रविवार, 11 अप्रैल 2010

पुण्यतिथि के बहाने फणीश्वरनाथ रेणु को याद करते हुए

ग्यारह अप्रैल को फणीश्वरनाथ रेणु की पुण्यतिथि है। 1977 में इमरजेंसी खत्म होने के डेढ़-दो महीने बाद ही उनकी मौत हो गई थी। रेणु को हम क्यों याद करते हैं? अभी तक का जो हिंदी साहित्य है उसमें सबसे उत्कृष्ट किसानी जीवन का साहित्य है।

फणीश्वरनाथ रेणु के साथ एक शब्द आया- आंचलिकता। यद्यपि यह शब्द पंत जी का है। रेणु के साहित्य को आंचलिक साहित्य कहा गया। उसके बाद हिंदी साहित्य में आंचलिकता की पृवृत्ति पहचानी गई। रेणु का साहित्य वस्तुत: व्यतीतमानता (यानी जो हमेशा के लिए बीत रहा है, गुजर रहा है) का साहित्य है। इसका एक ऐतिहासिक कारण है।

आज़ाद हिंदुस्तान में चुनाव हुए, पंचवर्षीय योजनाएं बनीं, सड़कों का निर्माण हुआ और इन सबके साथ विस्थापन का बड़ा दौर शुरू हुआ। गांव के लड़के शिक्षा और नौकरी के लिए बड़ी तादाद में शहरों-महानगरों में आए। वहां उनको नौकरी मिली। शादी करके वे वहीं बीवी-बच्चों के साथ रहने लगे। यानी इनके लिए परिवार का मतलब था पत्नी और बच्चे। यह मध्यवर्ग कहलाया। यह मध्य वर्ग पैदा तो हुआ गांव में, वहीं पला-पुसा लेकिन लेकिन रहने लगा शहर में।

जो देहाती शहरी बन गया उसकी निगाह से गांव को देखता है उसको ग्रामकथा, आंचलिक कहानी या आंचलिक उपन्यास कहा गया। इनके यहां खास तरह के पात्र आपको मिलेंगे। मार्कण्डेय, शिवप्रसाद सिंहं, नागार्जुन, रामदरश मिश्र आदि के साहित्य में ऐसे कई पात्र आपको मिलेंगे।

यह पृवृत्ति कविता में भी आई थी। शंभुनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह आदि उन दिनों ग्रामीण बिंबों, प्रतीकों का खूब इस्तेमाल कर रहे थे। इसी बीच में फणीश्वरनाथ रेणु आए। रेणु के आने के बाद ग्रामकथा एक नया रूप अख्तियार किया।

रेणु के पहले ग्रामकथाओं की भाषा किताबी थी। उनमें कुछ आंचलिक शब्द जरूर डाल दिया जाता था। रेणु के साहित्य में एक अजीब बात सामने आई। उनकी भाषा में आंचलिक बोली की लय है और वह वाचिक अनुभाव के साथ है। बोलियों का जो वाचिक नाट्य है वो आश्चर्यजनक ढंग से रेणु की भाषा में है। इस वाचिक लय में देखा हुआ जीवन है, वह जीवन जो यथार्थ में है। रेणु ने पहली बार अपनी भाषा में इन सबका इस्तेमाल किया।

इसके अलावा रेणु ने मिथक, लोकविश्वास, अंधविश्वास, किंवदंतियां, लोकगीत- इन सबको अपनी रचनाओं जगह दी। ये सभी ग्रामीण जीवन की अंतरात्मा हैं। इन सबके बिना ग्रामीण जीवन की कथा नहीं कही जा सकती। प्रेमचंद का साहित्य ज्यादातर स्थितियों का साहित्य है लेकिन असलियत यह है कि समग्रता में रेणु के यहां जो ग्राम्य जीवन है, वह प्रेमचंद के यहां नहीं है। हिंदी आलोचना में इसे नोटिस नहीं लिया गया है।

रेणु के यहां विपन्न लोगों के जीवन की सांस्कृतिक संपन्नता है। रेणु के ज्यादातर पात्र दलित, अवर्ण और पिछड़े तबकों से हैं। इस योगदान पर भी प्रगतिशील आलोचना ने ध्यान नहीं दिया। ग्रामीण यथार्थ की द्वंद्वात्मकता की जबरदस्त पकड़ है रेणु में। बिना विचारधारा के यथार्थ को नहीं देखा जा सकता लेकिन इतिहास के प्रवाह, राजनीति, संस्कृति - ये सब यथार्थ के ही अंग हैं पर यदि आपकी नज़र इन सब पर है तो आप यथार्थ को पकड़ सकते हैं। रेणु ने इसे भलीभांति पकड़ा है।

