शनिवार, 4 सितंबर 2010

छिनाल-छिनाल न खेलें, आशीष नंदी के लिए लड़ें!

बंधु,
गुजरात दंगे का विरोध करने के लिए गुजरात की राजसत्ता आशीष नंदी को प्रताड़ित कर रही है. सभी लेखकों-बुद्धिजीवियों को इसका विरोध करना चाहिए. हिन्दी के हमारे बहुत से साथी लोग तो आजकल छिनाल-छिनाल खेल रहे हैं, जिसे मैं माफी प्रकरण के बाद पावर डिस्कोर्स मानता हूँ. मैंने दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील और हिन्दी लेखक अरविंद जैन से आशीष नंदी के मसले पर बात की है जो आज (4 सितंबर 2010) के दैनिक भास्कर, नई दिल्ली में "अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन" शीर्षक से प्रकाशित हुई है. पूर्व संपादित लेख इस प्रकार है.
-शशिकांत 

अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन
  • अरविन्द जैन
(हिंदी के बहुचर्चित लेखक और दिल्ली हाईकोर्ट में वरिष्ठ वकील)  
 
मेरे हिसाब से यह लड़ाई उन बुद्धिजीवियों के विरुद्ध है जो गुजरात दंगे के खिलाफ़ थे. जिन बुद्धिजीवियों ने गुजरात सरकार, नरेन्द्र मोदी और उनकी नीतियों का विरोध किया उनके विरुद्ध किसी एनजीओ के माध्यम से एफआईआर दर्ज करवा देना राज्य सरकार के लिए मुश्किल काम नहीं है. आजादी के पहले इस किस्म के मुक़दमे गांधी, नेहरू, तिलक आदि नेताओं के खिलाफ़ भी हुए. ब्रिटिश हुकूमत अपनी राजसत्ता को बचाए रखने के लिए यह गुनाह कर रही थी. 
 
दुर्भाग्यवश आज भी हमारे देश में यह क़ानून है. मेरे हिसाब से इन कानूनों में ही बदलाव होना चाहिए.किसी राजसत्ता से असहमति जताने का यह मतलब नहीं कि वह देशद्रोही है. लोकतंत्र में यदि असहमति को मान्यता नहीं मिलेगी तो फिर लोकतंत्र का क्या मतलब, जबकि देश में अलग-अलग मत, सिद्धांत, विचारधाराएँ, नीतियाँ, रीति-रिवाज हैं. 
 
संसद में, सरकार या किसी दल की नीतियों के विरोध को क्या देशद्रोही कहा जाएगा? मेरी नरेन्द्र मोदी से हज़ार असहमतियां हो सकती हैं और व्यक्तिगत संबंध भी हो सकता है. असहमत होना विरोधी होना नहीं है.

सार्वजनिक जीवन में रहकर कोई यह सोचे कि उसके खिलाफ़ कोई असहमति या विरोध ही न हो जैसा मिसेज गांधी ने आपातकाल में किया तो ऐसा राज्य बहुत दिन तक टिक नहीं सकता. लोकतंत्र की बुनियाद है असहमति. यदि आप असहमति का गला घोंट रहे हैं तो आप लोकतंत्र का भी गला घोंट रहे हैं. लोकतांत्रिक सरकार को विवेक से काम लेना चाहिए. 
 
जो सरकार अपने लेखकों, विद्वानों, कलाकारों का सम्मान नहीं करती वह वह अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारती है. इसीलिए मैंने कहा कि यह सारा मामला राजसत्ता के विरोध में खड़े बुद्धिजीवियों की आवाज को कुचलने का है. और यह काम भाजपा, कॉंग्रेस, वामपंथी, लालू, मुलायम, मायावती सभी सरकारों ने किया है.

आज किसी में भी अपनी सरकार की आलोचना सुनने की हिम्मत नहीं है. इसीलिए आज राजसत्ता के विरोध का मतलब है तस्लीमा को देशनिकाला, एम एफ हुसैन पर मुकदमेबाजी ताकि वे देश छोड़ने पर मजबूर हो जाएं, और आशीष नंदी पर देशद्रोह का मुकदमा चलाकर जेल में बंद कर दो. 
 
