सोमवार, 5 जुलाई 2010

लेखकीय स्वतंत्रता और बाज़ार (अब्दुल बिस्मिल्लाह ने शशिकांत से कहा)


जब इतिहास करवट लेता है या जब समय बदलता है तब उसका प्रभाव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर पड़ता है। साहित्य और कला की विधाएं उससे अछूती नहीं रह सकतीं। इस संदर्भ में काफी विचार होता रहा है और चिंताएं जाहिर की जाती रही हैं। लेकिन यह सच है कि जो बदलाव हो रहे हैं उन्हें चंद लोगों के विचार रोक नहीं सकते। लेकिन फिर भी हम लेखक और कलाकार इस पर विचार विमर्श करने से खुद को रोक नहीं सकते। 

साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर गौर करें तो
बाज़ार का दबाव एक बड़ा मसला बनकर उभरा है। कला और साहित्य पर बाज़ार का इतना दबाव पहले कभी नहीं था जितना आज है। अब सवाल यह उठता है कि इस दबाव को पैदा करनेवाली कौन सी शक्तियां हैं? यह सच है कि लेखक या कलाकार यह दबाव पैदा नहीं कर रहा है। रचनाकार खुद को अभिव्यक्त करने के लिए रचना करता है। स्वान्त: सुखाय वाली बात तो अब रही नहीं। हां अपनी अभिव्यक्ति को वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहता है। इसके लिए आज कई नए माध्यम भी आ गए हैं। और जब सारे माध्यम बाज़ार से ही संचालित हो रहे हैं तो लेखक और कलाकार क्या करे।

आज के  बाज़ारवादी दौर में यदि कोई लेखक या कलाकार खुद को
बाज़ार की गिरफ़्त से बाहर रखना चाहता है तो उसके सामने कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें आती हैं। एक लेखक कला के क्षेत्र में जब भी कोई सर्जनात्मक कार्य करता है तो वह उसको प्रकाशित, प्रसारित भी कराना चाहता है। इस लिहाज से लेखक का पहला रिश्ता मुद्रित माध्यम से है। यह माध्यम भी अब बाज़ार की गिरफ़्त  से बाहर नहीं रह गया है।

जहां तक हिंदी भाषा का सवाल है तो आज हिंदी मीडिया की भाषा हो गई है। मीडिया के साथ हिंदी अब लगातार सुदढ़ हो रही है। आज से पहले हिंदी में कभी भी इतने अखबार और पत्रिकाएं नहीं निकलती थी। बाज़ार सबको विज्ञापन भी मुहैया करा रहे हैं। टीवी चैनलों पर भी हिंदी के कार्यक्रमों की भरमार है। हिंदी की फिल्में पूरी दुनिया में लाकप्रिय हो रही हैं। हिंदी भाषा  को इतना अधिक प्रसारित, प्रचारित करने का श्रेय आज की मीडिया को ही जाता है। हिंदी का यह रूप निश्चित रूप से हिंदी भाषा से जुड़े लोगों को रोजगार दिलाने में सहायक रहा है।

लेकिन आज का हिंदी लेखक इसलिए लाचार है क्योंकि साहित्य आज भी किसी लेखक को रोज़गार नहीं दिला पाता। रोजगार के लिए वह न चाहते हुए भी समझौता करने करने के लिए बाध्य है। साहित्य रोज़गार बढ़ाने में सहायक क्यों नहीं है, यह एक गंभीर सवाल है। हिंदी की नई पीढ़ी क लेखक के सामने यह एक बड़ी चुनौती है। बाजार में नाम बिकता है। नई पीढ़ी में इतना धैर्य कहां!


आज का कड़वा सच यह है कि बड़े से बड़ा लेखक भी अपनी लाभ-हानि का खयाल करके लिखता, बोलता है। अपनी अभिव्यक्ति को लेकर वह सतर्क है। रचनात्मक सतर्कता फायदेमंद है लेकिन व्यक्तिगत सतर्कता कला और साहित्य के लिए घातक है क्योंकि व्यक्तिगत सतर्कता यानी स्वार्थ से जुड़ी सतर्कता सच कहने या लिखने से आपको रोकती है। आज मीडिया भी सतर्क है और अपनी लाभ-हानि के बारे में सोचता है।