रेणु की निगाह बदलते ग्रामीण समाज पर थी। जब कोई नई चीज गांव में आती है तो स्थानीय संस्कृति कैसे उसे अपनाती है (अंगरेजी में इसे ‘कल्चरल एक्सेप्टिबलिटी’ कहते हैं) रेणु ने ‘पंचलाइट’ कहानी में इसे बखूबी से दर्शाया  है। उनकी लेखनी का जादू यह है कि ग्रामीण जिंदगी की छोटी से छोटी स्थितियां वे इतनी बारीकी से बयां करते हैं कि वे मोहक बन जाती हैं।

दरअसल, साहित्य सिर्फ घटनाओं का वर्णन नहीं करता बल्कि वे घटनाएं गांव के लोगों के मन पर जो इमेज छोड़ती हैं, उन्हें शब्दबद्ध करके बड़ा रचनाकार अपनी रचना में जादू पैदा करता है। रेणु के साहित्य में पाठक इस तरह के इमेज जगह-जगह देखते हैं। ये सब रेणु के पहले हिंदी साहित्य में नहीं था। ग्रामकथा अपने अंधविश्वासों में, मिथकों में, लय में, प्रकृति में, अपने नाद और स्वर में, भाषा में नाट्य लय के साथ उपस्थित करते हैं रेणु। रेणु को पढ़ना ग्रामीण जीवन को जीने की तरह है।

‘तीसरी कसम’ रेणु की अद्भुत कहानी है। लेकिन इसमें प्रेम का कहीं भी ज़िक्र नहीं होता। 40 साल का  गाड़ीवान हीरामन और खूबसूरत नर्तकी हीराबाई। हीरामन नहीं जानता कि वह प्रेम कर रहा है। हीराबाई हीरामन को ‘मीता’ कहती है, इसलिए नहीं कि दोनों का नाम एक है बल्कि दोनों की मानसिकता भी एक है। दोनों के बीच प्रेम का संयोग बेमिसाल है।

दोनों में आंतरिक समानता भी है। हीरामन के जीवन में प्रेम की कोई गुंजाइश नहीं और हीराबाई ऐसे पेशे में है जहां हर दिन उसे प्रेम का ढोंग करना पड़ता है। दोनों का हृदय प्रेम के अनुभव के लिहाज से रेगिस्तान की तरह है। इस रेगिस्तान में जब प्रेम का सोता फूटता है तो दोनों एक-दूसरे से गहरी अंतरंगता से जुड़ते हैं।

हीरामन बार-बार स्वप्न-लोक में जाता है। उसके मन में जो संचित स्वप्न रहा होगा उसे वह जागती आंखों से देखता है। इस स्वप्न का क्लाइमेक्स है- ‘लाली लाली डोलिया पे लाली रे दुल्हनियां’ गाना, कहानी और फिल्म दोनों में। स्वप्न और स्वप्न-भंग की कहानी है ‘तीसरी कसम’। इस पर बहुत अच्छी फिल्म बनी है और म्युजिक तो कमाल का है।

आज हम इसलिए रेणु को याद करते हैं क्योंकि उनका साहित्य हिंदी जाति के सौंदर्य बोध को समृद्ध करने के साथ-साथ अमानवीयता, पराधीनता और साम्राज्यवाद का प्रतिवाद भी करता है। हाशिए के हिंदी समाज की अस्मिता और उसके स्वत्व को एक मजबूत भित्ति और सुरक्षा प्रदान करता है रेणु का साहित्य।
(10 अप्रैल 2010 दैनिक भास्कर, दिल्ली में प्रकाशित. विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ शशिकांत की बातचीत पर आधारित)

4 टिप्‍पणियां:

  1. रेणु की याद ! जाती ही कहाँ है ? 'तीसरी कसम' जैसी अद्भुत कहानी लिखने वाले को कौन भुला सकता है ,इस कहानी पर बनी फिल्म मैंने कई -कई बार देखी ,लेकिन फिर भी दिल न भरा .

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