रूप में देखा जाता है, चाहे खाप पंचायतों के प्रेमी युगल की हत्याओं का मामला हो या गंगा में डूबकर मोक्ष पाने का प्रश्न हो.

आस्थाओं को लेकर हमेशा ही इस तरह का वातावरण तैयार किया जाय कि अगर उन्हें छेदा गया तो संसार का प्रलय हो जाएगा, धर्म का नाश हो जाएगा. आर्य समाजियों और गांधीवादियों ने कुछ कुरीतियों को बंद करने का प्रयास किया था लेकिन वे भी धीरे-धीरे उन्हीं के शिकार हो गए और आज आर्यसमाजियों को सनातनधर्मियों से अलग करना मुश्किल है. 

जब तक इस तरह की आस्थाएं और धार्मिक विश्वासों को कड़े कानूनी हाथों से नहीं कुचला जाता तब तक समाज में न किसी सुधार की गुंजाइश है न प्रगति की, क्योंकि पिछले दो सौ सालों में हम इन अंधविश्वासियों का कुछ भी बदल नहीं पाए हैं.

मेरे निगाह में बाबरी मस्जिद का प्रश्न कुछ निहायत
अंधविश्वासी जिद्दियों का प्रश्न है और वे धर्म के नाम पर अक्षित, अनपढ़ और अवैज्ञानिक समाज को अपने प्रभाव में लिए हुए हैं. वे जब चाहे हत्याएं और दंगे करा सकते हैं. हर शहर में हजारों छोटे-बड़े मंदिर खड़ा कर सकते हैं और हिंसक किस्म के जुलूस या प्रदर्शनों की अगुआई कर सकते हैं. 

इनके पीछे शातिर दिमाग राजनेता कभी खुलकर नहीं आते और हमेशा द्विअर्थी भाषा बोलते हैं, जैसा कि बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले की जांच कर रही लिब्रहान कमिटी के सामने उन सारे लोगों ने पल्ला झाड़ लिया जो इस जांच के पीछे से विध्वंस का संचालन कर रहे थे.

इसीलिए सबकी तरह हम भी सांस रोककर इस फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं कि आस्था किस तरह अपना बारीक खेल खेलती है. इससे बड़ा मजाक और क्या होगा कि आस्था का प्रश्न हर संविधान और हर न्यायपालिका से ऊपर है. उसे भगवान ही संचालित कर सकते हैं. अब झख मारिए और भगवान की शरण में जाइए.
 
 (२३ सितम्बर २०१० के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली  में प्रकाशित )

टिप्पणियाँ

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति .......
    लेकिन फैसला तो १ सप्ताह के लिए टल गया है .....

    पढ़े और बताये कि कैसा लगा :-
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_22.html

    उत्तर देंहटाएं
  2. कल 24 सितम्बर है ! कल को सिर्फ़ कल की ही तरह देखें...ठीक उस कल की तरह जो बीते कल में आज को देखा था...! हम कल ऐसे हालात से गुज़रेंगे जिसमें हमें सिर्फ़ एक ही चीज़ को दर्शाना बेहद ज़रूरी है... और वो है ... संयम और सब्र ! अगर हम ऐसा ना कर पाए तो देश एक फ़िर से 60 साल पीछे चला जाएगा. क्या हम चाहेंगे कि हमारे सब्र और संयम ना रख पाने की वजह से आने वाली पीढ़ी हमें गलियां दे... जैसे कि हम उनको कहते हैं जो हमारे पूर्वज थे जिनके बेहद गिरे हुए फैसलों ने हमें आजतक शर्मशार किया हुआ है. हमें किंचित मात्र भी जज़्बाती होने की ज़रूरत नहीं, और अगर आप वाक़ई जज़्बाती होना चाहते हैं तो देशहित में जज़्बाती होईये !

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  3. हालांकि मुझे एक शंका यह भी है कि हिन्दू आसानी से आस्थाओं को तोड़ता नहीं है. मुसलमान तो बिल्कुल नहीं. मगर स्थिति यह बना दी गई है कि दोनों ही पक्ष सच्चाई नहीं जानना चाहते, सिर्फ अपनी आस्था का समर्पण चाहते हैं. ......... आदरणीय राजेंद्र जी की बात सही है ।

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