ज़माना काफी तेजी से बदल रहा है। अभिव्यक्ति के माध्यम बढ़े हैं तो रचनाकार और कलाकार भी बढ़े हैं। लेखक पर एक बड़ा सामाजिक और नैतिक दबाव भी होता है। अतीत हो या वर्तमान ऐसे गिने-चुने रचनाकार ही होते हैं जो बिना किसी दबाव के सर्जनात्मक कार्य करते हैं। आज जब कोई रचनाकार बेबाक तरीके से अपनी बात कहता या लिखता है तो उसके सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं और उसे संघर्ष करना पड़ता है।

लेखक की स्वतंत्रता जब छीनी जाती है तो उसका असर रचना पर पड़ता है। उसका मूल स्वरूप ख़त्म हो जाता है। पहले सिर्फ मुद्रित माध्यम था। आज कई तरह के आडियो विजुअल माध्यम आ गए हैं। जाहिर है इतने माध्यम हैं तो लेखक को समझौते भी करने पड़ रहे हैं और जो समझौते नहीं कर रहे हैं वे या तो हाशिए पर धकेले जा रहे हैं या धैर्य के साथ अपनी छमता को स्वीकार करवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


लेखक और मध्यवर्ग के रिश्ते पर भी विचार होना चाहिए। आज के बाज़ारवादी समय में भी ऐसे कई रचनाकार हैं जो सादगी से रहते हैं। विज्ञान का सिद्धांत है कि कोई चीज ख़त्म नहीं होती सिर्फ उसका स्वरूप बदल जाता है। चूंकि लेखक और कलाकार को जीवनयापन के लिए कोई न कोई काम करना पड़ता है, और रोजगार शहर, महानगर में ही मिलते हैं, इसलिए शहर या महानगर में रह रहे आम मध्यवर्गीय लेखक से सादगी की उम्मीद करना आदर्शवादी सोच कही जाएगी, व्यावहारिक नहीं। सादगी गांव या छोटे शहरों में मिलती है। जैसे-जैसे आप शहर की ओर उन्मुख होंगे वैसे-वैसे आपके जीवनयापन के स्वरूप में परिवर्तन होता चला जाएगा। 


जाहिर है कोई इन्सान एक सामाजिक-आर्थिक परिवेश से निकलकर जब दूसरे सामाजिक आथिक परिवेश में जाता है तो उसके सामने खुद को बदलने की मजबूरी होती है। इस बदलाव के जिम्मेदार वह नहीं बल्कि शहरी या महानगरीय परिवेश, वहां का समाज, आसपड़ोस और उसके परिवार की नई पीढ़ी के सदस्य होते हैं। यानी समय, परिस्थिति, वातावरण, आसपास के परिवेश आपको मध्यवर्गीय बनने के लिए बाध्य करते हैं। ऐसे कम लोग होते हैं जो स्वत: मध्यवर्गीय बन जाते हैं। आज का जीवन ही दबाव का जीवन है। इस दबाव के कारण होने वाले बदलावों से कोई खुद कब तक बचा पाएगा।


जहां तक हिंदी में स्त्री और दलित लेखन का सवाल है, साहित्य और कला के क्षेत्र में अलग-अलग खानों में बांटकर विचार विमर्श करना ठीक नहीं। मध्यकालीन भक्ति साहित्य को कभी भी जाति या धर्म में बांटकर नहीं देखा गया। साहित्य और कला की प्रवतियों का लेखन, विश्लेषण और विवेचन उसकी अपनी प्रवृतियों के आधार पर ही होना चाहिए। मैं कभी भी खुद को हिंदी का मुसलमान लेखक कहलाना पसंद नहीं करूंगा।

(दैनिक भास्कर, नई दिल्ली, 3 जुलाई 2010 को प्रकाशित)

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया बातचीत.
    आपका इ मेल पता दीजिये..

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  2. अच्छा लगा बातचीत पढ़कर.......... 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' ।

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  3. शशि,
    नमस्कार !

    काफी समय बाद मिले -वह भी नेट्जाल की मायवी दुनिया में। अब्दुल जी का इंटरव्यू पढ़ा । अच्छा लगा।

    शायद तुमको पता हो , जयपुर में हूँ आजकल। पल्लव की तरह मुझको भी तुम्हारा भी फोन नम्बर चाहिए।तुम मुझको मेरे पुराने इ-मेल आइ. डी. पर लिख सकते हो- tomanojmishra@gmail.com

    मनोज
    [आशा है मेरे नाम से तुमको कोई संदेह नहीं होगा। मैं वही हूं 92-94 बैच हिन्दी एम.ए. ]

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