यह आज आशीष नंदी के साथ हुआ है कल मेधा पाटकर, महाश्वेता देवी आदि के साथ हो सकता है. डॉ नंदी सारी उम्र अनेक विषयों पर जिस किस्म का लेखन करते रहे हैं उन्हें पढ़ने के बाद यह सपने में भी नहीं सोचा जा सकता है कि लिखने के पीछे उनकी नीयत समाज में घृणा पैदा करना, दंगा-फसाद करवाना आदि होगा. यह हो ही नहीं सकता. सारा जीवन जिन्होंने समाज के लिए सामाजिक कल्याण के लिए न्यौछावर कर दिया हो उस पर इस किस्म का लांछन दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है.

हमारे सामने उनका जो विवादित लेख है उस लेख को पूरा पढ़ा जाना चाहिए और उसकी पूरी पृष्ठभूमि के साथ पढ़ा जाना चाहिए. साथ ही उसमें जिन राजनीतिक स्थितियों का मूल्यांकन किया गया है, उसे भी समझने की जरूरत है. किसी लेख से दो लाइनें निकालकर उसके लेखक के खिलाफ़ मुकदमा दायर करना सही नहीं कहा जा सकता. 
 
भारतीय न्यायालयों के सामने इस तरह के बहुत सारे मुद्दे पहले पहले भी आये हैं (गुलाम सरवर, 1965, पटना हाईकोर्ट, इश्वरी प्रसाद शर्मा, 1927, लाहौर हाईकोर्ट, ललाई सिंह यादव, 1971, इलाहाबाद हाईकोर्ट) जिनमें न्यायालय ने कहा है कि  पूरे लेख या पूरी पुस्तक को पढ़कर ही निर्णय दिया जाना चाहिए.

यह अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को दबाने, अभिव्यक्ति का गला घोंटने और बुद्धिजीवियों को चुप करने की सरकारी कोशिश है. क़ानून को एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना ग़लत है. यह नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि जब हम अपनी सत्ता को बचाने के लिए क़ानून या राजसत्ता या अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं तो वह अपने आप में एक गैर कानूनी और गैर संवैधानिक काम है. कोई भी लेखक या बुद्धिजीवी जब लिखता है तो समाज और राष्ट्र के व्यापक हित को रख कर ही लिखता है, उसका व्यक्तिगत लाभ या हित नहीं होता है लेखन में.

यह हमेशा से राजसत्ता करती रही है. जब भी बुद्धिजीवी तबका उसका विरोध करता है तो उसमें से किसी एक को टारगेट करके बाकी लोगों को यह सबक सिखाया जाता है कि चुप रहो वर्ना यही हस्र तुम्हारा भी होगा. फिर लेखक सोचता है- भैया कौन बोले, क्योंकि सरकार के खिलाफ़ लड़ना-झगड़ना लेखकों, बुद्धिजीवियों के वश में नहीं है. जाहिर है कि कोई सरकार अगर विवेकपूर्ण ढंग से न्यायिक व्यवस्था का उपयोग नहीं कर रही है तो उसकी निंदा की जानी चाहिए और उसके खिलाफ़ लड़ाई लड़नी चाहिए. इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है. 

मेरे हिसाब से यह कहना भी गड़बड़ झमेले की बात है कि कि किसी लेखक को कह दिया जाए कि उसका लेख घृणा फैलानेवाला है और उसके खिलाफ़ एफआईआर दर्ज करवा दिया जाए. फिर न्यायिक व्यवस्था के तहत उसकी पुलिस जांच, गिरफ्तारी, कोर्ट-कचहरी की भागदौड़ आदि में सालों तक उलझा रहे लेखक. इतना हे नहीं, क़ानून की अपनी  टेक्निकलिटीज हैं जैसे कहाँ अपराध हुआ, कहाँ एफआईआर होगा वगैरह. 
 
जिस राष्ट्रीय अखबार में लेख छपा वह देश में दर्जनों जगहों से छपता है. देश में जहां-जहां भी वो पढ़ा गया क़ानून के हिसाब से वहां-वहां एफआईआर होना चाहिए. अब लेखक एक ही लेख पर देश के हजारों शहरों में मुक़दमे लड़ता रहे या फिर सुप्रीम कोर्ट में उन सारे मुकदमों को ट्रांसफर करवाए. 

एक एनजीओ जब किसी लेखक के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज करता है तब उस पर जांच का आदेश देने से पहले सरकार का फर्ज नहीं बनता कि वह इस मामले की तहकीकात करे कि यह आपराधिक मामला बनता भी है या नहीं.काफ़ी सोच-विचार के बाद ऐसा फैसला लिया जाना चाहिए. 
 
आशीष नंदी के इस लेख पर मुकदमा चलने की इजाजत देने से पहले क्या गुजरात सरकार ने किसी लीगल एक्सपर्ट से राय ली थी? मुकदमा चलाने के पहले उस लेख के पूरे आशय को. उसकी पूरी आत्मा को पढ़ने की जरूरत थी. अगर यह एफआईआर ग़लत दर्ज हुई है, कोई अपराध बनता है या नहीं यह तो अदालत तय करेगी लेकिन कानूनी प्रक्रिया से तो गुजरना ही पड़ेगा, जो बेहद तकलीफदेह हो सकती है. 
 
इसीलिए इस कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के खिलाफ़ भी प्रेस और बुद्धिजीवियों को लड़ना पड़ेगा. और इस लड़ाई का अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट में होगा. याद रहे सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी गुजरात सरकार को आदेश दिया था कि वह लेखक (डॉ. आशीष नंदी) को अरेस्ट नहीं करेगी.

एक लेखक और क़ानून का विद्यार्थी होने के नाते समझता हूँ कि आशीष नंदी के संपूर्ण लेखकीय योगदान और सामाजिक कार्यकलापों को देखते हुए पूरी पृष्ठभूमि, पूरे सन्दर्भ और खुली निगाह के साथ इस मामले को देखने की जरूरत है. एक विश्वविख्यात बुद्धिजीवी के खिलाफ़ इस किस्म की कार्रवाई गुजरात सरकार और राज्य की क़ानून-व्यवस्था को नुक्सान ज्यादा पहुंचाएगी, फायदा कम. मैं समझता हूँ कि नरेन्द्र मोदी भी बहुत शिक्षित और जागरूक किस्म के राजनेता हैं. 
 
इस विषय की नजाकत को समझते हुए गुजरात सरकार चाहे तो इस प्रकरण को वापस ले सकती है और ले लेना चाहिए. क्योंकि किसी समाज के हित में यही होता है कि विद्वानों का जो योगदान है उसकी भावना को समझकर ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए, ख़ासकर उन बुद्धिजीवियों का जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज को जोड़ने के लिए लगा दिया हो.
(शशिकांत के साथ बातचीत पर आधारित)

3 टिप्‍पणियां:

  1. hamare desh men yahi to hota hai .. buddhijeevi takleefen uthaata hai aur raaj netaaon ki chaandi rahati hai .. padhkar dukh hua ..

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  2. प्रज्ञा जी, टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. बिल्कुल सही कहा आपने. मैंने आपका ब्लॉग 'कुहासे में खोतीं सुबहें' देखा. बहुत अच्छा लिख रही हैं आप. 'स्त्री-देह का सच' टिप्पणी सार्थक है.

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  3. DR. NANDI HAS NOT SAID ANY THING WHICH IS UNPARLIAMENTRY. STARTING FROM EX-PRIMEMINISTER TO LALU ,MULAYAM ,SONIA, MAYAVATI ,PAWAR,NITISH TO EACH AND EVERY PERSON WHO IS AN INDIAN .”AAM ADAMI”,EACH AN EVERY PERSON CONDEMED WHAT HAPPNED IN GUJRAT .
    SO WHATS NEW IF DR. NANDI HAS RETREATED THE SAME IN HIS EDITORIAL.

    DR. NANDI HAD APPROACHED THE SUPREME COURT BY WAY OF AN SLP AND THE SLP WAS DISPOSED OF BY RESTRAINING STATE OF GUJARAT AND ITS AUTHORITIES AND OFFICIALS FROM TAKING ANY STEP TO ARREST AND DETAIN THE PETITIONER IN CONNECTION WITH THE PROCEEDINGS ARISING OUT OF THE ARTICLES WRITTEN BY THE PETITIONER. THIS PETITION WAS A GROSS MISUSE OF LAW.

    WHAT ELSE IS REQUIRED

    FOLLOWING WERE THE STATEMENTS MADE BY THE DR. NANDI IN THE ARTICLES IN REFERENCE TO STATE OF GUJARAT AND GUJARATIS IN THE ARTICLE :-
    “(A) GUJARATI CITIES PARTICULARLY ITS EDUCATIONAL INSTITUTIONS ARE TURNING CULTURAL DESERTS.

    (B) GUJARAT HAS ALREADY DISOWNED THE INDIAN CONSTITUTION.

    (C) THEY (HINDUS AND MUSLIMS) NOW FACE EACH OTHER AS HOSTILE NATIONS.

    (D) IN GUJARAT THIS CLASS (MIDDLE CLASS) HAS SMELT BLOOD FOR IT DOES NOT HAVE TO DO THE KILLING BUT CAN PLAN, FINANCE AND CO-ORDINATE THEM WITH IMPUNITY.

    (E) THE ACTUAL KILLERS ARE MOSTLY LOWERS OF THE LOW AND MOSTLY TRIBALS AND DALIT.

    (F) THE MIDDLE CLASS CONTROLS THE MEDIA AND EDUCATION WHICH HAVE BECOME HATE FACTORIES IN RECENT TIMES.

    (G) THEY RECEIVE SPIRITED SUPPORT FROM MOST NON-RESIDENT INDIANS WHO, AT A SAFE DISTANCE FROM INDIA CAN AFFORD TO BE MORE NATIONALIST BLOOD THIRSTY AND IRRESPONSIBLE.”

    WHATS WRONG IN IT---EACH AND EVERY CIVILIZED PERSON IS SUPPOSED TO COMMENT. FROM WHERE DOES SECTION 153-A AND 153-B COMES INTO PICTURE


    The Hon’ble High Court Of Delhi Dismissed The Petition Only On Ground Of Jurisdiction ---Nothing More Than This

    DELHI HIGH COURT HELD “IT IS NOT WITHIN THE JURISDICTION OF THIS COURT TO PREEMPT INVESTIGATION/TRIAL OF AN OFFENCE REGISTERED IN GUJARAT IN RESPECT OF THE COMMUNITIES IN GUJARAT ABOUT OFFENCES ALLEGEDLY COMMITTED UNDER SECTIONS 153-A AND 153-B IPC BY ANALYZING THE ARTICLE AND OBSERVING WHETHER THE ARTICLE FELL WITHIN THE MISCHIEF OF SECTIONS 153-A AND 153-B IPC. IF THIS IS DONE THEN NO OFFENCE UNDER SECTIONS 153-A AND 153-B IPC CAN EVER BE TRIED BY ANY METROPOLITAN MAGISTRATE AND EVERY OFFENCE UNDER SECTIONS 153-A AND 153-B IPC WILL HAVE TO BE GONE INTO BY HIGH COURT OR SUPREME COURT ALONE WHO WILL HAVE TO ANALYZE THE ARTICLE RIGHT IN THE BEGINNING AND COME TO A CONCLUSION WHETHER THE ARTICLE FELL WITHIN THE MISCHIEF OF SECTIONS 153-A AND 153-B IPC USURPING THE POWERS OF METROPOLITAN MAGISTRATE.”

    THE PETITION HAS NOT FORCE AND IS HEREBY DISMISSED


    THE ACT DONE BY GOVT OF GUJARAT IS TO SUPPRESS THE FREEDOM OF EXPRESSION. THE ARTICLE SHOULD BE READ FULL IN THE CORRECT SPRIT AND KEEPING IN MIND OF THE SITUATION OF THE STATE AT THAT TIME.

    IF SOMEONE IS TO BE HANGED THEN HANG
    1ST THE PERSON WHO SAID “ SARKAR KO RAJ DHARAM NIBHANA CHAHAYA”----

    HINDI ME EK KHAVAT HAI”CHORE NE KE MARE USKE MAA NE MARE.. JISNE AISA BUCHHA PAIDA KIYA”
    SO WHY NOT PUNISH THE NEWS PAPER WHO PUBLISHED THE ARTICLE INSTEAD OF THE PERSON WHO WROTE IT”


    WE ARE LIVING IN DEMOCRACY AND NO ONE WANT TO LISTEN TO MEDIA/OPPOSITION ---JO EMERGANCY KE TIME SITUATION THE VO AAJ BE VAISE HE HAI.

    THIS MATTER NEEDS A PROPER CONSIDRATION WITH A OPEN FRAME WORK OF MIND

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